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Upkar Full Movie Watch: ‘मेरे देश की धरती’ से अमर हुई ‘उपकार’, देखें कैसे बनी ये फ़िल्म
Upkar Full Movie Watch: मनोज कुमार की फिल्म ‘उपकार’ ने ‘जय जवान, जय किसान’ के नारे को सिनेमा की आत्मा कैसे बनाया?
Upkar Full Movie | Bollywood Old Movie List | Newstrack Special Hindi
Upkar Full Movie Watch: 1967 में ‘उपकार’ आई तो देश एक गहरे संक्रमण से गुज़र रहा था। 1965 के भारत-पाक युद्ध की शहादतें ताज़ा थीं और भीतर खाद्यान्न संकट था। भारत अनाज के लिए विदेशी आयात, ख़ासकर अमेरिकी मदद, पर निर्भर था, और प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने लोगों से हफ़्ते में एक वक़्त का भोजन छोड़ने तक की अपील की थी। उनका नारा 'जय जवान, जय किसान' राजनीतिक उद्घोष से बढ़कर आत्मनिर्भरता, त्याग और राष्ट्रनिर्माण की सामूहिक भावना बन चुका था। उधर ग्रामीण समाज ग़रीबी, बेरोज़गारी और ज़मीन के संकट से जूझ रहा था। ऐसे में मनोज कुमार ने ऐसी फ़िल्म बनाई जिसमें राष्ट्रवाद, किसान जीवन, युद्ध, त्याग और नैतिक संघर्ष एक साथ आ गए।
आज इसे सिर्फ़ सफल देशभक्ति फ़िल्म नहीं, लोकप्रिय राष्ट्रवादी सिनेमा की बुनियादी फ़िल्मों में गिना जाता है। “भारत माता”, किसान-नैतिकता और त्यागी भारतीय नायक की जो स्थायी छवि बनी, उसमें इसकी बड़ी भूमिका है, और इसी ने मनोज कुमार को 'भारत कुमार' बनाया। पर यह युद्ध-प्रचार नहीं थी। यह उस भारत की कहानी थी जो खेत और सरहद, दोनों मोर्चों पर लड़ रहा था।
शास्त्री जी की प्रेरणा
कहा जाता है कि फ़िल्म का बीज शास्त्री जी की बात से पड़ा। मनोज कुमार की ‘शहीद’ (1965) शास्त्री जी को पसंद आई थी, और उसी के बाद उन्होंने मनोज कुमार से कहा कि वे 'जय जवान, जय किसान' की भावना पर भी फ़िल्म बनाएँ। बताया जाता है कि दिल्ली से लौटते हुए ट्रेन में ही मनोज कुमार कहानी का ख़ाका बनाने लगे थे। यह उनके निर्देशक के रूप में पहले क़दम की शुरुआत थी।
एक करुण संयोग यह भी है कि जनवरी 1966 में ताशकंद में शास्त्री जी का निधन हो गया। फ़िल्म उनके जाने के बाद, 1967 में आई, यानी जिस प्रधानमंत्री के विचार से यह उपजी, वे इसे देख नहीं पाए। इससे फ़िल्म में एक तरह की श्रद्धांजलि का भाव भी घुल जाता है।
मनोज कुमार लेखक, निर्देशक और अभिनेता, तीनों रूपों में फ़िल्म को आकार दे रहे थे। उनकी शर्त थी कि राष्ट्रवाद भाषण न बने, उसमें मिट्टी, परिवार, खेत और त्याग की असली मौजूदगी हो। इसीलिए भावनात्मक केंद्र किसान जीवन है, सिर्फ़ युद्ध नहीं।
कहानी और किरदार
कहानी दो भाइयों, ज़मीन, लालच और नैतिक टकराव से बुनी है। एक तरफ़ आदर्शवादी भारतीयता, दूसरी तरफ़ बदलता, स्वार्थी समाज। यह उस दौर के भारत का भी संघर्ष था, जहाँ आधुनिकता और पारंपरिक नैतिकता टकरा रही थीं।
भारत (मनोज कुमार), नाम ही राष्ट्र का प्रतीक है, पर उसे अतिनाटकीय नहीं बनाया गया। दर्शक उसमें किसान, सैनिक और आम भारतीय, तीनों को देखता है। वह भाई के लिए त्याग करने वाला बड़ा भाई है, और यही निजी त्याग राष्ट्रीय त्याग का रूपक बन जाता है। वहीं, पूरन (प्रेम चोपड़ा) छोटा भाई है जो लालच और बदलते समाज के असर में बिगड़ता है। वह फ़िल्म में स्वार्थी आधुनिकता का चेहरा है। मलंग चाचा (प्राण) फ़िल्म की सबसे बड़ी ऐतिहासिक उपलब्धि रही। तब तक प्राण हिंदी सिनेमा के सबसे बड़े खलनायक माने जाते थे और दर्शक उन्हें नफ़रत से देखते थे। मलंग चाचा ने उनकी छवि पलट दी। उनकी मानवीय गर्माहट, दर्द और आध्यात्मिक गहराई ने दर्शकों को स्तब्ध कर दिया। मलंग का बिखरा रूप और आध्यात्मिक ऊर्जा उसे फ़िल्म का नैतिक विवेक बना देते हैं। आशा पारेख और कामिनी कौशल के किरदारों के जरिये पारिवारिक रिश्तों और ग्रामीण स्त्री-जीवन को संवेदनशीलता से सामने लाया गया। कामिनी कौशल माँ के रूप में उस पीढ़ी की त्याग-भावना का प्रतिनिधित्व करती हैं।
फ़िल्म की क्रांति यह थी कि इसने राष्ट्रवाद को युद्ध और दुश्मनी तक सीमित नहीं रखा। किसान और सैनिक दोनों राष्ट्र की आत्मा हैं, खेत और सरहद बराबर अहम। यही संतुलन इसे सांस्कृतिक दस्तावेज़ बनाता है।
मिट्टी की शूटिंग
शूटिंग पंजाब और उत्तर भारत के ग्रामीण माहौल वाली लोकेशनों पर हुई। मनोज कुमार गाँव को सजावटी पृष्ठभूमि नहीं बनाना चाहते थे। खेत, मिट्टी, बैल, पगडंडियाँ और ग्रामीण श्रम कहानी के जीवित हिस्से थे। यूनिट ने बैलों की चाल, खेती के काम और औज़ारों की लय का अलग से अध्ययन किया, इसीलिए इसका ग्रामीण संसार आज भी कृत्रिम नहीं लगता।
तब संसाधन सीमित थे। भारी कैमरे, कम रोशनी और मौसम की मुश्किलें। युद्ध वाले हिस्सों के लिए अतिरिक्त कलाकारों, वाहनों और नियंत्रित धमाकों के साथ बड़े पैमाने का तालमेल बिठाना पड़ा। विभिन्न स्रोतों के अनुसार लागत लगभग 1 से 1.5 करोड़ रुपये थी, जो उस दौर के हिसाब से महत्वाकांक्षी थी। प्रतीक मनोज कुमार का प्रिय औज़ार थे। लहलहाती फ़सल, मिट्टी छूते हाथ, तिरंगा, सैनिक वर्दी और श्रम। खेतों में प्राकृतिक रोशनी का भरपूर इस्तेमाल हुआ, ताकि किसान जीवन सुंदर भी लगे और संघर्षपूर्ण भी। कॉस्ट्यूम में धोती, पगड़ी और मिट्टी के रंग पूरी दृश्य-भाषा का हिस्सा बने। संपादन पारंपरिक पर असरदार रहा, जिसने युद्ध, खेत, परिवार और राष्ट्रवाद को एक भावनात्मक धारा में बाँधा।
राष्ट्रभावना समेटे संगीत
कल्याणजी-आनंदजी के संगीत में राष्ट्रभावना, लोकधर्मी आत्मा और भावनात्मक गहराई साथ चलती हैं। सबसे ऐतिहासिक गीत है ‘मेरे देश की धरती’, जिसे गुलशन बावरा ने लिखा और महेंद्र कपूर ने गाया। यह देशभक्ति गीत से ज़्यादा किसान और मिट्टी का स्तुति-गीत बन गया। मनोज कुमार चाहते थे कि यह “फ़िल्मी” न लगे, उसमें खेत की मिट्टी और राष्ट्र की आत्मा महसूस हो। इसीलिए यह आज भी गणतंत्र और स्वतंत्रता दिवस पर गूँजता है।
‘उपकार’ क्या कहती है, और क्या नहीं
‘उपकार’ में राष्ट्र कोई अमूर्त विचार नहीं, परिवार का विस्तार है। भाई का त्याग, माँ की सीख और ज़मीन से जुड़ाव, इन्हीं के ज़रिए देशभक्ति समझाई जाती है। इसी वजह से इसका असर नारेबाज़ी वाली फ़िल्मों से गहरा है। यह ‘मदर इंडिया’ (1957) की ग्रामीण नैतिकता और ‘हक़ीक़त’ (1964) की सैनिक-करुणा के बीच एक पुल बनाती है, जहाँ खेत और सरहद एक ही कहानी के दो अध्याय हैं।
फ़िल्म उस समय आई जब देश उच्च उपज वाले बीजों और नई कृषि नीति की ओर बढ़ रहा था, जिसे बाद में हरित क्रांति कहा गया। ‘उपकार’ ने किसान को पहली बार लोकप्रिय सिनेमा में सम्मान और गौरव का केंद्र बनाया। इसका सांस्कृतिक असर यह था कि “अन्नदाता” की छवि जनता की कल्पना में राष्ट्र-निर्माता के रूप में बैठी।
शहर बनाम गाँव का द्वंद्व। फ़िल्म का नैतिक नक़्शा काफ़ी साफ़ है: गाँव और परंपरा में सच्चाई, त्याग और धर्म है, जबकि बदलते, लालची समाज में भ्रष्टाचार। मनोज कुमार इसी ढाँचे को आगे ‘पूरब और पश्चिम’ (1970) में पश्चिमीकरण बनाम भारतीय मूल्यों के रूप में और खुले ढंग से उठाते हैं। यह विश्लेषण का बिंदु भी है और आलोचना का भी।
कई विश्लेषक मानते हैं कि फ़िल्म ग्रामीण जीवन का आदर्शीकरण करती है। जाति, भूमि-असमानता और शोषण जैसे असली ग्रामीण संघर्ष यहाँ पृष्ठभूमि में चले जाते हैं, और बुराई अक्सर व्यक्ति के नैतिक पतन के रूप में दिखती है, व्यवस्था के दोष के रूप में नहीं। यही कारण है कि यह ‘आक्रोश’ जैसी फ़िल्मों से बिल्कुल उलट ध्रुव पर खड़ी दिखती है। एक में राष्ट्र नैतिक आदर्श है, दूसरी में राज्य कठघरे में है। दोनों को साथ देखने से 1960-80 के भारतीय सिनेमा का पूरा वैचारिक दायरा समझ आता है।
‘उपकार’ सिर्फ़ एक किरदार की सफलता नहीं, छवि-प्रबंधन का सबक़ भी है। एक स्थापित खलनायक को सकारात्मक भूमिका में उतारना उस दौर में जोखिम था। इसकी कामयाबी ने बाद में प्राण के चरित्र अभिनेता के रूप में शानदार दौर का रास्ता खोला, जिसमें वे नायक के दोस्त, पिता और नैतिक सहारे के रूप में दिखे।
मनोज के कई नाम
मनोज कुमार का असली नाम हरिकृष्ण गिरि गोस्वामी था और उन्होंने ‘मनोज कुमार’ नाम दिलीप कुमार के एक किरदार से प्रभावित होकर रखा था। ‘उपकार’ के बाद दर्शकों ने उन्हें परदे के नाम ‘भारत’ से इतना जोड़ लिया कि “भारत कुमार” उनकी स्थायी पहचान बन गया।
‘उपकार’ को सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म, निर्देशन और कहानी जैसे कई फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिले, और राष्ट्रीय पुरस्कार भी।इसके बाद ‘पूरब और पश्चिम’, ‘रोटी कपड़ा और मकान’ और ‘क्रांति’ जैसी फ़िल्मों में मनोज कुमार की यही देशभक्त, सामाजिक छवि आगे बढ़ती गई।
विरासत
‘उपकार’ ने राष्ट्रवादी किसान नायक की स्थायी छवि गढ़ दी, और मनोज कुमार की पूरी सिनेमाई पहचान इसी धारा से जुड़ गई। बाद की कई देशभक्ति फ़िल्मों ने इसकी भावनात्मक बनावट, गीत-शैली और ग्रामीण राष्ट्रवाद से प्रेरणा ली।
रिलीज़ पर प्रतिक्रिया विस्फोटक थी। युद्ध के बाद का देश भावनात्मक रूप से संवेदनशील था और दर्शकों ने इसे मनोरंजन नहीं, राष्ट्रीय अनुभव की तरह अपनाया। ‘मेरे देश की धरती’ पूरे देश में गूँजा, सिनेमाघरों में लोग खड़े होकर तालियाँ बजाते थे, और ग्रामीण दर्शकों ने पहली बार महसूस किया कि किसान भी राष्ट्रीय गौरव का केंद्र हो सकता है। आलोचकों ने भावनात्मक शक्ति और प्राण के अभिनय की ख़ास तारीफ़ की और इसे लोकप्रिय सिनेमा व राष्ट्रीय भावना के बीच दुर्लभ संतुलन कहा। व्यावसायिक रूप से यह भारी सफल रही, और विदेशों में, ख़ासकर सोवियत संघ और एशियाई देशों में, इसके गीत और भावनात्मक बनावट सराही गई।
क्योंकि यह फ़िल्म सिर्फ़ देशभक्ति की कहानी नहीं थी। यह उस भारत की कहानी थी जहाँ खेत की मिट्टी और सरहद पर खड़ा सैनिक, दोनों मिलकर राष्ट्र की आत्मा बनते हैं।


