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Baptism Explained: बपतिस्मा क्या होता है? ईसाई धर्म में क्यों है इसका इतना बड़ा धार्मिक महत्व?
Baptism Explained in Hindi: बपतिस्मा क्या होता है और ईसाई धर्म में इसका इतना महत्व क्यों है? जानिए बपतिस्मा की शुरुआत, यीशु मसीह के बपतिस्मा, जल के धार्मिक महत्व और अलग-अलग ईसाई संप्रदायों की मान्यताओं के बारे में।
Baptism Explained in Hindi
Baptism Explained in Hindi: बपतिस्मा ईसाई धर्म का एक अत्यंत महत्वपूर्ण धार्मिक संस्कार है, जिसमें किसी व्यक्ति पर जल डाला जाता है, उसे जल में डुबोया जाता है या उसके सिर पर जल छिड़का जाता है। इसका मूल अर्थ है—ईसाई विश्वास में प्रवेश, पुराने पापमय जीवन से शुद्धि और ईश्वर के प्रति एक नए आध्यात्मिक जीवन की शुरुआत। अंग्रेज़ी में इसे Baptism कहा जाता है। अलग-अलग ईसाई संप्रदायों में इसकी विधि और धार्मिक व्याख्या कुछ अलग हो सकती है।
बपतिस्मा शब्द कहाँ से आया?
‘बपतिस्मा’ का मूल यूनानी शब्द Baptizein है, जिसका सामान्य अर्थ है—डुबोना, जल में निमज्जित करना या धोकर शुद्ध करना। ईसाई परंपरा में इसका सबसे प्रसिद्ध प्रारंभिक प्रसंग यीशु मसीह के बपतिस्मा से जुड़ा है। बाइबिल के अनुसार, यीशु ने लगभग तीस वर्ष की आयु में यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले—John the Baptist—से जॉर्डन नदी में बपतिस्मा लिया था। ईसाई मान्यता के अनुसार यीशु के जल से बाहर आने पर पवित्र आत्मा कबूतर के समान उन पर उतरा और स्वर्ग से ईश्वर की वाणी सुनाई दी। इसी घटना ने ईसाई परंपरा में बपतिस्मा को विशेष आध्यात्मिक महत्व प्रदान किया।
बपतिस्मा में वास्तव में किया क्या जाता है?
इसकी विधि सभी चर्चों में समान नहीं है। कैथोलिक चर्च में सामान्यतः शिशु या व्यक्ति के सिर पर पवित्र जल डाला जाता है और पिता, पुत्र तथा पवित्र आत्मा के नाम पर बपतिस्मा दिया जाता है। पूर्वी रूढ़िवादी चर्च में प्रायः बच्चे को तीन बार जल में डुबोने की परंपरा है। कई प्रोटेस्टेंट और बैपटिस्ट चर्चों में व्यक्ति को पूरी तरह पानी में डुबोकर बाहर निकाला जाता है। पूरी तरह पानी में डुबोने की एक प्रतीकात्मक व्याख्या भी है—जल में जाना पुराने जीवन की मृत्यु और जल से बाहर निकलना मसीह के साथ नए जीवन में प्रवेश का प्रतीक माना जाता है।
क्या बपतिस्मा लेने से व्यक्ति ईसाई बन जाता है?
यह प्रश्न थोड़ा जटिल है, क्योंकि विभिन्न ईसाई संप्रदाय इसका अलग उत्तर देते हैं। कैथोलिक, रूढ़िवादी और अनेक प्रोटेस्टेंट परंपराओं में बपतिस्मा को ईसाई जीवन में प्रवेश का मूल संस्कार माना जाता है। लेकिन कुछ प्रोटेस्टेंट संप्रदाय मानते हैं कि केवल बपतिस्मा पर्याप्त नहीं। यीशु मसीह में व्यक्तिगत विश्वास और उन्हें उद्धारकर्ता के रूप में स्वीकार करना केंद्रीय बात है और बपतिस्मा उस विश्वास की सार्वजनिक अभिव्यक्ति है। इसी मतभेद से एक महत्वपूर्ण प्रश्न पैदा होता है—बपतिस्मा बच्चे को दिया जाए या केवल उस व्यक्ति को जो स्वयं समझ-बूझकर विश्वास स्वीकार कर सके?
कैथोलिक, रूढ़िवादी, एंग्लिकन और कई अन्य परंपराओं में शिशु-बपतिस्मा प्रचलित है। माता-पिता और धर्म-अभिभावक बच्चे की ओर से धार्मिक जिम्मेदारी स्वीकार करते हैं। इसके विपरीत बैपटिस्ट और कई इवेंजेलिकल समुदायों में सामान्यतः विश्वासी-बपतिस्मा दिया जाता है—अर्थात व्यक्ति पहले स्वयं ईसाई विश्वास स्वीकार करता है और उसके बाद बपतिस्मा लेता है।
बपतिस्मा और पाप का संबंध
ईसाई धर्मशास्त्र में इसका एक गहरा अर्थ पाप से मुक्ति और आध्यात्मिक शुद्धि से जुड़ा है। विशेषकर कैथोलिक परंपरा में माना जाता है कि बपतिस्मा व्यक्ति को मूल पाप—Original Sin—से मुक्त करता है और उसे ईसाई समुदाय का सदस्य बनाता है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि बपतिस्मा लेने के बाद व्यक्ति भविष्य में पाप नहीं कर सकता। इसका धार्मिक अर्थ पुराने पापमय अस्तित्व से मुक्ति और ईश्वर के साथ नए संबंध की शुरुआत है।
यीशु ने स्वयं बपतिस्मा क्यों लिया, यदि वे निष्पाप माने जाते हैं?
यह ईसाई धर्मशास्त्र का बहुत दिलचस्प प्रश्न है। यदि बपतिस्मा पापों के पश्चाताप और शुद्धि से संबंधित था और यीशु को ईसाई धर्म निष्पाप मानता है, तो उन्हें बपतिस्मा लेने की आवश्यकता क्यों पड़ी? ईसाई व्याख्या के अनुसार यीशु ने अपने पापों की क्षमा के लिए बपतिस्मा नहीं लिया। उनका बपतिस्मा मानवता के साथ उनकी एकात्मता, ईश्वर की इच्छा के प्रति समर्पण और उनके सार्वजनिक धार्मिक कार्य की शुरुआत का संकेत था। इसी कारण यीशु का बपतिस्मा ईसाई इतिहास की प्रमुख घटनाओं में गिना जाता है।
इस प्रकार बपतिस्मा को केवल पानी डालने की धार्मिक रस्म समझना अधूरा होगा। इसके भीतर तीन बड़े विचार समाए हैं—शुद्धि, पुराने जीवन का अंत और नए आध्यात्मिक जीवन का आरंभ। इसी वजह से लगभग दो हजार वर्षों से ईसाई धर्म की विभिन्न परंपराओं में रूप अलग होने के बावजूद बपतिस्मा केंद्रीय संस्कार बना हुआ है।


