TRENDING TAGS :
Bollywood Old Movie Anand: वह फ़िल्म जिसमें मौत हार गई और ज़िंदगी अमर हो गई
Anand Full Movie Story: भारतीय सिनेमा में बहुत कम फ़िल्में ऐसी हैं जो दर्शकों को रुलाने के बाद भी उनके भीतर जीवन के प्रति प्रेम भर देती हैं। ‘आनंद’ ऐसी ही फ़िल्म थी।
Bollywood Old Movie Anand Story
Anand Full Movie Story: भारतीय सिनेमा में बहुत कम फ़िल्में ऐसी हैं जो दर्शकों को रुलाने के बाद भी उनके भीतर जीवन के प्रति प्रेम भर देती हैं। ‘आनंद’ ऐसी ही फ़िल्म थी। यह एक मरते हुए आदमी की कहानी थी, लेकिन अजीब बात यह थी कि फ़िल्म देखते हुए दर्शकों को मृत्यु नहीं, जीवन दिखाई देता था। यही कारण है कि 1971 में रिलीज़ हुई यह फ़िल्म केवल सफल नहीं हुई, बल्कि भावनात्मक रूप से भारतीय समाज का हिस्सा बन गई। आज भी जब हिंदी सिनेमा की सबसे संवेदनशील फिल्मों का नाम लिया जाता है तो ‘आनंद’ शीर्ष पर दिखाई देती है।
लेकिन इस फ़िल्म की असली ताक़त केवल उसकी कहानी नहीं थी। उसकी ताक़त थी उसके पीछे छिपा भावनात्मक सत्य। निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी जीवन और मृत्यु के प्रश्नों से भीतर तक प्रभावित थे। वे ऐसी फ़िल्म बनाना चाहते थे जिसमें बीमारी और मृत्यु को केवल दुख के रूप में नहीं, बल्कि जीवन को समझने की प्रक्रिया के रूप में दिखाया जाए। उस समय हिंदी सिनेमा में या तो अत्यधिक मेलोड्रामा होता था या पूर्ण मनोरंजन प्रधान कहानियाँ। ‘आनंद’ इन दोनों रास्तों से अलग थी। उसमें शोर नहीं था। उसमें भावनाओं की धीमी आँच थी।
‘आनंद’ की मूल प्रेरणा को लेकर एक अत्यंत दिलचस्प और भावनात्मक संदर्भ जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि ऋषिकेश मुखर्जी के भीतर इस कहानी का बीज उस समय पैदा हुआ जब उनके प्रिय मित्र राज कपूर गंभीर रूप से बीमार पड़े थे। उन्हें पहली बार गहराई से महसूस हुआ कि जीवन कितना अस्थायी है। इसी भावनात्मक अनुभव ने उन्हें ऐसी कहानी लिखने की ओर प्रेरित किया जिसमें मृत्यु मौजूद हो, लेकिन जीवन उससे बड़ा दिखाई दे। यही कारण है कि ‘आनंद’ किसी अस्पताल की कहानी कम और जीवन-दर्शन की कहानी अधिक लगती है।
फ़िल्म की कहानी का बीज ऋषिकेश मुखर्जी के निजी अनुभवों से पैदा हुआ था। वे लगातार लोगों को जीवन से हारते हुए देख रहे थे। अस्पतालों का वातावरण। बीमारी से टूटते परिवार। और आधुनिक जीवन का अकेलापन उन्हें भीतर तक प्रभावित करता था। लेकिन वे निराशा की फ़िल्म नहीं बनाना चाहते थे। वे दिखाना चाहते थे कि आदमी मौत के सामने भी गरिमा और मुस्कान बचाकर रख सकता है। यही सोच धीरे-धीरे ‘आनंद’ के चरित्र में बदल गई।
कहा जाता है कि ‘आनंद’ का प्रारंभिक विचार अभिनेता राज कपूर को ध्यान में रखकर विकसित किया गया था। ऋषिकेश मुखर्जी और राज कपूर के बीच गहरी दोस्ती थी। लेकिन समय और परिस्थितियाँ साथ नहीं आ सकीं। फिर कहानी राजेश खन्ना तक पहुँची। उस समय राजेश खन्ना भारतीय सिनेमा के पहले सुपरस्टार बन चुके थे। उनकी लोकप्रियता ऐसी थी कि सिनेमाघरों के बाहर लड़कियाँ उनके नाम से रोती थीं। निर्माता अक्सर चाहते थे कि उनकी फिल्मों में भारी रोमांस, गीत और स्टारडम दिखे। लेकिन ‘आनंद’ पूरी तरह अलग फ़िल्म थी।
फ़िल्म की कास्टिंग प्रक्रिया भी बेहद दिलचस्प थी। शुरुआती दौर में इस कहानी के लिए कई बड़े नामों पर विचार हुआ था। राज कपूर, उत्तम कुमार, किशोर कुमार और शशि कपूर जैसे नाम अलग-अलग समय पर चर्चा में रहे। लेकिन अंततः राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन की जोड़ी बनी। यह विडंबना ही थी कि उस समय राजेश खन्ना देश के सबसे बड़े सुपरस्टार थे, जबकि अमिताभ बच्चन संघर्षरत अभिनेता। लेकिन फ़िल्म ने दोनों को नए स्तर पर स्थापित किया। राजेश खन्ना को संवेदनशील अभिनेता के रूप में और अमिताभ को गंभीर स्क्रीन उपस्थिति वाले कलाकार के रूप में।
राजेश खन्ना ने कहानी सुनी और तुरंत तैयार हो गये। उन्हें एहसास हो गया था कि यह सामान्य भूमिका नहीं है। आनंद ऐसा आदमी था जो मर रहा है, लेकिन सबसे अधिक जीवन उसी के भीतर है। उसकी हँसी के भीतर दर्द छिपा है। उसका उत्साह एक तरह का आत्मिक प्रतिरोध है। यही विरोधाभास किरदार को महान बनाता था।
फ़िल्म के दूसरे सबसे महत्वपूर्ण किरदार ‘डॉ. भास्कर बनर्जी’ के लिए अमिताभ बच्चन का चयन हुआ। उस समय अमिताभ संघर्ष के दौर में थे। उनकी कई फ़िल्में सफल नहीं हुई थीं। उद्योग में लोग उन्हें लेकर आश्वस्त नहीं थे। लेकिन ऋषिकेश मुखर्जी को लगता था कि अमिताभ के भीतर गंभीरता और बौद्धिकता का वह स्वर है जो भास्कर के लिए आवश्यक है।
दिलचस्प बात यह है कि ‘आनंद’ के दौरान राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन की स्थिति बिल्कुल अलग थी। एक तरफ उस समय का सबसे बड़ा सुपरस्टार। दूसरी तरफ संघर्ष करता अभिनेता। लेकिन फ़िल्म में दोनों के बीच जो भावनात्मक संतुलन दिखाई देता है, वही उसकी आत्मा बन गया।
‘बाबूमोशाय’ शब्द को भी विशेष महत्व दिया जाना चाहिए। यह केवल फ़िल्मी संबोधन नहीं था। कहा जाता है कि राज कपूर प्यार से ऋषिकेश मुखर्जी को ‘बाबूमोशाय’ कहा करते थे। बाद में यही शब्द फ़िल्म का भावनात्मक केंद्र बन गया। जब आनंद बार-बार यह शब्द बोलता है तो वह केवल दोस्त को नहीं पुकार रहा होता, बल्कि जीवन से जुड़े रहने की कोशिश करता महसूस होता है।
शूटिंग मुख्य रूप से मुंबई में हुई। अस्पताल वाले हिस्सों के लिए वास्तविक वातावरण जैसा सेट तैयार किया गया। ऋषिकेश मुखर्जी कृत्रिमता से बचना चाहते थे। वे नहीं चाहते थे कि फ़िल्म अत्यधिक ग्लैमरस लगे। यही कारण है कि कैमरा बहुत शांत रहता है। पात्रों के चेहरे और संवाद कहानी को आगे बढ़ाते हैं।
फ़िल्म की शूटिंग बहुत कम समय में पूरी हुई थी, और यही इसकी सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है। ऋषिकेश मुखर्जी अत्यंत अनुशासित निर्देशक माने जाते थे। वे लंबे, अव्यवस्थित शूटिंग शेड्यूल पसंद नहीं करते थे। कहा जाता है कि ‘आनंद’ लगभग एक महीने के भीतर शूट कर ली गई थी। यह इसलिए संभव हुआ क्योंकि फ़िल्म का केंद्र तकनीकी भव्यता नहीं, लेखन और अभिनय था। सीमित लोकेशन, नियंत्रित वातावरण और गहरी तैयारी ने शूटिंग को व्यवस्थित बनाए रखा।
लेकिन शूटिंग पूरी तरह आसान नहीं थी। सबसे बड़ी चुनौती थी फ़िल्म की भावनात्मक टोन को संतुलित रखना। यदि कहानी अधिक दुखद हो जाती तो दर्शक टूट जाते। यदि अधिक हल्की हो जाती तो बीमारी की गंभीरता समाप्त हो जाती। ऋषिकेश मुखर्जी लगातार इस संतुलन पर काम करते रहे। कई दृश्यों में संवादों को अंतिम समय तक बदला गया ताकि भावनाएँ बनावटी न लगें।
राजेश खन्ना अपने किरदार की ऊर्जा को बनाए रखने के लिए सेट पर लगातार सक्रिय रहते थे। वे यूनिट के लोगों से बातें करते, मज़ाक करते और उसी ऊर्जा को कैमरे पर ले आते। लेकिन कई बार भावनात्मक दृश्यों के दौरान पूरा वातावरण बेहद शांत हो जाता था। विशेष रूप से अंतिम हिस्सों की शूटिंग के दौरान यूनिट के कई सदस्य भावुक हो जाते थे।
फ़िल्म की शूटिंग के दौरान एक और दिलचस्प बात होती थी। अमिताभ बच्चन अपने संवादों और दृश्यों को लेकर अत्यंत गंभीर रहते थे। वे घंटों तैयारी करते। दूसरी ओर राजेश खन्ना अधिक सहज शैली में काम करते थे। यह अंतर कई बार सेट पर दिखाई देता था, लेकिन कैमरे पर यही विरोधाभास दो किरदारों के संबंध को और वास्तविक बना देता था।
अमिताभ बच्चन से जुड़ा एक दिलचस्प प्रसंग भी इस फ़िल्म से जुड़ा है। रिलीज़ से पहले वे आम जनता के लिए लगभग अपरिचित थे। लेकिन ‘आनंद’ के बाद स्थिति बदलने लगी। फ़िल्म उद्योग और दर्शकों ने पहली बार गंभीरता से नोटिस किया कि यह लंबा, शांत और गहरी आवाज़ वाला अभिनेता भविष्य में बहुत बड़ा नाम बन सकता है। यही फ़िल्म उनके लिए निर्णायक मोड़ साबित हुई।
फ़िल्म का एक दिलचस्प पहलू यह भी था कि आनंद का चरित्र वास्तविक जीवन के कई लोगों से प्रेरित माना जाता है। कुछ लोग कहते हैं कि उसमें लेखक गुलज़ार की संवेदनशीलता की झलक थी। कुछ लोग इसे ऋषिकेश मुखर्जी के निजी अनुभवों का मिश्रण मानते हैं। लेकिन शायद उसकी सबसे बड़ी ताक़त यही थी कि वह किसी एक आदमी की कहानी नहीं लगती। वह हर उस इंसान की कहानी लगती है जिसने मृत्यु के सामने भी मुस्कुराने की कोशिश की हो।
फ़िल्म का सबसे बड़ा सौंदर्य यह था कि उसमें बीमारी को melodrama नहीं बनाया गया। आनंद मर रहा है, लेकिन फ़िल्म लगातार जीवन का उत्सव मनाती है। अस्पताल है, दर्द है, मृत्यु का भय है, लेकिन कहानी कभी निराशा में नहीं डूबती। यही संतुलन इसे असाधारण बनाता है। आनंद स्वयं रोगी होते हुए भी आसपास के लोगों को जीवन जीना सिखाता है। इस अर्थ में फ़िल्म की सबसे सुंदर बात यह है कि डॉक्टर रोगी को नहीं बचाता, बल्कि रोगी डॉक्टर को भावनात्मक रूप से जीवित कर देता है।
फ़िल्म का बजट लगभग 60 से 70 लाख रुपये के बीच माना जाता है। उस समय यह मध्यम से बड़े स्तर की फ़िल्म मानी जाती थी। लेकिन इसकी सबसे बड़ी पूँजी उसका लेखन और अभिनय था। निर्माता एन. सी. सिप्पी और ऋषिकेश मुखर्जी जानते थे कि यह फ़िल्म सितारों से नहीं, भावनाओं से चलेगी।
फ़िल्म का संगीत भी उसकी आत्मा का हिस्सा था। संगीतकार सलिल चौधरी और गीतकार योगेश ने ऐसे गीत रचे जो सीधे मनुष्य की आंतरिक संवेदनाओं से जुड़ते थे। ‘ज़िंदगी कैसी है पहेली’ केवल एक गीत नहीं रहा। वह जीवन-दर्शन बन गया।
इस गीत की शूटिंग मुंबई के समुद्री किनारों और खुले वातावरण में की गई ताकि जीवन की अनिश्चितता और प्रवाह को दृश्यात्मक रूप से महसूस कराया जा सके। राजेश खन्ना का मुस्कुराता चेहरा और भीतर छिपा हुआ मृत्यु-बोध इस गीत को असाधारण बना देता है।
‘कहीं दूर जब दिन ढल जाए’ की रिकॉर्डिंग के दौरान भी पूरा माहौल बेहद भावुक था। मुकेश की आवाज़ में जो अकेलापन और थकान थी, उसने गीत को अमर बना दिया। कहा जाता है कि ऋषिकेश मुखर्जी चाहते थे कि गीत में बनावटी दर्द न हो। उसमें जीवन की शांत उदासी हो।
जब फ़िल्म रिलीज़ हुई तो दर्शकों की प्रतिक्रिया असाधारण थी। लोग सिनेमाघरों में रोते थे। लेकिन अजीब बात यह थी कि वे उदास होकर नहीं, भावनात्मक रूप से समृद्ध होकर बाहर निकलते थे। फ़िल्म ने भारत और विदेशों में मिलाकर लगभग 3.5 से 4 करोड़ रुपये तक का कारोबार किया, जो उस समय के हिसाब से बड़ी सफलता थी।
लेकिन ‘आनंद’ की सबसे बड़ी जीत उसकी कमाई नहीं थी। इस फ़िल्म ने राजेश खन्ना की छवि को केवल रोमांटिक सुपरस्टार से आगे बढ़ाकर गंभीर अभिनेता के रूप में स्थापित किया। वहीं अमिताभ बच्चन को पहली बार बड़े स्तर पर नोटिस किया गया। बहुत से लोग मानते हैं कि ‘आनंद’ ने अमिताभ के लिए आगे आने वाले महान दौर की नींव रखी।
फ़िल्म को आलोचकों ने भी हाथों-हाथ लिया। इसे राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। संवाद, अभिनय और निर्देशन की व्यापक प्रशंसा हुई। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि फ़िल्म आम दर्शकों के जीवन का हिस्सा बन गई। लोग उसके संवाद याद रखने लगे। “बाबूमोशाय, ज़िंदगी बड़ी होनी चाहिए, लंबी नहीं”—यह संवाद भारतीय समाज की सामूहिक स्मृति में स्थायी रूप से दर्ज हो गया।
आज पाँच दशक बाद भी ‘आनंद’ पुरानी नहीं लगती। क्योंकि बीमारी आज भी है। अकेलापन आज भी है। मृत्यु का भय आज भी है। लेकिन इस सबके बीच जीवन से प्रेम करने की इच्छा भी आज उतनी ही गहरी है। और शायद यही कारण है कि ‘आनंद’ केवल एक फ़िल्म नहीं रही। वह भारतीय सिनेमा की सबसे सुंदर मानवीय मुस्कान बन गई।


