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Bollywood Old Movie Lagaan: ‘लगान’ एक क्रिकेट मैच बना आज़ादी, स्वाभिमान और सामूहिक संघर्ष की महागाथा
Lagaan Full Movie Story: 2001 में रिलीज हुई ‘लगान’ (Bollywood Old Movie Lagan) सिर्फ एक क्रिकेट फिल्म नहीं थी, बल्कि आज़ादी, स्वाभिमान और सामूहिक संघर्ष की महागाथा बन गई।
Bollywood Old Movie Lagaan Full Movie Story Newstrack
Bollywood Old Movie Lagaan: भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ फ़िल्में सिर्फ सफल ही नहीं होतीं बल्कि वे पूरी फिल्म इंडस्ट्री की दिशा बदल देती हैं। ‘लगान’ ऐसी ही फ़िल्म थी। 2001 में जब यह रिलीज़ हुई, तब हिंदी सिनेमा एक संक्रमण काल से गुजर रहा था। एक तरफ पारंपरिक मसाला फिल्मों का प्रभाव था, दूसरी तरफ शहरी मल्टीप्लेक्स दर्शकों की नई पसंद उभर रही थी। ऐसे समय में लगभग चार घंटे लंबी, ग्रामीण पृष्ठभूमि वाली, ब्रिटिश हुकूमत वाले भारत पर आधारित और क्रिकेट को केंद्र में रखकर बनाई गई इस फ़िल्म पर बहुत कम लोगों को भरोसा था। फ़िल्म इंडस्ट्री के कई लोग इसे अत्यधिक जोखिम भरा प्रयोग मान रहे थे। लेकिन रिलीज़ के बाद ‘लगान’ केवल सुपरहिट नहीं हुई। वह भारतीय सिनेमा के आत्मविश्वास की वैश्विक घोषणा बन गई।
यह फ़िल्म सिर्फ क्रिकेट मैच की कहानी नहीं थी। यह उस भारत की कहानी थी जिसे सदियों तक दबाया गया, अपमानित किया गया और कमजोर समझा गया। लेकिन जिसने अंततः अपनी सामूहिक शक्ति से सत्ता को चुनौती दी। यही कारण है कि ‘लगान’ को देखते समय दर्शक केवल खेल नहीं देखते। वे सम्मान, अस्तित्व और आत्मविश्वास की लड़ाई महसूस करते हैं। यही उसकी सबसे बड़ी भावनात्मक शक्ति बन गई।
आशुतोष गोवारिकर का आत्मविश्वास (Bollywood Movie Lagaan Director)
फ़िल्म का विचार निर्देशक आशुतोष गोवारिकर के मन में लंबे समय से था। वे ऐसी कहानी बनाना चाहते थे जिसमें खेल केवल मनोरंजन न होकर सामाजिक संघर्ष का प्रतीक बने। लेकिन किसी ने कल्पना नहीं की थी कि क्रिकेट को औपनिवेशिक शोषण और ग्रामीण प्रतिरोध की महागाथा के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है। यही ‘लगान’ का सबसे बड़ा रचनात्मक साहस था।
जब आशुतोष गोवारिकर ने यह कहानी इंडस्ट्री के लोगों को सुनानी शुरू की तो अधिकांश ने इसे असंभव परियोजना माना। ग्रामीण भारत। अंग्रेज़ पात्र। लंबी अवधि। भारी बजट। क्रिकेट पर आधारित क्लाइमेक्स। और कोई पारंपरिक शहरी ग्लैमर नहीं। बहुत-से निर्माताओं को लगा कि आम दर्शक ऐसी फ़िल्म स्वीकार नहीं करेंगे। कई लोगों ने कहानी सुनकर साफ़ मना कर दिया।
अंततः आशुतोष गोवारिकर आमिर खान के पास पहुँचे। शुरुआत में आमिर खान भी पूरी तरह आश्वस्त नहीं थे। लेकिन जैसे-जैसे उन्होंने कहानी को गहराई से समझा, उन्हें एहसास हुआ कि यह साधारण फ़िल्म नहीं है। यह भावनात्मक रूप से बेहद शक्तिशाली विचार है। यहीं से ‘लगान’ की वास्तविक यात्रा शुरू हुई। आमिर खान ने केवल अभिनय ही नहीं किया। बल्कि निर्माता के रूप में भी भारी जोखिम उठाया। बाद में उन्होंने स्वयं स्वीकार किया कि यदि ‘लगान’ असफल हो जाती तो आर्थिक रूप से स्थिति बेहद कठिन हो सकती थी।
कठिन लोकेशन और असली दिखने की चुनौती (Bollywood Movie Lagaan Shooting)
फ़िल्म का सबसे बड़ा निर्माण संघर्ष था उसकी प्रामाणिकता। आशुतोष गोवारिकर नहीं चाहते थे कि ग्रामीण भारत नकली लगे। वे चाहते थे कि दर्शक सचमुच उस सूखे, भूखे और संघर्षरत गाँव को महसूस करें जहाँ लोगों की पूरी ज़िंदगी बारिश पर निर्भर है। इसी कारण गुजरात के भुज क्षेत्र के पास विशाल सेट तैयार किया गया। वहाँ का सूखा बंजर परिदृश्य कहानी के लिए बिल्कुल उपयुक्त लगा।
लेकिन इस लोकेशन पर शूटिंग आसान नहीं थी। तापमान कई बार अत्यधिक बढ़ जाता था। धूल लगातार उड़ती रहती थी। दूर-दराज़ इलाके में पूरी यूनिट को महीनों तक रहना पड़ा। उस समय इतनी विशाल आउटडोर शूटिंग के लिए व्यवस्थाएँ करना बेहद कठिन था। पानी, भोजन, उपकरण, परिवहन और तकनीकी समन्वय, हर चीज़ बड़ी चुनौती थी। कई कलाकारों ने बाद में कहा कि ‘लगान’ की शूटिंग शारीरिक रूप से बेहद थकाऊ अनुभव थी।
फ़िल्म की सबसे बड़ी तकनीकी चुनौती था उसका क्रिकेट मैच। आज की तरह कंप्यूटर ग्राफिक्स और डिजिटल तकनीक उस स्तर पर उपलब्ध नहीं थी। आशुतोष गोवारिकर चाहते थे कि मैच वास्तविक लगे। इसके लिए कलाकारों को महीनों क्रिकेट की ट्रेनिंग दी गई। आमिर खान समेत पूरी टीम को बैटिंग, बॉलिंग और फील्डिंग की बारीकियाँ सीखनी पड़ीं ताकि कैमरे पर खेल बनावटी न लगे।
विशेष रूप से अंतिम मैच की शूटिंग बेहद जटिल थी। विशाल मैदान, सैकड़ों जूनियर कलाकार, अंग्रेज़ और भारतीय टीमों के बीच लगातार खेल का समन्वय, कैमरों की स्थिति और मैच के भावनात्मक तनाव, यह सब एक साथ नियंत्रित करना आसान नहीं था। कई बार एक छोटे दृश्य के लिए पूरा मैच दोबारा शूट करना पड़ता था। इससे समय और खर्च दोनों तेजी से बढ़ते गये।
‘लगान’ की सबसे बड़ी उपलब्धि यही थी कि उसने क्रिकेट को केवल खेल नहीं रहने दिया। उसने उसे सत्ता और स्वाभिमान के बीच संघर्ष का प्रतीक बना दिया। यही कारण है कि दर्शक मैच के हर ओवर को भावनात्मक रूप से जीते हैं।
आमिर खान का 'भुवन' (Bollywood Movie Lagaan Amir Khan Acting)
आमिर खान ने ‘भुवन’ के किरदार को अत्यंत नियंत्रित ढंग से निभाया। भुवन पारंपरिक फिल्मी नायक नहीं है। वह बहुत ज्यादा भाषण नहीं देता। उसके भीतर आत्मविश्वास है। लेकिन वह अहंकारी नहीं। वह गाँव वालों को एकजुट करता है। और धीरे-धीरे सामूहिक नेतृत्व का चेहरा बनता है। यही सादगी भुवन को विश्वसनीय बनाती है।
ग्रेसी सिंह फ़िल्म की सबसे बड़ी खोजों में से एक थीं। ‘गौरी’ के किरदार में उन्हें ग्रामीण मासूमियत, प्रेम और भावनात्मक धैर्य, तीनों को संतुलित करना था। आशुतोष गोवारिकर नहीं चाहते थे कि गौरी केवल पारंपरिक प्रेमिका बनकर रह जाए। वे चाहते थे कि वह गाँव की सामूहिक भावनात्मक ऊर्जा का हिस्सा महसूस हो। ग्रेसी सिंह ने इस भूमिका को अत्यंत सहजता से निभाया।
ब्रिटिश कलाकारों का चयन भी फ़िल्म के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण था। विशेष रूप से कैप्टन रसेल का किरदार निभाने वाले पॉल ब्लैकथॉर्न को ऐसा संतुलन बनाना था जिसमें अहंकार भी हो और वास्तविक औपनिवेशिक मानसिकता भी। आशुतोष गोवारिकर नहीं चाहते थे कि अंग्रेज़ पात्र कार्टून जैसे खलनायक लगें। वे सत्ता की मानसिकता को वास्तविक रूप में दिखाना चाहते थे। यही कारण है कि संघर्ष अधिक विश्वसनीय महसूस होता है।
ए.आर. रहमान के संगीत ने दी गहराई (Bollywood Movie Lagaan AR Rahman Songs)
फ़िल्म का संगीत उसकी आत्मा बन गया। ए. आर. रहमान उस समय भारतीय संगीत की सबसे बड़ी रचनात्मक शक्तियों में गिने जाते थे और ‘लगान’ में उन्होंने लोक, भक्ति, भावनात्मक मेलोडी और काव्यात्मक ऊर्जा सबको अद्भुत ढंग से जोड़ा। जावेद अख्तर के गीतों ने फ़िल्म को सांस्कृतिक गहराई दी।
‘घनन घनन’ केवल बारिश का गीत नहीं था। वह सूखे से जूझते किसानों की सामूहिक प्रार्थना बन गया। ‘ओ पालनहारे’ फ़िल्म का आध्यात्मिक केंद्र महसूस होता है। और ‘चले चलो’ ने पूरे मैच को भावनात्मक युद्ध में बदल दिया। यह गीत केवल प्रेरक संगीत नहीं रहा। वह सामूहिक प्रतिरोध की घोषणा बन गया।
‘लगान’ का संगीत फ़िल्म की कहानी से अलग नहीं चलता। वह कहानी के भीतर साँस लेता है। हर गीत गाँव की सामूहिक भावना, संघर्ष और उम्मीद को आगे बढ़ाता है।
फ़िल्म के निर्माण के दौरान सबसे बड़ी चिंता उसकी लंबाई को लेकर थी। उद्योग के बहुत-से लोगों को लगता था कि आधुनिक दर्शक इतनी लंबी फ़िल्म स्वीकार नहीं करेंगे। लेकिन आशुतोष गोवारिकर और आमिर खान को विश्वास था कि यदि भावनात्मक जुड़ाव मजबूत हुआ तो दर्शक पूरी यात्रा के साथ रहेंगे। यही हुआ। रिलीज़ के बाद दर्शक पूरी फ़िल्म को एक अनुभव की तरह देखने लगे।
दर्शकों का जुड़ाव और अंतरराष्ट्रीय ख्याति
जब ‘लगान’ रिलीज़ हुई तो शुरुआत से ही उसकी चर्चा असाधारण थी। फ़िल्म की लंबाई की चिंता बेवजह साबित हुई। हर वर्ग के दर्शकों ने उसकी तकनीकी गुणवत्ता, भावनात्मक स्केल और संघर्ष से गहरा जुड़ाव महसूस किया। फ़िल्म ने भारत और विदेशों में भारी सफलता हासिल की और जल्दी ही भारतीय सिनेमा की सबसे महत्वपूर्ण फिल्मों में शामिल हो गई।
इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि तब हुई जब इसे अकादमी पुरस्कार यानी ऑस्कर में ‘बेस्ट फॉरेन लैंग्वेज फ़िल्म' श्रेणी के लिए नामांकन मिला। ‘मदर इंडिया’ और ‘सलाम बॉम्बे!’ के बाद यह तीसरी भारतीय फ़िल्म थी जिसे यह सम्मान मिला। इस नामांकन ने दुनिया का ध्यान एक बार फिर भारतीय सिनेमा की ओर खींचा।
एक बदलाव छोड़ गई लगान
फ़िल्म की सफलता ने हिंदी सिनेमा के भीतर भी बड़ा बदलाव पैदा किया। इसके बाद बड़े निर्माता और अभिनेता अधिक जोखिम लेने लगे। पीरियड फिल्मों, खेल-आधारित कथाओं और ग्रामीण भारत की कहानियों को नई गंभीरता से देखा जाने लगा। बहुत-से फिल्म इतिहासकार मानते हैं कि 2000 के दशक के भारतीय सिनेमा के आत्मविश्वास में ‘लगान’ की बड़ी भूमिका थी।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि ‘लगान’ की जीत केवल मैच की जीत नहीं थी। वह उस आत्मविश्वास की जीत थी जिसमें एक दबा हुआ समाज पहली बार सत्ता की आँखों में आँख डालकर खड़ा होता है। यही कारण है कि ‘लगान’ आज भी देखते समय केवल मनोरंजन नहीं लगती। वह सामूहिक गर्व का अनुभव महसूस होती है।


