TRENDING TAGS :
Bollywood Old Movie Amar Prem: एक फ़िल्म… जिसने हर दिल को रुलाया और जोड़ दिया!
Rajesh Khanna Amar Prem Full Movie Story: ‘अमर प्रेम’ : प्रेम, करुणा और मानवीयता का अद्भुत मेल, एक फ़िल्म जो दिलों की दास्तान बन गई
Bollywood Old Movie Amar Prem Story
Bollywood Old Movie Amar Prem Story: भारतीय सिनेमा में प्रेम कहानियों की कभी कमी नहीं रही, लेकिन अधिकतर फिल्मों में प्रेम को सुंदर चेहरों, सामाजिक स्वीकृति और सुखद अंत के साथ प्रस्तुत किया जाता था। शक्ति सामंत की 'अमर प्रेम’ ने इस परंपरा को पूरी तरह बदल दिया। यह ऐसी प्रेम कहानी थी जिसमें प्रेम था, लेकिन अधिकार नहीं था। अपनापन था, लेकिन सामाजिक मान्यता नहीं थी। एक स्त्री थी जिसे उसके पति ने घर से निकाल दिया और समाज ने तवायफ बना दिया। एक पुरुष था जो अपने ही घर में भावनात्मक रूप से अकेला पड़ चुका था। और एक बच्चा था जिसे माँ का स्नेह चाहिए था। इन तीन टूटे हुए जीवनों के बीच जो रिश्ता बनता है, वही ‘अमर प्रेम’ की आत्मा है। यही कारण है कि 1972 में रिलीज़ हुई यह फ़िल्म सिर्फ बॉक्स ऑफिस सफल नहीं हुई, बल्कि भारतीय दर्शकों की भावनात्मक स्मृति का स्थायी हिस्सा बन गई।
शक्ति दा की बेजोड़ पेशकश
'अमर प्रेम' का निर्देशन शक्ति सामंत ने किया था, जो उस समय हिंदी सिनेमा के सबसे सफल निर्देशकों में गिने जाते थे। लेकिन ‘अमर प्रेम’ उनके करियर की सबसे संवेदनशील फिल्मों में शामिल मानी जाती है। यह फ़िल्म बंगाली साहित्य और सिनेमा की भावनात्मक परंपरा से प्रभावित थी। इसकी मूल प्रेरणा बिभूतिभूषण बंद्योपाध्याय की कहानी ‘निशी पद्मा’ और उस पर बनी एक बांग्ला फ़िल्म से जुड़ी थी। शक्ति सामंत इस कहानी की भावनात्मक गहराई से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने इसे हिंदी में रूपांतरित करने का निर्णय लिया। लेकिन वे केवल रीमेक नहीं बनाना चाहते थे। वे इसे हिंदी दर्शकों की संवेदना के अनुरूप एक नई आत्मा देना चाहते थे।
उस समय हिंदी सिनेमा में तवायफ पात्र प्रायः या तो अत्यधिक ग्लैमरस बनाए जाते थे या दुखद प्रतीक के रूप में दिखाए जाते थे। लेकिन ‘अमर प्रेम’ में ‘पुष्पा’ का चरित्र इन दोनों से अलग था। वह दुखी जरूर है, लेकिन भीतर से टूटी हुई नहीं। उसके भीतर करुणा है। मातृत्व है। और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि वह प्रेम को अधिकार की तरह नहीं, बल्कि अपनापन की तरह जीती है। यही गहराई इस किरदार को अमर बना देती है।
राजेश खन्ना का आनंद बाबू
फ़िल्म में राजेश खन्ना ने आनंद बाबू का किरदार निभाया। शक्ति सामंत की 'आराधना' और 'कटी पतंग' के बाद वो भारतीय सिनेमा के पहले सुपरस्टार बन चुके थे। उनकी लोकप्रियता ऐसी थी कि सिनेमाघरों के बाहर भीड़ टूट पड़ती थी। निर्माता अक्सर चाहते थे कि राजेश खन्ना की फिल्मों में रोमांस, स्टाइल और स्टारडम का प्रदर्शन हो। लेकिन ‘अमर प्रेम’ पूरी तरह अलग फ़िल्म थी। यहाँ उनका किरदार चमकदार नायक का नहीं, बल्कि भीतर से थके हुए आदमी का था। आनंद बाबू एक ऐसा व्यक्ति है जिसके पास सामाजिक प्रतिष्ठा तो है, लेकिन भावनात्मक शांति नहीं। उसका विवाह उसे प्रेम नहीं देता। घर उसे अपनापन नहीं देता। और धीरे-धीरे वह उस स्त्री के पास पहुँचता है जिसे समाज सम्मान नहीं देता, लेकिन जो उसे मनुष्य की तरह समझती है।
इस किरदार के लिए शक्ति दा की पहली पसंद थे राजकुमार। जब राजेश खन्ना को पता चला तो इस किरदार ने उन्हें इतना प्रभावित किया कि उन्होंने शक्ति सामंत से आग्रह करके ये रोल ले लिया।
राजेश खन्ना ने इस किरदार को बहुत नियंत्रित अभिनय से निभाया। उनकी आवाज़ की धीमी लय, संवाद बोलने का सहज अंदाज़ और आँखों की उदासी ने आनंद बाबू को असाधारण गहराई दी। यही कारण है कि उनका प्रसिद्ध संवाद- “पुष्पा, आई हेट टीयर्स” सिर्फ एक लोकप्रिय डायलॉग नहीं रहा बल्कि वह भारतीय लोकप्रिय संस्कृति का हिस्सा बन गया। दिलचस्प बात यह है कि इस संवाद को फिल्माते समय शक्ति सामंत चाहते थे कि राजेश खन्ना इसे अत्यधिक नाटकीय अंदाज़ में न बोलें। वे चाहते थे कि उसमें सच्चा अपनापन महसूस हो। यही सादगी उसे अमर बना गई।
शर्मिला टैगोर की जानदार पुष्पा
फ़िल्म में शर्मिला टैगोर ने ‘पुष्पा’ का किरदार निभाया और यह उनके करियर की सबसे महत्वपूर्ण प्रस्तुतियों में गिना जाता है। उस समय शर्मिला टैगोर ग्लैमरस और आधुनिक छवि की अभिनेत्री मानी जाती थीं। लेकिन ‘अमर प्रेम’ में उन्हें बिल्कुल अलग रूप में प्रस्तुत किया गया। यहाँ उनके चेहरे का सौंदर्य महत्वपूर्ण नहीं था। महत्वपूर्ण था उनके चेहरे पर दिखाई देता भावनात्मक दर्द और करुणा। शक्ति सामंत चाहते थे कि दर्शक पुष्पा को ऐसी स्त्री के रूप में देखें जिसे परिस्थितियों ने उस दुनिया में धकेल दिया।
‘अमर प्रेम’ की सबसे बड़ी ताक़त यही थी कि उसने समाज द्वारा पतित कही जाने वाली स्त्री को सबसे अधिक मानवीय गरिमा दी। पुष्पा दया की पात्र नहीं लगती। वह भावनात्मक रूप से उन लोगों से कहीं अधिक समृद्ध दिखाई देती है जो स्वयं को सभ्य समाज का हिस्सा मानते हैं। यही गहराई फ़िल्म को असाधारण बनाती है।
बंगाल की संस्कृति की छाया
फ़िल्म की शूटिंग मुख्य रूप से मुंबई में ही स्टूडियो में हुई, लेकिन उसके भीतर बंगाल की सांस्कृतिक संवेदना को जीवित रखने की कोशिश की गई। पुराने कोठों का वातावरण, संकरी गलियाँ, दीपकों की रोशनी और बारिश से भीगी रातें फ़िल्म के दृश्य संसार को बेहद भावनात्मक बना देती हैं।
शक्ति सामंत और सिनेमैटोग्राफर आलोक दासगुप्ता चाहते थे कि कैमरा केवल पात्रों को न दिखाए, बल्कि उनके अकेलेपन को भी महसूस कराए। यही कारण है कि फ़िल्म के कई दृश्य अत्यंत शांत हैं। पात्र धीरे बोलते हैं। लंबे विराम आते हैं। और उन्हीं चुप्पियों में कहानी सबसे अधिक असर करती है।
प्रेम का प्रतीक नंदू
फ़िल्म का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पक्ष था बाल कलाकार ‘नंदू’ का किरदार। मास्टर बंटी ने इस भूमिका को बेहद सहजता से निभाया। नंदू केवल कहानी का बच्चा नहीं है। वह उस प्रेम का प्रतीक है जो रक्त संबंधों से नहीं, भावनात्मक अपनत्व से पैदा होता है। पुष्पा और नंदू का रिश्ता फ़िल्म की सबसे करुण और सबसे सुंदर परतों में शामिल है। पुष्पा, नंदू की वास्तविक माँ नहीं है, लेकिन वही उसे सबसे अधिक स्नेह देती है। विनोद मेहरा ने बड़े हो चुके 'नंदू' का किरदार निभाया है।
पंचम दा का शानदार संगीत
फ़िल्म का संगीत उसकी आत्मा बन गया। संगीतकार आर. डी. बर्मन ने यहाँ अपने करियर का सबसे भावनात्मक संगीत दिया। गीतकार आनंद बख्शी ने ऐसे गीत लिखे जो सीधे अकेलेपन, स्मृति और अधूरे प्रेम से जुड़ते थे। ‘चिंगारी कोई भड़के’, ‘कुछ तो लोग कहेंगे’, ‘रैना बीती जाए’ और ‘ये क्या हुआ’ जैसे गीत न सिर्फ लोकप्रिय हुए बल्कि वे भारतीय फिल्म संगीत के इतिहास की अमर रचनाओं में शामिल हो गये।
‘कुछ तो लोग कहेंगे’ विशेष रूप से भारतीय समाज पर गहरा व्यंग्य था। यह गीत केवल सांत्वना नहीं देता। वह समाज की उस मानसिकता को चुनौती देता है जो लोगों को उनके अतीत और सामाजिक स्थिति से परिभाषित करती है।
‘रैना बीती जाए’ की रिकॉर्डिंग के दौरान लता मंगेशकर की आवाज़ में जो भावनात्मक पीड़ा उभरी, उसने गीत को अमर बना दिया। आर. डी. बर्मन चाहते थे कि गीत में एक ऐसी उदासी हो जो सीधे दिल तक पहुँचे। यही कारण है कि यह गीत आज भी हिंदी फिल्म संगीत की सबसे दर्दभरी प्रस्तुतियों में शामिल है।
एक अनोखी प्रेम कहानी
फ़िल्म का सबसे महत्वपूर्ण भावनात्मक पक्ष यह था कि यहाँ प्रेम को सामाजिक सफलता के रूप में नहीं दिखाया गया। आनंद बाबू और पुष्पा का रिश्ता कभी पारंपरिक प्रेम कहानी नहीं बनता। वे एक-दूसरे को समझते हैं, सहारा देते हैं, लेकिन उनके बीच अधिकार नहीं आता। यही परिपक्वता फ़िल्म को महान बनाती है। बहुत-सी प्रेम कहानियाँ समय के साथ पुरानी लगने लगती हैं, लेकिन ‘अमर प्रेम’ आज भी आधुनिक महसूस होती है क्योंकि उसका केंद्र मनुष्य का भावनात्मक अकेलापन है।
बॉक्स ऑफिस हिट और कई अवार्ड
इस फ़िल्म ने भारत और विदेशों में मिलाकर लगभग 7 करोड़ रुपये से अधिक का कारोबार किया, जो उस समय बड़ी सफलता मानी जाती थी। इसे 6 फिल्मफेयर पुरस्कारों के लिए नामांकित किया गया, जिसमें इसने कहानी और पटकथा के लिए पुरस्कार जीते। अमर प्रेम की सबसे बड़ी जीत बॉक्स ऑफिस नहीं थी। इस फ़िल्म ने राजेश खन्ना की छवि को केवल रोमांटिक सुपरस्टार से आगे बढ़ाकर संवेदनशील अभिनेता के रूप में स्थापित किया। वहीं शर्मिला टैगोर के करियर को नई गंभीरता मिली।
‘अमर प्रेम’ ने हिंदी सिनेमा को यह सिखाया कि सबसे गहरी प्रेम कहानियाँ वही होती हैं जिनमें अधिकार कम और करुणा अधिक होती है। यही कारण है कि यह फ़िल्म केवल प्रेम कहानी नहीं लगती। वह मनुष्य के अकेलेपन और अपनत्व की खोज का दस्तावेज़ महसूस होती है।


