गंभीर चोट में मांसपेशियों का बढ़ता दबाव बताएगी रिम्स की स्वदेशी डिजिटल डिवाइस

RIMS Ranchi: रिम्स रांची के डॉक्टरों ने करीब 80 हजार रुपये की लागत से डिजिटल डिवाइस का प्रोटोटाइप तैयार किया है, जो गंभीर चोटों में कंपार्टमेंट प्रेशर की निगरानी में मदद कर सकता है।

Newstrack Network
Published on: 11 Sept 2026 8:39 PM IST
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RIMS Ranchi: सड़क दुर्घटना में पैर बुरी तरह कुचल गया हो, भारी मलबे के नीचे हाथ या पैर दब गया हो अथवा गंभीर फ्रैक्चर के बाद मांसपेशियों के भीतर सूजन और रक्तस्राव तेजी से बढ़ रहा हो, ऐसे मरीजों में डॉक्टरों के सामने एक बड़ी चुनौती यह पता लगाने की होती है कि प्रभावित हिस्से के भीतर दबाव खतरनाक स्तर तक तो नहीं पहुंच रहा। झारखंड के सबसे बड़े चिकित्सा संस्थानों में शामिल राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान, रांची के डॉक्टरों ने इसी चुनौती से निपटने के लिए कम लागत वाली स्वदेशी डिजिटल डिवाइस का प्रोटोटाइप तैयार किया है। यह उपकरण मांसपेशियों के भीतर बनने वाले दबाव, जिसे चिकित्सकीय भाषा में ‘इंट्राकंपार्टमेंटल प्रेशर’ कहा जाता है, को मापने और उसकी लगातार निगरानी में डॉक्टरों की सहायता करेगा। उपकरण का उद्देश्य स्वयं चोट का उपचार करना नहीं है, बल्कि समय पर यह पहचानने में मदद करना है कि मरीज में खतरनाक ‘एक्यूट कंपार्टमेंट सिंड्रोम’ विकसित हो रहा है या नहीं और दबाव कम करने के लिए तत्काल शल्यक्रिया की आवश्यकता पड़ सकती है या नहीं। करीब 80 हजार रुपये की लागत से तैयार इस प्रोटोटाइप पर शोधकर्ताओं ने लगभग 20 महीने काम किया है और अब नियामकीय मंजूरी तथा संस्थागत आचार समिति की अनुमति के बाद इसका क्लीनिकल परीक्षण प्रस्तावित है। रिम्स की आधिकारिक जानकारी के अनुसार संस्थान झारखंड सरकार के अधीन स्वायत्त चिकित्सा संस्थान है और वर्तमान में इसके निदेशक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी प्रो. डॉ. दीपेंद्र कुमार सिन्हा हैं। ⁠

एक्यूट कंपार्टमेंट सिंड्रोम को समझना इस उपकरण की उपयोगिता समझने के लिए जरूरी है। हाथ और पैर की मांसपेशियां कई जगह मजबूत झिल्ली जैसे ऊतक, जिसे ‘फैशिया’ कहा जाता है, से बने सीमित खंडों या कंपार्टमेंट में बंद रहती हैं। गंभीर चोट, फ्रैक्चर, मांसपेशियों के कुचलने या भीतर रक्तस्राव और सूजन होने पर इस सीमित जगह में दबाव बढ़ सकता है। फैशिया आसानी से फैल नहीं पाती, इसलिए बढ़ता दबाव पहले छोटी रक्त वाहिकाओं और फिर ऊतकों में रक्त प्रवाह को प्रभावित कर सकता है। स्थिति गंभीर होने पर नसों और मांसपेशियों को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिलती और ऊतकों को स्थायी नुकसान होने का खतरा पैदा हो जाता है। अनुपचारित गंभीर एक्यूट कंपार्टमेंट सिंड्रोम में मांसपेशियों और नसों की स्थायी क्षति, अंग की कार्यक्षमता खत्म होने और अत्यंत गंभीर परिस्थितियों में अंग विच्छेदन तक की नौबत आ सकती है। इसीलिए इसे ऐसी चिकित्सकीय आपातस्थिति माना जाता है जिसमें संदेह होने पर तेजी से जांच और निर्णय आवश्यक होता है।

यहीं रिम्स की नई डिजिटल प्रणाली उपयोगी हो सकती है। कंपार्टमेंट सिंड्रोम का निदान हमेशा आसान नहीं होता। मरीज के दर्द, सूजन, प्रभावित हिस्से में तनाव, संवेदना में बदलाव और दूसरी चिकित्सकीय निशानियों को देखकर डॉक्टर प्रारंभिक निर्णय लेते हैं, लेकिन बेहोश, गंभीर रूप से घायल या संवाद करने में असमर्थ मरीज में केवल लक्षणों के आधार पर स्थिति का आकलन कठिन हो सकता है। ऐसे मामलों में कंपार्टमेंट के भीतर दबाव मापना चिकित्सकीय निर्णय में महत्वपूर्ण सहायता देता है। अमेरिकन एकेडमी ऑफ ऑर्थोपेडिक सर्जन्स के दिशा-निर्देश भी इंट्राकंपार्टमेंटल प्रेशर की निगरानी को निदान में सहायक मानते हैं और जरूरत के अनुसार बार-बार अथवा लगातार दबाव मापने की उपयोगिता स्वीकार करते हैं। हालांकि दिशा-निर्देश यह भी स्पष्ट करते हैं कि किसी एक प्रेशर रीडिंग को अकेले अंतिम निदान नहीं माना जाना चाहिए। मरीज के डायस्टोलिक रक्तचाप और कंपार्टमेंट दबाव के अंतर, जिसे ‘डेल्टा प्रेशर’ कहा जाता है, सहित पूरी चिकित्सकीय स्थिति को देखा जाता है। इसलिए रिम्स का उपकरण यदि क्लीनिकल परीक्षण में सफल रहता है तो उसका सबसे बड़ा लाभ डॉक्टरों को अधिक व्यवस्थित और लगातार माप उपलब्ध कराने में हो सकता है।

इस शोध की शुरुआत रिम्स के प्लास्टिक सर्जरी विभाग के वरिष्ठ रेजिडेंट डॉ. अरुणव राय के एक चिकित्सकीय अनुभव से हुई। उनके अनुसार जनरल सर्जरी में स्नातकोत्तर प्रशिक्षण के दौरान गंभीर दुर्घटनाओं के मरीजों, विशेषकर बच्चों और किशोरों, में कंपार्टमेंट प्रेशर जांच की प्रक्रिया के दौरान होने वाली परेशानी ने उन्हें बेहतर विकल्प खोजने के लिए प्रेरित किया। जनवरी 2025 में इस दिशा में व्यवस्थित काम शुरू किया गया। डॉ. बिनय कुमार और डॉ. निशिथ एक्का के मार्गदर्शन में डॉ. अरुणव राय तथा डॉ. साकेत वर्मा सहित टीम ने बाजार में मौजूद उपकरणों और तकनीकों का अध्ययन किया। दूसरे राज्यों के अस्पतालों में कार्यरत डॉक्टरों से जानकारी ली गई और विभिन्न तकनीकी विकल्पों तथा प्रोटोटाइप का परीक्षण किया गया। करीब एक वर्ष आठ महीने की मेहनत के बाद सितंबर 2026 तक डिजिटल प्रोटोटाइप तैयार हुआ। इस परियोजना के लिए एसआरएम विश्वविद्यालय, चेन्नई, जर्मनी की एक विश्वविद्यालय तथा देश के दूसरे शैक्षणिक संस्थानों के विशेषज्ञों से तकनीकी सहयोग लिए जाने की भी जानकारी सामने आई है।

टीम का दावा है कि इस उपकरण को विकसित करने पर लगभग 80 हजार रुपये खर्च हुए और शुरुआती शोध एवं प्रोटोटाइप निर्माण का खर्च शोधकर्ताओं ने स्वयं वहन किया। मौजूदा व्यवस्था में कंपार्टमेंट के भीतर दबाव मापने के लिए सुई अथवा कैथेटर आधारित तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता है और अलग-अलग परिस्थितियों में दोबारा माप लेने की आवश्यकता पड़ सकती है। नई प्रणाली का लक्ष्य माप को डिजिटल बनाना और लगातार निगरानी को आसान करना है। यहां “बिना दर्द” का दावा सावधानी से समझना जरूरी है। कंपार्टमेंट के भीतर दबाव मापने के लिए शरीर के भीतर सुई या सेंसर पहुंचाने की आवश्यकता पूरी तरह समाप्त हो गई है, ऐसा उपलब्ध जानकारी से स्थापित नहीं होता। इसलिए इस चरण में यह कहना अधिक सही है कि शोधकर्ता बार-बार मैनुअल माप की आवश्यकता और उससे जुड़ी असुविधा कम करने की कोशिश कर रहे हैं, न कि यह कि जांच पूरी तरह दर्दरहित हो गई है।

इस तकनीक की जरूरत रिम्स जैसे बड़े ट्रॉमा और आपात चिकित्सा भार वाले संस्थान में और स्पष्ट दिखाई देती है। रिम्स के अपने आंकड़ों के अनुसार आठ सितंबर 2026 को एक दिन में 318 मरीज इमरजेंसी में पहुंचे थे, सात सितंबर को 309 और पांच सितंबर को 306 मरीज इमरजेंसी में आए थे। अगस्त और सितंबर के उपलब्ध दैनिक आंकड़ों में भी अधिकांश दिनों में आपात विभाग में लगभग ढाई सौ से तीन सौ से अधिक मरीज दर्ज किए गए हैं। ये सभी दुर्घटना या कंपार्टमेंट सिंड्रोम के मरीज नहीं होते, इसलिए इन आंकड़ों को इस बीमारी की संख्या नहीं माना जा सकता, लेकिन वे यह जरूर बताते हैं कि संस्थान पर आपात चिकित्सा का कितना बड़ा भार है और गंभीर ट्रॉमा में तेजी से निर्णय लेने वाली तकनीक का व्यावहारिक महत्व क्यों हो सकता है।

इस उपकरण की सबसे महत्वपूर्ण परीक्षा अब अस्पताल की प्रयोगशाला या प्रोटोटाइप परीक्षण से आगे वास्तविक मरीजों पर होने वाले क्लीनिकल ट्रायल में होगी। शोधकर्ताओं के अनुसार इसका शोध प्रोटोकॉल केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन यानी CDSCO के समक्ष भेजा गया है। आवश्यक नियामकीय अनुमति मिलने के बाद संस्थागत आचार समिति की मंजूरी लेकर क्लीनिकल ट्रायल शुरू करने की योजना है। इसके बाद ही यह पता चलेगा कि उपकरण अलग-अलग प्रकार की चोटों और मरीजों में कितना सटीक है, इसकी रीडिंग मानक पद्धति के मुकाबले कितनी विश्वसनीय है, लगातार निगरानी कितनी प्रभावी है और वास्तविक अस्पताल परिस्थितियों में इसका उपयोग कितना सुरक्षित और व्यावहारिक है। इसलिए अभी इसे बाजार में उपलब्ध चिकित्सा उपकरण या प्रमाणित उपचार पद्धति मानना जल्दबाजी होगी। रिम्स के निदेशक प्रो. डॉ. दीपेंद्र कुमार सिन्हा के अनुसार आवश्यक स्वीकृतियां पूरी होने के बाद इसे बाजार तक ले जाने की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है। रिम्स की आधिकारिक वेबसाइट भी संस्थान में चिकित्सा शोध और क्लीनिकल अनुसंधान की सक्रिय व्यवस्था की पुष्टि करती है।

यदि क्लीनिकल परीक्षण में यह तकनीक सुरक्षित, सटीक और भरोसेमंद साबित होती है तो इसका महत्व केवल रिम्स तक सीमित नहीं रहेगा। भारत में सड़क दुर्घटनाओं, औद्योगिक हादसों, भारी मशीनों से लगने वाली चोटों, आपदाओं और गंभीर फ्रैक्चर वाले मरीजों के उपचार में कंपार्टमेंट सिंड्रोम का समय पर पता लगाना अंग बचाने के लिए निर्णायक हो सकता है। कम लागत में देश में विकसित ऐसी डिजिटल प्रणाली जिला अस्पतालों और सीमित संसाधनों वाले ट्रॉमा केंद्रों तक पहुंच सके तो डॉक्टरों को गंभीर चोट के बाद बदलते दबाव पर नजर रखने का एक अतिरिक्त साधन मिल सकता है। फिलहाल यह संभावना है, उपलब्धि का अंतिम प्रमाण नहीं। असली कसौटी क्लीनिकल ट्रायल के परिणाम होंगे। सफल परीक्षण के बाद ही यह तय होगा कि रांची में करीब 20 महीने की मेहनत से बना यह छोटा-सा प्रोटोटाइप गंभीर चोटों के उपचार में समय पर निर्णय लेने का बड़ा स्वदेशी उपकरण बन पाता है या नहीं।

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