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रेप पीड़िताओं के लिए हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, 24 हफ्ते तक गर्भावस्था समाप्त कराने पर अहम टिप्पणी
MP High Court: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि रेप पीड़िता को 24 हफ्ते तक की गर्भावस्था समाप्त कराने के लिए हर बार कोर्ट की अनुमति लेने की जरूरत नहीं है। 20 हफ्ते तक एक रजिस्टर्ड डॉक्टर और 20 से 24 हफ्ते के बीच दो रजिस्टर्ड डॉक्टरों की राय के आधार पर प्रक्रिया की जा सकती है।
Rape Survivor Pregnancy Termination (Image Credit-Social Media)
MP High Court: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि रेप पीड़िता को 24 हफ्ते तक की गर्भावस्था समाप्त कराने के लिए हर बार कोर्ट की अनुमति लेने की जरूरत नहीं है। 20 हफ्ते तक एक रजिस्टर्ड डॉक्टर और 20 से 24 हफ्ते के बीच दो रजिस्टर्ड डॉक्टरों की राय के आधार पर प्रक्रिया की जा सकती है।
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने रेप पीड़िताओं के लिए अहम टिप्पणी करते हुए साफ किया है कि यौन हिंसा, रेप या इन्सेस्ट के मामलों में 24 सप्ताह तक की गर्भावस्था को मेडिकल नियमों के तहत समाप्त कराने के लिए पीड़िता को अलग से कोर्ट की अनुमति लेने की जरूरत नहीं है। कोर्ट ने यह बात 16 वर्षीय रेप पीड़िता से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान कही।
18 सप्ताह की गर्भावस्था को लेकर पहुंचा था मामला
मामला एक 16 साल की नाबालिग रेप पीड़िता से जुड़ा है, जो करीब 18 सप्ताह की गर्भवती थी। पीड़िता के पिता ने उसकी इच्छा के मुताबिक गर्भावस्था समाप्त कराने के लिए हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी।
याचिका में बताया गया कि रेप के कारण हुई गर्भावस्था को लेकर नाबालिग मानसिक रूप से बेहद परेशान थी और वह इस गर्भावस्था को जारी नहीं रखना चाहती थी। हालांकि, इंदौर बेंच ने मामले में अलग से अनुमति देने की जरूरत नहीं मानी और याचिका को खारिज कर दिया।
24 सप्ताह तक कोर्ट की अनुमति जरूरी नहीं
जस्टिस संदीप एन. भट्ट ने 11 अगस्त को दिए आदेश में हाईकोर्ट की जबलपुर बेंच के 20 फरवरी 2025 के फैसले का भी उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) एक्ट, 1971 में यौन अपराधों की पीड़िताओं के लिए गर्भावस्था समाप्त कराने के प्रावधान मौजूद हैं।
कोर्ट के मुताबिक, रेप या यौन हिंसा के मामलों में 20 सप्ताह तक की गर्भावस्था को एक रजिस्टर्ड मेडिकल प्रैक्टिशनर की सलाह के अनुसार समाप्त किया जा सकता है। वहीं, अगर गर्भावस्था 20 सप्ताह से ज्यादा लेकिन 24 सप्ताह तक है, तो नियमों के तहत दो रजिस्टर्ड मेडिकल प्रैक्टिशनरों की राय के आधार पर मेडिकल प्रक्रिया की जा सकती है।
अस्पतालों को नहीं मांगना चाहिए कोर्ट का आदेश
हाईकोर्ट ने इस मामले में एक और महत्वपूर्ण निर्देश दिया है। कोर्ट ने राज्य के स्वास्थ्य विभाग के कमिश्नर से कहा कि इस आदेश की जानकारी सभी संबंधित अस्पतालों तक पहुंचाई जाए, खासकर सरकारी अस्पतालों को इसके बारे में स्पष्ट रूप से बताया जाए। इसका उद्देश्य यह है कि ऐसी परिस्थितियों में पीड़िताओं और उनके परिवारों को अनावश्यक रूप से अदालतों के चक्कर न लगाने पड़ें।
POCSO नियमों का भी दिया हवाला
हाईकोर्ट ने POCSO Rules, 2020 का भी जिक्र किया। कोर्ट ने कहा कि यौन अपराध की शिकार बच्ची को आपातकालीन चिकित्सा सुविधा देने के लिए अस्पताल या मेडिकल सेंटर को कानूनी या मजिस्ट्रेट की अनुमति जैसे दस्तावेजों को अनिवार्य शर्त नहीं बनाना चाहिए।


