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Earth's Temperature: धरती के अंदर इतनी गर्मी आती कहाँ से है? जानिए अरबों साल पुराने रहस्य का विज्ञान
Earth's Core Temperature: धरती के केंद्र का तापमान 5,000 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा क्यों है? जानिए पृथ्वी की बची हुई जन्म की गर्मी, रेडियोधर्मी क्षय, पिघले कोर और भूतापीय ऊर्जा का पूरा विज्ञान।
Earth's Core Temperature Why Is Earth Hot Inside | Earth Internal Heat Sources | Newstrack Hindi
Earth's Core Temperature: 1970 में सोवियत संघ के रूस वाले इलाक़े में कोला प्रायद्वीप पर वैज्ञानिकों ने ज़मीन में एक गड्ढा खोदना शुरू किया। मक़सद था धरती के भीतर झाँकना। लगभग दो दशक की खुदाई के बाद गड्ढा करीब 12 किलोमीटर गहरा हो गया, जो आज भी इंसान की खोदी सबसे गहरी जगह मानी जाती है। पर वहाँ वैज्ञानिकों को हैरानी हुई। अनुमान था कि तापमान लगभग 100 डिग्री सेल्सियस के आसपास होगा, लेकिन असल में वह करीब 180 डिग्री निकला। गर्मी इतनी थी कि उपकरण और ड्रिल पिघलने-गलने लगे और 1992 में काम रोकना पड़ा।
12 किलोमीटर सुनने में बहुत लगता है, पर धरती की त्रिज्या करीब 6,371 किलोमीटर है। यानी हम उसकी सतह को खरोंच भर पाए हैं, और वहीं हालत इतनी गरम थी। केंद्र तक पहुँचते-पहुँचते तापमान लगभग 5,000 से 6,000 डिग्री सेल्सियस के आसपास पहुँचने का अनुमान है, जो सूरज की सतह के तापमान के बराबर है। सवाल सीधा है कि यह गर्मी आती कहाँ से है, और इतने अरब सालों में ख़त्म क्यों नहीं हुई?
दो मुख्य स्रोत
जवाब मोटे तौर पर दो हिस्सों में बँटा है: जन्म के समय की बची हुई गर्मी, और भीतर लगातार हो रहा रेडियोधर्मी क्षय। आज के अनुमानों के हिसाब से धरती से बाहर निकलने वाली कुल गर्मी, जो लगभग 47 टेरावॉट (यानी 47 लाख करोड़ वॉट) है, का क़रीब आधा रेडियोधर्मिता से और बाकी आदिम गर्मी से आता है। यह अनुपात पक्का नहीं है और वैज्ञानिक अब भी इसे सटीक करने में लगे हैं। तुलना के लिए, पूरी मानव सभ्यता की कुल ऊर्जा खपत इसके आधे से कुछ ही ज़्यादा है, यानी धरती का भीतर का "हीटर" हमारी पूरी ऊर्जा ज़रूरत से कई गुना बड़ा है।
पहला स्रोत: जन्म की गर्मी
करीब 4.5 अरब साल पहले हमारा सौरमंडल गैस और धूल के एक घूमते बादल से बना। धूल के कण आपस में चिपके, छोटे पिंड बने, फिर पिंड मिलकर बड़े हुए। इस प्रक्रिया को "एक्रीशन" कहते हैं। जब कोई चीज़ तेज़ी से किसी दूसरी चीज़ से टकराती है, तो उसकी गति की ऊर्जा गर्मी में बदल जाती है। अब सोचिए कि धरती ने अपना आकार इसी तरह अनगिनत टक्करों से पाया। हर टक्कर ने गर्मी जोड़ी।
सबसे बड़ी टक्कर शायद वह थी जिससे चाँद बना। माना जाता है कि मंगल के आकार का एक पिंड, जिसे वैज्ञानिक "थिया" कहते हैं, युवा धरती से टकराया। उस धमाके की ऊर्जा इतनी थी कि धरती का बड़ा हिस्सा पिघलकर मैग्मा का समुद्र बन गया होगा। यह चाँद के बनने का सबसे प्रचलित सिद्धांत है, हालाँकि पूरी तरह साबित नहीं हुआ।
एक और स्रोत इसी दौर में मिला, जिसे "आयरन कैटास्ट्रोफ़" यानी लोहे की तबाही कहा जाता है। जब धरती पिघली हुई थी, तो भारी लोहा और निकल डूबकर केंद्र की तरफ़ चले गए और हल्के सिलिकेट पदार्थ ऊपर तैर गए। ज़रा-सी ऊँचाई से गिरती भारी चीज़ की तरह, इस डूबने में गुरुत्वाकर्षण की ऊर्जा भी गर्मी बनकर निकली। आज का हमारा लोहे का कोर इसी प्रक्रिया का नतीजा है।
इसके अलावा, अंतरिक्ष के बादल में कुछ अल्पकालिक रेडियोधर्मी तत्व भी थे, जैसे एल्यूमिनियम-26, जो शुरुआती करोड़ों सालों में गर्मी देकर ख़त्म हो गए।
लेकिन ठंडा होने में तो समय लगेगा?
यहाँ वैज्ञानिक इतिहास का एक दिलचस्प किस्सा है। 19वीं सदी में ब्रिटेन के मशहूर भौतिकशास्त्री लॉर्ड केल्विन ने हिसाब लगाया कि अगर धरती एक पिघले गोले के रूप में शुरू हुई और धीरे-धीरे ठंडी हो रही है, तो उसकी उम्र केवल 20 से 100 मिलियन साल, यानी 2 से 10 करोड़ साल के बीच होनी चाहिए। भूविज्ञानी और डार्विन के विकास के सिद्धांत वाले जीवविज्ञानी इससे परेशान थे, क्योंकि चट्टानों और जीवों के विकास के लिए उन्हें कहीं ज़्यादा समय चाहिए था। केल्विन अपनी गणना पर अड़े रहे। उनकी भौतिकी ठोस थी, पर दो बातें उन्हें पता नहीं थीं। एक, धरती के भीतर रेडियोधर्मी गर्मी भी पैदा होती है। दो, मैंटल यानी पथरीली परत ठोस होते हुए भी बहुत धीमे से बहती है और गर्मी को ऊपर लाती रहती है।
1896 में हेनरी बेकरेल ने रेडियोधर्मिता खोजी, और 1904 में अर्नेस्ट रदरफ़ोर्ड ने एक व्याख्यान में कहा कि रेडियोधर्मी पदार्थ गर्मी भी छोड़ते हैं, जिससे केल्विन का हिसाब बदल जाता है। कहा जाता है कि उस सभा में बूढ़े केल्विन भी मौजूद थे। इसी खोज ने आगे चलकर धरती की असली उम्र, करीब 4.54 अरब साल, तक पहुँचने का रास्ता खोला।
दूसरा स्रोत: भीतर चलती परमाणुओं की धीमी भट्टी
धरती की चट्टानों में कुछ अस्थिर परमाणु होते हैं जो समय के साथ अपने आप टूटते रहते हैं और टूटते हुए ऊर्जा छोड़ते हैं। मुख्य खिलाड़ी चार हैं: यूरेनियम-238, यूरेनियम-235, थोरियम-232 और पोटैशियम-40। इनके आधे जीवन यानी हाफ़-लाइफ़ बहुत लंबे हैं। यूरेनियम-238 का करीब 4.5 अरब साल, थोरियम-232 का लगभग 14 अरब साल और पोटैशियम-40 का करीब 1.25 अरब साल। इसी वजह से ये अरबों साल बाद भी धरती को गरम रख पा रहे हैं। यूरेनियम-235 का आधा जीवन छोटा, करीब 70 करोड़ साल है, इसलिए वह पहले ज़्यादा गर्मी देता था और अब कम।
इसका मतलब यह भी है कि अतीत में धरती का यह "रेडियोधर्मी हीटर" ज़्यादा ज़ोरदार था। अनुमान है कि शुरुआती दौर में रेडियोधर्मी गर्मी आज के मुक़ाबले कई गुना ज़्यादा थी। अफ़्रीका के गैबॉन में ओक्लो नाम की जगह इसका जीवंत सबूत है, जहाँ करीब दो अरब साल पहले यूरेनियम के भंडार ने अपने आप एक प्राकृतिक परमाणु रिएक्टर की तरह लाखों साल तक काम किया। तब प्राकृतिक यूरेनियम में यूरेनियम-235 की मात्रा आज से अधिक थी, इसलिए ऐसा हो सका।
मज़ेदार बात यह कि ये रेडियोधर्मी तत्व धरती में समान रूप से नहीं बिखरे हैं। यूरेनियम, थोरियम और पोटैशियम "ग्रेनाइट प्रेमी" हैं और ज़्यादातर पपड़ी, यानी क्रस्ट, में जमा हो गए, ख़ासकर महाद्वीपों की पपड़ी में। इसलिए पपड़ी, जो धरती के कुल आयतन का बहुत छोटा हिस्सा है, कुल रेडियोधर्मी गर्मी का बड़ा हिस्सा देती है। बाकी का बड़ा हिस्सा मैंटल से आता है। कोर में कितना रेडियोधर्मी तत्व है, इस पर वैज्ञानिकों में अब भी बहस है।
"भूत-कणों" से गिनती
यह कैसे पता चलता है कि कितनी गर्मी रेडियोधर्मिता से आ रही है? एक चतुर तरीक़ा है "जियोन्यूट्रिनो", जो रेडियोधर्मी क्षय में निकलने वाले बेहद हल्के कण हैं। न्यूट्रिनो चट्टानों के आर-पार बिना रुके निकल जाते हैं, इसलिए धरती के भीतर से आने वाले ये कण हमें सीधी ख़बर देते हैं। जापान का KamLAND और इटली का Borexino जैसे विशाल भूमिगत डिटेक्टर इन्हें पकड़ते हैं। 2005 में KamLAND ने पहली बार इनकी पुष्टि की। इनसे मिले आँकड़े बताते हैं कि रेडियोधर्मिता धरती की आंतरिक गर्मी का एक बड़ा हिस्सा देती है, जो ऊपर बताए आधे के अनुमान से मेल खाता है। अभी आँकड़ों में काफ़ी अनिश्चितता बची है।
एक तीसरा छोटा स्रोत: जमता हुआ केंद्र
कोर के दो हिस्से हैं: बाहर पिघला हुआ तरल लोहा, और बिल्कुल बीच में ठोस भीतरी कोर। ठोस कोर की खोज डेनमार्क की भूकंप-विज्ञानी इंगे लेहमान ने 1936 में की थी, भूकंप की तरंगों के व्यवहार को पढ़कर। मज़े की बात यह है कि भीतरी कोर इसलिए ठोस है कि उस पर दबाव कमाल का, लगभग 3.3 से 3.6 करोड़ वायुमंडल जितना होता है। इतना दबाव लोहे को पिघलने नहीं देता, भले तापमान सैकड़ों-हज़ारों डिग्री हो।
धरती धीरे-धीरे ठंडी हो रही है, इसलिए बाहरी तरल कोर का लोहा भीतरी कोर पर जमता जा रहा है। जमने की प्रक्रिया में "गुप्त ऊष्मा" निकलती है, ठीक जैसे पानी के बर्फ़ बनने पर निकलती है। अनुमान है कि भीतरी कोर हर साल लगभग एक मिलीमीटर के आसपास बढ़ रही है। इस जमाव की गर्मी और उसके साथ हल्के तत्वों के ऊपर उठने से तरल कोर में घूमती धाराएँ चलती हैं, जो धरती का चुंबकीय क्षेत्र बनाती हैं। यानी हमारी धरती की ढाल, जो सूरज की घातक विकिरण से हमें बचाती है, इसी गर्मी की देन है।
इतना गरम, फिर भी ज़मीन पर इतनी ठंड क्यों?
अगर भीतर 5,000 डिग्री से ऊपर है, तो हम जलते क्यों नहीं? क्योंकि गर्मी का सतह तक पहुँचना बहुत धीमा सफ़र है। पथरीली चट्टानें गर्मी की बहुत ख़राब सुचालक हैं। मैंटल की गर्मी ऊपर आने में करोड़ों साल लगाती है, चट्टानों के बहुत धीमे बहने से, जिसे संवहन कहते हैं। नतीजा यह कि धरती की सतह तक आने वाली आंतरिक गर्मी की मात्रा, प्रति वर्ग मीटर, बहुत कम होती है, औसतन करीब 0.09 वॉट, जबकि सूरज से हमें हर वर्ग मीटर पर सैकड़ों वॉट मिलते हैं। हमारा मौसम इसी सूरज से चलता है, ज़मीन के भीतर की गर्मी से नहीं।
सतह के पास तापमान औसतन हर किलोमीटर की गहराई पर करीब 25 से 30 डिग्री बढ़ता है, पर यह जगह-जगह बदलता है। ज्वालामुखी, गर्म पानी के झरने और भूतापीय बिजली घर उन जगहों पर मिलते हैं जहाँ गर्मी सामान्य से ज़्यादा आसानी से ऊपर पहुँचती है, जैसे आइसलैंड, जहाँ घरों की बड़ी तादाद ज़मीन की गर्मी से ही गरम होती है।
क्या धरती कभी ठंडी हो जाएगी?
हाँ, पर बहुत-बहुत लंबे समय में। अनुमान है कि मैंटल हर एक अरब साल में कुछ सौ डिग्री से भी कम ठंडा हो रहा है, यानी बहुत धीमे। मंगल और चंद्रमा धरती से छोटे हैं, इसलिए उनके भीतर की गर्मी जल्दी बाहर निकल गई और वे लगभग निष्क्रिय हो चुके हैं। मंगल का चुंबकीय क्षेत्र अब नहीं रहा। धरती का बड़ा आकार उसकी गर्मी को थामे हुए है। अरबों साल बाद जब भीतर की भट्टी मंद पड़ेगी, तब प्लेट टेक्टोनिक्स और ज्वालामुखी भी थमेंगे, और चुंबकीय क्षेत्र कमज़ोर पड़ सकता है। पर यह वह समय है जब तक सूरज के बदलते हालात धरती की तस्वीर ख़ुद बदल चुके होंगे।
धरती के भीतर की गर्मी दो विरासतों का मेल है। एक, उस भयानक जन्म की यादें, जब टक्करों, चाँद बनाने वाले धमाके और लोहे के डूबने से उसने ऊर्जा जमा की। दूसरी, उन अस्थिर परमाणुओं की धीमी, अरबों साल चलने वाली भट्टी, जो आज भी ख़ामोशी से गर्मी बाँट रही है। साथ में कोर के जमने की छोटी, पर अहम गर्मी भी है।
इसी गर्मी से महाद्वीप खिसकते हैं, पहाड़ उठते हैं, ज्वालामुखी फूटते हैं और चुंबकीय ढाल बनी रहती है। यानी जिस धरती पर हम चैन से रहते हैं, उसका जीवन-योग्य होना उसके भीतर की इसी आग का तोहफ़ा है।


