OTT के बाद अब आगे क्या? क्या स्ट्रीमिंग फिर केबल TV मॉडल की ओर लौट रही है?

OTT vs Cable TV: क्या OTT का दौर अब बदल रहा है? जानिए क्यों Netflix, Disney+, Prime Video और अन्य स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म फिर से बंडल मॉडल अपना रहे हैं, कैसे केबल TV जैसी व्यवस्था लौट रही है और AI भविष्य में OTT अनुभव को कैसे बदल सकता है।

Yogesh Mishra
Published on: 8 Aug 2026 2:08 PM IST
OTT vs Cable TV Explained in Hindi
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OTT vs Cable TV Explained in Hindi 

OTT vs Cable TV: करीब डेढ़ दशक पहले जब Netflix, Hulu और बाद में Amazon Prime Video जैसी स्ट्रीमिंग सेवाओं ने अमेरिका में पारंपरिक केबल टीवी को चुनौती देना शुरू किया था, तब इसे मनोरंजन उद्योग की सबसे बड़ी क्रांति माना गया। पहली बार दर्शकों को यह आजादी मिली कि वे केवल उसी कंटेंट के लिए भुगतान करें जिसे वे वास्तव में देखना चाहते हैं। केबल टीवी के दौर में ग्राहकों को दर्जनों या सैकड़ों चैनलों वाले बड़े पैकेज खरीदने पड़ते थे, जबकि उनमें से अधिकांश चैनल वे कभी देखते भी नहीं थे।

Netflix ने इसी समस्या का समाधान पेश किया। उसका संदेश साफ था - केबल का तार छोड़िए, इंटरनेट अपनाइए और अपनी पसंद का कंटेंट देखिए। शुरुआती वर्षों में यह मॉडल बेहद सफल रहा। एक या दो स्ट्रीमिंग सब्सक्रिप्शन में ही फिल्मों और वेब सीरीज का इतना बड़ा संग्रह मिल जाता था कि महंगे केबल पैकेज की जरूरत तेजी से खत्म होने लगी।

लेकिन 2026 तक तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। आज लगभग हर बड़ा मीडिया समूह अपनी अलग स्ट्रीमिंग सेवा चला रहा है। फिल्मों और टीवी शो के अधिकार अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर बंट चुके हैं। खेल प्रसारण अलग सदस्यताओं में बिखर गए हैं। सब्सक्रिप्शन महंगे हो गए हैं। परिणाम यह है कि उपभोक्ता फिर उसी समस्या का सामना कर रहा है जिससे बचने के लिए उसने केबल टीवी छोड़ा था। बहुत सारे ऐप, बहुत सारे पासवर्ड, कई अलग-अलग भुगतान और यह याद रखने की परेशानी कि कौन-सा शो आखिर किस प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध है।

यही वजह है कि स्ट्रीमिंग उद्योग अब एक बार फिर "बंडल" मॉडल की ओर लौट रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार केबल वायर की जगह इंटरनेट, स्मार्ट टीवी, मोबाइल ऐप और टेलीकॉम कंपनियां हैं।

क्या सचमुच अमेरिकी सात OTT का सब्सक्रिप्शन लेते हैं?

सोशल मीडिया और कई रिपोर्टों में यह दावा किया जाता है कि अमेरिका में औसतन हर परिवार सात स्ट्रीमिंग सेवाओं का उपयोग करता है और हर महीने लगभग 169 डॉलर खर्च करता है। लेकिन इस आंकड़े को सही संदर्भ में समझना जरूरी है।

2025 की दूसरी तिमाही के एक अध्ययन में पाया गया कि उत्तर अमेरिका में औसतन एक उपभोक्ता सात वीडियो सेवाओं से जुड़ा था। वहीं लगभग 169 डॉलर का मासिक खर्च केवल ओटीटी (OTT) पर नहीं बल्कि पूरे वीडियो और टेलीविजन इकोसिस्टम, केबल, लाइव टीवी, स्ट्रीमिंग और अन्य सेवाओं, का संयुक्त खर्च था।

दूसरी ओर 2026 के सर्वे बताते हैं कि केवल पेड स्ट्रीमिंग सेवाओं पर अमेरिकी परिवार औसतन लगभग 69 डॉलर प्रति माह खर्च कर रहे हैं।

फिर भी निष्कर्ष एक ही निकलता है कि मनोरंजन पहले की तुलना में महंगा हो चुका है। यही कारण है कि बड़ी संख्या में लोग अब पूरे साल किसी एक OTT की सदस्यता बनाए रखने के बजाय कुछ महीनों के लिए सब्सक्रिप्शन लेते हैं, पसंदीदा सीरीज खत्म करते हैं और फिर दूसरी सेवा पर चले जाते हैं। उद्योग की भाषा में इसे "चर्न" कहा जाता है और आज यह स्ट्रीमिंग कंपनियों की सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है।

कंटेंट की लड़ाई ने स्ट्रीमिंग को कैसे टुकड़ों में बांट दिया?

स्ट्रीमिंग की शुरुआत में Netflix लगभग पूरे हॉलीवुड का डिजिटल पुस्तकालय बन गया था। Disney, Warner Bros., NBC, Paramount और दूसरे स्टूडियो अपनी फिल्मों और टीवी कार्यक्रमों के अधिकार Netflix को लाइसेंस देते थे। दर्शकों को एक ही जगह लगभग सब कुछ मिल जाता था। लेकिन जल्द ही इन स्टूडियो को एहसास हुआ कि वे अपने सबसे मूल्यवान कंटेंट से अपने ही प्रतिसिद्वंद्वी को मजबूत कर रहे हैं। इसके बाद मनोरंजन उद्योग में सबसे बड़ा बदलाव आया।

- Disney ने Disney+ लॉन्च किया।

- Warner Bros. ने HBO Max (अब Max) शुरू किया।

- NBCUniversal ने Peacock बनाया।

- Paramount ने Paramount+ लॉन्च किया।

- Apple ने Apple TV+ शुरू किया।

परिणाम यह हुआ कि जो सामग्री पहले Netflix पर मिलती थी, वह अलग-अलग ऐप में बंट गई। अब Marvel और Star Wars देखने के लिए Disney+, HBO की सीरीज के लिए Max, NBC के शो के लिए Peacock और Netflix Originals के लिए Netflix की अलग सदस्यता लेनी पड़ने लगी। चुनाव की आजादी धीरे-धीरे "सब्सक्रिप्शन के जंगल" में बदल गई।

जब निवेशकों ने पूछा, ग्राहक नहीं तो मुनाफा कहां है?

स्ट्रीमिंग कंपनियों ने शुरुआती वर्षों में अरबों डॉलर खर्च किए। उनका लक्ष्य सिर्फ एक था, ज्यादा से ज्यादा ग्राहक जोड़ना। लेकिन जब निवेशकों ने लाभ मांगना शुरू किया तो रणनीति बदल गई।

कंपनियों ने सब्सक्रिप्शन महंगे किए, पासवर्ड शेयरिंग पर रोक लगाई, विज्ञापन वाले सस्ते प्लान शुरू किए और कम लोकप्रिय कंटेंट पर खर्च घटाया।

यहीं सबसे बड़ी विडंबना सामने आई। जिस स्ट्रीमिंग मॉडल ने विज्ञापन वाले टीवी से मुक्ति का वादा किया था, वही आज विज्ञापन को अपने सबसे बड़े राजस्व स्रोत के रूप में अपना चुका है।

क्यों लौट रहा है 'बंडल' मॉडल?

आज यदि किसी ग्राहक को Netflix, Disney+, Max और Hulu अलग-अलग खरीदने पड़ें तो उसका मासिक खर्च काफी बढ़ जाता है।

इसी समस्या का समाधान है "बंडल"। Disney ने Disney+ और Hulu को साथ बेचना शुरू किया। बाद में Max को भी संयुक्त पैकेज में शामिल किया गया। यानी जो कंपनियां कुछ वर्ष पहले एक-दूसरे की प्रतिद्वंद्वी थीं, वे आज ग्राहकों को बचाए रखने के लिए साझेदार बन रही हैं। पहले प्रतियोगिता कंटेंट की थी। अब प्रतियोगिता ग्राहक को अपने इकोसिस्टम में बनाए रखने की है।

नया बंडल पुराने केबल जैसा क्यों नहीं है?

नई व्यवस्था और पुराने केबल टीवी में कई समानताएं हैं, लेकिन महत्वपूर्ण अंतर भी हैं। पुराने केबल में लंबी अवधि के अनुबंध, इंस्टॉलेशन शुल्क और उपकरण किराया जैसी बाध्यताएं थीं। आज अधिकांश डिजिटल सेवाएं मासिक आधार पर बंद की जा सकती हैं।

पुराने केबल में चैनल टीवी तक सीमित थे। आज वही सामग्री मोबाइल, टैबलेट, लैपटॉप और स्मार्ट टीवी पर उपलब्ध है। फिर भी आर्थिक मॉडल लगभग वही है, कई सेवाओं को एक बिल में जोड़कर ग्राहक को लंबे समय तक बनाए रखना।

Amazon, Apple और Google की नई भूमिका

आज सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह नहीं है कि सबसे अच्छी वेब सीरीज कौन बना रहा है। असली सवाल यह है कि दर्शक टीवी ऑन करते ही सबसे पहले किस प्लेटफॉर्म पर पहुंचता है। Amazon Prime Video अब सिर्फ अपनी फिल्में नहीं दिखाता बल्कि अन्य OTT सेवाओं की सदस्यता भी बेचता है। Apple TV, Roku, Google TV और Samsung Smart TV भी अलग-अलग ऐप को एक ही इंटरफेस में लाने की कोशिश कर रहे हैं। यानी भविष्य का सबसे ताकतवर खिलाड़ी वह हो सकता है जो सबसे ज्यादा कंटेंट नहीं बल्कि सबसे अच्छा "डिस्कवरी प्लेटफॉर्म" बनाए।

टेलीकॉम कंपनियां फिर बन रही हैं नई केबल कंपनियां

अमेरिका से लेकर भारत तक मोबाइल और ब्रॉडबैंड कंपनियां अपने प्लान के साथ Netflix, Disney+, Max और अन्य OTT सेवाएं जोड़ रही हैं। ग्राहक को लगता है कि OTT मुफ्त मिल रहा है। असल में उसकी कीमत इंटरनेट पैकेज में शामिल होती है। इससे दोनों को फायदा होता है। ग्राहक आसानी से सेवा नहीं छोड़ता।

OTT को लाखों नए उपयोगकर्ता एक साथ मिल जाते हैं।

खेल प्रसारण फिर बदल रहा है पूरा बाजार

स्पोर्ट्स हमेशा से टीवी उद्योग का सबसे बड़ा हथियार रहा है। फिल्म बाद में देखी जा सकती है। लेकिन लाइव मैच नहीं। इसी वजह से NFL, NBA, क्रिकेट, फुटबॉल और दूसरे खेल स्ट्रीमिंग कंपनियों को मजबूर कर रहे हैं कि वे संयुक्त पैकेज बनाएं। आने वाले वर्षों में स्पोर्ट्स बंडल सबसे तेजी से बढ़ने वाला बाजार हो सकता है।

मुफ्त OTT भी तेजी से बढ़ रहे हैं

आज Pluto TV, Tubi और अन्य FAST (Free Ad-Supported Streaming TV) प्लेटफॉर्म तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं। यह पुराने फ्री टीवी की तरह हैं - कोई मासिक शुल्क नहीं। बीच-बीच में विज्ञापन। लगातार चलने वाले चैनल। यानी स्ट्रीमिंग उद्योग पुराने टेलीविजन के तीनों स्तंभ, विज्ञापन, चैनल और बंडल को नए डिजिटल रूप में अपना रहा है।

भारत में कहानी अलग क्यों है?

भारत का बाजार अमेरिका से बिल्कुल अलग है। यहां मोबाइल डेटा अपेक्षाकृत सस्ता है। प्रति व्यक्ति आय कम है। दर्जनों भाषाएं हैं। और सबसे महत्वपूर्ण, क्रिकेट सबसे बड़ा मनोरंजन उत्पाद है। इसीलिए भारत में शुरुआत से ही टेलीकॉम कंपनियों के साथ OTT बंडल लोकप्रिय हो गए। Jio, Airtel और अन्य कंपनियां इंटरनेट के साथ कई OTT सेवाएं देती हैं। यानी भारत ने अमेरिका से पहले ही डिजिटल बंडल मॉडल अपनाना शुरू कर दिया था।

JioHotstar और भारतीय OTT का नया दौर

JioCinema और Disney+ Hotstar का एकीकरण भारतीय स्ट्रीमिंग उद्योग का सबसे बड़ा बदलाव माना जा रहा है। अब एक ही प्लेटफॉर्म पर क्रिकेट, हिंदी मनोरंजन, Disney कंटेंट और क्षेत्रीय भाषाओं की बड़ी लाइब्रेरी उपलब्ध है। इसके साथ JioFiber के कई प्लान Netflix, Amazon Prime Video, SonyLIV, ZEE5, Discovery+, Lionsgate Play, Hoichoi और कई अन्य सेवाओं को एक साथ उपलब्ध करा रहे हैं।

यह डिजिटल युग का नया "केबल पैकेज" है।

क्या डिजिटल बंडल भी महंगे हो जाएंगे?

इतिहास बताता है कि शुरुआत में हर नई तकनीक सस्ती लगती है। लेकिन जैसे-जैसे ग्राहक उस पर निर्भर होने लगता है, कीमतें बढ़ने लगती हैं। डिजिटल बंडल में भी यही खतरा मौजूद है। यदि किसी परिवार को सिर्फ Netflix और क्रिकेट चाहिए लेकिन उसे 15 ऐप वाला पैकेज खरीदना पड़े तो वह फिर उन्हीं सेवाओं का भुगतान करेगा जिन्हें वह कभी खोलेगा भी नहीं।

डेटा बनेगा सबसे बड़ा हथियार

पुराने केबल ऑपरेटर सिर्फ इतना जानते थे कि ग्राहक ने कौन-सा पैकेज लिया है। आज की स्ट्रीमिंग कंपनियां जानती हैं कि आप कब टीवी देखते हैं। किस अभिनेता को पसंद करते हैं। कौन-सा एपिसोड बीच में छोड़ देते हैं।

कौन-सा विज्ञापन पूरा देखते हैं। और किस ट्रेलर के बाद सदस्यता खरीदते हैं। भविष्य में यह डेटा मनोरंजन उद्योग की सबसे बड़ी संपत्ति होगा।

AI बदल सकता है पूरा OTT अनुभव

आने वाले वर्षों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी AI स्ट्रीमिंग को पूरी तरह बदल सकती है। संभव है कि हर परिवार के लिए अलग पैकेज बने। किसी को सिर्फ खेल चाहिए।किसी को बच्चों का कंटेंट। किसी को क्षेत्रीय भाषा की फिल्में।AI इन्हीं पसंदों के आधार पर व्यक्तिगत बंडल तैयार कर सकता है और शायद भविष्य में भुगतान भी केवल देखे गए कंटेंट के आधार पर हो।

इसलिए आने वाले वर्षों में असली मुकाबला OTT बनाम केबल का नहीं होगा, बल्कि "कौन दर्शक को एक ही जगह सबसे आसान, सबसे सस्ता और सबसे व्यक्तिगत मनोरंजन अनुभव दे सकता है", यही स्ट्रीमिंग उद्योग का अगला बड़ा युद्ध होगा।

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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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