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Baazigar Movie: Shah Rukh Khan की वह फिल्म जिसने हिंदी सिनेमा में एंटी-हीरो का नया दौर शुरू किया
Baazigar Movie Analysis: जानिए कैसे Shah Rukh Khan की फिल्म बाज़ीगर ने हिंदी सिनेमा में एंटी-हीरो की परिभाषा बदल दी। पढ़ें फिल्म की कहानी, रोचक तथ्य, कास्ट और इसकी ऐतिहासिक सफलता।
Bollywood Old Movie Baazigar Movie Story
Baazigar Movie: हिंदी सिनेमा में एक अनलिखा नियम था। नायक गुस्सा कर सकता है। हिंसक हो सकता है। ग़लतियाँ कर सकता है। लेकिन उसका भीतरी हिस्सा हमेशा साफ़ रहना चाहिए। दर्शक उसके साथ सुरक्षित महसूस करे, यह तय था। 1993 में 'बाज़ीगर' आई। और उसने यह नियम तोड़ दिया। पहली बार मुख्यधारा हिंदी सिनेमा ने दर्शकों को ऐसे नायक से प्रेम करने पर मजबूर किया जो झूठ बोलता है, धोखा देता है, हत्या करता है। फिर भी उससे नज़रें हटाना मुश्किल हो जाता है।
अब्बास मस्तान: वह जोड़ी जो असहजता बेचना चाहती थी
निर्देशक अब्बास मस्तान उस समय तक स्टाइलिश थ्रिलर बनाने में माहिर माने जाते थे। लेकिन 'बाज़ीगर' उनके लिए कुछ अलग था। वे सिर्फ़ रहस्य या रोमांच नहीं बनाना चाहते थे। वे एक ऐसा भावनात्मक खेल रचना चाहते थे जिसमें दर्शक लगातार असहज रहे। नायक को रोकना भी चाहे, और उसकी जीत भी देखना चाहे। यही दोहरी इच्छा फ़िल्म की सबसे बड़ी ताक़त बनी।
शाहरुख खान: जिसके पास खोने के लिए कुछ नहीं था
अजय शर्मा के किरदार के लिए कई स्थापित सितारों ने मना कर दिया था। वजह साफ़ थी। यह किरदार दर्शकों की सहानुभूति खो सकता था। और बड़े सितारे यह जोखिम लेने को तैयार नहीं थे। शाहरुख खान उस समय नए थे। उनके पास खोने के लिए कम था और कुछ साबित करने की भूख ज़्यादा। यही भूख आगे चलकर उनके स्टारडम की पहचान बनी।
उन्होंने अजय को ठंडे, स्टाइलिश खलनायक की तरह नहीं निभाया। उन्होंने उसमें बेचैनी भरी, असुरक्षा भरी, और लगभग बचपन जैसा एक टूटा हुआ जुनून भरा। कई दृश्यों में उनकी आँखों के भीतर एक डर दिखता है।जैसे वह आदमी खुद जानता हो कि वह धीरे धीरे अपने भीतर बची हुई इंसानियत को खत्म कर रहा है। यही वजह है कि अजय सिर्फ़ खतरनाक नहीं लगता। वह दुखद भी लगता है।
काजोल और शिल्पा शेट्टी: दो किरदार जो फ़िल्म को संतुलित करते थे
काजोल की भूमिका फ़िल्म की भावनात्मक धड़कन थी। उनकी सहजता और खुलापन इस अंधेरी कहानी को थोड़ी सांस देते थे। लेकिन शिल्पा शेट्टी का किरदार वह तत्व था जिसने पूरे देश को हिला दिया।
उस दौर का दर्शक एक बात मानकर बैठा था, मुख्य अभिनेत्री सुरक्षित रहेगी। 'बाज़ीगर' ने यह भरोसा तोड़ दिया। शाहरुख खान द्वारा शिल्पा शेट्टी को इमारत से गिराने वाला दृश्य सिर्फ़ कहानी का मोड़ नहीं था। वह दर्शक की नैतिक सुरक्षा पर सीधा हमला था। यह दृश्य गोपनीयता से शूट किया गया था। निर्देशक चाहते थे कि सिनेमाघर में दर्शकों को वास्तविक झटका लगे, बिना किसी पूर्व जानकारी के। और जब फ़िल्म रिलीज़ हुई, यही हुआ। पूरे देश में इस एक दृश्य की चर्चा होने लगी। अब्बास मस्तान का दृश्य संसार बहुत सोचा समझा था।
ऊँची इमारतें, शीशे, आधुनिक घर, पार्टियाँ, यह सब मिलकर उस नए भारत की तस्वीर बनाते हैं जहाँ सफलता और धोखा साथ साथ चलते हैं। ऊँची इमारत वाले दृश्यों की शूटिंग तकनीकी रूप से बेहद कठिन थी। उस दौर में सुरक्षा तकनीक सीमित थी। कैमरा एंगल और बॉडी डबल्स का इस्तेमाल करके ऊँचाई और डर का भ्रम पैदा किया गया।
कॉस्ट्यूम जो पहचान बदल देता था
जब अजय शर्मा "विकी मल्होत्रा" बनता है, तो उसका पूरा दृश्य व्यक्तित्व बदल जाता है। महँगे कपड़े, आत्मविश्वासी चाल, नियंत्रित मुस्कान, यह सब मिलकर उस नकली पहचान को असली जैसा बनाते हैं। यह कॉस्ट्यूम डिज़ाइन सिर्फ़ फैशन नहीं था। यह किरदार के मनोवैज्ञानिक खेल का हिस्सा था।
अनु मलिक : अंधकार को हल्का करता संगीत
संगीतकार अनु मलिक के लिए यह फ़िल्म करियर की एक बड़ी सफलता बन गई। निर्माताओं को पता था कि फ़िल्म का विषय जोखिमपूर्ण है। इसलिए गीतों को जानबूझकर बहुत आकर्षक बनाया गया। 'ये काली काली आँखें', 'ऐ मेरे हमसफ़र' और 'बाज़ीगर ओ बाज़ीगर' सिर्फ़ गीत नहीं रहे। 'ये काली काली आँखें' ने शाहरुख खान की स्क्रीन ऊर्जा को एक नई पहचान दी। उनकी शरारत, उनका नृत्य, कैमरे से खेलने का अंदाज़, यह सब बाद के शाहरुख स्टाइल की शुरुआती झलक बन गया।
वहीं 'ऐ मेरे हमसफ़र' फ़िल्म की भावनात्मक विडंबना को और गहरा करता है। क्योंकि यहाँ प्रेम और धोखा साथ साथ चलते रहते हैं। संगीत की लोकप्रियता ने फ़िल्म को सिनेमाघर पहुँचने से पहले ही चर्चा का विषय बना दिया था। 'बाज़ीगर' की सबसे बड़ी तकनीकी उपलब्धि सिर्फ़ कहानी नहीं थी। यह फ़िल्म शाहरुख खान की एक नई सिनेमाई पहचान गढ़ रही थी। कैमरा, संगीत, संवाद और संपादन, सब मिलकर एक ऐसा व्यक्तित्व बना रहे थे जो खतरनाक, आकर्षक ल और भावनात्मक भी हो। यह जटिलता आगे चलकर शाहरुख के पूरे स्टारडम की केंद्रीय ताक़त बनी।
वह दिन जब देश चौंक गया
जब फ़िल्म रिलीज़ हुई, प्रतिक्रिया तुरंत और तीव्र थी। युवा दर्शकों ने शाहरुख खान को एक बिल्कुल अलग ऊर्जा वाले अभिनेता के रूप में अपनाया। यह पारंपरिक हीरो नहीं था। यह बेचैन, तेज़, खतरनाक और भावनात्मक रूप से अप्रत्याशित किरदार था। बॉक्स ऑफिस पर फ़िल्म बड़ी सफलता बनी। लेकिन असली बदलाव यह था कि निर्माताओं ने पहली बार समझा कि दर्शक नैतिक रूप से जटिल नायक को भी स्वीकार कर सकता है। यही समझ आगे चलकर 'डर', 'अंजाम' और बाद के पूरे एंटी हीरो सिनेमा का रास्ता खोलती है।
वह आदमी जो खलनायक नहीं, एक टूटा हुआ बेटा था
अजय शर्मा की कहानी सिर्फ़ निजी प्रतिशोध की कहानी नहीं है। मदन चोपड़ा सिर्फ़ एक व्यक्तिगत खलनायक नहीं है। वह उस निर्मम आर्थिक शक्ति का प्रतीक है जो दूसरे परिवारों को कुचलकर अपनी सफलता बनाती है। और अजय उसी व्यवस्था की हिंसक प्रतिक्रिया है।
यही कारण है कि उसकी क्रूरता सिर्फ़ अपराध नहीं लगती। वह सामाजिक और भावनात्मक टूटन की उपज लगती है। उदारीकरण के शुरुआती भारत में सफलता सिर्फ़ सम्मान नहीं रही बल्कि अस्तित्व का सवाल बन रही थी। पैसा, ताक़त, सामाजिक प्रतिष्ठा, यह सब नए शहरी भारत की धड़कन बन रहे थे। 'बाज़ीगर' उसी बेचैन समय की फ़िल्म है। फ़िल्म का सबसे बड़ा साहस यह था कि उसने अपने नायक को कभी पूरी तरह निर्दोष बनाने की कोशिश नहीं की।
अजय के भीतर दर्द है, लेकिन उसका दर्द उसके अपराधों को मिटाता नहीं। दर्शक लगातार दो भावनाओं के बीच फँसा रहता है। वह अजय को रोकना भी चाहता है, और उसकी जीत भी देखना चाहता है। और अंत में जब सब कुछ खत्म होता है, अजय लगभग सब कुछ खो चुका होता है। उसकी हिंसा उसे शांति नहीं देती। उसका बदला उसके भीतर के टूटे हुए बच्चे को वापस नहीं ला पाता।
यही कारण है कि 'बाज़ीगर' अंततः प्रतिशोध की महिमा नहीं करती। वह उसकी आत्म विनाशकारी प्रकृति को उजागर करती है। 'बाज़ीगर' इसलिए बड़ी फिल्म नहीं है कि उसमें चौंकाने वाले मोड़ थे। वह इसलिए बड़ी है क्योंकि उसने हिंदी सिनेमा को पहली बार यह असुविधाजनक सच्चाई दिखाई कि इंसान को समझना उसे अच्छा या बुरा कह देने से कहीं ज़्यादा कठिन काम है।
और शायद यही कारण है कि इतने वर्षों बाद भी यह फ़िल्म सिर्फ़ एक थ्रिलर की तरह याद नहीं आती। वह उस क्षण की तरह याद आती है जब हिंदी सिनेमा ने पहली बार दर्शकों से कहा था कि नायक हमेशा सुरक्षित नहीं होगा। और शायद सबसे खतरनाक आदमी ही सबसे ज़्यादा याद रह जाएगा


