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Bollywood Old Movie Shree 420: राज कपूर की सबसे बेहतरीन फिल्म, जिसने भारत का सच दिखाया
Shree 420 Full Movie Story: राज कपूर की ‘श्री 420’ केवल एक फिल्म नहीं, बल्कि आज़ाद भारत के सपनों, संघर्ष, नैतिक द्वंद्व और शहरी जीवन की चमक-दमक का जीवंत सामाजिक दस्तावेज़ है।
Bollywood Old Movie Shree 420 Story
Bollywood Old Movie Shree 420: 1950 का दशक भारत के लिए केवल एक नया राजनीतिक दौर नहीं था। वह उम्मीदों का दशक था। देश अभी-अभी आज़ाद हुआ था। करोड़ों लोग गरीबी में थे। शहरों की ओर पलायन तेज़ हो रहा था। हर आदमी की आँखों में सपना था कि एक दिन वह भी अमीर बनेगा। लेकिन उसी सपने के भीतर लालच, धोखा और नैतिक पतन का अंधेरा भी छिपा था।
. ‘श्री 420’ को केवल एक मनोरंजक सामाजिक फ़िल्म के रूप में देखना उसके महत्व को कम कर देता है। यह फ़िल्म दरअसल स्वतंत्र भारत के शहरी संक्रमण की कहानी थी। गाँवों से शहरों की ओर भागते लोग। जल्दी अमीर बनने का सपना। ईमानदारी और सफलता के बीच संघर्ष। राज कपूर ने इन सबको एक सरल लेकिन गहरे भावनात्मक ढंग से परदे पर उतारा। यही कारण है कि ‘श्री 420’ आज भी आधुनिक भारत की शुरुआती सामाजिक बेचैनियों का दस्तावेज़ महसूस होती है।
ऐसे समय में राज कपूर ने ‘श्री 420’ बनाई
यह फ़िल्म केवल एक आवारा युवक की कहानी नहीं थी। यह नए भारत की कहानी थी। उस भारत की, जहाँ ईमानदारी और सफलता के बीच संघर्ष शुरू हो चुका था। जहाँ गाँव से आया सीधा-सादा युवक महानगर मुंबई की चमक में खो भी सकता था और टूट भी सकता था। यही कारण है कि ‘श्री 420’ आज भी केवल मनोरंजन नहीं लगती। वह आज़ाद भारत के शुरुआती सपनों का सामाजिक दस्तावेज़ महसूस होती है।
. 1955 में रिलीज़ हुई यह फ़िल्म उस समय भारतीय सिनेमा की सबसे बड़ी सफलताओं में शामिल हुई। लेकिन इसकी निर्माण यात्रा उतनी ही दिलचस्प थी जितनी इसकी कहानी। पर्दे के पीछे भावनाएँ थीं। प्रेम था। महत्वाकांक्षा थी। आर्थिक जोखिम था। और एक ऐसा रचनात्मक जुनून था जिसने राज कपूर को भारतीय सिनेमा का सबसे बड़ा शोमैन बना दिया।
. ‘श्री 420’ का विचार लेखक ख्वाजा अहमद अब्बास और राज कपूर की लंबी चर्चाओं से विकसित हुआ। दोनों इस बात से परेशान थे कि आज़ादी के बाद भी आम आदमी का संघर्ष समाप्त नहीं हुआ था। शहरों में धन का आकर्षण बढ़ रहा था और नैतिकता धीरे-धीरे कमजोर पड़ती दिखाई दे रही थी। राज कपूर चाहते थे कि यह संघर्ष भारी भाषणों के रूप में नहीं, बल्कि मनोरंजन, हास्य और भावनात्मक कहानी के माध्यम से सामने आए।
. ‘श्री 420’ की पटकथा में सामाजिक व्यंग्य की गहरी परत मौजूद थी। ख्वाजा अहमद अब्बास वामपंथी विचारों से प्रभावित थे और वे चाहते थे कि फ़िल्म आम आदमी के संघर्ष को ईमानदारी से दिखाए। दूसरी तरफ राज कपूर जानते थे कि यदि कहानी अत्यधिक वैचारिक हो गई तो दर्शकों तक उसकी पहुँच कम हो जाएगी। यही कारण है कि फ़िल्म में गंभीर सामाजिक टिप्पणी और लोकप्रिय मनोरंजन का असाधारण संतुलन दिखाई देता है।
. राज कपूर का किरदार ‘राज’ सीधे-सीधे चार्ली चैपलिन के प्रसिद्ध ‘ट्रैम्प’ से प्रभावित था। फटी टोपी। घिसे जूते। मासूम मुस्कान। और भीतर छिपा संवेदनशील आदमी। लेकिन राज कपूर ने उसे पूरी तरह भारतीय बना दिया। उसके सपने भारतीय थे। उसकी गरीबी भारतीय थी। उसकी नैतिक दुविधाएँ भारतीय थीं। यही कारण है कि दर्शकों ने उस किरदार को तुरंत अपना लिया।
फ़िल्म में नरगिस का किरदार ‘विद्या’ केवल प्रेमिका का नहीं था। वह नैतिकता और सच्चाई का प्रतीक थी। कहा जाता है कि राज कपूर ने यह भूमिका विशेष रूप से नरगिस की स्क्रीन पर्सनैलिटी को ध्यान में रखकर तैयार की थी। उस समय दोनों की जोड़ी भारतीय सिनेमा की सबसे लोकप्रिय जोड़ी बन चुकी थी। दर्शक उन्हें केवल कलाकार नहीं, बल्कि वास्तविक प्रेमी मानने लगे थे।
. ‘विद्या’ और ‘माया’ दरअसल फ़िल्म के भीतर दो अलग-अलग भारत का प्रतिनिधित्व करती थीं। ‘विद्या’ ईमानदारी, सादगी और नैतिकता की दुनिया थी। जबकि ‘माया’ आधुनिक शहरी आकर्षण, धन और नैतिक समझौते का प्रतीक थी। राज कपूर चाहते थे कि दर्शक केवल कहानी न देखें, बल्कि इन दो रास्तों के बीच संघर्ष को महसूस करें। यही कारण है कि फ़िल्म आज भी नैतिक रूप से प्रासंगिक लगती है।
लेकिन ‘श्री 420’ के दौरान उनके निजी रिश्तों में तनाव बढ़ने लगा था। राज कपूर पहले से विवाहित थे और नरगिस धीरे-धीरे भावनात्मक असुरक्षा महसूस करने लगी थीं। फ़िल्म के निर्माण काल में यह तनाव कई बार यूनिट के लोगों को भी महसूस होता था। फिर भी कैमरे के सामने दोनों की केमिस्ट्री इतनी जीवंत दिखाई देती थी कि दर्शकों को वह प्रेम पूरी तरह वास्तविक लगता था। बाद में कई फिल्म इतिहासकारों ने लिखा कि ‘श्री 420’ कहीं न कहीं राज कपूर और नरगिस के रिश्ते के बदलते दौर की भी कहानी बन गई।
. फ़िल्म की सबसे बड़ी ताक़त उसका भावनात्मक संतुलन था। राज कपूर जानते थे कि यदि संदेश बहुत भारी हो गया तो दर्शक दूर हो जाएंगे। इसलिए उन्होंने कहानी में हास्य, रोमांस, गीत और सामाजिक व्यंग्य को अद्भुत तरीके से मिलाया। यही कारण है कि फ़िल्म आम दर्शकों को भी पसंद आई और बुद्धिजीवियों को भी।
फ़िल्म में ‘माया’ का किरदार निभाने वाली नादिरा उस समय बेहद आधुनिक और ग्लैमरस छवि की अभिनेत्री मानी जाती थीं। राज कपूर चाहते थे कि ‘विद्या’ और ‘माया’ केवल दो महिलाएँ न लगें, बल्कि दो विचारधाराएँ महसूस हों। एक तरफ ईमानदारी और सादगी। दूसरी तरफ धन, आकर्षण और नैतिक समझौता। नादिरा ने इस भूमिका को इतनी प्रभावशाली ढंग से निभाया कि वह फ़िल्म की सबसे चर्चित प्रस्तुतियों में शामिल हो गईं।
. ‘माया’ का चरित्र उस समय के हिंदी सिनेमा के लिए अत्यंत आधुनिक माना गया। उनका पहनावा, व्यवहार और आत्मविश्वास उस दौर की पारंपरिक नायिकाओं से बिल्कुल अलग था। समाज के एक हिस्से को यह प्रस्तुति साहसी लगी। लेकिन राज कपूर यही दिखाना चाहते थे कि महानगर का आकर्षण केवल पैसा नहीं, बल्कि जीवन शैली का भी बदलाव लेकर आता है।
1. कहा जाता है कि नादिरा के बोल्ड और आधुनिक अंदाज़ ने उस समय समाज के एक हिस्से को चौंका दिया था। लेकिन यही चीज़ फ़िल्म को आधुनिक शहरी भारत का यथार्थ भी देती थी।
फ़िल्म का निर्माण आर. के. स्टूडियो में हुआ और उस समय के हिसाब से यह बड़ा प्रोजेक्ट माना गया। विभिन्न स्रोतों के अनुसार फ़िल्म का बजट लगभग 38 लाख से 60 लाख रुपये के बीच माना जाता है, जो 1950 के दशक के लिए बहुत बड़ी राशि थी। राज कपूर ने सेट, संगीत और गीतों पर खुलकर पैसा खर्च किया। उन्हें विश्वास था कि दर्शक केवल कहानी नहीं, अनुभव देखने आते हैं।
. ‘श्री 420’ की दृश्य शैली पर भी असाधारण मेहनत हुई थी। राज कपूर चाहते थे कि मुंबई केवल शहर की तरह न दिखे, बल्कि सपनों और भ्रम की दुनिया महसूस हो। रात की सड़कें। चमकती रोशनियाँ। बारिश। भीड़। फुटपाथ। बड़े होटल। सब कुछ प्रतीकात्मक ढंग से फिल्माया गया। यही कारण है कि फ़िल्म का मुंबई आज भी सिनेमाई स्मृति का हिस्सा बना हुआ है।
. सबसे अधिक मेहनत फ़िल्म के गीतों और दृश्यात्मक शैली पर की गई। राज कपूर इस बात को अच्छी तरह समझते थे कि संगीत भारतीय दर्शकों के दिल तक पहुँचने का सबसे शक्तिशाली माध्यम है। इसलिए उन्होंने संगीतकार जोड़ी शंकर-जयकिशन, गीतकार शैलेन्द्र और हसरत जयपुरी के साथ मिलकर ऐसा संगीत रचा जिसने फ़िल्म को अमर बना दिया।
. ‘मेरा जूता है जापानी’ केवल गीत नहीं रहा। वह नए भारत की पहचान बन गया। गीत में जापानी जूते, अंग्रेज़ी पतलून और रूसी टोपी का ज़िक्र था, लेकिन दिल हिंदुस्तानी बताया गया। आज़ादी के after के भारत में यह गीत राष्ट्रीय आत्मविश्वास का प्रतीक बन गया। सोवियत संघ से लेकर मध्य एशिया तक यह गीत लोकप्रिय हुआ।
. ‘मेरा जूता है जापानी’ की लोकप्रियता केवल भारत तक सीमित नहीं रही। सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप में यह गीत भारतीय पहचान का सांस्कृतिक प्रतीक बन गया। राज कपूर जब विदेश यात्राओं पर जाते थे तो लोग यह गीत गाकर उनका स्वागत करते थे। यही वह दौर था जब भारतीय सिनेमा पहली बार वैश्विक स्तर पर भावनात्मक पहचान बना रहा था।
. ‘प्यार हुआ इकरार हुआ’ की शूटिंग अपने आप में भारतीय सिनेमा के इतिहास की सबसे यादगार घटनाओं में गिनी जाती है। बारिश। एक छाता। अंधेरी सड़क। और राज कपूर-नरगिस का साथ चलना। इस दृश्य ने रोमांस की पूरी दृश्य भाषा बदल दी। दिलचस्प बात यह है कि इस गीत में राज कपूर के बच्चे रणधीर कपूर, ऋतु नंदा और छोटे से ऋषि कपूर भी दिखाई दिये थे। उस समय किसी ने नहीं सोचा था कि वही छोटा बच्चा आगे चलकर हिंदी सिनेमा का बड़ा स्टार बनेगा।
. ‘प्यार हुआ इकरार हुआ’ की शूटिंग तकनीकी रूप से भी कठिन थी। उस समय कृत्रिम बारिश तैयार करना आसान नहीं था। भारी लाइटें, पानी और कैमरों के बीच तालमेल बनाना चुनौतीपूर्ण था। लेकिन राज कपूर चाहते थे कि दृश्य केवल रोमांटिक न लगे, बल्कि भावनात्मक अकेलेपन और साथ होने की अनुभूति भी दे। यही कारण है कि यह गीत आज भी हिंदी सिनेमा के सबसे सुंदर फिल्माए गए रोमांटिक गीतों में गिना जाता है।
. फ़िल्म के निर्माण के दौरान राज कपूर कई बार पूरी रात एडिटिंग टेबल पर बैठे रहते थे। वे केवल निर्देशक नहीं थे। वे निर्माता भी थे। अभिनेता भी। संपादन पर नज़र भी रखते थे। संगीत बैठकों में भी शामिल होते थे। कई यूनिट सदस्य बाद में कहते थे कि राज कपूर फ़िल्म नहीं बनाते थे, वे फ़िल्म को जीते थे।
फ़िल्म का सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक हिस्सा था गरीबों को घर दिलाने वाली स्कीम का धोखा। कहानी में अमीर लोग गरीबों के सपनों का इस्तेमाल करके उन्हें ठगते हैं। यह हिस्सा उस समय के शहरी भारत पर तीखा व्यंग्य माना गया। आज भी जब लोग रियल एस्टेट घोटालों या निवेश धोखाधड़ी की बात करते हैं तो कई समीक्षक ‘श्री 420’ को याद करते हैं।
. ‘श्री 420’ का यह हिस्सा समय से बहुत आगे माना जाता है। राज कपूर दिखाना चाहते थे कि शहर केवल अवसर नहीं देता, बल्कि सपनों का शोषण भी करता है। गरीब आदमी अपने घर का सपना लेकर आता है और चालाक लोग उसी सपने को व्यापार बना देते हैं। यही कारण है कि फ़िल्म आज भी समकालीन महसूस होती है।
. जब फ़िल्म रिलीज़ हुई तो सिनेमाघरों के बाहर भारी भीड़ उमड़ पड़ी। यह 1955 की सबसे अधिक कमाई करने वाली भारतीय फ़िल्म बनी। विभिन्न बॉक्स ऑफिस स्रोतों के अनुसार फ़िल्म ने भारत और विदेशों में मिलाकर लगभग 4 करोड़ से 5 करोड़ रुपये तक का कारोबार किया, जो उस समय असाधारण सफलता मानी जाती थी। कुछ आकलनों के अनुसार फ़िल्म ने अपने बजट से लगभग 300 प्रतिशत तक लाभ दिया।
. सोवियत संघ में फ़िल्म की लोकप्रियता ऐतिहासिक स्तर तक पहुँच गई। वहाँ राज कपूर भारतीय सिनेमा के सबसे बड़े चेहरे बन गये। ‘आवारा’ के बाद ‘श्री 420’ ने उनकी अंतरराष्ट्रीय पहचान को और मजबूत कर दिया। लाखों लोग राज कपूर को भारतीय चार्ली चैपलिन कहने लगे।
. सोवियत दर्शकों के बीच राज कपूर की लोकप्रियता इतनी अधिक थी कि बहुत से लोग उन्हें भारत का सांस्कृतिक प्रतिनिधि मानने लगे थे। ‘श्री 420’ में दिखाई गई गरीबी, संघर्ष और आशावाद वहाँ के आम दर्शकों को अपने जीवन के करीब महसूस होता था। यही कारण है कि राज कपूर भारतीय सिनेमा के पहले वास्तविक अंतरराष्ट्रीय सुपरस्टार बन गये।
. लेकिन इस सफलता के पीछे एक भावनात्मक विडंबना भी छिपी थी। बहुत से फिल्म इतिहासकार मानते हैं कि ‘श्री 420’ के बाद राज कपूर और नरगिस के रिश्ते में दूरी बढ़नी शुरू हो गई थी। नादिरा की बढ़ती लोकप्रियता, निजी तनाव और भविष्य को लेकर असुरक्षा ने दोनों को धीरे-धीरे अलग कर दिया। कुछ वर्षों बाद ‘मदर इंडिया’ के दौरान नरगिस की ज़िंदगी बदल गई और राज कपूर-नरगिस की ऐतिहासिक जोड़ी समाप्त हो गई।
. ‘श्री 420’ को आज पीछे मुड़कर देखने पर यह एहसास होता है कि यह केवल राज कपूर के करियर की सफलता नहीं थी। यह राज कपूर-नरगिस युग के भावनात्मक शिखर की भी अंतिम बड़ी फिल्मों में थी। इसके बाद दोनों के रिश्तों की दूरी धीरे-धीरे बढ़ती चली गई। यही कारण है कि फ़िल्म के कई रोमांटिक दृश्य आज और भी अधिक भावुक महसूस होते हैं।
. आज लगभग सात दशक बाद भी ‘श्री 420’ ताज़ा लगती है। क्योंकि उसके सवाल आज भी जीवित हैं। क्या ईमानदारी से सफलता मिल सकती है? क्या महानगर आदमी को बदल देता है? क्या पैसा इंसान की आत्मा खरीद सकता है?
. ‘श्री 420’ की सबसे बड़ी ताक़त यही है कि वह उपदेश नहीं देती। वह मुस्कुराते हुए समाज की परतें खोलती है। राज कपूर का भोला-सा ‘राज’ दर्शकों को हँसाता भी है और भीतर से बेचैन भी करता है। यही कारण है कि फ़िल्म समय के साथ पुरानी नहीं हुई। उसके सवाल आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं।
. और शायद यही कारण है कि राज कपूर का वह मुस्कुराता हुआ आवारा आज भी भारतीय सिनेमा के इतिहास में चलता दिखाई देता है।
. ‘राज’ का किरदार भारतीय सिनेमा के सबसे मानवीय पात्रों में गिना जाता है। वह पूरी तरह नायक नहीं है। वह गलतियाँ करता है। लालच में फँसता है। टूटता है। लेकिन अंततः उसकी आत्मा उसे वापस सही रास्ते की ओर खींचती है। यही मानवीय कमजोरी और नैतिक संघर्ष उसे दर्शकों के बेहद करीब ले आते हैं।
. उसके जूते चाहे जापानी हों, लेकिन उसका दिल अब भी हिंदुस्तानी महसूस होता है।
. सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि ‘श्री 420’ केवल एक फ़िल्म नहीं रही। वह नए भारत के सपनों, संघर्षों और नैतिक उलझनों की सांस्कृतिक स्मृति बन गई। उसके गीत, किरदार और संवाद आज भी जीवित हैं। और शायद यही किसी महान फ़िल्म की सबसे बड़ी पहचान होती है।


