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Bollywood Old Movie: ‘जाने भी दो यारों’, सिस्टम और समाज का असली चेहरा दिखाती एक कल्ट क्लासिक फ़िल्म
Jaane Bhi Do Yaaro Full Movie Story: 1983 में रिलीज़ हुई ‘जाने भी दो यारों’ ने इन दोनों रास्तों को तोड़ दिया। यह फ़िल्म हँसाती भी थी और भीतर तक असहज भी कर देती थी।
Bollywood Old Movie Jaane Bhi Do Yaaro
Bollywood Old Movie Jaane Bhi Do Yaaro: भारतीय सिनेमा में व्यंग्य फिल्मों की परंपरा बहुत मजबूत कभी नहीं रही। अधिकतर फ़िल्में या तो पूर्ण मनोरंजन की ओर चली जाती थीं या फिर गंभीर सामाजिक संदेश देने लगती थीं। लेकिन 1983 में रिलीज़ हुई ‘जाने भी दो यारों’ ने इन दोनों रास्तों को तोड़ दिया। यह फ़िल्म हँसाती भी थी और भीतर तक असहज भी कर देती थी। दर्शक पूरे समय ठहाके लगाते रहते थे, लेकिन धीरे-धीरे उन्हें एहसास होता था कि वे जिस भ्रष्टाचार, लालच और नैतिक पतन पर हँस रहे हैं, वही दरअसल उनके आसपास की वास्तविक दुनिया है। इस फिल्म का व्यंग्य पूरे सिस्टम पर था जिसमें राजनीति, मीडिया, बिल्डर लॉबी, भ्रष्टाचार, नौकरशाही और नैतिक पतन सब कुछ शामिल थे। फिल्म किसी एक पार्टी या विचारधारा पर हमला नहीं करती बल्कि वह पूरे सामाजिक ढांचे की सड़ांध दिखाती थी। यही वजह है कि वह कालजयी बनी।
जब यह फ़िल्म बनी, तब किसी ने कल्पना नहीं की थी कि आगे चलकर इसे ‘कल्ट क्लासिक’ कहा जाएगा। फ़िल्म सीमित बजट में बनी थी। बड़े सितारे नहीं थे। शूटिंग बेहद कठिन परिस्थितियों में हुई थी। कलाकारों और तकनीशियनों को कई बार यह भी नहीं पता होता था कि वे जिस दृश्य को कर रहे हैं, वह अंतिम रूप में कैसा दिखाई देगा।
जब फिल्म रिलीज़ हुई, तब यह बॉक्स ऑफिस (Bollywood Box Office) पर बहुत बड़ी सफल नहीं रही क्योंकि उस दौर में मसाला फिल्में ज्यादा लोकप्रिय थीं। आज जिस फिल्म को लोग क्लासिक मानते हैं, उसे उस समय कल्ट दर्जा मिलने में वर्षों लगे। दूरदर्शन और बाद में वीडियो कैसेट के दौर में जब लोगों ने इसे बार-बार देखा, तब उसके संवाद और दृश्य लोकप्रिय हुए।
1970 और 80 का दशक भारत में राजनीतिक और प्रशासनिक भ्रष्टाचार के बढ़ते दौर का समय था। शहरों में बिल्डर लॉबी ताक़तवर हो रही थी। पत्रकारिता पर दबाव बढ़ रहा था। सरकारी तंत्र के भीतर रिश्वत और साठगाँठ आम चर्चा का विषय बनने लगे थे। कुंदन शाह इन सबको बहुत करीब से देख रहे थे। वे ऐसी फ़िल्म बनाना चाहते थे जो सीधे भाषण न दे, लेकिन व्यवस्था की पूरी बेतुकापन को उजागर कर दे। यही सोच धीरे-धीरे ‘जाने भी दो यारों’ में बदल गई।
फ़िल्म का विचार राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय और एफटीआईआई से जुड़े उस रचनात्मक समूह से भी प्रभावित था जिसमें गंभीर थिएटर, राजनीतिक व्यंग्य और यथार्थवादी अभिनय की मजबूत परंपरा थी। यही कारण है कि पूरी फ़िल्म में हास्य सतही नहीं लगता। उसके भीतर लगातार सामाजिक बेचैनी चलती रहती है। बहुत-से दृश्य इतने हास्यास्पद हैं कि दर्शक हँसते-हँसते असहज हो जाते हैं।
नसीरुद्दीन शाह और रवि बासवानी
फ़िल्म में नसीरुद्दीन शाह (Naseeruddin Shah Movie) और रवि बासवानी ने दो संघर्षरत फोटोग्राफरों, विनोद और सुधीर, का किरदार निभाया। दोनों छोटे आदमी हैं। सपने बड़े हैं, लेकिन व्यवस्था उन्हें लगातार कुचलती रहती है। उनकी मासूमियत ही फ़िल्म की सबसे बड़ी ताक़त बन जाती है। वे भ्रष्ट दुनिया में ईमानदार बने रहने की कोशिश करते हैं, लेकिन धीरे-धीरे उसी अराजकता में फँसते चले जाते हैं।
नसीरुद्दीन शाह उस समय समानांतर सिनेमा के सबसे महत्वपूर्ण अभिनेताओं में गिने जाते थे। लेकिन ‘जाने भी दो यारों’ में उन्होंने अपने भीतर की कॉमिक टाइमिंग को जिस सहजता से इस्तेमाल किया, वह असाधारण था। वहीं रवि बासवानी की मासूम ऊर्जा फ़िल्म की जान बन गई। बहुत-से समीक्षक आज भी मानते हैं कि भारतीय सिनेमा ने रवि बासवानी जैसे अभिनेता का पूरा उपयोग कभी नहीं किया।
हमारे बीच के पात्र
‘जाने भी दो यारों’ की सबसे बड़ी ताक़त यही थी कि उसके नायक पारंपरिक नायक नहीं थे। वे साधारण, कमजोर और भ्रमित लोग थे। यही कारण है कि दर्शक उनके भीतर अपना प्रतिबिंब देखने लगे। फ़िल्म में ओम पुरी, पंकज कपूर, सतीश शाह, सतीश कौशिक, भारती आचरेकर और नीना गुप्ता जैसे कलाकारों ने छोटे-छोटे लेकिन बेहद प्रभावशाली किरदार निभाए। दिलचस्प बात यह है कि उस समय इनमें से बहुत-से कलाकार संघर्ष के दौर में थे। किसी को यह अंदाज़ा नहीं था कि आगे चलकर यही लोग भारतीय अभिनय परंपरा के बड़े नाम बनेंगे।
पंकज कपूर का भ्रष्ट ठेकेदार ‘तारनेजा’ और ओम पुरी का बिल्डर ‘आहूजा’ भारतीय सिनेमा के सबसे यादगार व्यंग्यात्मक पात्रों में शामिल हो गये। दोनों का लालच इतना अतिरंजित है कि वह हास्यास्पद लगता है, लेकिन दर्शक जानते हैं कि यही वास्तविकता भी है।
कम बजट की बड़ी फिल्म
फ़िल्म का निर्माण नेशनल फ़िल्म डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन के सहयोग से हुआ था और उसका बजट बेहद सीमित था। यही कारण था कि पूरी यूनिट को बहुत नियंत्रित संसाधनों में काम करना पड़ा। कई कलाकारों ने बाद में बताया कि शूटिंग के दौरान आर्थिक दबाव लगातार बना रहता था। लेकिन शायद यही सीमाएँ फ़िल्म की रचनात्मक ताक़त बन गईं। फ़िल्म की लो-बजट प्रकृति ही उसकी सबसे बड़ी वास्तविकता बन गई। टूटी हुई लोकेशन, अस्त-व्यस्त दफ़्तर, सस्ते कैमरे और बिखरा हुआ शहरी वातावरण सब मिलकर उस भारत की तस्वीर बनाते हैं जहाँ ईमानदार आदमी लगातार हास्यास्पद स्थिति में धकेल दिया जाता है।
शूटिंग और कलाकारों को आज़ादी
फ़िल्म की शूटिंग मुख्य रूप से मुंबई में हुई। उस समय मुंबई तेजी से बदलता हुआ शहर था। बिल्डर राजनीति और शहरी भ्रष्टाचार बढ़ रहा था। कुंदन शाह चाहते थे कि शहर फ़िल्म में केवल पृष्ठभूमि न लगे, बल्कि व्यवस्था के पतन का सक्रिय हिस्सा महसूस हो। इसलिए उन्होंने वास्तविक लोकेशनों का व्यापक उपयोग किया।
फ़िल्म का कैमरा भी जानबूझकर अत्यधिक ‘स्टाइलिश’ नहीं रखा गया। दृश्य कई बार लगभग डॉक्यूमेंट्री जैसे महसूस होते हैं। यही यथार्थवादी शैली बाद में फ़िल्म की पहचान बन गई। फ़िल्म के निर्माण के दौरान सबसे बड़ी चुनौती थी उसके हास्य का संतुलन। यदि व्यंग्य बहुत हल्का हो जाता तो सामाजिक असर खत्म हो जाता। यदि बहुत गंभीर हो जाता तो दर्शक उससे दूर हो सकते थे। कुंदन शाह लगातार इस संतुलन पर काम करते रहे। कई दृश्यों में कलाकारों को खुद गढ़ने की खुली छूट दी गई। यही कारण है कि फ़िल्म का हास्य अत्यंत स्वाभाविक लगता है।
सतीश शाह का किरदार
सतीश शाह ने फ़िल्म में नगर निगम के भ्रष्ट कमिश्नर डि मेलो का किरदार निभाया था। उनका रोल बहुत लंबा नहीं था, लेकिन फिल्म के सबसे यादगार और विचित्र हास्य क्षणों में से कई उन्हीं से जुड़े हैं। डि मेलो एक शराबी, भ्रष्ट और नैतिक रूप से पूरी तरह गिरा हुआ अफसर है, जो बिल्डर लॉबी और सत्ता के खेल का हिस्सा बन चुका है।फिल्म में उसका किरदार उस नौकरशाही का प्रतीक है जो ऊपर से सभ्य और अधिकारपूर्ण दिखती है, लेकिन भीतर से पूरी तरह सड़ी हुई है।
सबसे मशहूर बात यह है कि डि मेलो की मौत के बाद भी उसका “शव” पूरी फिल्म में घूमता रहता है। यही शव बाद में महाभारत वाले ऐतिहासिक क्लाइमैक्स तक पहुँच जाता है और पूरी अराजक कॉमेडी का केंद्र बन जाता है।सतीश शाह का अभिनय आज भी याद किया जाता है।
महाभारत का दृश्य
फ़िल्म का सबसे ऐतिहासिक हिस्सा उसका अंतिम ‘महाभारत’ दृश्य बन गया। भारतीय सिनेमा के इतिहास में शायद ही कोई दूसरा व्यंग्य दृश्य इतना अराजक, इतना हास्यास्पद और इतना राजनीतिक रहा हो। मंच पर चल रहे महाभारत नाटक के भीतर भ्रष्टाचार, हत्या, लालच और प्रशासनिक पतन का पूरा तंत्र घुस आता है।
पात्रों की पहचान टूट जाती है। संवाद बिखर जाते हैं। और पूरा दृश्य भारतीय व्यवस्था की सामूहिक विफलता का प्रतीक बन जाता है। इस दृश्य की शूटिंग बेहद कठिन थी। इतने सारे कलाकार। अलग अलग खांचे। पूरे सीक्वेंस को नियंत्रित करना आसान नहीं था। लेकिन यही दृश्य बाद में फ़िल्म की पहचान बन गया।
आज भी प्रासंगिक
विडंबना यह थी कि जिस फ़िल्म को शुरू में सीमित दर्शक मिले, वही आगे चलकर भारतीय मध्यवर्ग की सबसे प्रिय व्यंग्य फिल्म बन गई। क्योंकि भ्रष्टाचार, सत्ता और नैतिक पतन के उसके सवाल समय के साथ और अधिक प्रासंगिक होते गये। आज चार दशक बाद भी यह फ़िल्म पुरानी नहीं लगती। क्योंकि भ्रष्टाचार आज भी है। मीडिया और सत्ता की साठगाँठ आज भी है। छोटे आदमी की बेबसी आज भी है। और व्यवस्था की बेतुकापन आज भी वैसी ही दिखाई देती है।
कुंदन शाह
इस फिल्म के बाद कुंदन शाह बड़े व्यावसायिक निर्देशक नहीं बन पाए। फिर भी उन्होंने सामाजिक व्यंग्य और मध्यमवर्गीय कहानियों पर काम जारी रखा। उनकी अगली चर्चित फिल्म थी कभी हां कभी न। इसमें युवा शाहरुख खान थे। यह फिल्म हल्की, मानवीय और बेहद संवेदनशील थी।
आज इसे शाहरुख के करियर की सबसे ईमानदार परफॉर्मेंस में गिना जाता है। वैसे, कुंदन शाह भारतीय टेलीविजन के इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण नामों में भी थे। उन्होंने नुक्कड़ जैसे लोकप्रिय टीवी धारावाहिक का निर्देशन किया।
हम होंगे कामयाब
फ़िल्म का एक बेहतरीन पहलू है 'हम होंगे कामयाब' गीत। फिल्म के क्लाइमैक्स में अदालत और पुलिस की मिलीभगत के बाद विनोद चोपड़ा (नसीरुद्दीन शाह) और सुधीर मिश्र (रवि बासवानी) पर ही पुल गिराने और साजिश का आरोप डाल दिया जाता है। असली भ्रष्ट लोग बिल्डर, अधिकारी और बाकी ताकतवर पात्र बच निकलते हैं। इसी दौरान बैकग्राउंड में “हम होंगे कामयाब” बजता है। इसे फिल्म में किसी पात्र द्वारा बैठकर गाया नहीं जाता, बल्कि यह एक व्यंग्यात्मक बैकग्राउंड गीत की तरह इस्तेमाल होता है। उस दृश्य में भ्रष्ट लोग 'सत्यमेव जयते' जैसे आदर्शवादी नारों के बीच समझौता कर लेते हैं और कैमरा व्यवस्था की नकली नैतिकता को दिखाता है। उसी समय “हम होंगे कामयाब” बजना शुरू होता है। यह गाना फिल्म में उम्मीद का नहीं, बल्कि कटाक्ष और विडंबना का प्रतीक बन जाता है।
विनोद चोपड़ा और सुधीर मिश्र।
फ़िल्म में विनोद चोपड़ा नाम निर्देशक विधु विनोद चोपड़ा पर आधारित था, जो कुंदन शाह के एफटीआईआई सर्कल के करीबी दोस्त थे। सुधीर मिश्र का नाम बाद में मशहूर निर्देशक बने सुधीर मिश्र से लिया गया था, जो उस समय समानांतर सिनेमा और लेखन से जुड़े युवा फिल्मकारों में थे। दिलचस्प बात यह है कि असली सुधीर मिश्र ने फिल्म में सह-लेखन और सहायक निर्देशन से जुड़ा काम भी किया था। यानी फिल्म के किरदारों के नाम सिर्फ काल्पनिक नहीं थे; वे उस पूरी एफटीआईआई और समानांतर सिनेमा वाली पीढ़ी के दोस्तों, संघर्षों और हास्य संस्कृति का हिस्सा थे।


