TRENDING TAGS :
Bollywood Old Movie Zanjeer: वह फिल्म जिसने अमिताभ बच्चन को सुपरस्टार बना दिया
Bollywood Old Movie Zanjeer: ‘ज़ंजीर’ की पर्दे के पीछे की विस्तृत कहानी, जिसमें अमिताभ बच्चन की सफलता, सलीम-जावेद की लेखन क्रांति, प्रकाश मेहरा का निर्देशन, निर्माण की चुनौतियाँ, संगीत, बॉक्स ऑफिस पर इसका प्रभाव और भारतीय सिनेमा पर इसकी चिरस्थायी छाप शामिल है।
Bollywood Old Movie Zanjeer Full Story Amitabh Bachchan
Bollywood Old Movie Zanjeer Full Story: 70 के दशक का भारत भीतर से बेचैन था। बेरोज़गारी बढ़ रही थी। भ्रष्टाचार को लेकर गुस्सा बढ़ रहा था। शहरों में अपराध और असुरक्षा का माहौल गहरा रहा था। एक थका हुआ मिडिल क्लास जो व्यवस्था से लड़ना चाहता तो था लेकिन जानता था कि जीतेगा नहीं। राजनीतिक अस्थिरता और सामाजिक निराशा धीरे-धीरे मध्यमवर्गीय युवा मानस को बदल रही थी। लेकिन हिंदी सिनेमा अब भी बड़े पैमाने पर रोमांटिक नायकों, फूलों के बीच गाए जाने वाले गीतों और भावुक प्रेमकथाओं में उलझा हुआ था। राजेश खन्ना का दौर अपने चरम पर था। प्रेम, मुस्कान और रोमांस ही स्टारडम की सबसे बड़ी भाषा माने जाते थे।
सलीम खान और जावेद अख्तर यह देख रहे थे। और वो असंतुष्ट ही नहीं बल्कि उन्हें गुस्सा आ रहा था। वे ऐसा नायक लिखना चाहते थे जो उस गुस्से, उस असंतोष, उस आक्रोश को आवाज़ दे जो लाखों भारतीयों के भीतर जमा था, लेकिन जिसे अब तक कोई शब्द नहीं मिले थे।
इस आवाज का नाम था - विजय। (Bollywood Old Movie Zanjeer Acting)
ऐसा किरदार जो व्यवस्था से समझौता न करे। जो भीतर से घायल हो। जो प्रेम में खोया हुआ नहीं, बल्कि अन्याय से जलता हुआ आदमी हो। विजय उसी सोच से पैदा हुआ। यही वह क्षण था जहाँ “Angry Young Man” की अवधारणा जन्म ले रही थी।
सलीम-जावेद: जिसने हीरो की परिभाषा बदल दी
हिंदी सिनेमा में पटकथा लेखक हमेशा पर्दे के पीछे रहते थे। निर्देशक की तारीफ होती थी। अभिनेता का नाम होता था। लेखक? वे बस क्रेडिट में आते थे।
सलीम-जावेद ने यह बदला। उन्होंने 'जंजीर' के लिए एक ऐसा ढाँचा तैयार किया जो उस समय हिंदी सिनेमा में नहीं था। नायक प्रेमी नहीं था। वह त्यागी नहीं था। वह भावुक नहीं था। वह जल रहा था।
बचपन में माता-पिता की हत्या का गवाह। उसके बाद सिस्टम का हिस्सा बना लेकिन सिस्टम से कभी शांति नहीं पाई। यह निजी त्रासदी से जन्मी नैतिक आग थी जो विजय को सामान्य पुलिस अफ़सर से अलग बनाती थी।सलीम-जावेद ने यह भी समझा था कि संवाद अब पहले से छोटे और तीखे होने चाहिए। विजय ज़्यादा नहीं बोलता। जब बोलता है, तो दर्शक के भीतर कुछ हिल जाता है। ये डाइलॉग राइटिंग की नई क्रांति थी।
वह भूमिका जिसे सब ने ठुकराया
प्रकाश मेहरा एक सुलझे हुए फिल्मकार थे। उनके पास स्क्रिप्ट थी। उन्हें उसकी ताक़त पता थी। हीरो के लिए नाम आते गए और हटते गए। राज कुमार। देव आनंद। धर्मेंद्र। राजेश खन्ना। किसी ने भी अपने स्थापित रोमांटिक स्टारडम को इस कठोर, कम बोलने वाले, गुस्सैल किरदार के लिए दाँव पर नहीं लगाया। सबके इनकार के बाद सलीम-जावेद की नज़र उस अभिनेता पर गई जिसे उद्योग लगभग छोड़ चुका था। ये था एक फ्लॉप एक्टर, नाम था - अमिताभ बच्चन।
लगातार फ्लॉप फ़िल्में। उद्योग में असफल प्रयोग की छवि। फीस इतनी कम कि हिसाब लगाना भी मुश्किल।
जावेद अख्तर ने बाद में स्वीकार किया कि उस वक़्त उद्योग की नज़र में यह फ़ैसला पागलपन था। सुपरहिट स्क्रिप्ट में सुपरफ्लॉप अभिनेता। लेकिन सलीम-जावेद को अमिताभ की आँखों में कुछ दिखा था। एक भीतरी बेचैनी। एक दबा हुआ ज्वालामुखी। जो विजय के लिए ज़रूरी था। यही पागलपन इतिहास बन गया।
प्रकाश मेहरा : वह निर्देशक जिसने सब दाँव पर लगाया
प्रकाश मेहरा केवल निर्देशक नहीं थे, वे निर्माता भी थे। और 'जंजीर' के लिए उन्होंने वह किया जो बहुत कम फ़िल्मकार करते हैं। उन्होंने अपनी निजी संपत्ति दाँव पर लगाई। गहने तक गिरवी रखे गए। वितरक सशंकित थे। और अभिनेता वह था जिसे सब रिजेक्ट मान चुके थे।लेकिन प्रकाश मेहरा को स्क्रिप्ट पर भरोसा था। और अमिताभ पर। उन्होंने फ़िल्म का पूरा दृश्यात्मक संसार उस भरोसे के आधार पर बनाया, कठोर, यथार्थवादी, बिना रोमांटिक चमक के।
सिनेमैटोग्राफी: वह कैमरा जो भीतर झाँकता था
'जंजीर' की दृश्य भाषा को आकार दिया छायाकार एन. सत्येन ने। उनका सबसे महत्वपूर्ण निर्णय था, अमिताभ का चेहरा। शॉट्स क्लोज़-अप थे। बहुत करीब से। बिना किसी सुंदर रोशनी के। बिना ग्लैमर के। उस चेहरे पर थकान थी। आग थी। और एक ऐसी चुप्पी थी जो संवाद से ज़्यादा कहती थी।
सत्येन ने समझा कि विजय का असली हथियार संवाद नहीं है बल्कि उसकी आँखें हैं। और उन्होंने कैमरे को वहाँ रोका जहाँ वह आग सबसे साफ़ दिखती थी।
फ़िल्म का सेट डिज़ाइन भी जानबूझकर कठोर रखा गया। पुलिस स्टेशन, गोदाम, अपराधियों के अड्डे। इनमें कोई सजावट नहीं थी। लोहा था। धुआँ था। असुरक्षा थी। यह वातावरण विजय की भीतरी दुनिया का बाहरी रूप था।
प्राण का 'शेर खान' : वह दोस्ती जिसने फ़िल्म को आत्मा दी
'जंजीर' केवल गुस्से की फ़िल्म होती अगर शेर खान न होता। प्राण उस समय तक महान खलनायक के रूप में स्थापित थे। उनसे यह किरदार किसी ने नहीं सोचा था। लेकिन शेर खान ने फ़िल्म को एक आयाम दिया जो सिर्फ़ एक्शन से नहीं मिल सकता था। ये आयाम था - दोस्ती। गरिमा। नैतिक कोड।
विजय की कठोर दुनिया में शेर खान वह इंसान था जो बिना कारण के साथ आता है। जो विजय के गुस्से को समझता है और उसे अकेला नहीं छोड़ता। विजय और शेर खान की लड़ाई का दृश्य, जो दोस्ती की शुरुआत है, हिंदी सिनेमा के सबसे प्रतिष्ठित दृश्यों में गिना जाता है। यह मारपीट नहीं थी। यह दो मर्दाना व्यक्तित्वों के बीच सम्मान की स्थापना थी। प्राण ने इस भूमिका के बाद पूरी तरह अपनी छवि बदल ली। यह 'जंजीर' का एक और उपहार था।
जया भादुड़ी: जो नायिका नहीं थी
'जंजीर' में पारंपरिक ग्लैमरस नायिका नहीं थी। 'माला' सड़क पर पली-बढ़ी लड़की थी। जीने के लिए लड़ती थी। उसके पास न सुंदर कपड़े थे, न बड़े संवाद।
माला यानी जया भादुड़ी में वह सहजता और वास्तविकता थी जो इस किरदार को चाहिए थी। वे अत्यधिक नाटकीय नहीं होतीं। उनकी उपस्थिति गर्म और विश्वसनीय थी। उन्होंने और अमिताभ ने मिलकर परदे पर वह रिश्ता बनाया जो फ़िल्मी नहीं लगता। उसमें असली इंसानी गर्माहट थी। यही गर्माहट विजय की कठोर दुनिया में एकमात्र राहत थी।
कल्याणजी-आनंदजी : वह संगीत जो पीछे हट गया
'जंजीर' की सबसे बड़ी संगीत-क्रांति यह थी कि संगीत पीछे हट गया। कल्याणजी-आनंदजी ने फ़िल्म के लिए गीत बनाए लेकिन कम। और कहानी पर हावी होने से रोका। यह उस दौर में असाधारण था जब हिंदी फ़िल्म का नायक हर कुछ मिनट बाद गाता था।
गीत सीमित थे और कहानी पर हावी नहीं होते। यह अपने-आप में बड़ा बदलाव था। विजय नहीं गाता। वह चुप रहता है। और यह चुप्पी संगीत से ज़्यादा बोलती है। फिर भी 'यारी है ईमान मेरा' अमर हो गया, क्योंकि वह शेर खान के किरदार की आत्मा था। एक ऐसा गीत जो दोस्ती को पूजा की तरह देखता है।
रिकॉर्डिंग प्रक्रिया में पारंपरिक ऑर्केस्ट्रा का इस्तेमाल हुआ, लेकिन संगीत को कहानी के मूड के अनुसार नियंत्रित रखा गया। बैकग्राउंड स्कोर में गोली की आवाज़, कदमों की ताल और संवादों की तीखी लय, यही 'जंजीर' का असली संगीत था।
वह बदलाव जो फ़िल्म ने लिखा
'जंजीर' रिलीज़ हुई। शुरुआत में प्रतिक्रिया मिश्रित थी। फिर धीरे-धीरे कुछ हुआ। युवा दर्शक सिनेमाघरों में आने लगे और जाने के बाद फिर वापस आने लगे। विजय में उन्होंने अपना गुस्सा देखा। अपनी निराशा देखी। अपनी वह आवाज़ देखी जो उनके पास थी लेकिन जिसे अब तक परदे पर जगह नहीं मिली थी। 'जंजीर' ब्लॉकबस्टर बन गई। और अमिताभ बच्चन जिन्हें उद्योग छोड़ चुका था, एक रात में हिंदी सिनेमा के सबसे बड़े सितारे बन गए। 'जंजीर' की असली विरासत उसकी कमाई नहीं है। उसकी विरासत है वह ढाँचा जो उसने बनाया। भीतर से टूटा हुआ नायक। भ्रष्ट व्यवस्था। सीमित संवाद लेकिन विस्फोटक प्रभाव। गीत नहीं बल्कि गुस्सा। रोमांस नहीं बल्कि न्याय।
यही ढाँचा 'दीवार' में और गहरा हुआ। 'शोले' में और भव्य। 'त्रिशूल' में और तीखा। और आज भी जब कोई फ़िल्म व्यवस्था से टकराते नायक की कहानी कहती है तो कहीं न कहीं 'जंजीर' की परछाईं वहाँ होती है।
'जंजीर' इसलिए महान नहीं है कि उसने एक अभिनेता को सुपरस्टार बनाया। वह इसलिए महान है क्योंकि उसने हिंदी सिनेमा को वह साहस दिया कि नायक को मुस्कुराने की ज़रूरत नहीं है। वह सच बोल सकता है। गुस्सा हो सकता है। टूटा हुआ हो सकता है। और फिर भी दर्शक उससे प्रेम करेंगे। क्योंकि वह उनका अपना है।
अमिताभ बच्चन केवल स्टार नहीं बने; वे 1970 के दशक की भारतीय बेचैनी का चेहरा बन गये। यही कारण है कि ‘जंजीर’ को केवल फ़िल्म की तरह नहीं देखा जाता। उसे हिंदी सिनेमा के इतिहास में सत्ता-परिवर्तन की घटना की तरह देखा जाता है।


