Saraya Saraya Sugar Mill: सरैया इंडस्ट्रीज़ की पूरी कहानी, चीनी मिल से दिवालिया प्रक्रिया तक

Saraya Saraya Sugar Mill: सरैया इंडस्ट्रीज़ सरदारनगर की 1909 से अब तक की पूरी कहानी जानिए। मजिठिया परिवार, विदेशी निवेश, कर्ज, NCLT की दिवाला प्रक्रिया, ₹249.96 करोड़ के स्वीकार दावे और Swarajkranti के ₹76 करोड़ के Resolution Plan की पूरी पड़ताल।

Yogesh Mishra
Published on: 21 Aug 2026 7:35 PM IST
Gorakhpur Saraya Industries Saraya Sugar Mill insolvency
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Gorakhpur Saraya Industries Saraya Sugar Mill insolvency 

Saraya Saraya Sugar Mill: गोरखपुर के सरदारनगर की सरैया शुगर मिल/सरैया इंडस्ट्रीज़ की कहानी केवल एक चीनी मिल के बनने और बंद होने की कहानी नहीं है। इसके पीछे एक सदी से अधिक पुराना औद्योगिक इतिहास, मजिठिया परिवार की व्यावसायिक विरासत, चीनी से शराब और बिजली उत्पादन तक फैला औद्योगिक विस्तार, विदेशी पूंजी का प्रवेश, परिवार के भीतर हिस्सेदारी के विवाद, बैंकों और सरकारी विभागों का बढ़ता कर्ज, कर्मचारियों और अन्य लेनदारों के दावे, जमीन से संबंधित पुराने विवाद और अंततः दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता के तहत NCLT में पहुँची समाधान प्रक्रिया—सब एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। आज स्थिति यह है कि कंपनी औपचारिक रूप से दिवाला समाधान प्रक्रिया में है, Swarajkranti Infratech Pvt. Ltd. का समाधान प्रस्ताव उसके अधिग्रहण का प्रमुख रास्ता बना हुआ है। लेकिन NCLT, NCLAT और अन्य मंचों पर विवादों के कारण अंतिम हस्तांतरण अभी पूरा नहीं हुआ है।

शुरुआत : सरैया की औद्योगिक विरासत कितनी पुरानी है?

सरैया की औद्योगिक जड़ें वर्तमान Saraya Industries Ltd. नाम की कंपनी से बहुत पुरानी हैं। ऐतिहासिक स्रोत सरैया शुगर मिल की स्थापना को 1909 और इसके संस्थापक को सरदार बहादुर सर सुंदर सिंह मजिठिया से जोड़ते हैं। लेकिन यहाँ एक कानूनी सावधानी जरूरी है। आज NCLT में मौजूद Saraya Industries Ltd. की कॉरपोरेट पहचान 1909 की उसी कानूनी कंपनी के रूप में सीधे नहीं चली आती। समय के साथ साझेदारी, निजी कंपनी, सार्वजनिक कंपनी और बाद में कॉरपोरेट पुनर्गठन हुए। इसीलिए ‘सरैया मिल की औद्योगिक शुरुआत’ और ‘ आज की Saraya Industries Ltd. का incorporation’ दो अलग तारीखें हैं।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के 1995 के ऐतिहासिक फैसले Kiran Sandhu and Others v. Saraya Sugar Mills Ltd. and Others से इस औद्योगिक परिवार की अंदरूनी संरचना का अत्यंत महत्वपूर्ण विवरण मिलता है। अदालत के सामने रखे गए तथ्यों के अनुसार व्यवसाय मूलतः मजिठिया परिवार की साझेदारी था। 21 अगस्त, 1944 को Lady Parson Kaur—सर सुंदर सिंह मजिठिया की विधवा—और परिवार के अन्य सदस्यों, जिनमें सुरेंद्र सिंह मजिठिया, सुरजीत सिंह मजिठिया तथा कृपाल सिंह के पुत्र Gur Nihal Singh Majithia और Dilip Singh Majithia शामिल थे, के बीच साझेदारी बनी। 1956 में साझेदारी व्यवसाय को निजी लिमिटेड कंपनी में बदला गया। बाद में इसे सार्वजनिक लिमिटेड कंपनी बनाया गया। कंपनी ने आगे Saraya Distillery, Saraya Oil Works और Fairweathers जैसे परिवार के अन्य व्यवसाय भी अपने ढाँचे में लिए।

CARE Ratings के आधुनिक अभिलेख भी इसकी मूल पहचान मजिठिया परिवार द्वारा प्रवर्तित औद्योगिक समूह के रूप में करते हैं और बताते हैं कि कंपनी चीनी के अलावा देशी शराब, भारतीय निर्मित विदेशी शराब, औद्योगिक अल्कोहल और सह-उत्पादन से बिजली के कारोबार में रही। इसलिए सरैया को केवल ‘चीनी मिल’ समझना इसकी वास्तविक औद्योगिक संरचना को बहुत छोटा करके देखना होगा। अपने अच्छे दौर में यह पूर्वी उत्तर प्रदेश की एक समेकित कृषि-औद्योगिक इकाई थी—गन्ना उसकी आधारभूत कच्ची सामग्री थी, लेकिन उससे चीनी, शीरा, डिस्टिलरी और ऊर्जा तक कई आय-धाराएँ बनती थीं।

सरैया का ‘गोल्डन टाइम’

किसी आधिकारिक दस्तावेज में कंपनी के किसी निश्चित कालखंड को Golden Period नहीं कहा गया है, इसलिए इस शब्द का इस्तेमाल विश्लेषणात्मक अर्थ में करना चाहिए। उपलब्ध कॉरपोरेट और न्यायिक दस्तावेज बताते हैं कि सरैया का प्रभावशाली औद्योगिक दौर वह था जब चीनी मिल के साथ डिस्टिलरी, शराब उत्पादन, औद्योगिक अल्कोहल और बाद में बिजली उत्पादन का कारोबार सक्रिय था तथा कंपनी बड़े संस्थागत ऋण और विदेशी निवेश आकर्षित करने की स्थिति में थी। 2000 के दशक के मध्य तक कंपनी ऐसी अवस्था में थी कि विदेशी निजी पूंजी निवेशक उसमें 26 प्रतिशत हिस्सेदारी लेने को तैयार था और कंपनी के शेयर बाजार में सूचीबद्ध होने की बाकायदा योजना बनाई गई थी। यह स्वयं उस समय उसकी व्यावसायिक महत्वाकांक्षा और अनुमानित मूल्य का बड़ा संकेत है।

सरदारनगर और आसपास के क्षेत्र में मिल की भूमिका केवल प्रत्यक्ष रोजगार तक सीमित नहीं थी। चीनी मिल हजारों गन्ना उत्पादक परिवारों, परिवहन, मरम्मत, छोटे व्यापार, दैनिक मजदूरी और स्थानीय बाजार से जुड़ी आर्थिक गतिविधियों का केंद्र रही। 2022 में CIRP शुरू होने के समय उपलब्ध पेशेवर अभिलेख में ही 100 कामगार और 85 कर्मचारी दर्ज थे, जबकि यह उस समय का आंकड़ा है, जब कंपनी पहले से गंभीर संकट में थी। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि पूर्ण क्षमता और अच्छे दौर में इसका स्थानीय रोजगार-प्रभाव इससे कहीं बड़ा रहा होगा। CIRP से पहले 2019-20 के उपलब्ध अंतिम वित्तीय आंकड़ों में कंपनी का कारोबार लगभग ₹44.45 करोड़ और 31 मार्च, 2020 को पुस्तकीय संपत्तियाँ लगभग ₹218.73 करोड़ दर्ज थीं।

मजिठिया परिवार और सरैया

सरैया का सबसे महत्वपूर्ण नाम मजिठिया परिवार है। परिवार के मुखिया रहे सर सुंदर सिंह मजिठिया अपने समय के प्रमुख जमींदार, सार्वजनिक जीवन के व्यक्ति और कारोबारी थे। बाद की पीढ़ियों में कंपनी के स्वामित्व और संचालन में अलग-अलग शाखाएँ आईं। 1971-72 में परिवार की संपत्तियों और व्यवसायों के बँटवारे को लेकर मध्यस्थता हुई। 21 मार्च, 1972 को परिवार ने Sardar R.S. Bindra को एकमात्र मध्यस्थ नियुक्त किया और उनका पुरस्कार जनवरी 1974 में अदालत का नियम बना। उसी के माध्यम से Saraya Distillery, Saraya Oil Mills, Saraya Engineering Works और अन्य व्यवसाय विभिन्न शाखाओं में बाँटे गए, जबकि चीनी मिल कंपनी के शेयर परिवार की शाखाओं के बीच वितरित हुए।

परिवार के अंदर यह हिस्सेदारी बाद में गंभीर विवाद का कारण भी बनी। 1995 में Kiran Sandhu तथा अन्य शेयरधारकों ने Saraya Sugar Mills Ltd. को winding up करने की मांग तक कर दी थी। याचिकाकर्ताओं के पास लगभग 35.7 प्रतिशत शेयर थे। उनका आरोप था कि परिवार की विभिन्न शाखाओं के बीच गंभीर अविश्वास और प्रबंधन गतिरोध पैदा हो चुका है। अदालत के सामने यह तक कहा गया कि बाहरी शेयरधारकों की अनुपस्थिति में कंपनी व्यवहार में एक पारिवारिक साझेदारी जैसी थी। यह मुकदमा यह दिखाता है कि सरैया के भीतर स्वामित्व संबंधी तनाव दिवालिया प्रक्रिया से कई दशक पहले से चले आ रहे थे।

आधुनिक कॉरपोरेट रिकॉर्ड में Saraya Industries Ltd. के निदेशकों में Satyajit Singh Majithia, Gurmeher Singh Majithia और Deepak Khajuria के नाम दिखाई देते हैं। कंपनी का अधिकृत शेयर पूंजी आधार लगभग ₹8.10 करोड़ और चुकता शेयर पूंजी लगभग ₹4.28 करोड़ है। हालांकि केवल वर्तमान निदेशक सूची से पूरे ऐतिहासिक स्वामित्व का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।

विदेशी निवेशक Clearwater का प्रवेश : सरैया के इतिहास का बहुत महत्वपूर्ण अध्याय

सरैया के इतिहास में सबसे उल्लेखनीय निवेशकों में Clearwater Capital Partners (Cyprus) Limited का नाम आता है। दिल्ली हाईकोर्ट के 23 फरवरी 2012 के विस्तृत फैसले से इस निवेश की ठोस जानकारी मिलती है। 11 दिसंबर, 2005 को Clearwater ने Saraya Industries के प्रवर्तक शेयरधारकों के साथ Share Subscription Agreement और Shareholders Agreement किया। उस समय छह प्रवर्तक/शेयरधारक मिलकर कंपनी की 72.5 प्रतिशत इक्विटी नियंत्रित करते थे। Clearwater को 11,13,800 शेयर जारी हुए और उसकी हिस्सेदारी कंपनी में 26 प्रतिशत हो गई। प्रबंधन का दैनिक नियंत्रण हालांकि मजिठिया प्रवर्तकों के पास ही रहा।

इस समझौते में भविष्य में कंपनी के शेयरों की IPO/Listing की परिकल्पना थी। यदि 30 जून, 2009 तक सूचीबद्धता न हो तो Clearwater को अपनी हिस्सेदारी का एक भाग निर्धारित प्रतिफल पर वापस बेचने का अधिकार दिया गया था। बाद में 22 जनवरी 2010 को समझौता बदला गया और Put Option को फिर निर्धारित किया गया। इसमें Clearwater के निवेश पर 25 प्रतिशत वार्षिक आंतरिक प्रतिफल दर आधारित निकासी व्यवस्था थी। इससे साफ है कि 2005-10 के समय कंपनी को एक विकासशील, संभावित रूप से सूचीबद्ध होने वाली औद्योगिक कंपनी के रूप में देखा जा रहा था।

लेकिन IPO नहीं हुआ और निवेशक की निकासी विवाद में बदल गई। दिसंबर, 2011 में Clearwater ने Put Option लागू करते हुए प्रवर्तकों से भुगतान माँगा और बाद में दिल्ली हाईकोर्ट पहुँचा। उसने लगभग ₹48.57 करोड़, इसके ऊपर आगे की 25 प्रतिशत IRR वाली राशि, तथा शेयरों और प्रवर्तकों की संपत्तियों पर रोक जैसी राहतें माँगीं। दूसरी ओर मजिठिया प्रवर्तकों ने Share Subscription Agreement और Put Option की वैधता को चुनौती दी और विवाद सिंगापुर अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता व्यवस्था तक पहुँचा। यानी कंपनी की वित्तीय कठिनाइयों से बहुत पहले ही एक बड़ा विदेशी निवेश और exit dispute पैदा हो चुका था।

कंपनी रजिस्ट्रार के charge records में भी Clearwater Capital Partners India से जुड़े पुराने secured charges दिखाई देते हैं—लगभग ₹5 करोड़, ₹15 करोड़ और ₹90 करोड़ तक की विभिन्न सुविधाओं/चार्जों के रिकॉर्ड मिलते हैं, जिनमें बाद में closure भी दर्ज है। ये रकम सीधे आज के NCLT claims नहीं हैं। इन्हें केवल कंपनी के ऐतिहासिक वित्तपोषण संबंधों के रूप में देखना चाहिए।

बैंक ऋण बढ़ने की कहानी

कंपनी के कॉरपोरेट charge records बताते हैं कि समय के साथ Saraya Industries ने अनेक बैंकों और वित्तीय संस्थानों से वित्त प्राप्त किया। पंजाब नेशनल बैंक के नाम 1990 के दशक से लेकर 2010 के दशक तक अनेक चार्ज दर्ज हैं। पुराने रिकॉर्ड में बैंक ऑफ बड़ौदा, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, आंध्र बैंक, आईसीआईसीआई बैंक, पिकअप, क्लीयर वाटर तथा बाद में Indian Renewable Energy Development Agency जैसी संस्थाएँ भी दिखाई देती हैं। उदाहरण के लिए 9 जनवरी, 2019 को IREDA के पक्ष में लगभग ₹51.29 करोड़ का charge दर्ज हुआ। यह ध्यान रखना जरूरी है कि charge amount और आज वास्तव में बकाया ऋण समान चीज नहीं हैं—चार्ज किसी समय उपलब्ध कराई गई या सुरक्षित की गई ऋण सीमा को दिखाता है, जबकि दिवाला प्रक्रिया में स्वीकार किया गया दावा अलग गणना से तय होता है।

संकट कितना गहरा था?

2019-20 तक उपलब्ध आंकड़ों में कंपनी की पुस्तकीय संपत्ति करीब ₹218.73 करोड़ थी। लेकिन उसी समय कारोबार केवल करीब ₹44.45 करोड़ रह गया था। कंपनी के बाद के वित्तीय आंकड़ों में नेट वर्थ में भारी गिरावट भी दर्ज हुई। ये संकेत बताते हैं कि संपत्ति का आधार होने के बावजूद संचालन से पर्याप्त आय पैदा नहीं हो रही थी और देनदारियों का दबाव बढ़ रहा था।

इसके साथ लंबे समय से बैंक ऋण, सरकारी देनदारियाँ, कर्मचारियों और आपूर्तिकर्ताओं के भुगतान, गन्ना क्षेत्र से संबंधित दावे तथा अन्य वित्तीय विवाद जुड़े रहे। स्थिति इतनी बिगड़ी कि पंजाब नेशनल ने IBC की धारा 7 के तहत Saraya Industries के विरुद्ध NCLT का दरवाजा खटखटाया। मामला CP (IB) No. 2628/(ND)/2019, Punjab National Bank v. Saraya Industries Ltd. बना और 17 मई 2022 को NCLT नई दिल्ली की पीठ ने CIRP शुरू करने की याचिका स्वीकार कर ली। इसी दिन से कंपनी विधिक अर्थ में दिवाला समाधान प्रक्रिया में चली गई। Shravan Kumar Vishnoi समाधान पेशेवर के रूप में इस प्रक्रिया से जुड़े और कंपनी के प्रबंधन पर IBC की व्यवस्था लागू हो गई।

आखिर कितना बकाया है?

यह हिस्सा अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि अलग-अलग तारीखों पर दावों की रकम बदलती रही है। इसलिए किसी एक रकम को हमेशा के लिए ‘कुल कर्ज’ कहना गलत होगा। IBBI पर उपलब्ध 10 दिसंबर, 2025 की नवीनतम विस्तृत creditors list के अनुसार कुल 31 दावे लगभग ₹289.62 करोड़ के प्राप्त हुए थे। उनमें से 16 दावों में लगभग ₹249.96 करोड़ स्वीकार किए गए थे। जबकि करीब ₹39.65 करोड़ की रकम स्वीकार नहीं की गई थी।

इनमें सबसे बड़ा हिस्सा सरकारी देनदारियों का है। दो सरकारी दावों में करीब ₹151.15 करोड़ मांगे गए, जिनमें लगभग ₹150.88 करोड़ स्वीकार किए गए। अकेले यही कुल स्वीकृत क्लेम्स का लगभग 60.36 प्रतिशत है। दूसरे बड़े वर्ग में तीन secured financial creditors के लगभग ₹94.29 करोड़ के दावे हैं और पूरी ₹94.29 करोड़ रकम स्वीकार की गई—यानी कुल स्वीकृत दावों का करीब 37.72 प्रतिशत।

Unsecured financial creditors के पाँच दावे करीब ₹10.46 करोड़ के थे।लेकिन उस सूची में केवल दो दावों के लगभग ₹25 लाख स्वीकार हुए और करीब ₹10.20 करोड़ स्वीकार नहीं किया गया। कर्मचारियों की श्रेणी में पाँच दावे करीब ₹17.46 करोड़ के थे, जिनमें उस समय लगभग ₹12.29 लाख स्वीकार थे और करीब ₹17.33 करोड़ अस्वीकृत दिखाए गए। अन्य operational creditors के 16 दावे करीब ₹16.26 करोड़ के थे, जिनमें आठ दावों के लगभग ₹4.42 करोड़ स्वीकार और करीब ₹11.84 करोड़ अस्वीकार दिखाए गए।

‘Claim not admitted’ का अर्थ हर स्थिति में यह नहीं कि संबंधित व्यक्ति का पैसा निश्चित रूप से कभी नहीं बनता।कई दावे समय-सीमा, दस्तावेज, न्यायिक विवाद अथवा सत्यापन संबंधी कारणों से अस्वीकार हुए और इनमें से कुछ पर अलग मुकदमे भी चले। उदाहरण के लिए NCLT ने जुलाई, 2025 में 49 कर्मचारियों/कामगारों की देर से दाखिल claim application पर आदेश दिया था। इन लोगों का कहना था कि वे अगस्त, 2022 तक कंपनी में काम करते रहे लेकिन दिवाला प्रक्रिया की जानकारी उन्हें बाद में हुई।

गन्ना किसानों/समितियों का मामला

सरैया के संकट में गन्ना देनदारियों का मुद्दा नया नहीं है। NCLT की पुरानी cause list में Cane Cooperative Union, Sardar Nagar v. Saraya Industries Ltd., IB-1067(PB)/2020 धारा 9 IBC के तहत दिखाई देता है। यानी PNB द्वारा शुरू कराई गई वर्तमान CIRP से पहले ही गन्ना सहकारी संस्था ने कंपनी के खिलाफ operational creditor के रूप में दिवाला कार्रवाई का रास्ता अपनाया था। 2026 में भी Co-operative Cane Development Union से संबंधित आवेदन Saraya के Resolution Plan की प्रक्रिया में दिखाई देता है। इसका अर्थ यह है कि गन्ना क्षेत्र से जुड़े दावों और प्रस्तावित समाधान योजना के बीच संबंध आज भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है।

₹35.16 करोड़ का एक और गंभीर NCLT विवाद

NCLT की 2025 की cause-list में Saraya Industries से संबंधित IA/6527/2023 भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसमें IBC की धारा 66 के तहत लगभग ₹35.16 करोड़ Corporate Debtor की संपत्तियों में वापस योगदान कराने की मांग दर्ज है। धारा 66 सामान्यतः fraudulent trading अथवा wrongful trading जैसी परिस्थितियों में इस्तेमाल होती है। केवल application लंबित होने से यह नहीं माना जा सकता कि किसी व्यक्ति ने ₹35.16 करोड़ की धोखाधड़ी सिद्ध रूप से की है। लेकिन यह जरूर बताता है कि दिवाला प्रक्रिया में पूर्व लेन-देन और प्रबंधन के कुछ पहलुओं पर गंभीर प्रश्न उठाए गए हैं।इसके अलावा IA/2862/2022 में Resolution Professional ने Satyajit Singh Majithia और अन्य से CIRP में सहयोग और जरूरी दस्तावेज उपलब्ध कराने के निर्देश मांगे थे। इसका उल्लेख बाद की NCLT cause-lists में भी मिलता है।

स्वराजक्रांति कहाँ से आई?

CIRP शुरू होने के बाद Saraya Industries के लिए संभावित समाधान आवेदकों को बुलाया गया। IBBI के रिकॉर्ड में मार्च 2023 के Expression of Interest/Resolution Process के दस्तावेज उपलब्ध हैं। अंततः दो प्रमुख Resolution Plans Committee of Creditors के सामने पहुँचे—JFC Finance (India) Ltd. और Swarajkranti Infratech Pvt. Ltd.।

11 जुलाई, 2023 की CoC बैठक में दोनों योजनाओं पर विचार हुआ और 14 जुलाई से 9 अगस्त, 2023 के बीच मतदान हुआ। JFC Finance की योजना अस्वीकार हो गई, जबकि Swarajkranti Infratech की योजना 99.96 प्रतिशत voting share से मंजूर हुई। इसके बाद Resolution Professional ने IA No. 5122/2023 के माध्यम से NCLT से धारा 30(6) और 31 के तहत अंतिम स्वीकृति मांगी।

इस योजना का resolution value लगभग ₹76 करोड़ बताया गया जबकि liquidation value करीब ₹100 करोड़ थी। बाद में लगभग ₹3.79 करोड़ के अतिरिक्त दावे स्वीकार/विचाराधीन होने और लगभग ₹14 करोड़ के अन्य claims न्यायिक विचाराधीन होने के कारण PNB ने योजना पर दोबारा बातचीत की मांग की। बैंक चाहता था कि ₹76 करोड़ की योजना को फिर CoC में भेजा जाए।

लेकिन NCLT ने 26 जुलाई 2024 को Resolution Professional का यह अनुरोध खारिज कर दिया। न्यायाधिकरण ने कहा कि जब CoC 99.96 प्रतिशत मत से योजना मंजूर कर चुकी है और योजना NCLT के सामने आ चुकी है, तब केवल इसलिए उसे पुनः मोलभाव के लिए वापस नहीं भेजा जा सकता कि resolution value liquidation value से कम है। कानून यह अनिवार्य नहीं करता कि Resolution Plan की रकम liquidation value से अधिक ही हो।

इसलिए Swarajkranti को ‘सरैया की खरीदार कंपनी’ कहना अभी तकनीकी रूप से आधा सच है। अधिक सही शब्द होगा—वह Successful Resolution Applicant है जिसकी योजना CoC से मंजूर हो चुकी है लेकिन NCLT की अंतिम स्वीकृति और संबंधित अपीलीय विवादों का समाधान अभी बाकी है।

स्वराजक्रांति की योजना पर आगे क्या हुआ?

NCLT की cause lists में Resolution Plan लगातार pending for approval दिखाई देता रहा। 2025 की सूची में साथ ही “Pending in Hon’ble NCLAT” भी दर्ज था। इसके अतिरिक्त Saraya Industries से संबंधित कार्यवाही में Swarajkranti के विरुद्ध Resolution Professional द्वारा non-compliance of Regulation 36B(4A) को लेकर IA/6090/2024 भी सूचीबद्ध हुई। यानी Successful Resolution Applicant के स्तर पर भी कुछ प्रक्रिया संबंधी विवाद पैदा हुए।

2026 में मामला समाप्त होने के बजाय और आगे बढ़ा। Saraya Industries के Resolution Plan में एक Addendum लाने की प्रक्रिया हुई और Swarajkranti से जुड़ा समाधान प्रस्ताव NCLT में सक्रिय बना रहा। इसका अर्थ यह है कि उपलब्ध अभिलेखों के अनुसार Swarajkranti सौदे से बाहर नहीं हुई है।

कर्मचारियों का NCLAT मामला

इस पूरी कहानी का एक नया और महत्वपूर्ण आयाम कर्मचारियों से जुड़ा है। 2026 में Hriday Shankar Mishra और Bansh Bahadur Singh, Authorized Representatives of Employees of Saraya Industries Limited v. Saraya Industries Ltd. through RP Shravan Kumar Vishnoi, Company Appeal (AT)(Ins.) No. 312 of 2026 NCLAT तक पहुँचा। जुलाई,2026 और अगस्त, 2026 की NCLAT सूचियों में यह मामला दर्ज दिखाई देता है। इससे यह साफ है कि कंपनी की समाधान प्रक्रिया केवल बैंकों और प्रस्तावित खरीदार के बीच का मामला नहीं है। कर्मचारी भी अपने अधिकारों और claims को लेकर अपीलीय न्यायाधिकरण तक पहुँचे हैं।

सरैया की जमीन और मजिठिया पक्ष का अलग विवाद

सरैया की जमीन से संबंधित विवाद को NCLT के Resolution Plan से अलग करके समझना बहुत जरूरी है। इलाहाबाद हाईकोर्ट में Writ-C No. 2694 of 2026, Dileep Kumar Pandey v. State of U.P. and Others में गोरखपुर सदर के नायब तहसीलदार के सामने चल रहे Computerized Case No. T2017053135031785, “Braham Gyan Singh Majithia (Deceased) v. Saraiya Sugar Mills” का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। मामला उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता की धारा 34 से संबंधित था। न्यायमूर्ति प्रकाश पाडिया ने 2 फरवरी 2026 को इस याचिका पर आदेश दिया।

इसी विवाद में Rohini Majithia पहले Writ-C No. 38989 of 2025 लेकर हाईकोर्ट गई थीं। 2 दिसंबर, 2025 के आदेश में संबंधित नायब तहसीलदार को मूल राजस्व विवाद शीघ्र और संभव हो तो तीन महीने में तय करने को कहा गया था। फरवरी , 2026 में हाईकोर्ट को बताया गया कि राजस्व मामले में 12 जनवरी, 2026 को आदेश सुरक्षित किया जा चुका था।

यह जमीन का विवाद इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अगर Saraya Industries की परिसंपत्तियों के जिन गाटा/भूखंडों को Resolution Plan में माना गया है, उनमें से किसी के स्वामित्व या नामांतरण पर अंतिम विवाद कायम रहता है तो नए समाधान आवेदक के वास्तविक नियंत्रण पर उसका व्यावहारिक प्रभाव पड़ सकता है। लेकिन उपलब्ध हाईकोर्ट आदेश को सीधे ‘Swarajkranti की खरीद रोकने का हाईकोर्ट मुकदमा’ कहना अभी उचित नहीं है।

सरैया का पुराना हाईकोर्ट मामला

इसके अलावा Saraya Sugar Mill, a unit of Saraya Industries v. Collector and 61 Others, Writ-C No. 14687 of 2018 भी इलाहाबाद हाईकोर्ट में रहा। 19 अगस्त, 2025 को न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति प्रवीण कुमार गिरि की खंडपीठ ने इसे निस्तारित किया। अदालत ने उस समय कोई जीवित cause of action दिखाई न देने और याचिकाकर्ता की अनुपस्थिति के कारण मामला समाप्त किया। हालांकि आवश्यक होने पर recall/modification का रास्ता छोड़ा। इसलिए यह मामला वर्तमान में सामान्य अर्थ में लंबित मुकदमा नहीं माना जाना चाहिए।

शराब कारोबार से जुड़े पुराने मुकदमे

Saraya Industries का डिस्टिलरी कारोबार भी कई न्यायिक मामलों में सामने आया। 2005 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के Saraya Industries Ltd. v. State of U.P. में कंपनी की सरदारनगर distillery और Indian Made Foreign Liquor उत्पादन का स्पष्ट वर्णन है। विवाद शराब की बोतलों आदि पर लगाए जाने वाले सुरक्षा होलोग्राम और उनसे जुड़ी एक्साइज ड्यूटी को लेकर था। इससे यह पुष्टि होती है कि कंपनी का डिस्टिलरी व्यवसाय उसके औद्योगिक ढाँचे का वास्तविक और महत्वपूर्ण हिस्सा था।

एक अलग पंजाब प्रकरण और बिक्रम सिंह मजिठिया का नाम

मजिठिया परिवार की राजनीतिक पहचान के कारण सरैया इंडस्ट्रीज़ का नाम हाल के एक अलग पंजाब मामले में भी आया है। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के दिसंबर 2025 के Bikram Singh Majithia v. State of Punjab आदेश में अभियोजन पक्ष ने सरैया इंडस्ट्रीज़ की शेयर होल्डिंग और कंपनी में पुराने वित्तीय लेन-देन को लेकर आरोप प्रस्तुत किए। आदेश में Bikram Singh Majithia सहित परिवार के सदस्यों तथा संबंधित entities की हिस्सेदारी का उल्लेख है। लेकिन यहाँ बहुत स्पष्ट अंतर रखना चाहिए—ये आपराधिक जांच में अभियोजन के आरोप हैं, Saraya Industries की NCLT insolvency proceeding में सिद्ध निष्कर्ष नहीं। इसलिए इन्हें कंपनी के दिवालिया होने का प्रमाणित कारण नहीं कहा जा सकता।

तो सरैया आखिर दिवालिया क्यों हुई?

उपलब्ध दस्तावेजों से किसी एक घटना को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा। ज्यादा विश्वसनीय तस्वीर यह है कि संकट कई वर्षों में बना। एक ओर कंपनी की संपत्तियाँ और पुराने औद्योगिक ढाँचे बड़े थे, दूसरी ओर कारोबार अपेक्षाकृत कमजोर होता गया। कंपनी पर संस्थागत ऋण बढ़े। सरकारी देनदारियाँ बहुत बड़ी हुईं। गन्ना और operational creditors के दावे बने। कर्मचारियों के बकाये पैदा हुए। विदेशी निवेशक का exit dispute चला। पारिवारिक हिस्सेदारी के पुराने तनाव थे। और अंततः नकदी प्रवाह बैंक ऋणों तथा अन्य देनदारियों को संभालने के लिए पर्याप्त नहीं रहा।

31 मार्च, 2020 को पुस्तकीय असेट्स लगभग ₹218.73 करोड़ और turnover केवल करीब ₹44.45 करोड़ होना इस असंतुलन का संकेत है। आज IBBI के creditors data में करीब ₹249.96 करोड़ स्वीकार किए गए क्लेम्स हैं—जो कंपनी की समस्या की व्यापकता दर्शाता है।

एक नजर में मौजूदा देनदारियाँ

दिसंबर, 2025 की IBBI सूची सबसे उपयोगी आधार देती है। लगभग ₹289.62 करोड़ claims आए; करीब ₹249.96 करोड़ स्वीकार हुए। इनमें करीब ₹150.88 करोड़ सरकारी dues, ₹94.29 करोड़ secured financial creditors, लगभग ₹25 लाख unsecured financial creditors, करीब ₹12.29 लाख स्वीकार कर्मचारी claims और करीब ₹4.42 करोड़ अन्य operational creditors के स्वीकार claims थे। यह रकम भविष्य के judicial orders और claim revisions से बदल सकती है।

यह भी याद रखना होगा कि ₹76 करोड़ का Swarajkranti Resolution Plan और ₹249.96 करोड़ admitted claims की तुलना सीधे ‘लेनदारों को केवल इतने प्रतिशत पैसा मिलेगा’ के रूप में नहीं की जा सकती, क्योंकि योजना में भुगतान की प्राथमिकता, operational creditors, secured creditors, statutory dues, going-concern value, fresh investment और अन्य शर्तें अलग होती हैं। पूरा वितरण केवल अंतिम स्वीकृत Resolution Plan देखकर ही निश्चित कहा जा सकता है।

वर्तमान कानूनी स्थिति : अगस्त 2026

आज उपलब्ध दस्तावेजों को जोड़ने पर स्थिति इस प्रकार बनती है। Saraya Industries Ltd. अभी भी CIRP के अंतर्गत है। मूल मामला Punjab National Bank v. Saraya Industries Ltd., IB-2628(ND)/2019 है। CIRP 17 मई 2022 को शुरू हुआ। Swarajkranti Infratech का Resolution Plan CoC द्वारा 99.96 प्रतिशत मत से स्वीकार हुआ और IA/5122/2023 में NCLT की मंजूरी के लिए गया। योजना करीब ₹76 करोड़ की थी जबकि liquidation value करीब ₹100 करोड़ बताई गई। NCLT ने 26 जुलाई, 2024 को plan को renegotiation के लिए वापस CoC भेजने से इनकार किया।

इस बीच कर्मचारियों, operational creditors, पूर्व प्रबंधन, सरकारी विभागों और अन्य claimants से जुड़ी अनेक IAs पैदा हुईं। एक धारा 66 आवेदन में ₹35.16 करोड़ की contribution की मांग है। कर्मचारियों का मामला NCLAT तक पहुँच चुका है। Resolution Plan स्वयं भी अपीलीय विवादों से प्रभावित हुआ और 2026 में उसके Addendum पर कार्यवाही हुई। इसलिए Swarajkranti को मिल का अंतिम, निर्विवाद मालिक अभी नहीं कहा जा सकता। सबसे सटीक स्थिति यही है कि Swarajkranti Saraya Industries के लिए सफल समाधान आवेदक है। लेकिन Resolution Plan का अंतिम न्यायिक क्रियान्वयन अभी पूर्ण नहीं हुआ है।

‘28 तारीख’ वाली सूचना पर स्थिति

हमारी पिछली जाँच में यह सामने नहीं आया कि 28 अगस्त, 2026 को इलाहाबाद हाईकोर्ट में सीधे ‘Saraya Industries की Swarajkranti को बिक्री’ वाला कोई पुष्ट मामला सूचीबद्ध है। जमीन से जुड़े Majithia–Saraiya Sugar Mills राजस्व विवाद हाईकोर्ट तक अवश्य पहुँचे हैं। लेकिन उन्हें Swarajkranti के Resolution Plan की सीधी challenge मानना अभी प्रमाणित नहीं है। यदि 28 तारीख की कोई पेशी है तो वह किसी अलग interim application, revenue proceeding, NCLT/NCLAT matter अथवा किसी अन्य जुड़े पक्ष का मामला भी हो सकता है। इसलिए बिना case number के ‘28 को बिक्री पर हाईकोर्ट फैसला होगा’ कहना अभी तथ्यात्मक रूप से सुरक्षित नहीं है।

पूरी कहानी का निष्कर्ष

सरैया की यात्रा लगभग उत्तर भारत के पुराने पारिवारिक औद्योगिक घरानों के उत्थान और संकट का एक आदर्श उदाहरण है। औद्योगिक विरासत बीसवीं सदी के शुरुआती दशक तक जाती है। मजिठिया परिवार ने इसे चीनी मिल से आगे डिस्टिलरी, शराब, औद्योगिक अल्कोहल और बिजली उत्पादन तक विस्तृत किया। कंपनी ऐसी स्थिति तक पहुँची कि विदेशी निवेशक Clearwater ने 26 प्रतिशत हिस्सेदारी ली और IPO तक की योजना बनी। लेकिन परिवार के भीतर स्वामित्व विवाद, निवेशक exit dispute, भारी संस्थागत ऋण, सरकारी बकाया, operational liabilities और कमजोर होती वित्तीय स्थिति ने धीरे-धीरे कंपनी की नींव कमजोर की।

स्थिति का सबसे चौंकाने वाला पक्ष यह है कि जिस कंपनी की 2020 में पुस्तकीय संपत्ति करीब ₹218.73 करोड़ थी, उसके दिसंबर 2025 तक स्वीकार claims करीब ₹249.96 करोड़ पहुँच गए। इसमें अकेले सरकारी विभागों के करीब ₹150.88 करोड़ और secured financial creditors के करीब ₹94.29 करोड़ स्वीकार claims हैं।

17 मई , 2022 को PNB की याचिका पर CIRP शुरू होना इस लंबे संकट का कानूनी परिणाम था। इसके बाद Swarajkranti Infratech सामने आई, उसका ₹76 करोड़ के आसपास का Resolution Plan 99.96 प्रतिशत CoC vote से मंजूर हुआ, मगर liquidation value ₹100 करोड़ होने, नए claims आने और दूसरे विवादों के कारण PNB ने योजना फिर से खोलने की कोशिश की। NCLT ने ऐसा करने से इनकार कर दिया।

आज इसलिए सरैया को ‘बिक चुकी मिल’ कहना समय से पहले होगा और ‘स्वराजक्रांति का कोई संबंध नहीं’ कहना भी पूरी तरह गलत होगा। सही तथ्य दोनों के बीच है—स्वराजक्रांति अधिग्रहण के लिए चुनी गई सफल Resolution Applicant है। उसने कानूनी प्रक्रिया में ठोस कदम उठाया है। लेकिन कंपनी का अंतिम और विवादरहित हस्तांतरण अभी न्यायिक प्रक्रिया के पूरा होने पर निर्भर है।

और इस पूरी कहानी का शायद सबसे महत्वपूर्ण अगला दस्तावेज Swarajkranti का पूरा Resolution Plan तथा 2026 का उसका Addendum है। यदि उसकी प्रति मिल जाती है तो हम बिल्कुल रुपये-दर-रुपये बता सकते हैं कि PNB/अन्य secured creditors को कितना मिलेगा, कर्मचारियों को कितना, गन्ना समिति/किसानों के लिए क्या व्यवस्था है, सरकारी ₹150 करोड़ से अधिक admitted dues का कितना भुगतान प्रस्तावित है, पुराने promoters की equity का क्या होगा, कितनी जमीन और कौन-कौन सी औद्योगिक इकाइयाँ Swarajkranti को जाएँगी तथा मिल दोबारा चलाने के लिए नया निवेश कितना प्रस्तावित है। अभी उपलब्ध सार्वजनिक रिकॉर्ड कहानी का ढाँचा बहुत स्पष्ट कर देते हैं। लेकिन इस अंतिम आर्थिक बँटवारे के लिए स्वीकृति हेतु दाखिल मूल Resolution Plan/Addendum निर्णायक दस्तावेज होगा।

Yogesh Mishra
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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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