Bollywood Old Movie: वह फ़िल्म जिसने अमिताभ बच्चन को ‘एंग्री यंग मैन’ बना दिया

Deewar Full Movie Story: ‘दीवार’ को केवल दो भाइयों की कहानी के रूप में देखना उसके महत्व को छोटा कर देता है। यह फ़िल्म 1970 के दशक के भारत की सामूहिक बेचैनी का सिनेमाई दस्तावेज़ थी।

Yogesh Mishra
Published on: 14 May 2026 8:35 PM IST
Bollywood Old Movie Deewar Story
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Bollywood Old Movie Deewar Story

Deewar Full Movie Story: 1970 का दशक भारत के भीतर गहरी बेचैनी का दौर था। बेरोज़गारी बढ़ रही थी। भ्रष्टाचार को लेकर जनता में गुस्सा था। शहरों में अपराध फैल रहा था। मजदूर आंदोलनों और राजनीतिक अस्थिरता ने आम आदमी के भीतर व्यवस्था के प्रति अविश्वास पैदा कर दिया था। ऐसे समय में हिंदी सिनेमा का पारंपरिक ‘सभ्य’ और ‘त्यागी’ नायक दर्शकों को पूरी तरह संतुष्ट नहीं कर पा रहा था। जनता के भीतर दबा हुआ गुस्सा परदे पर किसी ऐसे चेहरे की तलाश कर रहा था जो व्यवस्था को चुनौती दे सके।

और तभी आई ‘दीवार’।

1975 में रिलीज़ हुई यह फ़िल्म केवल एक अपराध कथा नहीं थी। यह उस भारत की कहानी थी जहाँ गरीबी और अपमान आदमी को अपराध की ओर धकेल सकते थे। यह दो भाइयों की कहानी थी, लेकिन उससे कहीं अधिक यह व्यवस्था और नैतिकता के संघर्ष की कहानी थी।

‘दीवार’ को केवल दो भाइयों की कहानी के रूप में देखना उसके महत्व को छोटा कर देता है। यह फ़िल्म 1970 के दशक के भारत की सामूहिक बेचैनी का सिनेमाई दस्तावेज़ थी। उस समय बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार, मजदूर असंतोष और आर्थिक असमानता तेज़ी से बढ़ रही थी। मुंबई के बंदरगाह, मिल इलाके और तस्करी की दुनिया वास्तविक सामाजिक संकटों का हिस्सा बन चुके थे। विजय का किरदार इसी टूटते हुए शहरी भारत की उपज था। वह जन्म से अपराधी नहीं था। व्यवस्था ने उसे धीरे-धीरे उस दिशा में धकेला।


और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि यही वह फ़िल्म थी जिसने अमिताभ बच्चन को सुपरस्टार से आगे बढ़ाकर एक सांस्कृतिक प्रतीक बना दिया। लेकिन ‘दीवार’ की निर्माण यात्रा भी उतनी ही रोचक और संघर्षपूर्ण थी जितनी उसकी कहानी।

फ़िल्म का विचार लेखक जोड़ी सलीम-जावेद के मन में उस समय आया जब वे लगातार मुंबई के बदलते अंडरवर्ल्ड, मजदूर राजनीति और सामाजिक असंतोष को देख रहे थे। कहा जाता है कि उन्होंने मुंबई डॉकयार्ड और मिल इलाकों में काम करने वाले मजदूरों की ज़िंदगी पर काफी अध्ययन किया था।

विजय का किरदार पूरी तरह काल्पनिक नहीं था। उसमें उस दौर के मुंबई अंडरवर्ल्ड के कुछ वास्तविक चेहरों की झलक दिखाई देती थी। विशेष रूप से तस्करी और बंदरगाह अपराधों की दुनिया का प्रभाव कहानी में स्पष्ट महसूस होता है। सलीम-जावेद ऐसी कहानी लिखना चाहते थे जिसमें नायक पूरी तरह अच्छा आदमी न हो। वह गलत रास्ते पर जाए, लेकिन दर्शक फिर भी उसके साथ भावनात्मक रूप से जुड़े रहें। उस समय हिंदी सिनेमा में यह बहुत बड़ा बदलाव था।


फ़िल्म में बचपन वाला ‘मेरा बाप चोर है’ दृश्य केवल भावनात्मक घटना नहीं था। यही पूरा मनोवैज्ञानिक आधार था जिस पर विजय का व्यक्तित्व खड़ा हुआ। सार्वजनिक अपमान, गरीबी और समाज द्वारा अस्वीकृति ने उसके भीतर स्थायी गुस्सा पैदा किया। यही कारण है कि जब वह बड़ा होकर पैसा और ताक़त हासिल करता है, तब भी उसके भीतर का घायल बच्चा शांत नहीं होता। यही आंतरिक घाव विजय को सामान्य नायक से अलग बनाता है।

निर्देशक यश चोपड़ा को जब कहानी सुनाई गई तो वे तुरंत समझ गये कि यह साधारण मसाला फ़िल्म नहीं है। लेकिन उन्हें यह भी पता था कि फ़िल्म की सफलता पूरी तरह मुख्य अभिनेता पर निर्भर करेगी। विजय के किरदार के लिए ऐसा चेहरा चाहिए था जिसमें गुस्सा भी हो, दर्द भी और भीतर की संवेदनशीलता भी।

उस समय तक अमिताभ बच्चन लगातार संघर्षों से गुजर चुके थे। ‘ज़ंजीर’ ने उन्हें पहचान दी थी, लेकिन वे अभी पूरी तरह स्थापित नहीं हुए थे। उद्योग में कई लोग अब भी मानते थे कि उनका व्यक्तित्व पारंपरिक रोमांटिक हीरो जैसा नहीं है। लेकिन सलीम-जावेद को पूरा विश्वास था कि विजय केवल अमिताभ ही निभा सकते हैं।

और सच यही साबित हुआ।

फ़िल्म की शूटिंग शुरू हुई तो अमिताभ बच्चन अपने किरदार में लगभग डूब गये। विजय का मौन, उसका दबा हुआ गुस्सा और उसके भीतर का अपमान अमिताभ के व्यक्तित्व के साथ एकाकार होता चला गया। यही कारण है कि ‘दीवार’ देखते समय अभिनय कम और वास्तविकता अधिक महसूस होती है।

फ़िल्म का सबसे महत्वपूर्ण भावनात्मक केंद्र था विजय और उसके छोटे भाई रवि का रिश्ता। रवि के किरदार के लिए शशि कपूर को चुना गया। दिलचस्प बात यह है कि उस समय शशि कपूर रोमांटिक और हल्के-फुल्के किरदारों के लिए अधिक प्रसिद्ध थे। लेकिन यश चोपड़ा चाहते थे कि रवि में नैतिक संतुलन दिखाई दे।


शशि कपूर और अमिताभ बच्चन की ऊर्जा बिल्कुल अलग थी। एक शांत और विनम्र। दूसरा भीतर से जलता हुआ। यही विरोधाभास फ़िल्म की सबसे बड़ी ताक़त बन गया। फ़िल्म की शूटिंग मुख्य रूप से मुंबई में हुई। डॉकयार्ड, बंदरगाह क्षेत्र, मिल इलाके और पुराने औद्योगिक हिस्सों को वास्तविकता के साथ दिखाने की कोशिश की गई। निर्देशक यश चोपड़ा नहीं चाहते थे कि फ़िल्म स्टूडियो जैसी लगे। वे चाहते थे कि दर्शक मुंबई की धूल, पसीना और अपराध को महसूस करें।

मुंबई की लोकेशन का उपयोग ‘दीवार’ की सबसे बड़ी वास्तविक ताक़तों में था। यश चोपड़ा नहीं चाहते थे कि फ़िल्म चमकदार स्टूडियो ड्रामा लगे। इसलिए बंदरगाह, गोदाम, ट्रक यार्ड और औद्योगिक इलाकों का वास्तविक वातावरण इस्तेमाल किया गया। लेकिन वहाँ शूटिंग आसान नहीं थी। भीड़ नियंत्रण बड़ी समस्या थी। अमिताभ बच्चन की लोकप्रियता तेजी से बढ़ रही थी और लोग शूटिंग देखने जमा हो जाते थे। भारी मशीनों, ट्रकों और समुद्री गतिविधियों के बीच कैमरा नियंत्रित करना भी कठिन था। यही कारण है कि फ़िल्म के दृश्य इतने जीवित और खुरदरे महसूस होते हैं।

लेकिन लोकेशन शूटिंग आसान नहीं थी।

1970 के दशक की मुंबई आज जैसी व्यवस्थित फिल्म शूटिंग के लिए तैयार नहीं थी। भीड़ नियंत्रण बड़ी समस्या थी। अमिताभ बच्चन जहाँ जाते, लोग इकट्ठा होने लगते। कई बार शूटिंग रोकनी पड़ती थी। डॉकयार्ड और बंदरगाह क्षेत्रों में सुरक्षा की समस्याएँ भी थीं। भारी मशीनें, ट्रक और समुद्री गतिविधियाँ शूटिंग को कठिन बना देती थीं।

फ़िल्म के कुछ एक्शन दृश्यों की शूटिंग बेहद चुनौतीपूर्ण थी क्योंकि उस समय आज जैसी सुरक्षा तकनीक उपलब्ध नहीं थी। कई स्टंट वास्तविक रूप से किये जाते थे। अमिताभ बच्चन अपने कई दृश्य स्वयं करना चाहते थे। यही कारण है कि यूनिट कई बार जोखिम में काम करती थी।


फ़िल्म का बजट लगभग 1.3 करोड़ रुपये के आसपास माना जाता है, जो उस दौर के हिसाब से बड़ी राशि थी। लेकिन निर्माता गुलशन राय और यश चोपड़ा जानते थे कि यह फ़िल्म साधारण स्तर पर नहीं बनाई जा सकती। सेट, लोकेशन, एक्शन और स्टारकास्ट पर खुलकर खर्च किया गया।

फ़िल्म के संवाद उसकी सबसे बड़ी पहचान बन गये। सलीम-जावेद ने ऐसे संवाद लिखे जो सीधे जनता के भीतर उतर गये।

“आज मेरे पास बिल्डिंग है, प्रॉपर्टी है, बैंक बैलेंस है, बंगला है, गाड़ी है… तुम्हारे पास क्या है?”

और उसके जवाब में शशि कपूर का वह छोटा-सा संवाद — “मेरे पास माँ है।”

यह केवल संवाद नहीं रहा। यह भारतीय लोकप्रिय संस्कृति का हिस्सा बन गया। मेरे पास माँ है’ संवाद को केवल लोकप्रिय डायलॉग की तरह नहीं, बल्कि फ़िल्म के नैतिक केंद्र के रूप में समझना चाहिए। विजय के पास पैसा, शक्ति और सफलता है। लेकिन रवि के पास नैतिक वैधता है। यही कारण है कि छोटा-सा संवाद पूरे दृश्य पर भारी पड़ जाता है।


दिलचस्प बात यह है कि इस दृश्य को फिल्माते समय यश चोपड़ा चाहते थे कि शशि कपूर संवाद बहुत सामान्य ढंग से बोलें। बिना भारी अभिनय के। क्योंकि असली ताक़त उसकी सादगी में थी। और यही निर्णय दृश्य को अमर बना गया। फ़िल्म का एक और बड़ा भावनात्मक पक्ष था निरुपा रॉय का किरदार। उन्होंने हिंदी सिनेमा में माँ की जो छवि बनाई, उसमें ‘दीवार’ का योगदान बहुत बड़ा है। उनके चेहरे पर दर्द और नैतिक मजबूती दोनों दिखाई देते थे।

अनिता के किरदार को भी अधिक महत्व दिया जाना चाहिए। परवीन बाबी का यह पात्र हिंदी सिनेमा की पारंपरिक नायिका से अलग था। वह आधुनिक थी, स्वतंत्र थी और सामाजिक नैतिकता के पुराने ढाँचे से बाहर खड़ी दिखाई देती थी। विजय और अनिता का रिश्ता उस समय के बदलते शहरी भारत का संकेत था जहाँ रिश्ते पारंपरिक पारिवारिक संरचनाओं से अलग रूप लेने लगे थे।

कहा जाता है कि अमिताभ बच्चन कई भावनात्मक दृश्यों में वास्तविक रूप से भावुक हो जाते थे। विशेष रूप से माँ से जुड़े दृश्यों में वातावरण इतना गंभीर हो जाता था कि शूटिंग खत्म होने के बाद भी कुछ देर तक सन्नाटा रहता था। फ़िल्म के संगीत को लेकर भी दिलचस्प स्थिति थी। ‘दीवार’ पूरी तरह गीत प्रधान फ़िल्म नहीं थी। यश चोपड़ा जानते थे कि कहानी का तनाव संगीत से टूटना नहीं चाहिए। इसलिए गीतों का इस्तेमाल सीमित लेकिन प्रभावी रखा गया।


संगीतकार आर. डी. बर्मन ने बैकग्राउंड स्कोर में आधुनिकता और भावनात्मक तनाव दोनों को संतुलित किया। फ़िल्म का संगीत कहानी पर हावी नहीं होता, बल्कि उसे भीतर से मजबूत करता है। फ़िल्म की शूटिंग के दौरान सबसे बड़ी चुनौती थी उसके भावनात्मक और व्यावसायिक संतुलन को बनाए रखना। कहानी गंभीर थी। नायक अपराध की दुनिया में जाता है। अंत दुखद है। उस समय निर्माता अक्सर ऐसे विषयों से डरते थे। लेकिन यश चोपड़ा और सलीम-जावेद जानते थे कि जनता बदल चुकी है। दर्शक अब ‘सफेद’ नायक नहीं चाहते। उन्हें ऐसा आदमी चाहिए जो टूटता भी हो, गलतियाँ भी करे और व्यवस्था से लड़ भी सके।

जब ‘दीवार’ रिलीज़ हुई तो प्रतिक्रिया विस्फोटक थी। दर्शकों ने विजय में अपना गुस्सा देखा। गरीब आदमी का अपमान देखा। व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह देखा। फ़िल्म ने भारत और विदेशों में मिलाकर लगभग 7 से 8 करोड़ रुपये से अधिक का कारोबार किया, जो 1975 के हिसाब से बड़ी सफलता थी। यह उस वर्ष की सबसे अधिक कमाई करने वाली फिल्मों में शामिल रही।

लेकिन ‘दीवार’ की असली सफलता उसकी कमाई नहीं थी।

इस फ़िल्म ने हिंदी सिनेमा के नायक की परिभाषा बदल दी। इसके बाद ‘एंग्री यंग मैन’ का दौर शुरू हुआ। अमिताभ बच्चन केवल अभिनेता नहीं रहे। वे व्यवस्था के खिलाफ जनता के गुस्से का चेहरा बन गये। फ़िल्म ने सलीम-जावेद को भी हिंदी सिनेमा के सबसे शक्तिशाली लेखकों में स्थापित कर दिया। इसके बाद लेखक पहली बार स्टार जैसी प्रतिष्ठा पाने लगे।

फ़िल्म का अंत भी विशेष महत्व रखता है। विजय अंततः मंदिर की सीढ़ियों पर मरता है। यह वही आदमी है जिसने पूरी फ़िल्म में व्यवस्था, ईश्वर और नैतिकता से संघर्ष किया। लेकिन मृत्यु के क्षण में वह माँ की गोद और मंदिर दोनों की ओर लौटता है। यही दृश्य ‘दीवार’ को साधारण गैंगस्टर फ़िल्म से आगे बढ़ाकर आधुनिक भारतीय त्रासदी बना देता है।

आज लगभग पाँच दशक बाद भी ‘दीवार’ पुरानी नहीं लगती। क्योंकि उसके भीतर का संघर्ष आज भी जीवित है। गरीबी आज भी आदमी को तोड़ती है। अपमान आज भी गुस्सा पैदा करता है। और व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह आज भी दर्शकों को आकर्षित करता है। शायद यही कारण है कि विजय आज भी भारतीय सिनेमा के सबसे जीवित किरदारों में गिना जाता है। क्योंकि वह केवल अपराधी नहीं था। वह उस समाज का घायल बेटा था जिसने उसे कभी पूरी तरह अपनाया ही नहीं।

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