TRENDING TAGS :
'गैसलाइटिंग' शब्द कहां से आया? एक पुरानी फिल्म का नाम मनोविज्ञान की शब्दावली कैसे बना
Gaslight Movie History: जानिए 'Gaslighting' शब्द की शुरुआत कैसे 1938 के नाटक और 1944 की फिल्म से हुई और कैसे यह मनोविज्ञान का चर्चित शब्द बन गया।
Gaslight Movie History
Gaslight Movie History: आज सोशल मीडिया पर "वो मुझे गैसलाइट कर रहा था" जैसे जुमले आम हो चुके हैं। रिश्तों की बातचीत से लेकर थेरेपी सेशन तक, हर जगह यह शब्द सुनाई देता है। लेकिन कम ही लोग जानते हैं कि यह शब्द किसी मनोवैज्ञानिक ने नहीं, बल्कि एक पुराने ब्रिटिश नाटक और उसकी हॉलीवुड फिल्म ने गढ़ा था और उस कहानी में सच में एक "गैस लाइट" (गैस से जलने वाली बत्ती) की अहम भूमिका थी।
शुरुआत हुई एक स्टेज प्ले से
इस शब्द की जड़ें 1938 के एक नाटक 'Gas Light' में मिलती हैं, जिसे बाद में 1944 में एक ही शब्द वाले नाम 'Gaslight' से फिल्म बनाकर पर्दे पर उतारा गया। इसे लिखा था पैट्रिक हैमिल्टन ने, और बाद में इसका ब्रॉडवे वर्जन 5 दिसंबर 1941 को 'Angel Street' नाम से आया, जो 1944 तक लगातार चलता रहा।
कहानी क्या थी जिसने इतना बड़ा शब्द जन्मा दिया
1944 की फिल्म एक विवाहित महिला की कहानी बताती है, जिसे एक कीमती संपत्ति विरासत में मिली है। जिस घर में वह अपने पति के साथ रहती है, वहां उसे बंद पड़े अटारी से आती अजीब आवाज़ें परेशान करती हैं, और उसे यह भी महसूस होता है कि घर की गैस-बत्तियां बिना किसी वजह के अक्सर धीमी और फिर तेज़ हो जाती हैं। उसका पति उसे बार-बार यकीन दिलाता है कि यह सिर्फ उसकी कल्पना है जबकि असल में वही धीरे-धीरे उसे यह विश्वास दिला रहा होता है कि वह पागल हो रही है, ताकि उसे मानसिक अस्पताल भेजकर उसकी संपत्ति हड़प सके। हकीकत में वही अटारी में जाकर शोर मचाता और बत्तियों को कम-ज्यादा करता है।
फिल्म में असल वजह यह थी कि पति अटारी में छिपे कीमती गहनों की तलाश में गुपचुप तरीके से गैस-बत्ती जलाता था, जिससे घर के बाकी हिस्सों में गैस का दबाव कम हो जाता और बत्तियां मंद पड़ जातीं और जब पत्नी इस बदलाव को नोटिस करती, तो वह उसे यह कहकर झुठला देता कि यह सिर्फ उसका वहम है।
नाटक से शब्दकोश तक कैसे बना यह मनोवैज्ञानिक टर्म
1944 की यह फिल्म एमजीएम स्टूडियो ने जॉर्ज कुकोर के निर्देशन में बनाई, जिसमें इंग्रिड बर्गमैन और चार्ल्स बॉयर मुख्य भूमिका में थे। यह फिल्म इतनी बड़ी हिट हुई और कई ऑस्कर नॉमिनेशन तक पहुंची कि आगे चलकर 'गैसलाइटिंग' शब्द का मतलब ही बन गया 'वो सब कुछ जो फिल्म में इंग्रिड बर्गमैन के किरदार के साथ हुआ था'।
1994 के 'रैंडम हाउस हिस्टोरिकल डिक्शनरी ऑफ अमेरिकन स्लैंग' के मुताबिक, आम जनता कम से कम 1956 से ही 'gaslight' शब्द को एक क्रिया के तौर पर इस्तेमाल करने लगी थी। हालांकि, इस मनोवैज्ञानिक हेरफेर के अर्थ में इस शब्द का सबसे पहला दर्ज इस्तेमाल 1961 में हुआ माना जाता है।
1940 की मूल ब्रिटिश फिल्म को मिटाने की कोशिश
एक कम जानी-मानी लेकिन दिलचस्प बात यह है कि 1944 की मशहूर अमेरिकी फिल्म असल में एक ब्रिटिश फिल्म (1940) का रीमेक थी, जिसका नाम भी 'Gaslight' ही था। एमजीएम स्टूडियो ने रीमेक बनाते समय पुरानी ब्रिटिश फिल्म की हर मौजूदा प्रिंट और असली नेगेटिव तक को नष्ट करने की कोशिश की थी, ताकि प्रतिस्पर्धा खत्म हो लेकिन सौभाग्य से वह फिल्म पूरी तरह मिटने से बच गई।
पॉप कल्चर से क्लिनिकल शब्दावली तक का सफर
'गैसलाइटिंग' शब्द की यात्रा बड़ी अनोखी रही है। यह पॉप कल्चर से जन्मा, फिर मनोविज्ञान की दुनिया में गंभीरता से इस्तेमाल होने लगा, और आखिरकार 2010 के दशक के मध्य में एक बार फिर पॉप कल्चर में जोरदार वापसी की। इस दौर में यह शब्द इतना लोकप्रिय हुआ कि अमेरिकन डायलेक्ट सोसाइटी ने 2016 में इसे साल का 'सबसे उपयोगी' नया शब्द घोषित किया, और 2022 में मेरियम-वेबस्टर डिक्शनरी ने इसे 'वर्ड ऑफ द ईयर' चुना।
मनोविज्ञान में इसकी आधिकारिक परिभाषा क्या है
अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन (APA) इसे परिभाषित करती है : किसी दूसरे व्यक्ति को उसकी अपनी समझ, अनुभव या घटनाओं की धारणा पर शक करने के लिए मैनिपुलेट (हेरफेर) करना। पहले यह शब्द इतनी गंभीर हेराफेरी के लिए इस्तेमाल होता था जो मानसिक बीमारी तक पैदा कर दे, या पीड़ित व्यक्ति को मनोरोग संस्थान में भर्ती कराने को सही ठहराने के लिए इस्तेमाल किया जाता था लेकिन अब यह ज्यादा सामान्य अर्थों में इस्तेमाल होता है।
आज के दौर में एक नई बहस भी शुरू हो गई है
दिलचस्प बात यह है कि जिस शब्द ने कभी गंभीर मनोवैज्ञानिक शोषण को नाम दिया था, अब कुछ विशेषज्ञ उसके ज़्यादा इस्तेमाल को लेकर चिंतित हैं। 2022 में वॉशिंगटन पोस्ट ने इसे 'थेरेपी स्पीक' का उदाहरण बताते हुए लिखा था कि यह शब्द अब एक ऐसा बज़वर्ड बन चुका है जिसे आम असहमतियों के लिए भी गलत तरीके से इस्तेमाल किया जाने लगा है यानी हर छोटी बहस या झगड़े को 'गैसलाइटिंग' कह देना, असली और गंभीर मनोवैज्ञानिक शोषण के मामलों को हल्का बना सकता है।
'गैसलाइटिंग' शायद अकेला ऐसा गंभीर मनोवैज्ञानिक शब्द है जो किसी लैब या रिसर्च पेपर से नहीं, बल्कि एक भूतिया-थ्रिलर नाटक और उसकी हॉलीवुड फिल्म से निकला। यह इस बात की भी मिसाल है कि कैसे सिनेमा कभी-कभी इंसानी व्यवहार को इतनी सटीकता से पकड़ लेता है कि उसका असर सिर्फ पर्दे तक सीमित नहीं रहता बल्कि हमारी रोज़मर्रा की भाषा और मनोविज्ञान की किताबों तक पहुंच जाता है।


