दिमाग किसी एक व्यक्ति को पसंद क्यों करने लगता है और यह भावना मस्तिष्क में कहाँ रहती है?

Love and Attraction Science: दिमाग किसी एक व्यक्ति को पसंद क्यों करने लगता है? जानिए आकर्षण, प्यार, डोपामिन, ऑक्सीटोसिन, स्मृति और मस्तिष्क के उन तंत्रों का विज्ञान जो किसी व्यक्ति को हमारे लिए खास बना देते हैं।

Yogesh Mishra
Published on: 17 Aug 2026 5:02 PM IST
Love and Attraction Science
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Love and Attraction Science: किसी व्यक्ति को पहली बार देखकर अचानक अच्छा लगना, कुछ मुलाकातों के बाद उसकी ओर बार-बार खिंचना, उसकी आवाज सुनते ही मन प्रसन्न होना, उसके संदेश की प्रतीक्षा करना, भीड़ में भी उसी चेहरे को पहले ढूँढ़ना, इन्हें हम सामान्य भाषा में आकर्षण कहते हैं। लेकिन मस्तिष्क-विज्ञान की दृष्टि से आकर्षण कोई एक भावना नहीं है और न ही यह मस्तिष्क के किसी एक छोटे हिस्से में ‘रखा’ होता है। यह देखने-सुनने की व्यवस्था, स्मृति, पुरस्कार-तंत्र, प्रेरणा, हार्मोन, सामाजिक अनुभव, व्यक्तित्व, गंध, परिचितपन और सांस्कृतिक सीख - इन सबके संयुक्त काम से पैदा होने वाली अवस्था है। रोमांटिक आकर्षण पर मस्तिष्क-चित्रण अध्ययनों में विशेष रूप से डोपामिन से समृद्ध पुरस्कार और प्रेरणा तंत्र - जैसे वेंट्रल टेगमेंटल एरिया (ventral tegmental area ) और कॉडेट नाभिक (Caudate Nucleus) - सक्रिय पाए गए हैं।

मस्तिष्क में बनता है आकर्षण

सबसे पहले एक महत्वपूर्ण भ्रम दूर करना चाहिए। हम अक्सर कहते हैं, ‘दिल किसी पर आ गया’, ‘दिल टूट गया’, ‘दिल उसे चाहता है।’ जैविक दृष्टि से प्रेम और आकर्षण का मुख्य निर्माण हृदय में नहीं, मस्तिष्क में होता है। हृदय उसकी शारीरिक प्रतिक्रिया दिखाता है - धड़कन बढ़ सकती है, हथेलियाँ पसीज सकती हैं, पेट में हलचल महसूस हो सकती है - लेकिन यह सब मस्तिष्क और स्वायत्त तंत्रिका तंत्र के संकेतों का परिणाम है। प्रेम में ‘दिल’ का प्रयोग सांस्कृतिक और काव्यात्मक प्रतीक है। वास्तविक निर्णय, स्मृति, इच्छा और व्यक्ति-विशेष पर केंद्रित ध्यान मस्तिष्क के अनेक तंत्रों से बनते हैं।

जब हम पहली बार किसी व्यक्ति को देखते हैं तो प्रक्रिया बहुत तेजी से शुरू हो जाती है। आँखों से चेहरे की आकृति, आँखें, मुस्कान, शरीर की गति और हावभाव की जानकारी मस्तिष्क तक जाती है। आवाज सुनें तो उसका स्वर, लय और भाव अलग रास्तों से संसाधित होता है। गंध, दूरी, शरीर की मुद्रा और सामने वाले की प्रतिक्रिया भी साथ जुड़ती है। मस्तिष्क इन संकेतों को अलग-अलग नहीं छोड़ता। कुछ ही क्षणों में वह उनका संयुक्त सामाजिक अर्थ बनाने लगता है -यह व्यक्ति परिचित है या नया? सुरक्षित है या खतरा? आकर्षक है या अप्रासंगिक? मेरे लिए महत्वपूर्ण हो सकता है या नहीं?

लेकिन कोई चेहरा ‘सुंदर’ लगना और किसी व्यक्ति से वास्तव में आकर्षित होना एक ही बात नहीं है। आप किसी अभिनेता या अजनबी को बहुत सुंदर मान सकते हैं, फिर भी उसके प्रति कोई गहरी खिंचाव न महसूस करें। दूसरी तरफ कोई व्यक्ति पहली नजर में असाधारण सुंदर न लगे। लेकिन बातचीत, बुद्धिमत्ता, हास्य, आत्मीयता या बार-बार मिलने से अत्यंत आकर्षक लगने लगे। इसका कारण यह है कि मस्तिष्क केवल चेहरे की समरूपता नहीं माप रहा। वह उस व्यक्ति से मिलने वाले संभावित पुरस्कार और भावनात्मक महत्व का अनुमान बना रहा है।

डोपामिन की भूमिका

यहीं डोपामिन की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। डोपामिन को अक्सर गलत तरीके से ‘आनंद का रसायन’ कहा जाता है। वास्तव में यह केवल आनंद नहीं। बल्कि प्रेरणा, सीखने, अपेक्षा और किसी महत्वपूर्ण पुरस्कार की ओर बढ़ने में बड़ी भूमिका निभाता है। जब कोई व्यक्ति हमारे लिए विशेष महत्व ग्रहण करने लगता है, तो उससे जुड़े संकेत - उसका चेहरा, नाम, संदेश, आवाज या मिलने का स्थान - पुरस्कार तंत्र के लिए महत्वपूर्ण बन सकते हैं। शुरुआती तीव्र प्रेम पर हुए प्रसिद्ध मस्तिष्क-चित्रण अध्ययनों में प्रिय व्यक्ति की तस्वीर देखते समय वेंट्रल टेगमेंटल एरिया और कॉडेट नाभिक जैसे डोपामिन-समृद्ध हिस्सों की सक्रियता मिली।

यही समझाता है कि आकर्षण में केवल ‘वह व्यक्ति अच्छा लगता है’ नहीं होता। बल्कि “मैं उससे फिर मिलना चाहता हूँ” वाली प्रेरणा भी पैदा होती है। प्रेम का शुरुआती चरण कई बार आनंद से अधिक खोज और लालसा जैसा होता है। फोन बार-बार देखना, उसके बारे में सोचना, मिलने का अवसर बनाना, उसके छोटे संकेतों का अत्यधिक महत्व महसूस करना—ये सब पुरस्कार और प्रेरणा तंत्र की इसी दिशा से समझे जा सकते हैं।

वेंट्रल टेगमेंटल एरिया (ventral tegmental area ) मस्तिष्क के मध्य भाग में स्थित एक छोटा लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र है। यह डोपामिन व्यवस्था का हिस्सा है और भोजन, उपलब्धि, नई चीज, सामाजिक पुरस्कार तथा रोमांटिक आकर्षण जैसी अनेक प्रेरक अवस्थाओं में सक्रिय हो सकता है। इसलिए इसे ‘प्रेम का केंद्र’ कहना सही नहीं होगा। यह प्रेम के दौरान सक्रिय होने वाले महत्वपूर्ण पुरस्कार तंत्रों में से एक है। यही क्षेत्र दूसरे प्रकार के पुरस्कारों में भी काम करता है।

कॉडेट नाभिक भी प्रेरणा, लक्ष्य-निर्देशित व्यवहार और पुरस्कार से जुड़ा है। शुरुआती रोमांटिक प्रेम में इसकी सक्रियता प्रेम की तीव्रता से जुड़ी पाई गई है। इसलिए जब किसी एक व्यक्ति पर ध्यान असामान्य रूप से केंद्रित हो जाता है, तो यह केवल कविता की भाषा में ‘मन उसी में लग गया’ नहीं है। मस्तिष्क वास्तव में उस व्यक्ति को विशेष महत्त्व वाला लक्ष्य देने लगता है।

दिमाग किसी एक को ही विशेष क्यों बना देता है?

आकर्षण कई स्तरों के चयन का परिणाम है। चेहरे की बनावट, स्वास्थ्य के संकेत, आवाज, गंध और शरीर की भाषा जैविक स्तर पर भूमिका निभा सकते हैं। इसके बाद व्यक्तित्व, हास्य, बुद्धिमत्ता, संवेदनशीलता, आत्मविश्वास, बातचीत की शैली, सामाजिक स्थिति, समान मूल्य, समान रुचियाँ और संबंध की उपलब्धता जुड़ती हैं। फिर व्यक्ति का अपना जीवन-इतिहास इसमें प्रवेश करता है। बचपन के संबंध, परिवार, पिछले प्रेम-संबंध, सुखद और अप्रिय अनुभव। इसलिए एक ही व्यक्ति किसी को अत्यंत आकर्षक लग सकता है और दूसरे को बिल्कुल नहीं। आकर्षण वस्तु में अकेले नहीं होता। देखने वाले मस्तिष्क और सामने वाले व्यक्ति के बीच संबंध में पैदा होता है। इसीलिए सुंदरता के कुछ औसत जैविक संकेत होने के बावजूद पसंद में भारी व्यक्तिगत और सांस्कृतिक अंतर मिलता है। यदि आकर्षण केवल चेहरे के गणित से तय होता तो एक ही व्यक्ति पूरी दुनिया को समान रूप से आकर्षक लगता। वास्तविकता ऐसी नहीं है।

परिचितपन भी शक्तिशाली है। जिस व्यक्ति को हम बार-बार देखते हैं, उससे अनुकूल परिस्थितियों में परिचय और सहजता बढ़ सकती है। मनोविज्ञान में बार-बार संपर्क से पसंद बढ़ने की प्रवृत्ति लंबे समय से जानी जाती है। लेकिन यहाँ भी सीमा है। यदि पहला अनुभव अप्रिय है तो बार-बार मिलना पसंद बढ़ाने के बजाय नापसंदगी बढ़ा सकता है। यानी केवल ‘ज्यादा दिखो और प्रेम हो जाएगा’ जैसा कोई नियम नहीं है।

समानता भी आकर्षण को प्रभावित करती है। समान भाषा, शिक्षा, रुचि, हास्य, राजनीतिक या सांस्कृतिक दृष्टिकोण, जीवन लक्ष्य और पारिवारिक पृष्ठभूमि दो लोगों में बातचीत और भविष्यवाणी को आसान बना सकते हैं। मस्तिष्क को सामने वाला व्यक्ति ‘मेरी दुनिया समझता है’ ऐसा लग सकता है। लेकिन फिर इसका उलटा भी होता है। कुछ लोग अपने से अलग व्यक्तित्व की ओर आकर्षित होते हैं। ‘विपरीत लोग हमेशा आकर्षित होते हैं’ भी उतना ही अतिरंजित है जितना ‘केवल समान लोग प्रेम करते हैं।’

गंध और हार्मोन की रोचक भूमिका

गंध की भूमिका भी रोचक है। मनुष्य में गंध की क्षमता कई पशुओं जितनी प्रमुख दिखाई नहीं देती, फिर भी शरीर की गंध और सुगंध सामाजिक मूल्यांकन को प्रभावित कर सकती है। लेकिन लोकप्रिय संस्कृति में इसे अक्सर ‘फेरोमोन’ के रूप में बहुत बढ़ा-चढ़ाकर बताया जाता है। मनुष्यों में ऐसा कोई सरल, सर्वमान्य यौन फेरोमोन अभी स्थापित नहीं है जिसे लगाकर किसी को आकर्षित कर लिया जाए। इसलिए बाजार में मिलने वाले तथाकथित ‘फेरोमोन इत्र’ को वैज्ञानिक प्रेम-सूत्र समझना उचित नहीं।

हार्मोन आकर्षण में भूमिका निभाते हैं।लेकिन यहाँ भी लोकप्रिय धारणाएँ बहुत सरल हैं। टेस्टोस्टेरोन यौन इच्छा और प्रेरणा से जुड़ा है। एस्ट्रोजन और दूसरे प्रजनन हार्मोन भी यौन व्यवहार को प्रभावित कर सकते हैं। लेकिन किसी व्यक्ति से प्रेम टेस्टोस्टेरोन की मात्रा से निर्धारित नहीं होता। यौन इच्छा और व्यक्ति-विशेष के प्रति रोमांटिक आकर्षण अलग प्रक्रियाएँ हो सकती हैं।

ऑक्सीटोसिन को अक्सर ‘लव हार्मोन’ कहा जाता है। लेकिन यह नाम अधूरा और कई बार भ्रामक है। ऑक्सीटोसिन सामाजिक पहचान, निकटता, मातृत्व और संबंध-निर्माण में भूमिका निभाता है तथा डोपामिन आधारित पुरस्कार तंत्र के साथ परस्पर क्रिया कर सकता है। लेकिन इसका प्रभाव व्यक्ति और संदर्भ पर निर्भर करता है। यह ऐसा प्रेम-द्रव्य नहीं है, जिसे बढ़ाकर किसी व्यक्ति को किसी से प्रेम कराया जा सके। आधुनिक समीक्षाएँ प्रेम और जोड़ी-बंधन में ऑक्सीटोसिन, डोपामिन और वैसोप्रेसिन के परस्पर संबंध की चर्चा करती हैं।

आकर्षण और लगाव में फर्क

यहीं आकर्षण और लगाव में फर्क समझना बहुत उपयोगी है। शुरुआती आकर्षण में नई चीज, उत्साह, तीव्र ध्यान और पुरस्कार की अपेक्षा अधिक हो सकती है। लंबे समय के संबंध में वही व्यक्ति सुरक्षा, भरोसा, परिचितपन और भावनात्मक आश्रय का स्रोत बन सकता है। तब संबंध केवल उत्तेजना पर नहीं टिकता। लगाव की व्यवस्था अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है।

दिलचस्प रूप से लंबे विवाह या लंबे प्रेम-संबंध में भी रोमांटिक प्रेम पूरी तरह समाप्त होना जरूरी नहीं। एक प्रसिद्ध अध्ययन में औसतन लगभग 21 वर्षों से विवाहित लोगों को साथी की तस्वीर दिखाई गई तो पुरस्कार और लगाव से जुड़े कई मस्तिष्क क्षेत्रों में सक्रियता मिली। यानी लंबे संबंध में प्रारंभिक जुनून का रूप बदल सकता है। लेकिन कुछ लोगों में साथी के प्रति तीव्र रोमांटिक मूल्य बहुत लंबे समय तक बना रह सकता है। इससे यह लोकप्रिय विचार गलत साबित होता है कि ‘प्यार केवल तीन महीने या तीन साल का रसायन है।’सजैविक प्रणालियाँ समय के साथ बदलती जरूर हैं। लेकिन प्रेम की कोई सार्वभौमिक समाप्ति-घड़ी नहीं होती।

मेमोरी और आकर्षण

आकर्षण में स्मृति का महत्व भी बहुत बड़ा है। कल्पना करें कि किसी व्यक्ति से पहली मुलाकात बहुत आनंददायक रही। उस समय स्थान, उसकी आवाज, बातचीत, खुशबू और आपके भाव - सब स्मृति में जुड़े। अगली बार उसी व्यक्ति को देखते ही उन सकारात्मक अनुभवों का एक हिस्सा फिर सक्रिय हो सकता है। धीरे-धीरे मस्तिष्क सीखता है - इस व्यक्ति की उपस्थिति मेरे लिए सुखद है।

इसके उलट यदि किसी व्यक्ति ने अपमान, भय या असुरक्षा पैदा की तो आकर्षक चेहरा होने के बावजूद मस्तिष्क उसे नकारात्मक मूल्य दे सकता है। इसलिए आकर्षण केवल आँखों से प्रवेश नहीं करता; स्मृतियाँ लगातार उसका मूल्य बदलती रहती हैं। इसी कारण कभी-कभी शुरुआत में पसंद न आने वाला व्यक्ति बाद में बहुत प्रिय हो जाता है। पहली छाप ने थोड़ा मूल्य दिया था। महीनों की बातचीत ने वह मूल्य बदल दिया। मस्तिष्क की सामाजिक पसंद स्थिर अंक नहीं है - वह नई जानकारी से लगातार अद्यतन होती है।

अमिग्डाला की भूमिका

अमिग्डाला (Amygdala) भी सामाजिक और भावनात्मक संकेतों के मूल्यांकन में भूमिका निभाता है। लेकिन इसे केवल ‘भय केंद्र’ मानना गलत है। यह भावनात्मक महत्त्व वाले संकेतों की पहचान में व्यापक रूप से शामिल है। इंसुला शरीर के भीतर की संवेदनाओं और भावनात्मक अनुभव से जुड़ी है। प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स मूल्यांकन, सामाजिक निर्णय और नियंत्रण में भूमिका निभाता है। हिप्पोकैम्पस स्मृति और संदर्भ से जुड़ता है। यानी प्रेम का कोई एक बटन नहीं। एक पूरा जाल काम करता है। प्रेम और लगाव पर मस्तिष्क-चित्रण के बड़े विश्लेषण भी पुरस्कार, प्रेरणा, भावना और सामाजिक अनुभूति से जुड़े वितरित तंत्रों को दर्शाते हैं।

यही आपके तीसरे प्रश्न का सीधा उत्तर है, आकर्षण ब्रेन के किसी एक हिस्से में ‘रहता’ नहीं है। यदि किसी नक्शे पर सबसे महत्वपूर्ण हिस्से चिह्नित करने हों तो शुरुआती रोमांटिक आकर्षण में वेंट्रल टेगमेंटल एरिया और कॉडेट जैसे पुरस्कार-प्रेरणा क्षेत्र बहुत महत्वपूर्ण दिखाई देते हैं। लगाव में न्यूक्लियस अकम्बेंस, वेंट्रल स्ट्रायटम तथा ऑक्सीटोसिन और वैसोप्रेसिन से जुड़े तंत्र भूमिका निभाते हैं। भावना, स्मृति और सामाजिक अर्थ के लिए दूसरे क्षेत्रों का सहयोग जरूरी है।

किसी व्यक्ति के बारे में हम बार-बार क्यों सोचने लगते हैं?

क्योंकि ध्यान भी पुरस्कार से प्रभावित होता है। जिस चीज को मस्तिष्क महत्वपूर्ण पुरस्कार मानता है, उसे वह प्राथमिकता देता है। इसलिए प्रेम के शुरुआती चरण में प्रिय व्यक्ति से संबंधित संकेत असामान्य रूप से ध्यान खींच सकते हैं। उसका नाम स्क्रीन पर दिखा तो तुरंत ध्यान गया। कमरे में उसकी आवाज आई तो बाकी आवाजों के बीच वह अलग लगी। उसके संदेश की सूचना दूसरे संदेशों से अधिक महत्वपूर्ण महसूस हुई।

इसे केवल ‘डोपामिन बढ़ गया’ कह देना फिर भी अधूरा होगा। उसमें अपेक्षा भी जुड़ती है। संदेश आएगा या नहीं? वह मिलने आएगा या नहीं? वह भी मुझे पसंद करता है या नहीं? अनिश्चित पुरस्कार कई परिस्थितियों में ध्यान को और मजबूत कर सकता है। यही कारण है कि प्रेम की अनिश्चित अवस्था कई बार बहुत अधिक मानसिक जगह घेरती है।

और इसलिए अस्वीकृति इतनी दर्दनाक क्यों होती है, उसका उत्तर भी इसी तंत्र में मिलता है। जिस व्यक्ति को मस्तिष्क ने उच्च पुरस्कार और लक्ष्य के रूप में दर्ज कर लिया हो, अचानक उसकी अनुपलब्धता केवल ‘एक विचार गलत हो गया’ नहीं होती। पुरस्कार की अपेक्षा टूटती है, सामाजिक हानि होती है और संबंध से जुड़े अनेक संकेत सक्रिय बने रहते हैं। यही वजह है कि प्रेम-विच्छेद के बाद व्यक्ति जानता है कि संबंध खत्म हो गया है, लेकिन उसका मस्तिष्क कुछ समय तक उस व्यक्ति की ओर खिंचाव बनाए रख सकता है। रोमांटिक प्रेम और व्यसन के बीच कुछ तंत्रिका समानताओं की चर्चा इसी संदर्भ में होती है। दोनों में पुरस्कार और प्रेरणा तंत्र सक्रिय हो सकते हैं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि प्रेम स्वयं बीमारी या नशा है। समान मस्तिष्क तंत्र जीवन की अनेक महत्वपूर्ण प्रेरणाओं में इस्तेमाल होते हैं। प्रेम को ‘ड्रग’ कह देना लोकप्रिय रूपक है। पूर्ण वैज्ञानिक व्याख्या नहीं।

क्या ‘पहली नजर का प्यार’ सचमुच होता है?

क्या ‘पहली नजर का प्यार’ सचमुच होता है? पहली नजर में तीव्र आकर्षण निश्चित रूप से हो सकता है। मस्तिष्क बहुत कम समय में चेहरा, शरीर भाषा, आवाज और सामाजिक संकेतों का आकलन कर सकता है। लेकिन पहली नजर में किसी के चरित्र, भरोसे, मूल्य और संबंध क्षमता का ज्ञान नहीं हो सकता। इसलिए पहली नजर में जो होता है, उसे गहरे विकसित प्रेम की तुलना में तीव्र आकर्षण या प्रेम की संभावना कहना अधिक वैज्ञानिक होगा। बाद की बातचीत उस शुरुआती मूल्यांकन को मजबूत भी कर सकती है और पूरी तरह उलट भी सकती है।

किसी अत्यंत आकर्षक व्यक्ति के सामने कुछ लोग घबरा क्यों जाते हैं? क्योंकि आकर्षण केवल पुरस्कार नहीं, महत्त्व और अनिश्चितता भी बढ़ाता है। जिस व्यक्ति की राय हमारे लिए अधिक मायने रखती है, उसके सामने सामाजिक मूल्यांकन का तनाव बढ़ सकता है। दिल तेज धड़कना, मुंह सूखना या शब्द भूल जाना इसी मिश्रित अवस्था का परिणाम हो सकता है - आकर्षण, अपेक्षा और सामाजिक चिंता एक साथ।

क्या महिलाओं और पुरुषों का आकर्षण पूरी तरह अलग तरीके से काम करता है? लोकप्रिय किताबें अक्सर ऐसा बहुत कठोर दावा करती हैं। लेकिन विज्ञान अधिक जटिल तस्वीर देता है। औसत स्तर पर कुछ जैविक और सामाजिक अंतर हो सकते हैं। लेकिन दोनों लिंगों और अलग-अलग यौन अभिरुचियों में रोमांटिक प्रेम से जुड़े पुरस्कार और प्रेरणा तंत्रों में काफी समानता दिखाई देती है। किसी व्यक्ति की पसंद को केवल ‘पुरुष दृश्य से आकर्षित होते हैं, महिलाएँ भावनाओं से’ जैसे एक वाक्य में समेटना वैज्ञानिक रूप से कमजोर है।

क्या पैसा, शक्ति और सामाजिक प्रतिष्ठा आकर्षण को प्रभावित करते हैं? कर सकते हैं। लेकिन केवल लालच के अर्थ में नहीं। मनुष्य सामाजिक प्राणी है और मस्तिष्क क्षमता, आत्मविश्वास, सुरक्षा, प्रतिष्ठा, संसाधन तथा दूसरे लोगों की प्रतिक्रिया को सामाजिक संकेतों के रूप में पढ़ता है। संस्कृति फिर इन्हें बढ़ाती या घटाती है। लेकिन हर व्यक्ति पर इनका प्रभाव समान नहीं होता।

यही बात शारीरिक सुंदरता पर लागू होती है। चेहरे की कुछ विशेषताएँ औसतन आकर्षक मानी जा सकती हैं। लेकिन सांस्कृतिक आदर्श, व्यक्तिगत अनुभव और परिचितपन उन्हें बदलते हैं। इसलिए ‘वैज्ञानिक रूप से बिल्कुल सही आकर्षक चेहरा’ जैसी इंटरनेट सूचियाँ वास्तविक मानव पसंद को बहुत सरल बना देती हैं।

और प्रेम में ‘केमिस्ट्री’ क्या वास्तव में कोई चीज है? आम बातचीत में हम कहते हैं - ‘दोनों के बीच केमिस्ट्री है।’ वैज्ञानिक दृष्टि से कोई एक रसायन ‘केमिस्ट्री’ नहीं बनाता। यह परस्पर ध्यान, चेहरे और आवाज के संकेत, हँसी का तालमेल, बातचीत, पुरस्कार की अनुभूति, शारीरिक उत्तेजना, स्पर्श, स्मृति और हार्मोनल प्रतिक्रियाओं का मिला-जुला परिणाम हो सकता है। इसलिए सामाजिक अर्थ में ‘केमिस्ट्री” वास्तविक अनुभव है। लेकिन उसके पीछे कोई एक प्रेम-रसायन नहीं।

स्पर्श और लगाव

और स्पर्श इसमें विशेष भूमिका निभा सकता है। सुरक्षित और इच्छित स्पर्श सामाजिक निकटता और लगाव से जुड़े तंत्रों को प्रभावित कर सकता है। लेकिन वही स्पर्श यदि अवांछित हो तो आकर्षण नहीं, तनाव और खतरे की प्रतिक्रिया पैदा करेगा। इसलिए मस्तिष्क केवल स्पर्श को नहीं पढ़ता, स्पर्श का अर्थ पढ़ता है। यही प्रेम विज्ञान की केंद्रीय बात है। एक ही बाहरी घटना का मस्तिष्क पर प्रभाव संदर्भ से बदल जाता है। प्रिय व्यक्ति का हाथ पकड़ना सुखद हो सकता है; अजनबी का बिना अनुमति वही स्पर्श असुविधाजनक या भयावह हो सकता है। रसायन अकेले अर्थ तय नहीं करते।

आकर्षण में समय का भी बड़ा योगदान है। पहले चरण में नवीनता और उत्सुकता महत्वपूर्ण हो सकती है। फिर यदि अनुभव सकारात्मक रहें तो भरोसा और लगाव बढ़ता है। यदि नकारात्मक अनुभव जमा हों तो प्रारंभिक आकर्षण भी समाप्त हो सकता है। इसका अर्थ है कि मस्तिष्क प्रेम को एक बार चुनकर स्थायी मुहर नहीं लगा देता।

इसलिए बहुत सुंदर और शुरू में अत्यंत प्रिय लगने वाला व्यक्ति कुछ वर्ष बाद अप्रिय भी लग सकता है। यदि उसके साथ धोखा, हिंसा, अपमान या निरंतर तनाव जुड़ जाए। चेहरा वही है, लेकिन मस्तिष्क में उस चेहरे का मूल्य बदल चुका है। उलटे लंबे संबंध में उम्र के साथ चेहरा बदल जाने पर भी साथी प्रिय बना रह सकता है। क्योंकि उसका मूल्य अब केवल चेहरे में नहीं है। उसके साथ हजारों स्मृतियाँ, भरोसा, कठिन समय की साझेदारी और सुरक्षा का अनुभव जुड़ चुका है। यही कारण है कि 20 वर्ष पुराने साथी की तस्वीर भी पुरस्कार और लगाव तंत्र को विशेष रूप से सक्रिय कर सकती है।

क्या प्यार अंधा होता है?

यहाँ ‘प्यार अंधा होता है’ वाली कहावत का भी कुछ मनोवैज्ञानिक अर्थ है। प्रेम के शुरुआती चरण में व्यक्ति प्रिय व्यक्ति की सकारात्मक विशेषताओं पर अधिक ध्यान दे सकता है और नकारात्मक बातों को कम महत्व दे सकता है। लेकिन यह कोई पूर्ण मस्तिष्क बंद हो जाना नहीं है। सामाजिक निर्णय चलता रहता है; केवल उसका भार बदल सकता है।

अंततः यदि प्रश्न हो कि दिमाग किसी व्यक्ति को पसंद क्यों करने लगता है? तो उसका सबसे सटीक उत्तर यह है कि मस्तिष्क धीरे-धीरे उस व्यक्ति को “मेरे लिए महत्वपूर्ण, पुरस्कार देने वाला, सुरक्षित, आकर्षक या संबंध योग्य” मूल्य देता है। यह मूल्य चेहरे से शुरू हो सकता है। लेकिन स्मृति, बातचीत, गंध, स्पर्श, समानता, अनुभव और सामाजिक परिस्थिति से लगातार बदलता रहता है।

और यदि पूछा जाए कि यह प्यार या आकर्षण दिमाग में कहाँ रहता है? तो जवाब है: किसी एक जगह नहीं। शुरुआती आकर्षण और रोमांटिक प्रेरणा में वेंट्रल टेगमेंटल एरिया, कॉडेट और दूसरे डोपामिन-समृद्ध पुरस्कार तंत्र महत्वपूर्ण हैं; लगाव में वेंट्रल स्ट्रायटम, न्यूक्लियस अकम्बेंस तथा ऑक्सीटोसिन-वैसोप्रेसिन से जुड़े तंत्र भूमिका निभाते हैं। जबकि स्मृति, भाव, शरीर की अनुभूति और सामाजिक निर्णय के लिए हिप्पोकैम्पस, अमिग्डाला, इंसुला और मस्तिष्क के अग्र भाग सहित व्यापक तंत्र जुड़े रहते हैं।

इसलिए प्रेम को केवल ‘दिल की बात’ कहना काव्यात्मक रूप से सुंदर है, और केवल ‘डोपामिन का खेल’ कहना वैज्ञानिक रूप से बहुत छोटा। आकर्षण वास्तव में मस्तिष्क का एक विशाल समन्वित निर्णय है। यह व्यक्ति मेरे लिए दूसरों से अलग है। जब यह निर्णय पुरस्कार, स्मृति और लगाव से बार-बार मजबूत होता जाता है, तब एक चेहरा करोड़ों चेहरों में से निकलकर हमारे लिए ‘वह खास व्यक्ति’ बन जाता है।

Yogesh Mishra
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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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