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Single Screen Theatre: दुनिया के वो शहर जहां सिनेमाघर पूरी तरह बंद हो चुके हैं: सिंगल-स्क्रीन थिएटर
Single Screen Theatre: OTT और मल्टीप्लेक्स के बढ़ते दौर में दुनिया भर के सिंगल-स्क्रीन सिनेमाघर क्यों बंद हो रहे हैं? जानिए भारत, तमिलनाडु, बिहार और अन्य राज्यों के आंकड़े, FICCI-EY रिपोर्ट, स्क्रीन संकट और भविष्य में सिनेमाघरों का क्या होगा।
Single Screen Theatre
Single Screen Theatre: कभी जिन शहरों-कस्बों में सिनेमा हॉल की टिकट खिड़की पर लंबी कतारें लगती थीं, वहां आज ताले लटके हैं। भारत के हजारों सिंगल-स्क्रीन सिनेमाघर पिछले डेढ़ दशक में हमेशा के लिए बंद हो चुके हैं। और सिर्फ महानगर नहीं, देश के 19,500 में से सिर्फ मुट्ठी भर पिन कोड ऐसे बचे हैं जहां आज भी कोई सिनेमाघर मौजूद है।
आंकड़े जो असली तस्वीर दिखाते हैं
2010 से 2019 के बीच, भारत भर में सिंगल-स्क्रीन सिनेमाघरों की संख्या करीब 10,000 से घटकर 7,000 से भी कम रह गई और यह गिरावट कोरोना महामारी से भी पहले की है। कोरोना की दूसरी घातक लहर के बाद तो दर्जनों और थिएटर हमेशा के लिए बंद होने की घोषणा कर चुके थे।
सबसे ताज़ा और चौंकाने वाला आंकड़ा 2026 की FICCI-EY रिपोर्ट से आता है जो बताता है कि भारत के कुल 19,500 पिन कोड में से सिर्फ 3,150 पिन कोड ऐसे हैं जहां कोई सिनेमाघर मौजूद है। देश में प्रति 10 लाख आबादी पर सिर्फ 6.8 स्क्रीन हैं। ये अमेरिका (109), फ्रांस (95), ब्रिटेन (66) और चीन (64) के मुकाबले बेहद कम है।
बिहार, ओडिशा, झारखंड जहां आज भी 'स्क्रीन डार्क' इलाके हैं
भारत में सिनेमाघरों का फैलाव बेहद असमान है। दिल्ली एनसीआर, मुंबई और बेंगलुरु जैसे शहरों में सिनेमाघरों का विस्तार तेजी से हुआ है, जबकि बिहार, उत्तर प्रदेश, ओडिशा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और पूर्वोत्तर के राज्य आज भी अपेक्षाकृत 'स्क्रीन-डार्क' (सिनेमाघर-विहीन) बने हुए हैं। 2023 तक महाराष्ट्र में जहां 1,044 स्क्रीन थीं, वहीं बिहार में सिर्फ 149, झारखंड में 83 और ओडिशा में सिर्फ 162 स्क्रीन बचीं थीं।
देश के 4,000 से ज्यादा उप-जिलों में आज भी न कोई मल्टीप्लेक्स है, न कोई सिंगल-स्क्रीन थिएटर। यानी वहां के करोड़ों लोगों के लिए बड़े पर्दे पर फिल्म देखना पूरी तरह असंभव है।
दक्षिण भारत में भी तेज़ी से बंद हो रहे थिएटर
यह सिर्फ हिंदी बेल्ट की समस्या नहीं। दक्षिण भारत, जहां सिनेमा देखने की संस्कृति सबसे मजबूत मानी जाती है, वहां भी हालात चिंताजनक हैं। तमिलनाडु में सबसे ज्यादा गिरावट देखी गई है। सिनेमा इंडस्ट्री के अनुमान के मुताबिक 1,500 से ज्यादा थिएटर बंद हो चुके हैं, अब सिर्फ 1,165 स्क्रीन बची हैं, जिनमें से ज्यादातर आधुनिक मल्टीप्लेक्स में हैं। 2000 के दशक की शुरुआत में तमिलनाडु में करीब 4,000 स्क्रीन थीं। 2025 में अकेले आंध्र प्रदेश ने 54 स्क्रीन खो दीं, जबकि कर्नाटक ने 29 सिनेमाघर बंद होते देखे।
'हफ्ते में सिर्फ कुछ दिन' खुलने वाले सिनेमाघर
रिपोर्ट के अनुसार, इंडस्ट्री की चर्चाओं से पता चलता है कि हिंदी भाषी राज्यों के कुछ कस्बों में अब सिनेमाघर हफ्ते में सिर्फ कुछ दिन ही खुलते हैं, या सिर्फ किसी बड़ी फिल्म की रिलीज पर ही चलाए जाते हैं। यानी वहां रोज़ चलने वाला सिनेमा अब इतिहास बन चुका है।
क्या OTT सिर्फ बहाना है?
यह सवाल सबसे दिलचस्प है, और जवाब उतना सीधा नहीं जितना लगता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि गिरावट का एक हिस्सा एक संरचनात्मक बदलाव को दिखाता है। कई सिंगल-स्क्रीन थिएटर सीधे बंद नहीं हुए, बल्कि पुरानी प्रॉपर्टी को दोबारा डेवलप कर मल्टीप्लेक्स में तब्दील किया गया है। यानी हर बंद हुआ सिनेमाघर सीधे OTT की वजह से नहीं मरा। कई मामलों में असली वजह रही महंगी होती रियल एस्टेट, दर्शकों की बदलती पसंद (आरामदायक, साफ-सुथरे मल्टीप्लेक्स की चाहत) और रखरखाव का बढ़ता खर्च। फिर भी OTT का असर नकारा नहीं जा सकता। आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक में पुराने स्टैंडअलोन थिएटर अनिश्चित दर्शक संख्या, बढ़ती लागत और OTT प्लेटफॉर्म्स से बढ़ती प्रतिस्पर्धा के दबाव में संघर्ष कर रहे हैं।
तो क्या सिनेमा वाकई मर रहा है?
यहां एक दिलचस्प उलटफेर भी है। बिल्कुल यही समय है जब मल्टीप्लेक्स सेगमेंट फिर से जोरदार वापसी कर रहा है। 2026 की पहली छमाही में भारत के मल्टीप्लेक्स कारोबार में 21% की बढ़ोतरी दर्ज हुई, और यह सिर्फ बड़े शहरों तक सीमित नहीं है। छोटे शहरों में भी लोग फिर से सिनेमाघर लौट रहे हैं। 2025 में भारतीय सिनेमा का कुल कलेक्शन 13,000-13,500 करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है, जो पिछले साल के मुकाबले 10-14% ज्यादा है। इसमें बड़े सितारों वाली फिल्मों से ज्यादा मजबूत कहानी और क्षेत्रीय सिनेमा का योगदान रहा।
यानी असली तस्वीर सीधी नहीं है। महंगे, आधुनिक मल्टीप्लेक्स फल-फूल रहे हैं, जबकि सस्ते, पुराने सिंगल-स्क्रीन थिएटर मर रहे हैं। OTT ने दर्शकों को सिनेमा से पूरी तरह दूर नहीं किया, बल्कि उन्हें एक बेहतर, प्रीमियम अनुभव की तरफ धकेल दिया है और जो थिएटर वह अनुभव नहीं दे पाए, वही सबसे पहले बंद हुए।
आगे का रास्ता क्या हो सकता है
रिपोर्ट में एक दिलचस्प समाधान भी सुझाया गया है। विशेषज्ञों की राय है कि सरकार के साथ साझेदारी में बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन और एयरपोर्ट जैसी जगहों पर कम लागत वाले सिनेमाघर बनाए जा सकते हैं। छोटे शहरों और गांवों के लिए सिनेमा स्क्रीन को कम्युनिटी हेल्थ सेंटर, नगरपालिका दफ्तर जैसी सार्वजनिक सुविधाओं के साथ जोड़ने का सुझाव भी दिया गया है, ताकि अगले 15 करोड़ भारतीयों तक थिएटर का अनुभव पहुंचाया जा सके।


