TRENDING TAGS :
Newstrack Special: कोकीन कभी दवा थी? चिकित्सा इतिहास में नशे वाली चीजों का अजीब इस्तेमाल
Cocaine Medical History Explained: कोकीन, हेरोइन, अफीम और मेथामफेटामीन कभी चिकित्सा में इस्तेमाल होते थे। जानिए नशीले पदार्थों के इस अजीब चिकित्सा इतिहास और इससे मिली बड़ी सीख के बारे में।
Cocaine Medical History Explained
Cocaine Medical History Explained: आज कोकीन का नाम सुनते ही दिमाग में सीधे एक खतरनाक, प्रतिबंधित नशीले पदार्थ की छवि उभरती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि करीब सौ साल पहले यही कोकीन डॉक्टरों की दवा की पेटी का हिस्सा हुआ करती थी। इसे खांसी की दवाई से लेकर आंखों के ऑपरेशन तक में इस्तेमाल किया जाता था, और यहां तक कि एक मशहूर सॉफ्ट ड्रिंक की शुरुआती रेसिपी में भी यह शामिल थी? यह अकेली कहानी नहीं है। चिकित्सा इतिहास में हेरोइन, अफीम, मेथामफेटामीन जैसी कई चीज़ें कभी बाकायदा दवा के तौर पर बेची और सुझाई जाती रही हैं।
कोकीन दवा के तौर पर कैसे इस्तेमाल हुई
उन्नीसवीं सदी के आखिरी दशकों में कोकीन को यूरोप और अमेरिका में एक "चमत्कारी" पदार्थ की तरह देखा जाने लगा था। इसकी शुरुआत तब हुई जब वैज्ञानिकों ने कोका के पौधे से इस सक्रिय रसायन को अलग करना सीखा, जिसे दक्षिण अमेरिका के मूल निवासी सदियों से कोका के पत्तों को चबाकर इस्तेमाल करते आए थे, ताकि थकान कम हो और ऊंचाई पर सांस लेने में आसानी हो।
मशहूर मनोवैज्ञानिक सिगमंड फ्रॉयड ने अपने करियर के शुरुआती सालों में कोकीन पर गहराई से शोध किया और इसे अवसाद, थकान और यहां तक कि मॉर्फीन की लत छुड़ाने के इलाज के तौर पर सुझाया। उन्होंने इस पर एक पूरा लेख भी लिखा, जिसमें इसे एक बेहद उपयोगी और सुरक्षित पदार्थ बताया गया था। उस दौर में यह समझ बेहद सीमित थी कि कोकीन खुद कितनी गहरी लत पैदा कर सकती है, इसलिए इसे बड़े भरोसे के साथ चिकित्सा जगत में अपनाया गया।
कान-नाक-गले और आंखों की सर्जरी में इस्तेमाल
कोकीन के चिकित्सा इस्तेमाल की एक बेहद अहम और आज भी प्रासंगिक कहानी है इसका "लोकल एनेस्थीसिया" यानी स्थानीय सुन्नता पैदा करने वाली दवा के तौर पर इस्तेमाल। उन्नीसवीं सदी के अंत में डॉक्टरों ने पाया कि कोकीन को आंख, नाक या गले जैसे संवेदनशील हिस्सों पर लगाने से वह हिस्सा अस्थायी रूप से सुन्न हो जाता है, जिससे बिना मरीज को पूरी तरह बेहोश किए छोटी सर्जरी की जा सकती है।
यह खोज उस दौर की चिकित्सा के लिए बेहद क्रांतिकारी थी, क्योंकि इससे पहले ऐसी सर्जरी या तो बेहद दर्दनाक होती थी, या फिर मरीज को पूरी तरह बेहोश करने के जोखिम भरे तरीकों पर निर्भर रहना पड़ता था। आंखों की सर्जरी में कोकीन के इस्तेमाल ने इस क्षेत्र में बड़ी प्रगति को जन्म दिया, और यही खोज आगे चलकर आधुनिक लोकल एनेस्थीसिया तकनीकों की नींव बनी। दिलचस्प बात यह है कि आज भी चिकित्सा जगत में कोकीन का एक बेहद सीमित और सख्त निगरानी में रखा गया वैध इस्तेमाल मौजूद है, खासकर नाक और गले की कुछ खास सर्जरी में, जहां इसके सुन्न करने वाले गुण के साथ-साथ खून बहाव कम करने की क्षमता को भी बेहद उपयोगी माना जाता है।
एक मशहूर सॉफ्ट ड्रिंक की शुरुआती कहानी
कोकीन से जुड़ी सबसे मशहूर और अक्सर चर्चा में रहने वाली कहानी है एक बेहद लोकप्रिय सॉफ्ट ड्रिंक की शुरुआत। उन्नीसवीं सदी के आखिर में अमेरिका में बनी इस ड्रिंक की शुरुआती रेसिपी में कोका के पत्तों का सत निकालकर इस्तेमाल किया जाता था, जिसमें कोकीन की मामूली मात्रा मौजूद रहती थी। इसे उस दौर के आम फार्मेसी टॉनिक की तरह बेचा जाता था, जिसका दावा था कि यह थकान दूर करता है और दिमाग को तरोताज़ा रखता है।
जैसे-जैसे बीसवीं सदी की शुरुआत में कोकीन के खतरों को लेकर जागरूकता बढ़ी, इस कंपनी ने भी अपनी रेसिपी बदल दी और कोकीन को पूरी तरह हटा दिया, हालांकि कोका के पत्तों का इस्तेमाल आज भी एक खास, कोकीन-रहित तरीके से स्वाद के लिए किया जाता है। यह कहानी बताती है कि उस दौर में कोकीन को कितनी आम और बेधड़क तरीके से रोजमर्रा के उत्पादों में शामिल किया जाता था, बिना इसके नशे की लत वाले खतरों को पूरी तरह समझे।
हेरोइन: खांसी की दवा के तौर पर बेची गई
कोकीन अकेली ऐसी चीज़ नहीं थी। शायद इतिहास की सबसे चौंकाने वाली कहानियों में से एक है हेरोइन की। उन्नीसवीं सदी के अंत में जर्मनी की एक बड़ी दवा कंपनी ने हेरोइन को एक ऐसी दवा के तौर पर बाज़ार में उतारा, जिसे मॉर्फीन का "सुरक्षित और गैर-नशीला" विकल्प बताया गया। उस दौर में मॉर्फीन की लत एक बड़ी चिकित्सा समस्या बन चुकी थी, और कंपनी ने दावा किया कि हेरोइन बिना लत लगाए खांसी, दर्द और यहां तक कि मॉर्फीन की लत को ठीक करने में मदद कर सकती है।
यह दवा बाकायदा खांसी की सिरप के तौर पर, बच्चों तक के लिए बेची जाती थी, बिना यह जाने कि यह असल में मॉर्फीन से भी कहीं ज्यादा तेज़ी से और गहराई से लत पैदा करती है। कुछ ही सालों में इसके भयानक नशे की लत वाले असर सामने आने लगे, और आखिरकार बीसवीं सदी की शुरुआत में इसे चिकित्सा इस्तेमाल से पूरी तरह हटा दिया गया और सख्ती से प्रतिबंधित कर दिया गया। यह कहानी आज भी दवा उद्योग के लिए एक बड़ी सीख के तौर पर याद की जाती है, कि किसी नई दवा को बाज़ार में उतारने से पहले उसके दीर्घकालिक असर की गहराई से जांच कितनी जरूरी है।
अफीम और लॉडेनम: सब कुछ ठीक करने वाली दवा
उन्नीसवीं सदी के ब्रिटेन और अमेरिका में अफीम आधारित दवाएं बेहद आम थीं, खासकर लॉडेनम नाम की एक तरल दवा, जो अफीम को शराब में घोलकर बनाई जाती थी। यह इतनी आसानी से उपलब्ध थी कि इसे बिना किसी नुस्खे के, आम दुकानों से खरीदा जा सकता था, और इसे दर्द, खांसी, बेचैनी, अनिद्रा, यहां तक कि रोते हुए शिशुओं को शांत करने के लिए भी दिया जाता था।
उस दौर में यह आम सोच थी कि अफीम आधारित दवाएं हर तरह की तकलीफ का इलाज कर सकती हैं, और चूंकि नशे की लत के विज्ञान को उस वक्त ठीक से समझा ही नहीं गया था, इसलिए लाखों लोग, जिनमें कई महिलाएं और यहां तक कि बच्चे भी शामिल थे, अनजाने में ही इसकी गहरी लत में फंसते चले गए। यह इतिहास आज की ओपिओइड यानी अफीम-आधारित दर्द निवारक दवाओं से जुड़ी समस्याओं को समझने के लिए भी एक अहम संदर्भ माना जाता है, क्योंकि इतिहास खुद को अलग-अलग रूपों में दोहराता आया है।
मेथामफेटामीन: सैनिकों को जगाए रखने वाली गोली
बीसवीं सदी के मध्य में, खासकर दूसरे विश्व युद्ध के दौरान, मेथामफेटामीन नाम की एक उत्तेजक दवा का इस्तेमाल कई देशों की सेनाओं में बड़े पैमाने पर किया गया। इसे सैनिकों को थकान दूर रखने, लंबे समय तक जागते रहने और युद्ध के मैदान में सतर्क बने रहने के लिए बाकायदा दिया जाता था। जर्मनी में इसे एक बेहद लोकप्रिय ब्रांड नाम से बेचा जाता था, और यह सिर्फ सेना तक सीमित नहीं थी, बल्कि आम नागरिकों के बीच भी थकान दूर करने वाली गोली के तौर पर मशहूर हो गई थी।
युद्ध खत्म होने के बाद जैसे-जैसे इस दवा के गंभीर मानसिक और शारीरिक दुष्प्रभाव सामने आने लगे, इसे धीरे-धीरे चिकित्सा इस्तेमाल से हटाया गया और आगे चलकर इसे सख्त नियंत्रण में ला दिया गया। आज मेथामफेटामीन दुनिया के सबसे खतरनाक और गहरी लत वाले नशीले पदार्थों में गिनी जाती है, पर इसका एक बेहद सीमित और नियंत्रित चिकित्सा इस्तेमाल आज भी कुछ खास परिस्थितियों में मौजूद है।
भांग और मारिजुआना: सदियों पुराना चिकित्सा इस्तेमाल
भांग या मारिजुआना का चिकित्सा इस्तेमाल किसी एक सदी तक सीमित नहीं, बल्कि यह हज़ारों साल पुराना है। प्राचीन भारत, चीन और मध्य पूर्व की चिकित्सा परंपराओं में इसका इस्तेमाल दर्द कम करने, भूख बढ़ाने और कई तरह की बीमारियों में राहत देने के लिए किया जाता रहा है। उन्नीसवीं सदी के पश्चिमी चिकित्सा जगत में भी इसे कई तरह की दवाओं में शामिल किया गया, और यह उस दौर की मान्यता प्राप्त फार्मेसी सूचियों का हिस्सा भी रही।
बीसवीं सदी में जैसे-जैसे नशीली दवाओं को लेकर सख्त कानून बनने लगे, भांग को भी ज्यादातर देशों में प्रतिबंधित कर दिया गया। पर हाल के दशकों में वैज्ञानिक शोध ने इसके कुछ खास चिकित्सा गुणों को फिर से मान्यता दी है, और आज दुनिया के कई हिस्सों में इसका एक नियंत्रित और डॉक्टर की निगरानी में चिकित्सा इस्तेमाल फिर से वैध किया जाने लगा है, खासकर पुराने दर्द और कुछ खास तंत्रिका संबंधी बीमारियों में।
एलएसडी: मनोविज्ञान के शोध में इस्तेमाल
बीसवीं सदी के मध्य में एलएसडी नाम का एक शक्तिशाली मतिभ्रम पैदा करने वाला पदार्थ खोजा गया, और शुरुआती दशकों में इसे मनोचिकित्सा के क्षेत्र में एक संभावित उपयोगी उपकरण के तौर पर देखा गया। कई मनोचिकित्सक इसे गंभीर चिंता, अवसाद और शराब की लत जैसी समस्याओं के इलाज में मददगार मानते थे, और इस पर कई वैज्ञानिक अध्ययन भी हुए।
हालांकि जैसे-जैसे यह पदार्थ चिकित्सा दायरे से बाहर निकलकर आम समाज में मनोरंजन के लिए इस्तेमाल होने लगा, और इसके साथ कई सामाजिक और मानसिक समस्याएं जुड़ने लगीं, तो सरकारों ने इसे सख्ती से प्रतिबंधित कर दिया, जिससे इस पर होने वाला वैज्ञानिक शोध भी दशकों के लिए लगभग रुक गया। दिलचस्प बात यह है कि हाल के वर्षों में दुनिया भर के कई शोध संस्थान एक बार फिर इस तरह के पदार्थों पर नियंत्रित वैज्ञानिक अध्ययन शुरू कर रहे हैं, यह समझने के लिए कि क्या इनका सही और सीमित इस्तेमाल वाकई कुछ गंभीर मानसिक बीमारियों में मददगार हो सकता है।
आखिर यह सब क्यों हुआ
इन सारी कहानियों में एक समान धागा दिखाई देता है। उन्नीसवीं और बीसवीं सदी के शुरुआती दशकों में चिकित्सा विज्ञान आज जितना विकसित नहीं था, और नशे की लत के पीछे के जैविक और मानसिक विज्ञान को ठीक से समझा ही नहीं गया था। उस दौर में किसी नई दवा को बाज़ार में उतारने के लिए आज जैसी सख्त और लंबी जांच प्रक्रिया भी मौजूद नहीं थी। ज्यादातर मामलों में कंपनियां और डॉक्टर किसी पदार्थ के तुरंत दिखने वाले फायदे को देखकर उसे अपना लेते थे, बिना यह समझे कि लंबे समय में इसका क्या असर होगा।
इसके अलावा उस दौर के व्यावसायिक हित भी इसमें एक बड़ी भूमिका निभाते थे। कोई भी नई और असरदार दिखने वाली दवा बेहद तेज़ी से लोकप्रिय हो सकती थी, और कंपनियां इसे बाज़ार में उतारने की जल्दबाजी में उसके खतरों को नजरअंदाज़ कर देती थीं, या फिर उस वक्त इन खतरों की पूरी जानकारी वैज्ञानिक रूप से मौजूद ही नहीं होती थी।
आज हम क्या सीख सकते हैं
यह पूरा इतिहास आज हमें एक बेहद अहम सबक देता है कि किसी भी नई दवा या पदार्थ को अपनाने से पहले उसके दीर्घकालिक असर को गहराई से समझना कितना जरूरी है। आज दवाओं की मंजूरी के लिए कहीं ज्यादा सख्त, लंबी और वैज्ञानिक प्रक्रिया अपनाई जाती है, जिसमें सालों तक अध्ययन और परीक्षण किए जाते हैं, इससे पहले कि कोई दवा आम लोगों तक पहुंचे। यह सख्ती इसी पुराने इतिहास से मिली सीख का नतीजा है।
साथ ही यह इतिहास हमें यह भी सिखाता है कि "प्राकृतिक" या "पौधे से बना" होना अपने आप में सुरक्षित होने की गारंटी नहीं है, क्योंकि कोकीन, अफीम और भांग, यह सब भी प्राकृतिक पौधों से ही निकलती हैं। असली सवाल हमेशा यह होना चाहिए कि किसी पदार्थ का वैज्ञानिक रूप से सिद्ध असर क्या है, इसे किस मात्रा और किस निगरानी में इस्तेमाल किया जा रहा है, और इसके दीर्घकालिक खतरे क्या हो सकते हैं।
आज दवाओं को लेकर इतनी सतर्कता और वैज्ञानिक जांच-पड़ताल की जाती है, ताकि इतिहास की यह गलतियां दोबारा न दोहराई जाएं, और भविष्य में कोई भी नया पदार्थ बाज़ार में आने से पहले पूरी तरह जांचा-परखा जाए।


