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मोबाइल की लत किशोरों को परिवार और समाज से कर रही दूर, रिनपास के अध्ययन में नींद, पढ़ाई और व्यवहार पर असर
RINPAS Study: RINPAS के शोध में किशोरों के अत्यधिक तकनीकी इस्तेमाल को सामाजिक दूरी, नींद और पढ़ाई पर असर से जोड़ा गया। विशेषज्ञों ने डिजिटल प्रतिबंध के बजाय संतुलित उपयोग और पारिवारिक सहयोग पर जोर दिया।
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RINPAS Technology Addiction Study: मोबाइल फोन, इंटरनेट, ऑनलाइन गेम और दूसरे डिजिटल उपकरण किशोरों की पढ़ाई और संवाद का जरूरी हिस्सा बन चुके हैं, लेकिन इनका अनियंत्रित और अत्यधिक इस्तेमाल अब परिवार तथा सामाजिक जीवन के लिए गंभीर चुनौती बनता दिखाई दे रहा है। रांची इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरो-साइकियाट्री एंड एलाइड साइंसेज (RINPAS) के क्लिनिकल साइकोलॉजी विभाग से जुड़े शोध में किशोरों में अत्यधिक तकनीकी इस्तेमाल के साथ सामाजिक अलगाव, माता-पिता से संवाद में कमी, नींद की गड़बड़ी, पढ़ाई पर असर और भावनाओं को नियंत्रित करने में कठिनाई जैसी समस्याएं सामने आई हैं। शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि केवल किशोर का मोबाइल छीन लेना या इंटरनेट बंद कर देना इसका व्यावहारिक समाधान नहीं है। परिवार को साथ लेकर डिजिटल इस्तेमाल के नियम तय करने, व्यवहार में बदलाव, तनाव से निपटने की क्षमता और वास्तविक जीवन की गतिविधियां बढ़ाने पर आधारित व्यवस्थित हस्तक्षेप अधिक उपयोगी रास्ता हो सकता है। तकनीकी व्यसन पर पहले के भारतीय शोध भी पूर्ण डिजिटल परहेज के बजाय नियंत्रित और संतुलित इस्तेमाल को उपचार का अधिक व्यावहारिक लक्ष्य मानते हैं।
रिनपास के क्लिनिकल साइकोलॉजी विभाग के प्रोफेसर डॉ. अमूल रंजन सिंह और शोधार्थी देबालिना दास पिछले कुछ समय से स्कूल जाने वाले किशोरों में तकनीक के अत्यधिक इस्तेमाल पर अध्ययन कर रहे हैं। हालांकि उपलब्ध मूल खबर में इस अध्ययन को अप्रैल 2026 में ‘इंडियन जर्नल ऑफ साइकियाट्री’ में प्रकाशित बताया गया है, लेकिन उपलब्ध शोध अभिलेखों से इस दावे की पुष्टि नहीं होती। दोनों शोधकर्ताओं का सत्यापित संबंधित अध्ययन ‘डेवलपमेंट एंड वैलिडेशन ऑफ इंटीग्रेटेड ग्रुप थेरेपी मॉड्यूल फॉर स्कूल-गोइंग एडोलसेंट्स विद टेक्नोलॉजी एडिक्शन’ अक्टूबर 2025 में ईस्टर्न जर्नल ऑफ साइकियाट्री में प्रकाशित हुआ था। इसके अलावा जून 2025 में इसी पत्रिका में उनका ‘रोल ऑफ डिफरेंट सोशियोडेमोग्राफिक मार्कर्स एंड चाइल्ड-पैरेंट बॉन्डिंग ऐज ए प्रेडिक्टर ऑफ टेक्नोलॉजी एडिक्शन अमंग स्कूल-गोइंग एडोलसेंट्स’ प्रकाशित हुआ था। इसलिए प्रकाशन के जर्नल और तारीख को लेकर मूल खबर में तथ्यात्मक गड़बड़ी दिखाई देती है।
300 किशोरों की जांच, करीब एक-तिहाई में अत्यधिक तकनीकी इस्तेमाल की समस्या
रिनपास से सामने आई जानकारी के अनुसार अध्ययन में 13 से 18 वर्ष आयु के 300 किशोरों का सर्वेक्षण किया गया और इनमें तकनीक के अत्यधिक इस्तेमाल से जुड़ी समस्या वाले 113 किशोरों का आगे विस्तृत अध्ययन किया गया। इनमें 52 लड़के और 61 लड़कियां थीं। इन आंकड़ों के आधार पर समस्या वाले किशोरों का अनुपात 37.7 प्रतिशत बैठता है, इसलिए मूल खबर में लिखा ‘करीब 35 प्रतिशत’ मोटा अनुमान तो माना जा सकता है, लेकिन उपलब्ध संख्या के आधार पर ‘करीब 38 प्रतिशत’ अधिक सटीक होगा। इसका अर्थ यह भी नहीं है कि 300 में से 113 किशोर चिकित्सकीय अर्थ में किसी प्रमाणित ‘मोबाइल एडिक्शन’ बीमारी से पीड़ित थे। शोध में ‘टेक्नोलॉजी एडिक्शन’ अथवा समस्याग्रस्त तकनीकी इस्तेमाल की जांच की गई थी। इंटरनेट या मोबाइल के अत्यधिक इस्तेमाल और किसी औपचारिक चिकित्सकीय निदान के बीच अंतर रखना जरूरी है।
अत्यधिक इस्तेमाल वाले समूह में कुछ किशोर प्रतिदिन पांच से छह घंटे तक स्क्रीन के सामने रह रहे थे, जबकि अन्य में इस्तेमाल लगभग तीन से पांच घंटे तक बताया गया। अभिभावकों ने चिड़चिड़ापन, गुस्सा, पारिवारिक बातचीत में कमी और पढ़ाई प्रभावित होने जैसी शिकायतें बताईं। लेकिन यहां भी केवल स्क्रीन पर बिताए घंटों को ‘लत’ की कसौटी मान लेना सही नहीं होगा। तीन घंटे ऑनलाइन पढ़ाई करने और तीन घंटे लगातार ऑनलाइन गेम खेलने या सोशल मीडिया देखने के प्रभाव समान नहीं होते। समस्या का अधिक महत्वपूर्ण संकेत यह है कि क्या किशोर डिजिटल इस्तेमाल को नियंत्रित नहीं कर पा रहा, क्या उसके कारण नींद, पढ़ाई, परिवार, मित्रता या दैनिक जिम्मेदारियां प्रभावित हो रही हैं और इस्तेमाल कम करने पर अत्यधिक बेचैनी या व्यवहार परिवर्तन दिखाई दे रहा है।
परिवार से दूरी क्यों बढ़ती है
तकनीक के अत्यधिक इस्तेमाल और पारिवारिक संबंधों के बीच संबंध पर रिनपास के शोधकर्ताओं ने अलग से भी काम किया है। डॉ. अमूल रंजन सिंह और देबालिना दास का 2025 में प्रकाशित अध्ययन विशेष रूप से सामाजिक-जनसांख्यिकीय कारकों और बच्चे-माता-पिता के जुड़ाव को तकनीकी व्यसन से जोड़कर देखता है। यह महत्वपूर्ण है क्योंकि किशोरों में समस्याग्रस्त डिजिटल इस्तेमाल को केवल फोन की उपलब्धता से नहीं समझा जा सकता। परिवार के भीतर संवाद, माता-पिता और बच्चे के बीच भावनात्मक संबंध, दिनचर्या तथा किशोर की सामाजिक परिस्थितियां भी उसकी डिजिटल आदतों से जुड़ी हो सकती हैं। इसलिए यह संबंध दोतरफा भी हो सकता है-अत्यधिक मोबाइल इस्तेमाल परिवार से बातचीत घटा सकता है, वहीं कमजोर पारिवारिक जुड़ाव किशोर को डिजिटल दुनिया में अधिक समय बिताने की ओर भी ले जा सकता है। किसी एक अध्ययन से यह निश्चित करना कठिन है कि हर मामले में पहले कारण कौन-सा है।
भारतीय मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की व्यापक समीक्षा भी इस चिंता का समर्थन करती है। दिसंबर 2025 में ‘इंडियन जर्नल ऑफ साइकियाट्री’ में प्रकाशित निमहांस से जुड़े विशेषज्ञों के शोध में बच्चों और किशोरों के बढ़ते इंटरनेट इस्तेमाल को नींद में व्यवधान, शारीरिक निष्क्रियता, चिंता, अवसाद, साइबर बुलिंग, गेमिंग की लत और सामाजिक रूप से अलग होने जैसी समस्याओं से जोड़ा गया। लेकिन शोधकर्ता केवल इंटरनेट प्रतिबंध लगाने को पर्याप्त समाधान नहीं मानते। उनका जोर परिवार, स्कूल, स्वास्थ्य व्यवस्था और नीति स्तर पर ऐसी रणनीति विकसित करने पर है जिसमें बच्चे डिजिटल तकनीक का लाभ भी उठा सकें और उसके नुकसान से भी सुरक्षित रहें।
आठ सत्रों में आदत बदलने से लेकर माता-पिता से संबंध तक पर काम
रिनपास के शोध का सबसे उपयोगी हिस्सा समस्या पहचानने से आगे उसके समाधान की कोशिश है। डॉ. सिंह और देबालिना दास ने स्कूल जाने वाले किशोरों के लिए आठ सत्रों वाला एकीकृत समूह चिकित्सा कार्यक्रम विकसित किया। उपलब्ध शोध विवरण के अनुसार प्रत्येक सत्र लगभग 40 से 45 मिनट का था और पांच-पांच किशोरों के समूह में सप्ताह में दो बार सत्र रखने की रूपरेखा तैयार की गई। कार्यक्रम तैयार करने से पहले किशोरों और अभिभावकों की जरूरतों को समझा गया और विशेषज्ञों की राय ली गई। इसमें तकनीकी व्यसन के बारे में जागरूकता, उसके प्रभाव को समझना, मनोशिक्षा, पढ़ाई के लिए प्रेरणा, माता-पिता के साथ जुड़ाव, आत्मसम्मान और ‘डिजिटल डिटॉक्स’ जैसे घटक शामिल किए गए। इस मॉड्यूल को विशेषज्ञों से सत्यापित भी कराया गया।
इस उपचार पद्धति का मूल विचार मोबाइल को दुश्मन घोषित करना नहीं, बल्कि किशोर को अपने डिजिटल व्यवहार पर नियंत्रण वापस दिलाना है। पुराने भारतीय चिकित्सकीय साहित्य में भी तकनीकी व्यसन के लिए संज्ञानात्मक व्यवहार चिकित्सा, प्रेरक संवाद, लक्ष्य निर्धारित करना, कुछ खास ऐप या गतिविधियों से सीमित अवधि के लिए दूरी, बाहरी समय-संकेत, सहायता समूह और पारिवारिक हस्तक्षेप जैसे उपायों का उल्लेख मिलता है। आधुनिक जीवन में तकनीक की जरूरत को देखते हुए विशेषज्ञ पूर्ण परहेज के बजाय नियंत्रित उपयोग को अधिक व्यावहारिक लक्ष्य मानते हैं। इसका अर्थ है कि परिवार में यह तय किया जाए कि भोजन के समय फोन नहीं होगा, सोने से पहले स्क्रीन का इस्तेमाल सीमित रहेगा, पढ़ाई और मनोरंजन का डिजिटल समय अलग होगा और ऑफलाइन खेल, मित्रों से प्रत्यक्ष संवाद तथा पारिवारिक गतिविधियों के लिए नियमित समय रखा जाएगा।
हर ज्यादा मोबाइल चलाने वाला किशोर ‘एडिक्ट’ नहीं
इस विषय पर भाषा की सावधानी भी महत्वपूर्ण है। ‘मोबाइल की लत’ आम बोलचाल में प्रभावशाली शब्द है, लेकिन मानसिक स्वास्थ्य की दृष्टि से हर अधिक स्क्रीन टाइम को व्यसन कहना उचित नहीं है। विश्व स्तर पर ‘गेमिंग डिसऑर्डर’ को औपचारिक पहचान मिली हुई है, लेकिन सामान्य स्मार्टफोन इस्तेमाल या सोशल मीडिया पर अधिक समय बिताने को केवल घंटों की संख्या के आधार पर मानसिक विकार घोषित नहीं किया जा सकता। चिकित्सकीय चिंता तब अधिक होती है जब व्यक्ति इस्तेमाल पर नियंत्रण खोने लगे, दूसरी महत्वपूर्ण गतिविधियों की तुलना में डिजिटल गतिविधि को लगातार प्राथमिकता दे और नुकसान होने के बावजूद उसका इस्तेमाल जारी रखे। किशोरों के मामले में पढ़ाई, नींद, पारिवारिक संबंध और सामाजिक व्यवहार में लगातार गिरावट ऐसे संकेत हो सकते हैं जिन पर माता-पिता और स्कूल को ध्यान देना चाहिए।
रिनपास के अध्ययन की एक और महत्वपूर्ण सीख यह है कि समाधान केवल बच्चे पर जिम्मेदारी डालकर नहीं निकलेगा। डिजिटल उपकरण अब शिक्षा, सूचना, मित्रता और मनोरंजन सभी का माध्यम हैं। ऐसे में किशोर को लगातार फोन इस्तेमाल करने के लिए डांटना, जबकि परिवार के वयस्क स्वयं भोजन, बातचीत और खाली समय में स्क्रीन से जुड़े रहें, व्यवहार परिवर्तन को कठिन बना सकता है। इसीलिए शोध में किशोर और अभिभावक दोनों को शामिल कर साझा डिजिटल नियम बनाने पर जोर दिया गया। तकनीक को पूरी तरह हटाने के बजाय परिवार के भीतर ऐसा वातावरण बनाना अधिक महत्वपूर्ण है जिसमें आमने-सामने बातचीत, नींद, पढ़ाई, खेल और सामाजिक संबंधों के लिए डिजिटल दुनिया से बाहर पर्याप्त समय सुरक्षित रहे।
रिनपास का अध्ययन एक महत्वपूर्ण चेतावनी जरूर देता है, लेकिन 300 किशोरों के एक अध्ययन के निष्कर्षों को देश के सभी किशोरों पर सीधे लागू नहीं किया जा सकता। फिर भी रिनपास के निष्कर्ष और निमहांस सहित दूसरे भारतीय शोध एक व्यापक दिशा की ओर इशारा करते हैं-समस्या मोबाइल फोन अपने-आप में नहीं, बल्कि उसका ऐसा अनियंत्रित इस्तेमाल है जो वास्तविक जीवन की नींद, पढ़ाई, भावनात्मक संतुलन और रिश्तों की जगह लेने लगे। किशोर यदि परिवार के बीच बैठकर भी लगातार स्क्रीन में डूबा रहे, रात की नींद फोन के कारण कम होने लगे, पढ़ाई प्रभावित हो और वास्तविक मित्रों तथा परिवार से संवाद घटता जाए, तो डिजिटल सुविधा धीरे-धीरे सामाजिक अलगाव का माध्यम बन सकती है।


