क्या है IMAX? 35mm से 10 गुना बड़ी फिल्म क्यों? जाने IMAX का पूरा इतिहास

IMAX क्या है और इसकी 15/70 फिल्म 35mm से लगभग 10 गुना बड़ी क्यों होती है? जानिए 1967 के मॉन्ट्रियल एक्सपो से 2026 तक IMAX का पूरा इतिहास और तकनीक।

Yogesh Mishra
Published on: 21 Aug 2026 8:34 PM IST
What is IMAX Film History Explained in Hindi
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What is IMAX Film History Explained in Hindi

What is IMAX Film: सोचिये कि आप फिल्म देखने गए हैं और सिनेमाहॉल की स्क्रीन इतनी बड़ी है कि लगे मानो फिल्म आपके के ही ऊपर चल रही है। बस यही है आईमैक्स (IMAX) का खेल। IMAX एक खास तरह का थिएटर फॉर्मेट है जिसमें बड़ी स्क्रीन, दमदार साउंड और हाई क्वालिटी प्रोजेक्शन मिलता है। मतलब फिल्म सिर्फ दिखती नहीं बल्कि महसूस होती है। खासकर एक्शन, स्पेस, पहाड़, समुद्र और बड़े-बड़े विजुअल्स में मजा कई गुना बढ़ जाता है। IMAX की शूटिंग भी ख़ास IMAX कैमरों से शूट किया जाता है और इसके प्रोजेक्शन के मशीन भी अलग होती है।

सिर्फ बड़ी स्क्रीन ही नहीं है आईमैक्स

IMAX को सिर्फ बहुत बड़ी स्क्रीन वाला सिनेमा समझना अधूरा है। असली IMAX एक पूरी सिनेमाई प्रणाली है जिसमें कैमरा, फिल्म का आकार, प्रोजेक्टर, स्क्रीन, साउंड और सीटिंग - सब मिलकर ऐसा अनुभव बनाते हैं जिसमें दर्शक सिर्फ पर्दा नहीं देखता बल्कि दृश्य से लगभग घिर जाता है। IMAX का सबसे प्रसिद्ध तकनीकी चमत्कार उसका 15-perforation/70mm फिल्म प्रारूप है। यह वही प्रारूप है जिसकी एक फिल्म फ्रेम सर्फेस पारंपरिक 35mm फिल्म से लगभग दस गुना बड़ी होती है।

1967: मॉन्ट्रियल एक्सपो और वह समस्या जिससे IMAX पैदा हुआ

1967 में कनाडा अपनी स्थापना की शताब्दी मना रहा था और मॉन्ट्रियल में विश्व प्रदर्शनी ‘एक्सपो 67’ आयोजित हुई। यह सिर्फ देशों के मंडपों की प्रदर्शनी नहीं थी बल्कि ये सिनेमा के इतिहास में प्रयोगों की एक विशाल प्रयोगशाला बन गई। कनाडा के फिल्मकार अलग-अलग तरीके से यह खोज रहे थे कि दर्शक को पारंपरिक एक पर्दे और एक प्रोजेक्टर से आगे कैसे ले जाया जाए। कनाडा के नेशनल फिल्म बोर्ड ने एक्सपो में एक विशाल Labyrinth Pavilion बनाया। पाँच मंजिला इस भवन में कई स्क्रीन और कई प्रोजेक्टरों की जटिल व्यवस्था थी। एक हॉल में दो विशाल स्क्रीन थीं, एक सामने और दूसरी फर्श की दिशा में। दूसरे मुख्य हॉल में पाँच स्क्रीन क्रॉस के आकार में लगाई गई थीं। In the Labyrinth नमक फिल्म को पाँच कैमरों से समन्वित रूप से शूट किया गया और पाँच प्रोजेक्टरों से एक साथ दिखाया गया। यह इतनी जटिल व्यवस्था थी कि कैमरे, संपादन और प्रोजेक्टर सबका पूर्ण तालमेल आवश्यक था।

इसी एक्सपो में Graeme Ferguson ने Polar Life नामक बड़ी स्क्रीन प्रयोग का निर्देशन किया। उनके साथ निर्माता Robert Kerr थे। दूसरी ओर Roman Kroitor, In the Labyrinth के प्रमुख रचनाकारों में थे। इन लोगों ने एक ही समस्या को महसूस किया कि विशाल और गहन अनुभव (immersive) इमेज बनाने के लिए कई कैमरे और कई प्रोजेक्टर इस्तेमाल करना बहुत जटिल था। सवाल ये उठा कि क्या ऐसा मुमकिन नहीं था कि एक ही बहुत बड़े फिल्म फ्रेम और एक ही प्रोजेक्टर से वही विशाल इमेज को बनाया जाए? नेशनल फिल्म बोर्ड के इतिहास के अनुसार एक्सपो 67 के बाद Ferguson, Kerr और Kroitor ने इसी प्रश्न पर काम शुरू किया और बाद में इंजीनियर William ‘Bill’ Shaw उनके साथ जुड़े।

IMAX के रचनात्मक बीज में विशेष रूप से इन्हीं चारों की भूमिका थी। इनमें भी इंजीनियर Bill Shaw के बिना विशाल फिल्म को स्थिर और विश्वसनीय ढंग से चलाने वाला प्रोजेक्टर शायद संभव नहीं होता। कंपनी 1967 में बनी और इसका आरंभिक नाम था मल्टी स्क्रीन कारपोरेशन।

तो समस्या थी क्या?

35मिलीमीटर वाले सिनेमा में फिल्म की रील सामान्यतः प्रोजेक्टर में खड़ी दिशा में चलती थी। हर फ्रेम छोटा होता था। ये सामान्य थिएटर के लिए पर्याप्त था क्योंकि स्क्रीन सीमित आकार की होती थी। लेकिन अगर उसी छोटे फ्रेम को छह सात मंजिल ऊँची स्क्रीन तक बड़ा कर दिया जाए तो उसकी ग्रेन, धुंधलापन और सीमित विवरण अधिक दिखाई देने लगता है। इसका सरल समाधान था कि फ्रेम को बहुत बड़ा कर दिया जाए। लेकिन सिर्फ फिल्म चौड़ी कर देने से बात नहीं बनती। 70मिलीमीटर फिल्म पहले से ही मौजूद थी। पारंपरिक 70मिलीमीटर में फिल्म लंबवत चलती थी और एक फ्रेम सामान्यतः पाँच perforations यानी रील के किनारे बने पाँच छेदों की ऊँचाई घेरता था। IMAX ने वही 70एमएम की फिल्म ली लेकिन उसे क्षैतिज दिशा में चलाया, ताकि प्रत्येक फ्रेम फिल्म की लंबाई में 15 perforations तक फैल सके। यही प्रसिद्ध 15/70 IMAX प्रारूप है। अर्थात 15 = प्रत्येक फ्रेम की चौड़ाई में 15 छेद। 70 = लगभग 70एमएम चौड़ी प्रोजेक्शन फिल्म। IMAX की अपनी तकनीकी दस्तावेजी जानकारी के अनुसार 15/70 फ्रेम व्यावसायिक सिनेमा में इस्तेमाल होने वाले सबसे बड़े फिल्म-फ्रेमों में है और उसका इमेज area पारंपरिक 35 एमएम फ्रेम से लगभग दस गुना बड़ा है।

‘दस गुना बड़ा’ वास्तव में किस चीज को कहते हैं?

इसका मतलब यह नहीं कि IMAX फिल्म की पट्टी 35एमएम से दस गुना चौड़ी है। फिल्म 65/70 एमएम श्रेणी की है। असली अंतर प्रत्येक फ्रेम के क्षेत्रफल में है। 35एमएम फिल्म का फ्रेम छोटा और लंबवत फिल्म पथ पर व्यवस्थित होता है। IMAX 65एमएम कैमरा फिल्म को क्षैतिज चलाता है और प्रत्येक तस्वीर फिल्म की लंबाई में बहुत बड़ा हिस्सा घेरती है। इसलिए एक IMAX नेगेटिव फ्रेम में प्रकाश रिकॉर्ड करने के लिए बहुत ज्यादा वास्तविक सतह उपलब्ध होती है। जितनी बड़ी फिल्म सतह, उतनी अधिक सूक्ष्म दृश्य जानकारी रिकॉर्ड की जा सकती है। यही कारण है कि विशाल स्क्रीन पर IMAX फिल्म का दृश्य इतना विस्तृत और प्राकृतिक दिख सकता है।

कंपनी अपने 15/70 प्रोजेक्शन सिस्टम को लगभग दस गुना बड़े इमेज area वाला बताती रही है। इसे कभी-कभी दस गुना रीसोल्यूशन कहकर भी प्रचारित किया गया, लेकिन वैज्ञानिक दृष्टि से ‘फ्रेम क्षेत्रफल दस गुना’ कहना अधिक सीधा और सुरक्षित है, क्योंकि फिल्म की वास्तविक रीसोल्यूशन लेंस, फिल्म रील, प्रोसेसिंग, प्रोजेक्शन और देखने की स्थितियों पर भी निर्भर करती है।

फिल्म को क्षैतिज (horizontal) चलाने का विचार इतना महत्वपूर्ण क्यों था?

सामान्य फिल्म प्रोजेक्टर में फिल्म ऊपर से नीचे चलती है। अगर IMAX भी यही करता तो फ्रेम की ऊँचाई बढ़ाने की सीमा होती। इंजिनियर Bill Shaw और टीम ने फिल्म को आड़े यानी क्षैतिज (horizontal) दिशा में चलाया। इससे 70एमएम पट्टी पर बहुत चौड़ा और विशाल फ्रेम संभव हुआ। लेकिन इससे दूसरी समस्या पैदा हुई। इतना बड़ा फिल्म फ्रेम बहुत भारी और तेजी से चलता है। पारंपरिक प्रोजेक्टर मशीन में फिल्म को प्रत्येक फ्रेम पर झटके से रोकना और फिर आगे खींचना होता था। 15/70 जैसी विशाल फिल्म पर ऐसा करना भरोसेमंद नहीं था। Bill Shaw ने एक विशेष रोलिंग लूप प्रोजेक्शन सिस्टम डेवलप किया। इसमें फिल्म को बड़ी तेजी से झटके देकर खींचने के बजाय लूप के नियंत्रित तरीके से आगे बढ़ाया जाता है। वैक्यूम व्यवस्था फिल्म को प्रोजेक्शन के क्षण में अत्यंत सपाट रखती है। यही तकनीकी इनोवेशन IMAX के मूल पेटेंटों और उसकी सफलता की केंद्रीय वजह बना। इसलिए IMAX सिर्फ ‘बड़ी फिल्म’ नहीं था। उस बड़ी फिल्म को स्थिर, सटीक और लगातार चलाने वाला नया प्रोजेक्टर भी उतना ही महत्वपूर्ण था।

1970: पहली असली IMAX फिल्म

तीन वर्षों की तकनीकी मेहनत के बाद 1970 में जापान के ओसाका एक्सपो’70 में पहली IMAX फिल्म दिखाई गई। उसका नाम था ‘Tiger Child’। यहीं वह प्रयोग पहली बार पूर्ण IMAX प्रणाली में बदल गया। IExpo 67 के कई प्रोजेक्टरों की जगह अब एक विशाल फिल्म और एक विशेष प्रोजेक्टर था। नेशनल फिल्म बोर्ड इसे उस बेहतरी की परिणति बताता है जिसकी तलाश Ferguson, Kerr, Kroitor और Shaw ने मॉन्ट्रियल के बाद शुरू की थी। यही कारण है कि IMAX की कहानी में दो वर्ष बार-बार आते हैं : 1967 - विचार और कंपनी का जन्म। 1970 - पहली वास्तविक IMAX प्रोजेक्शन।

IMAX नाम कहाँ से आया?

कंपनी का शुरुआती नाम मल्टी स्क्रीन कारपोरेशन (Multi-Screen Corporation) था। बाद में ‘IMAX’ नाम अपनाया गया। इसे सामान्यतः Image Maximum से निकला हुआ ब्रांड नाम माना जाता है। इसके पीछे विचार यही है कि दर्शक को अधिकतम संभव इमेज अनुभव दिया जाए।यह नाम तकनीक की फिलोसफी को अच्छी तरह पकड़ता है। लक्ष्य सिर्फ स्क्रीन को बड़ा करना नहीं था बल्कि दर्शक के दृश्य क्षेत्र में अधिक से अधिक वास्तविक इमेज इनफार्मेशन भरना था।

1971: स्थायी IMAX थिएटर

Expo 70 की अस्थायी स्थापना के बाद अगला महत्वपूर्ण कदम था स्थायी थिएटर। 1971 में टोरंटो के ओंटारियो प्लेस में सिनेस्फीयर खुला। इसे IMAX के शुरुआती स्थायी प्रदर्शनी में ऐतिहासिक स्थान प्राप्त है। Graeme Ferguson की फिल्म North of Superior यहाँ दिखाई गई। IMAX की अपनी 2026 की ऐतिहासिक सामग्री भी Cinesphere को अपनी तरह की पहली स्थायी IMAX स्थापना के रूप में याद करती है। अब IMAX विश्व प्रदर्शनी का प्रयोग नहीं रहा। वह थिएटर प्रणाली बन चुका था।

स्क्रीन इतनी बड़ी क्यों रखी गई?

यहाँ IMAX का दूसरा बड़ा विज्ञान आता है जिसे फील्ड ऑफ़ व्यू कहते हैं, यानी हमारी नजर का कितना हिस्सा स्क्रीन भरती है। सामान्य थिएटर में दर्शक स्क्रीन को अपने सामने एक चौकोर की तरह देखता है। उसके आसपास दीवारें, छत और बाकी हॉल दिखाई देते रहते हैं। IMAX का लक्ष्य था कि स्क्रीन इतनी बड़ी और दर्शक के इतनी निकट हो कि वह आँखों की देखने के पूरे दायरे में फ़ैल जाये।

IMAX के कॉर्पोरेट दस्तावेज बताते हैं कि कुछ स्क्रीन सौ फुट से अधिक चौड़ी और कई मंजिल ऊँची रही हैं। थिएटर की सीटें तीखी ढलान वाली रखी जाती है, ताकि दर्शक स्क्रीन के अधिक पास होते हुए भी सामने वाले व्यक्ति के सिर से आँखों के सामने कोई बाधा न पहुंचे। यही कारण है कि IMAX में पहली पंक्ति से अंतिम पंक्ति तक का अनुभव सामान्य सिनेमा से अलग होता है। आप स्क्रीन को ‘देख’ कम रहे होते हैं; स्क्रीन आपके दृश्य क्षेत्र का बड़ा हिस्सा घेर रही होती है।

1.43:1 का अनोखा अनुपात

क्लासिक 15/70 IMAX का प्रसिद्ध aspect ratio लगभग 1.43:1 है। आधुनिक वाइडस्क्रीन सिनेमा के 2.39:1 की तुलना में यह काफी ऊँचा है।इसका फायदा विशाल वर्टिकल इमेज है। यदि आपने Christopher Nolan की IMAX फिल्में सही 1.43:1 थिएटर में देखी हों तो कुछ दृश्यों में ऊपर और नीचे अचानक बहुत अधिक तस्वीर खुल जाती है। इसका अर्थ यह नहीं कि फिल्म ‘खींची’ गई है। IMAX कैमरा वास्तव में ज्यादा ऊँची तस्वीर रिकॉर्ड कर रहा होता है। इस वर्टिकल विस्तार का प्रभाव खासकर पहाड़, अंतरिक्ष, शहर, युद्ध, विमान और विशाल प्राकृतिक दृश्यों में असाधारण होता है। इसीलिए IMAX की स्क्रीन सिर्फ चौड़ी नहीं बल्कि बहुत ऊँची भी होती है।

IMAX कैमरा इतना भारी और शोर वाला क्यों था?

15/65 IMAX फिल्म कैमरे में हर सेकंड विशाल फिल्म मात्रा चलती है। पारंपरिक 24 फ्रेम प्रति सेकेण्ड पर एक सेकेण्ड में 24 बड़े 15 perforation फ्रेम आगे बढ़ते हैं। इससे दो समस्याएँ पैदा होती थीं - कैमरा भारी होता था और बहुत शोर करता था। यही वजह है कि दशकों तक IMAX कैमरे मुख्यतः नेचर डाक्यूमेंट्री, अंतरिक्ष, हवाई दृश्य और ऐसे दृश्यों में इस्तेमाल होते रहे जहाँ डायलाग रिकॉर्ड करना जरूरी नहीं था। हॉलीवुड की सामान्य फीचर फिल्मों के लिए कैमरा बहुत बड़ा, महँगा और शोर वाला माना जाता था। लेकिन Christopher Nolan जैसे फिल्मकारों ने इसे बदल दिया। शुरुआत में IMAX मुख्यधारा हॉलीवुड नहीं था। 1970 और 1980 के दशक में IMAX का सबसे बड़ा घर मल्टीप्लेक्स नहीं बल्कि साइंस म्यूजियम, प्लेनेटेरियम और स्पेशल फोर्मैट थिएटर थे। IMAX फिल्मों की अवधि अक्सर 30 से 45 मिनट होती थी। विषय होते थे - अंतरिक्ष, प्रकृति, समुद्र, पर्वत, विज्ञान और इतिहास।

यह बिल्कुल तार्किक था। विशाल 70एमएम प्रिंट बहुत महँगी और भारी होती थी। दो घंटे की फिल्म का प्रिंट इतना विशाल हो जाता कि सामान्य कमर्शियल सिनेमा में उसका संचालन कठिन था। लेकिन इसी दौर में IMAX ने अपनी प्रतिष्ठा बनाई कि “यदि आपको वास्तव में विशाल और शानदार तस्वीर देखनी है, तो IMAX देखिए।”

अंतरिक्ष ने IMAX को नया आयाम दिया

नासा (NASA) और IMAX का संबंध भी इसकी पहचान बनाने में महत्वपूर्ण रहा। IMAX कैमरे स्पेस शटल अभियानों में ले जाए गए और अंतरिक्ष से पृथ्वी के वास्तविक विशाल फॉर्मेट चित्र रिकॉर्ड किए गए। The Dream Is Alive जैसी फिल्मों ने IMAX को विज्ञान संग्रहालयों से लेकर विश्वव्यापी दर्शकों तक पहुँचाया। IMAX के पुराने कॉर्पोरेट रिकॉर्ड इसे कंपनी की सफल 15/70 फिल्मों में गिनते हैं। जब विशाल IMAX स्क्रीन पर अंतरिक्ष से पृथ्वी दिखाई जाती थी, तब तकनीक का उद्देश्य साफ समझ आता था कि यह केवल ‘फिल्म’ दिखाने का माध्यम नहीं। बड़े पैमाने का अनुभव था।

1990 का दशक: IMAX धीरे-धीरे मनोरंजन उद्योग की ओर

1990 के दशक तक IMAX विश्व भर में फैल चुका था। 1997 में उसे अकादमी ऑफ़ मोशन पिक्चर्स एंड साइंस से साइंटिफिक एंड टेक्निकल एचीवमेंट का ऑस्कर पुरस्कार भी मिला। कंपनी के अनुसार यह सम्मान उसके फिल्मांकन और प्रोजेक्शन सिस्टम की तकनीकी उपलब्धि के लिए था। लेकिन एक बड़ी व्यावसायिक समस्या बाकी थी। लोग साल में शायद एक बार संग्रहालय जाकर IMAX डाक्यूमेंट्री देखते थे। हॉलीवुड की बड़ी फीचर फिल्में नियमित रूप से IMAX में नहीं आती थीं।यदि IMAX को जनसमूह का सिनेमा बनना था तो उसे हॉलीवुड को अपने भीतर लाना था।

डीएमआर: जब सामान्य फिल्में IMAX में आने लगीं

2000 के दशक में IMAX ने डिजिटल मीडिया रीमास्टरिंग (Digital Media Remastering – DMR) विकसित किया। इसका उद्देश्य सामान्य 35एमएम या डिजिटल फीचर फिल्म को IMAX प्रेजेंटेशन के लिए विशेष रूप से रीमास्टर करना था। इससे पहली बार हॉलीवुड की बड़ी फ़िल्में IMAX थियेटरों में नियमित रूप से दिखने लगीं। यह बदलाव निर्णायक था। अब IMAX को हर फिल्म अपनी विशाल 65एमएम कैमरा पर शूट करने की जरूरत नहीं थी। किसी स्टूडियो की सामान्य फिल्म को भी IMAX के लिए तैयार किया जा सकता था। यहीं से IMAX विज्ञान आधारित फॉर्मेट से निकल कर प्रीमियम कमर्शियल सिनेमा ब्रांड बनने लगा। और फिर आए क्रिस्टोफर नोलन।

IMAX और आधुनिक हॉलीवुड के संबंध में शायद नोलन जितना प्रभावशाली कोई निर्देशक नहीं रहा। नोलन को वास्तविक फिल्म, बड़े नेगेटिव और प्रैक्टिकल फोटोग्राफी का जुनून था। The Dark Knight में उन्होंने फीचर फिल्म के महत्वपूर्ण हिस्सों को वास्तविक IMAX कैमरे पर शूट किया। इसके बाद The Dark Knight Rises, Interstellar, Dunkirk, Tenet और Oppenheimer में IMAX 65एमएम का उपयोग बढ़ता गया। नोलन के कारण दर्शकों ने पहली बार व्यापक स्तर पर समझा कि ‘IMAX में रिलीज़ हुई फिल्म’ और ‘IMAX कमरे से शूट हुई फिल्म’ एक ही बात नहीं है। यहीं बड़ा फर्क है। कोई फिल्म IMAX थिएटर में दिखाई जा सकती है, लेकिन वह वास्तविक 15/65 फिल्म कैमरे पर शूट हुई हो, यह अलग बात है।

35एमएम से IMAX इमेज इतनी अलग क्यों दिख सकती है?

मान लीजिए आप एक बहुत छोटी तस्वीर को दीवार जितना बड़ा कर रहे हैं। जितना ज्यादा एनलार्ज करेंगे, ग्रेन और सीमाएँ उतनी दिखाई देंगी। अब उसी दृश्य को दस गुना बड़े नेगेटिव पर रिकॉर्ड कीजिए। वहाँ प्रत्येक महीन विवरण के लिए अधिक वास्तविक फिल्म एरिया है। चेहरे की त्वचा, कपड़े का टेक्सचर, दूर की इमारतें, बादल - सभी ज्यादा इनफार्मेशन के साथ रिकॉर्ड किए जा सकते हैं। यही कारण है कि सही 15/70 प्रिंट और बड़े IMAX प्रोजेक्टर में तस्वीर में एक ऐसी भौतिक गहराई और विवरण दिखाई दे सकता है जिसे केवल पिक्सेल संख्या से समझना मुश्किल है।

फिल्म की कोई एक तय डिजिटल साफ़-साफ़ तस्वीर की क्षमता नहीं होती। इसलिए ‘आईमैक्स मायने ठीक 18K’ जैसी प्रचलित संख्याओं को बहुत सावधानी से समझना चाहिए। फिल्म किस तरह की है और उसे किस क्षमता से स्कैन किया गया है, इसके आधार पर अलग-अलग अनुमान लगाए जा सकते हैं। लेकिन एक बात साफ है कि 15/65 निगेटिव का असली तस्वीर वाला हिस्सा 35mm फिल्म से बहुत बड़ा होता है।

फिर 70mm और आईमैक्स 70mm में फर्क क्या है?

यही बात अक्सर सबसे ज्यादा भ्रम पैदा करती है। सामान्य 70mm सिनेमा और आईमैक्स 70mm, दोनों को ‘70mm’ कहा जा सकता है, लेकिन इनमें फिल्म के फ्रेम की दिशा और आकार अलग होता है। पारंपरिक 65mm फिल्म में तस्वीर खींचने और 70mm में उसे दिखाने के दौरान फिल्म ऊपर से नीचे की दिशा में चलती है और आम तौर पर एक फ्रेम में फिल्म की पांच छेद वाली कतारें होती हैं। आईमैक्स में फिल्म बगल से चलती है और एक फ्रेम में 15 छेद वाली कतारें होती हैं। इसलिए आईमैक्स 15/70 का फ्रेम सामान्य 5/70 फ्रेम से भी बहुत बड़ा होता है। यही वजह है कि केवल ‘70mm’ लिखा देखकर यह नहीं मान लेना चाहिए कि वह आईमैक्स 70mm है।

कैमरे में 65mm और पर्दे पर 70mm क्यों?

यह भी पुराने फिल्म तकनीक के दौर की एक दिलचस्प परंपरा है। मूल फिल्म, जिस पर तस्वीर रिकॉर्ड की जाती है, करीब 65mm चौड़ी होती है। बाद में पर्दे पर दिखाने के लिए बनाई जाने वाली प्रति करीब 70mm चौड़ी होती थी। अतिरिक्त जगह का इस्तेमाल ऐतिहासिक रूप से आवाज की जानकारी जैसी चीजों के लिए किया जाता था। इसीलिए फिल्म बनाने के दौरान अक्सर ‘आईमैक्स 65mm कैमरा’ और फिल्म दिखाने के दौरान ‘आईमैक्स 70mm’ कहा जाता है। दोनों इसी बड़े फिल्म प्रारूप के अलग-अलग चरण हैं।

डिजिटल आईमैक्स ने सब बदल दिया

2000 के दशक के आखिरी वर्षों में आईमैक्स ने डिजिटल प्रक्षेपण यानी डिजिटल तरीके से फिल्म दिखाने की शुरुआत की। इससे बहुत ज्यादा मल्टीप्लेक्स में आईमैक्स पर्दे लगाना संभव हो गया। यह कारोबार के लिहाज से बहुत बड़ी सफलता थी, लेकिन यहीं से ‘असली आईमैक्स बनाम छोटा आईमैक्स’ जैसी बहस भी शुरू हुई। पुराने 15/70 फिल्म वाले आईमैक्स थिएटरों में बहुत बड़े 1.43:1 आकार के पर्दे और फिल्म प्रोजेक्टर होते थे। इसके मुकाबले कई नए डिजिटल आईमैक्स थिएटर छोटे थे और उनमें करीब 1.90:1 आकार के पर्दे पर डिजिटल प्रक्षेपण किया जाता था। दोनों आईमैक्स के नाम से चलते हैं, लेकिन दोनों का तकनीकी अनुभव एक जैसा नहीं है।

यही कारण है कि अगर कोई व्यक्ति कहता है, ‘मैंने आईमैक्स देखा, लेकिन मुझे इतना बड़ा फर्क नहीं लगा’, तो हो सकता है कि उसने छोटे डिजिटल आईमैक्स थिएटर में फिल्म देखी हो, 15/70 फिल्म वाले 1.43 आकार के थिएटर में नहीं।

लेजर आईमैक्स क्या है?

डिजिटल आईमैक्स के बाद अगली बड़ी छलांग लेजर प्रोजेक्शन था। पुराने ज़ेनॉन बल्ब की जगह लेजर रोशनी का इस्तेमाल शुरू हुआ। इससे पर्दे पर ज्यादा चमक, बेहतर गहरा-काला और ज्यादा अच्छे रंग दिखाना संभव हुआ। दो लेजर वाली आईमैक्स प्रणालियां खास तौर पर बहुत बड़े 1.43:1 पर्दों के लिए बनाई जा सकती हैं...आगे की खबर पढ़ने के लिए Next Page पर क्लिक करें

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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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