Bollywood Movie Review: ‘अंदाज़ अपना अपना’, जब एक मामूली शुरुआत वाली कॉमेडी कल्ट फिल्म बन गई

Bollywood Movie Review Andaz Apna Apna: ‘अंदाज़ अपना अपना’ रिलीज के समय बड़ी व्यावसायिक सफलता नहीं थी, लेकिन आमिर खान, सलमान खान, परेश रावल और क्राइम मास्टर गोगो के यादगार किरदारों व संवादों ने इसे धीरे-धीरे कल्ट फिल्म बना दिया।

Yogesh Mishra
Published on: 19 Sept 2026 2:11 PM IST
Bollywood Movie Review Andaz Apna Apna Film
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Bollywood Movie Review Andaz Apna Apna Film

Bollywood Movie Review Andaz Apna Apna: 1994 का भारत तेजी से बदल रहा था। आर्थिक उदारीकरण के बाद महानगरों की भाषा, फैशन और महत्वाकांक्षाओं में बदलाव दिखाई देने लगा था और केबल टेलीविजन भारतीय घरों तक पहुंच चुका था। हिंदी सिनेमा भी एक संक्रमण के दौर से गुजर रहा था। एक ओर पुरानी मसाला फिल्मों की परंपरा कायम थी, दूसरी ओर रोमांटिक सिनेमा नई पीढ़ी की पसंद बन रहा था। उसी साल ‘हम आपके हैं कौन’ पारिवारिक मनोरंजन का एक नया पैमाना बना रही थी। एक्शन, प्रेम और पारिवारिक मेलोड्रामा के बीच कॉमेडी को अक्सर सहायक शैली की तरह देखा जाता था। ऐसे समय में राजकुमार संतोषी ने ‘अंदाज़ अपना अपना’ बनाई, जो अपने समय की सामान्य कॉमेडी से अलग थी। इसमें हास्य केवल चुटकुलों से नहीं, बल्कि पात्रों की सोच, गलतफहमियों, लालच, आत्मविश्वास और उनकी लगातार बिगड़ती योजनाओं से पैदा होता है।

आज यह बात अजीब लग सकती है कि ‘अंदाज़ अपना अपना’ रिलीज के समय कोई बड़ी व्यावसायिक सफलता नहीं थी। लेकिन इसकी असली कहानी सिनेमाघरों से निकलने के बाद शुरू हुई। वीडियो कैसेट, टेलीविजन प्रसारण, केबल और बाद में इंटरनेट के दौर ने इस फिल्म को धीरे-धीरे नई पीढ़ियों तक पहुंचाया। दर्शकों ने इसे बार-बार देखा और हर बार इसमें कोई नया संवाद, प्रतिक्रिया या छोटी-सी हास्यपूर्ण हरकत खोज ली। ‘क्राइम मास्टर गोगो’, ‘तेजा मैं हूं, मार्क इधर है’, ‘आप पुरुष ही नहीं, महापुरुष हैं’ जैसे संवाद फिल्म की सीमाओं से निकलकर लोकप्रिय बोलचाल और हास्य संस्कृति का हिस्सा बन गए। इंटरनेट और मीम संस्कृति आने से बहुत पहले यह फिल्म अपने संवादों के जरिए लोगों के बीच लगातार दोहराई जा रही थी।

गंभीर निर्देशक ने बनाई इतनी बेतुकी कॉमेडी

‘अंदाज़ अपना अपना’ की कहानी इसलिए भी दिलचस्प है क्योंकि इसके निर्देशक राजकुमार संतोषी उस समय गंभीर और तीखे तेवर वाली फिल्मों के लिए पहचाने जाते थे। ‘घायल’ और ‘दामिनी’ जैसी फिल्मों ने उन्हें सामाजिक तनाव और मजबूत नाटकीयता वाले निर्देशक के रूप में स्थापित किया था। ऐसे निर्देशक से पूरी तरह हास्य पर आधारित, अराजक और लगभग कार्टून जैसी दुनिया वाली फिल्म की उम्मीद कम ही की जाती थी। संतोषी लंबे समय से ऐसी कॉमेडी बनाना चाहते थे जिसमें हास्य केवल पंचलाइन पर निर्भर न हो। उनका जोर पात्रों की मानसिकता, गलतफहमी, महत्वाकांक्षा और मूर्खतापूर्ण आत्मविश्वास से पैदा होने वाली स्थितियों पर था। उनकी कोशिश ऐसी दुनिया बनाने की थी जहां हर पात्र खुद को बहुत समझदार मानता है, लेकिन उसकी योजना अगले ही पल हास्यास्पद तरीके से उलट जाती है।


फिल्म की कहानी ऊपर से बहुत सीधी है। अमर और प्रेम दो ऐसे युवक हैं जो किसी तरह अमीर बनना चाहते हैं और उन्हें लगता है कि किसी अमीर लड़की से शादी इसका आसान रास्ता हो सकता है। लेकिन इसके बाद पहचान की गड़बड़ियां, झूठ, लालच, अपराधियों की एंट्री और लगातार पैदा होती गलतफहमियां कहानी को ऐसी दिशा में ले जाती हैं जहां तर्क से ज्यादा महत्वपूर्ण हास्य की लय हो जाती है। संतोषी ने जानबूझकर ऐसी दुनिया बनाई जिसमें दर्शक हर घटना को वास्तविकता के पैमाने से नापने के बजाय उसके हास्य को स्वीकार करे। यही वजह है कि फिल्म की अराजकता उसकी कमजोरी नहीं, उसकी सबसे बड़ी रचनात्मक ताकत बन गई।

आमिर और सलमान की जोड़ी ने बनाई अलग कॉमिक लय

आमिर खान और सलमान खान को एक साथ लेना फिल्म की सबसे बड़ी आकर्षणों में से एक था। दोनों की अभिनय शैली अलग थी और संतोषी ने इसी अंतर को कहानी के भीतर इस्तेमाल किया। अमर के रूप में आमिर का किरदार खुद को बेहद चालाक और योजनाबद्ध समझता है, जबकि प्रेम के रूप में सलमान अपेक्षाकृत भोला, भावुक और सहज दिखाई देता है। दोनों जब साथ आते हैं तो उनके व्यक्तित्व का अंतर अपने आप हास्य पैदा करने लगता है। एक अपनी योजना को बहुत गंभीरता से लेता है, दूसरा उसी योजना को अनजाने में बिगाड़ देता है। कई दृश्यों में संवाद से ज्यादा दोनों की प्रतिक्रिया और आपसी तालमेल हंसी पैदा करता है।


पर्दे के पीछे भी दोनों की कार्यशैली अलग होने की चर्चाएं होती रही हैं। आमिर अपने दृश्यों, संवादों और प्रस्तुति पर विस्तार से चर्चा करने के लिए जाने जाते थे, जबकि सलमान की अभिनय शैली अपेक्षाकृत सहज और तात्कालिक मानी जाती थी। शूटिंग में कलाकारों की तारीखों और अलग-अलग व्यस्तताओं के कारण भी दिक्कतें आईं और फिल्म का निर्माण अपेक्षा से लंबा चला। हालांकि पर्दे पर यही अलग-अलग ऊर्जा एक ऐसी जोड़ी में बदल गई जो बाद के वर्षों में हिंदी कॉमेडी की सबसे यादगार जोड़ियों में गिनी जाने लगी।

रवीना और करिश्मा भी कहानी की कॉमिक मशीनरी का हिस्सा

रवीना टंडन और करिश्मा कपूर उस समय लोकप्रियता की ऊंचाई की ओर बढ़ रही थीं, लेकिन ‘अंदाज़ अपना अपना’ में उनका इस्तेमाल पारंपरिक सजावटी नायिकाओं की तरह नहीं किया गया। दोनों कहानी की पहचान और भ्रम से जुड़ी केंद्रीय कड़ियां हैं। करिश्मा कपूर ने अपने किरदार में तेज और अतिरंजित कॉमिक ऊर्जा दिखाई, जबकि रवीना टंडन का अंदाज अपेक्षाकृत संयमित रहा। दोनों के अभिनय में अंतर फिल्म के हास्य को संतुलित करता है और पुरुष किरदारों की अराजकता के बीच कहानी को आगे बढ़ाता है।

फिल्म की खासियत यही थी कि कोई भी पात्र पूरी तरह सामान्य नहीं लगता। हर व्यक्ति अपनी छोटी-सी दुनिया और अपने तर्क के साथ मौजूद है। कोई खुद को बहुत चालाक समझता है, कोई अपनी ताकत को बढ़ा-चढ़ाकर देखता है और कोई परिस्थितियों को समझ ही नहीं पाता। इसी वजह से फिल्म में हास्य केवल संवादों से पैदा नहीं होता। चेहरे के भाव, चाल-ढाल, गलत समय पर कही गई बात और दूसरे पात्र की प्रतिक्रिया भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो जाती है। यही वह शैली है जिसकी वजह से फिल्म को बार-बार देखने पर भी उसकी कॉमेडी पुरानी नहीं लगती।

परेश रावल ने दो किरदारों से बढ़ाई अराजकता

परेश रावल की दोहरी भूमिका फिल्म की हास्य संरचना का बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा है। तेजा और रामगोपाल बजाज एक ही अभिनेता द्वारा निभाए गए दो अलग-अलग किरदार हैं, लेकिन दोनों की मौजूदगी कहानी में पहचान की उलझन को लगातार बढ़ाती रहती है। एक तरफ नकली अपराधी तेजा है, दूसरी तरफ अपनी ही परिस्थितियों से परेशान रामगोपाल बजाज। परेश रावल ने दोनों के हावभाव, आवाज और व्यक्तित्व में इतना अंतर रखा कि दर्शक उनके बीच के भ्रम को समझते हुए भी हर बार उसके नतीजे पर हंसता है।

शक्ति कपूर का क्राइम मास्टर गोगो तो फिल्म की अपनी अलग ही दुनिया बना देता है। किरदार अपराधी है, लेकिन उसकी भाषा, आत्मविश्वास और हरकतों में ऐसी बचकानी अतिनाटकीयता है कि वह डराने के बजाय हंसाने लगता है। उसका पहनावा, चलने का अंदाज, संवाद बोलने की शैली और हाथों की हरकतें सब कुछ जरूरत से ज्यादा नाटकीय हैं। ‘क्राइम मास्टर गोगो’ की लोकप्रियता यह बताती है कि किसी किरदार का स्क्रीन टाइम कम होने के बावजूद वह दर्शकों की स्मृति में कितना बड़ा स्थान बना सकता है। बाद में यह किरदार फिल्म के सबसे पहचाने जाने वाले सांस्कृतिक प्रतीकों में शामिल हो गया।

फिल्म का हास्य इतना सहज क्यों लगता है?

‘अंदाज़ अपना अपना’ की सबसे बड़ी रचनात्मक उपलब्धि उसकी हास्य शैली है। फिल्म किसी एक चुटकुले या पंचलाइन पर निर्भर नहीं रहती। यहां परिस्थितियां खुद हास्य पैदा करती हैं और पात्र अपनी ही गलतियों को और बड़ा करते जाते हैं। दर्शक को पहले से पता होता है कि कोई योजना गलत दिशा में जा रही है, लेकिन पात्र उसे पूरी गंभीरता से आगे बढ़ा रहे होते हैं। यही अंतर हंसी पैदा करता है।

कॉमेडी में अभिनय की टाइमिंग बहुत महत्वपूर्ण होती है। एक संवाद कुछ सेकंड पहले या बाद में बोला जाए तो उसका असर बदल सकता है। कैमरा अगर अभिनेता की प्रतिक्रिया सही समय पर न पकड़े तो पूरा मजाक कमजोर पड़ सकता है। ‘अंदाज़ अपना अपना’ में इसी वजह से कलाकारों की प्रतिक्रियाओं, चेहरे के भाव और संवाद की गति पर काफी ध्यान दिया गया। फिल्म देखने में सहज और बेतरतीब लगती है, लेकिन उसकी कॉमिक लय के पीछे काफी नियंत्रित निर्देशन और संपादन है।


फिल्म के कई संवादों की लोकप्रियता के पीछे कलाकारों की प्रस्तुति का भी बड़ा योगदान है। संवाद कागज पर जितना मजेदार हो सकता है, सही आवाज, चेहरे के भाव और विराम के बिना वह उतना प्रभावी नहीं बनता। संतोषी ने इसी प्रस्तुति को फिल्म की शैली का हिस्सा बनाया। नतीजा यह हुआ कि कई संवाद ऐसे बन गए जिन्हें लोग आज भी फिल्म का संदर्भ दिए बिना बोल देते हैं।

दृश्य संसार भी जानबूझकर थोड़ा नकली रखा गया

फिल्म की शूटिंग मुंबई और ऊटी सहित अलग-अलग स्थानों पर की गई। इसके दृश्य संसार को पूरी तरह वास्तविक बनाने की कोशिश नहीं की गई। होटल, अमीर घर, अपराधियों के ठिकाने और कहानी में आने वाले दूसरे स्थान वास्तविक दुनिया से जुड़े जरूर लगते हैं, लेकिन उनमें हल्का अतिरंजितपन बना रहता है। यह फिल्म के हास्य के अनुकूल था क्योंकि कहानी खुद भी वास्तविकता और पैरोडी के बीच चलती है।

सिनेमैटोग्राफी में भी इसी भावना को आगे बढ़ाया गया। चमकीले रंग, पात्रों की प्रतिक्रियाओं पर ध्यान और कई जगह प्रभावी क्लोज-अप फिल्म की कॉमिक शैली को मजबूत करते हैं। हास्य केवल यह नहीं है कि पात्र क्या कह रहा है, बल्कि वह बात कहते समय उसका चेहरा कैसा है, सामने वाला कैसे देख रहा है और कैमरा किस क्षण किस प्रतिक्रिया को पकड़ रहा है, यह सब मिलकर दृश्य बनाते हैं।

कॉस्ट्यूम भी इसी डिजाइन का हिस्सा थे। अमर और प्रेम के कपड़े उनके व्यक्तित्व से मेल खाते हैं, जबकि क्राइम मास्टर गोगो का पहनावा उसे सामान्य अपराधी से अलग एक लगभग कॉमिक चरित्र बना देता है। तेजा का लुक भी उसकी नकली गंभीरता को बढ़ाता है। इन छोटी-छोटी चीजों ने फिल्म की दृश्य पहचान को मजबूत किया और बाद में यही चीजें उसके यादगार दृश्यों का हिस्सा बन गईं।

संगीत ने भी फिल्म की दुनिया को बनाए रखा हल्का

फिल्म का संगीत तुषार भाटिया ने तैयार किया था। ‘ये रात और ये दूरी’ और ‘दिल करता है तेरे पास आऊं’ जैसे गीत कहानी के हल्के और चंचल वातावरण के साथ चलते हैं। संगीत फिल्म के हास्य से अलग कोई गंभीर दुनिया बनाने के बजाय उसी कॉमिक माहौल का विस्तार करता है। धुनों और प्रस्तुति में पुराने हिंदी फिल्म संगीत की झलक भी मिलती है, जो फिल्म की पैरोडी और श्रद्धांजलि वाली शैली से मेल खाती है।

फिल्म का संगीत आज उसके संवादों जितना चर्चित नहीं है, लेकिन उस समय की कहानी में उसकी भूमिका महत्वपूर्ण थी। गीत कथा को पूरी तरह रोकने के बजाय पात्रों और माहौल को आगे बढ़ाते हैं। इसी वजह से फिल्म का हास्य, संगीत और दृश्य संसार एक ही लय में दिखाई देता है।

रिलीज के समय नहीं मिली बड़ी सफलता

‘अंदाज़ अपना अपना’ जब सिनेमाघरों में पहुंची तो उसे वैसी व्यावसायिक सफलता नहीं मिली जिसकी उम्मीद आमिर खान, सलमान खान और बड़े कलाकारों वाली फिल्म से की जा सकती थी। उस समय दर्शकों का एक बड़ा हिस्सा कॉमेडी से अपेक्षाकृत सीधी कहानी और साफ हास्य का अभ्यस्त था। ‘अंदाज़ अपना अपना’ का हास्य कई जगह बेतुका, आत्म-जागरूक और परतदार था। इसलिए रिलीज के समय फिल्म को लेकर दर्शकों की प्रतिक्रिया एक जैसी नहीं रही।

लेकिन फिल्म की कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। टेलीविजन और वीडियो के दौर ने उसे दोबारा दर्शकों तक पहुंचाया। जिन लोगों ने सिनेमाघरों में इसे बहुत बड़ी फिल्म के रूप में नहीं देखा था, उन्होंने बाद में इसे बार-बार देखना शुरू किया। नई पीढ़ी के दर्शकों के लिए यह फिल्म किसी नई रिलीज की तरह सामने आई। एक बार फिर देखने पर छोटे संवाद, पृष्ठभूमि में चल रही गतिविधियां और कलाकारों की प्रतिक्रियाएं सामने आने लगीं। धीरे-धीरे फिल्म का वह जीवन शुरू हुआ जो बॉक्स ऑफिस से कहीं ज्यादा लंबा साबित हुआ।

कैसे बनी कल्ट फिल्म?

‘अंदाज़ अपना अपना’ को आज जिस तरह याद किया जाता है, उसमें उसके संवादों की बड़ी भूमिका है। क्राइम मास्टर गोगो से लेकर तेजा और अमर-प्रेम की नोकझोंक तक, फिल्म ने ऐसे कई संवाद दिए जो अलग-अलग परिस्थितियों में लोग दोहराते रहे। बाद में सोशल मीडिया और मीम संस्कृति ने इस लोकप्रियता को एक नया माध्यम दिया, लेकिन फिल्म के संवाद उससे बहुत पहले लोगों की रोजमर्रा की भाषा में जगह बना चुके थे।

इस फिल्म की खासियत यह भी है कि इसमें हास्य उम्र के साथ बदलता है। पहली बार देखने पर कोई व्यक्ति बड़े संवादों पर हंस सकता है, दूसरी बार उसे किसी पात्र का चेहरा मजेदार लग सकता है और तीसरी बार पृष्ठभूमि में चल रहा कोई छोटा दृश्य नजर आ सकता है। इस तरह की परतदार कॉमेडी ही किसी फिल्म को बार-बार देखने योग्य बनाती है। ‘अंदाज़ अपना अपना’ का कल्ट दर्जा किसी एक समय की लोकप्रियता से नहीं बना, बल्कि लंबे समय तक अलग-अलग पीढ़ियों द्वारा इसे दोहराए जाने से बना।

भारतीय कॉमेडी पर इसका असर

‘अंदाज़ अपना अपना’ के बाद हिंदी सिनेमा में कॉमेडी की कई अलग शैलियां देखने को मिलीं, लेकिन इस फिल्म की खासियत को किसी एक बाद की फिल्म से जोड़ना आसान नहीं है। इसकी कॉमिक दुनिया संवाद, चरित्र और परिस्थिति तीनों पर एक साथ खड़ी है। यह किसी सामाजिक संदेश को साबित करने के लिए हास्य का इस्तेमाल नहीं करती और न ही अपने पात्रों को असाधारण रूप से बुद्धिमान दिखाती है। इसके पात्र लालची हैं, आत्ममुग्ध हैं, अक्सर मूर्खतापूर्ण फैसले लेते हैं और अपनी ही योजनाओं में फंसते रहते हैं। फिर भी दर्शक उनसे जुड़ जाता है क्योंकि उनकी कमियां बहुत मानवीय हैं।

शायद यही वजह है कि ‘अंदाज़ अपना अपना’ समय के साथ पुरानी होने के बजाय नई पीढ़ियों के लिए फिर से खोजी जाती रही। यह फिल्म अपने हास्य को लेकर किसी गंभीर दावे के साथ सामने नहीं आती। वह अपने संसार को पूरी तरह स्वीकार करती है और दर्शक से भी यही चाहती है कि कुछ देर के लिए तर्क को किनारे रखकर उसके साथ चले। यही सहजता उसकी सबसे बड़ी ताकत बन गई।

थिएटर से बाहर शुरू हुई असली जिंदगी

‘अंदाज़ अपना अपना’ की सबसे दिलचस्प बात यह है कि इसकी लोकप्रियता को केवल रिलीज के समय के प्रदर्शन से नहीं समझा जा सकता। यह उन फिल्मों में शामिल है जिनकी असली पहचान समय के साथ बनी। पहले वीडियो और टेलीविजन ने इसे घर-घर पहुंचाया, फिर नई पीढ़ियों ने इसके संवादों और पात्रों को अपने तरीके से अपनाया। इंटरनेट ने इस प्रक्रिया को और तेज किया। इस तरह फिल्म एक रिलीज से बढ़कर साझा सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा बन गई।

आज ‘अंदाज़ अपना अपना’ को याद करना दरअसल उस दौर को याद करना भी है जब हिंदी सिनेमा में कॉमेडी का एक अलग रास्ता खुल रहा था। यह फिल्म बताती है कि हर फिल्म की सफलता का पैमाना केवल उसके शुरुआती बॉक्स ऑफिस आंकड़े नहीं होते। कुछ फिल्मों की असली उम्र उनके प्रदर्शन के बाद शुरू होती है। वे धीरे-धीरे दर्शकों के बीच जगह बनाती हैं, संवाद उनकी जुबान पर चढ़ते हैं, पात्र पहचान बन जाते हैं और फिल्म अगली पीढ़ी तक पहुंचती रहती है।

‘अंदाज़ अपना अपना’ की यही कहानी है। यह रिलीज के समय बड़ी सफलता नहीं बन सकी, लेकिन समय के साथ इसकी पहचान मजबूत होती गई। आज यह हिंदी सिनेमा की उन कॉमेडी फिल्मों में गिनी जाती है जिन्हें लोग केवल कहानी के लिए नहीं, संवादों, पात्रों, अभिनय और उस खास हास्य लय के लिए दोबारा देखते हैं। फिल्म ने कभी महान बनने का दावा नहीं किया। उसने बस अपने पात्रों की मूर्खता, लालच, गलतफहमी और आत्मविश्वास को पूरी ईमानदारी से हास्यास्पद बनाया। शायद इसी वजह से वह दशकों बाद भी दर्शकों को हंसाती है।

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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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