Brain Multitasking Science: दिमाग एक साथ कितने काम कर सकता है? 'मल्टीटास्किंग' का सच क्या है?

Brain Multitasking Science: दिमाग एक साथ कितने काम कर सकता है? का जवाब आसान नहीं है। असली सवाल है कि वे काम किस प्रकार के हैं और क्या वे मस्तिष्क के समान सीमित मानसिक संसाधन मांग रहे हैं।

Yogesh Mishra
Published on: 16 Aug 2026 7:21 PM IST
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Brain Multitasking Science: हम अक्सर गर्व से कहते हैं - 'मैं एक साथ कई काम कर सकता हूँ।' कोई मोबाइल पर संदेश लिखते हुए मीटिंग सुन रहा है। कोई खाना बनाते समय फोन पर बात कर रहा है। कोई पढ़ाई के साथ संगीत सुन रहा है। कोई लैपटॉप पर रिपोर्ट बनाते-बनाते हर कुछ मिनट में ईमेल, मैसेज और सोशल मीडिया देख रहा है। बाहर से यह सब एक साथ कई काम करना लगता है। लेकिन न्यूरो साइंस की तस्वीर कुछ अलग है।

मनुष्य का दिमाग कुछ सरल या ऑटोमैटिक गतिविधियाँ समानांतर चला सकता है। लेकिन जब दो कामों को एक ही समय सचेत ध्यान, निर्णय, भाषा, वर्किंग मेमोरी या जटिल सोच चाहिए, तो दिमाग सामान्यतः दोनों पर पूरी तरह एक साथ काम नहीं करता। वह बहुत तेजी से एक काम से दूसरे काम पर जाता है। हमें यह बदलाव इतना तेज महसूस होता है कि भ्रम पैदा होता है कि दोनों काम साथ चल रहे हैं। शोध में इसे कार्य-परिवर्तन की लागत कहा जाता है। काम बदलते ही प्रतिक्रिया धीमी होती है और गलतियों की संभावना बढ़ती है।

कौन-सा काम कितनी मानसिक शक्ति माँगता है

दिमाग एक साथ कितने काम कर सकता है? का जवाब आसान नहीं है। असली सवाल है कि वे काम किस प्रकार के हैं और क्या वे मस्तिष्क के समान सीमित मानसिक संसाधन मांग रहे हैं। आप चलते हुए बातचीत कर सकते हैं। क्योंकि स्वस्थ वयस्क में चलने का बड़ा हिस्सा अत्यंत अभ्यास से ऑटोमेट हो चुका है। आप कपड़े तह करते हुए रेडियो सुन सकते हैं। अनुभवी चालक सामान्य परिस्थिति में कार चलाते हुए साथ बैठे व्यक्ति से हल्की बातचीत भी कर सकता है। लेकिन यदि अचानक भारी यातायात, बारिश और सामने कोई जटिल मोड़ आ जाए तो वही चालक अक्सर बात करना रोक देता है। मस्तिष्क ने स्वयं प्राथमिकता बदल दी। अब वाहन नियंत्रण को अधिक सचेत ध्यान चाहिए।

मनुष्य बनाम कंप्यूटर: मल्टीटास्किंग में फर्क

मनुष्य और कंप्यूटर की 'मल्टीटास्किंग' में फर्क समझना जरूरी है। कंप्यूटर कई प्रोसेस को बहुत तेजी से बाँटकर चला सकता है और आधुनिक मल्टी-कोर प्रोसेसर सचमुच कुछ गणनाएँ समानांतर भी कर सकते हैं। मनुष्य का मस्तिष्क भी असंख्य प्रक्रियाएँ समानांतर चलाता है। हृदय की धड़कन नियंत्रित हो रही है। सांस चल रही है। दृश्य संकेत संसाधित हो रहे हैं। शरीर का संतुलन बना हुआ है। आवाजें सुनी जा रही हैं। इस अर्थ में मस्तिष्क असाधारण समानांतर मशीन है। लेकिन सचेत, लक्ष्य-निर्देशित सोच की क्षमता सीमित है। योजना बनाना, निर्णय लेना, जानकारी कार्यशील स्मृति में रखना और ध्यान बदलना जैसी क्रियाएँ कार्यकारी नियंत्रण तंत्र पर निर्भर करती हैं।

कार्य-परिवर्तन क्या है

मान लीजिए आपको दो काम दिए जाएँ। पहला, 100 से उल्टी गिनती करें। दूसरा, किसी मित्र की बात ध्यान से सुनकर उसके तर्क की कमजोरियाँ खोजें। दोनों काम भाषा, कार्यशील स्मृति और सचेत नियंत्रण मांगते हैं। आप दोनों को वास्तविक गहराई से एक ही क्षण नहीं कर पाएँगे। कुछ सेकंड गिनती करेंगे। फिर मित्र की बात पर लौटेंगे। फिर संख्या कहाँ छोड़ी थी याद करेंगे। यही कार्य-परिवर्तन है।

इस परिवर्तन की कीमत होती है। कई दशकों के प्रयोगों में बार-बार पाया गया है कि जब व्यक्ति एक काम दोहराने के बजाय दूसरे काम पर स्विच करता है तो प्रतिक्रिया सामान्यतः धीमी और अधिक त्रुटिपूर्ण होती है। तैयारी का थोड़ा समय मिलने पर यह नुकसान घट सकता है, लेकिन पूरी तरह समाप्त नहीं होता।

इसे ऐसे समझिए जैसे आपके सामने दो अलग फाइलें खुली हैं। पहली पर काम करते समय मस्तिष्क ने उसके नियम सक्रिय किए हैं। किस बात पर ध्यान देना है। क्या याद रखना है। अगला कदम क्या है। अब आप अचानक दूसरी फाइल खोलते हैं। मस्तिष्क को पहली मानसिक व्यवस्था कुछ हद तक दबानी होती है। दूसरी सक्रिय करनी होती है। कुछ क्षण बाद पहली पर लौटते हैं तो फिर वही प्रक्रिया होती है। बाहर से यह केवल 'टैब बदलना' है। लेकिन भीतर मस्तिष्क को बार-बार मानसिक संदर्भ पुनः स्थापित करना पड़ता है।

बार-बार काम बदलने की मानसिक कीमत

यही कारण है कि हर पाँच मिनट में ईमेल देखने वाला व्यक्ति आठ घंटे कार्यालय में रहने के बावजूद उतना गहरा काम नहीं कर पाता जितना बिना व्यवधान के केंद्रित व्यक्ति कम समय में कर सकता है। अमेरिकी मनोवैज्ञानिक संघ ने कार्य-परिवर्तन पर पुराने प्रयोगों को समझाते हुए लिखा है कि बार-बार काम बदलने से छोटी-छोटी मानसिक रुकावटें जमा होती जाती हैं। जटिल कार्यों में ये लागत विशेष रूप से बढ़ सकती हैं।

कभी इस नुकसान के लिए 'उत्पादकता में 40 प्रतिशत तक कमी' वाली संख्या बहुत लोकप्रिय रूप से दोहराई जाती है। इसे सार्वभौमिक नियम की तरह नहीं लेना चाहिए। यह हर व्यक्ति, हर काम और हर परिस्थिति में 40 प्रतिशत नहीं होता। शोध का मजबूत निष्कर्ष संख्या से ज्यादा महत्वपूर्ण है। कार्य बदलने की कीमत होती है और काम जितने जटिल तथा असमान हों, वह कीमत उतनी अधिक हो सकती है।

संगीत सुनते हुए व्यायाम कैसे संभव है

अब सवाल आता है कि यदि मल्टीटास्किंग इतनी खराब है तो हम संगीत सुनते हुए व्यायाम कैसे कर लेते हैं? इसका कारण यह है कि सभी गतिविधियाँ समान सचेत संसाधन नहीं मांगतीं। एक काम अत्यधिक स्वचालित हो सकता है और दूसरा सचेत। नियमित पैदल चलना और परिचित संगीत सुनना अक्सर साथ चल सकते हैं। लेकिन उसी समय आपको जटिल गणित हल करने को कहा जाए तो चलने की गति तक बदल सकती है।

अनुभव इसमें बड़ी भूमिका निभाता है। जब हम कोई नया कौशल सीखते हैं तो उसे बहुत सचेत ध्यान चाहिए। नया चालक गियर बदलते समय बातचीत तक भूल सकता है। वर्षों के अभ्यास के बाद गियर बदलना लगभग स्वचालित हो जाता है। कम मानसिक नियंत्रण मांगता है। कार्यकारी कार्यों पर व्यापक समीक्षा बताती है कि अत्यधिक अभ्यास वाले कामों में ऊपर से नियंत्रित सचेत संसाधनों की जरूरत कम हो सकती है।

इसलिए कई बार जो व्यक्ति 'बेहतरीन मल्टीटास्कर' दिखाई देता है। वह वास्तव में दो कठिन काम एक साथ नहीं कर रहा होता। उसके एक या अधिक काम इतने अभ्यासयुक्त हैं कि वे बहुत कम सचेत ध्यान मांगते हैं।

भाषा से जुड़े काम एक-दूसरे से क्यों टकराते हैं

लेकिन यदि दोनों काम भाषा से जुड़े हों तो संघर्ष बढ़ जाता है। उदाहरण के लिए गीत के शब्द ध्यान से सुनते हुए गंभीर लेख लिखना कठिन होता है। कारण यह है कि दोनों भाषाई प्रसंस्करण मांगते हैं। केवल वाद्य संगीत कुछ लोगों को कम बाधित कर सकता है, जबकि परिचित गीत के शब्द बार-बार ध्यान खींच सकते हैं। व्यक्ति-व्यक्ति और काम के प्रकार के अनुसार फर्क होगा, लेकिन सामान्य सिद्धांत यही है कि समान मानसिक संसाधन मांगने वाले काम एक-दूसरे से अधिक टकराते हैं।

मोबाइल फोन ने समस्या को कैसे बढ़ाया

मोबाइल फोन ने इस समस्या को कई गुना बढ़ा दिया है क्योंकि मोबाइल केवल दूसरा काम नहीं देता, वह लगातार संभावित दूसरा काम सामने रखता है। संदेश आया, ध्यान बदला। सूचना आई, ध्यान बदला। वीडियो खुला, ध्यान बदला। फिर मूल लेख पर लौटे तो दिमाग को याद करना पड़ता है कि हम कहाँ थे और क्या सोच रहे थे। इसलिए डिजिटल मल्टीटास्किंग कई बार वास्तविक समानांतर काम से अधिक बार-बार ध्यान बदलने की आदत होती है।

मीडिया-मल्टीटास्किंग पर शोध में सामान्यतः अधिक मल्टीटास्किंग और कमजोर ध्यान नियंत्रण के बीच संबंध पाए गए हैं। लेकिन दीर्घकालिक कारण-परिणाम का प्रश्न सरल नहीं है। कुछ अध्ययनों में स्पष्ट नकारात्मक संबंध मिलता है। दूसरे में कम या मिश्रित परिणाम हैं। इसलिए यह कहना अतिरंजित होगा कि 'मोबाइल पर दो चीजें साथ करने से दिमाग स्थायी रूप से खराब हो जाता है।' अधिक उचित निष्कर्ष यह है कि भारी मीडिया-मल्टीटास्किंग तत्काल प्रदर्शन में बाधा डाल सकती है और उसके दीर्घकालिक संज्ञानात्मक प्रभावों पर शोध अभी जारी है।

कार्यशील स्मृति की भूमिका

कार्यशील स्मृति इस पूरी कहानी में महत्वपूर्ण है। यही वह सीमित मानसिक स्थान है जिसमें हम कुछ समय के लिए जानकारी सक्रिय रखते हैं। उदाहरण के लिए मन में फोन नंबर रखते हुए उसे लिखना, गणना का पिछला परिणाम याद रखना या लंबे वाक्य का शुरुआती हिस्सा याद रखकर उसका अर्थ समझना। जब दूसरा काम अचानक प्रवेश करता है तो यह सक्रिय जानकारी बाधित हो सकती है। वापस आने पर हम कहते हैं, 'मैं क्या कर रहा था?' यही वह क्षण है जिसमें कार्य बदलने की लागत हमें रोजमर्रा में सीधे दिखाई देती है।

इसलिए पढ़ाई के दौरान हर कुछ मिनट में संदेश देखने की समस्या केवल उतना समय नहीं है जितना संदेश पढ़ने में लगा। असली नुकसान यह भी है कि मूल विषय की मानसिक संरचना टूट गई। आप शरीर से किताब के सामने लौट आए, लेकिन मस्तिष्क को गहरे संदर्भ में लौटने में अतिरिक्त समय लगता है।

सतही काम बनाम गहरे काम

यह फर्क सतही और गहरे काम में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। पाँच ईमेल का जवाब देना, फाइल का नाम बदलना और दस्तावेज डाउनलोड करना जैसे छोटे कामों के बीच स्विच की लागत सीमित हो सकती है। लेकिन शोध लेख लिखना, जटिल निर्णय करना, कानूनी दस्तावेज पढ़ना, कठिन गणित करना या नई अवधारणा सीखना निरंतर मानसिक संदर्भ मांगते हैं। ऐसे कामों में व्यवधान की कीमत बहुत अधिक हो सकती है।

क्या महिलाएँ पुरुषों से बेहतर मल्टीटास्किंग करती हैं?

यह दावा बहुत व्यापक है, लेकिन वैज्ञानिक प्रमाण इसे किसी सरल नियम के रूप में स्थापित नहीं करते। कुछ अध्ययनों में छोटे लैंगिक अंतर मिलते हैं, कई में नहीं, और कार्य के प्रकार तथा प्रशिक्षण का बड़ा प्रभाव होता है। इसलिए 'महिलाओं का मस्तिष्क स्वाभाविक रूप से कई काम एक साथ करता है' और 'पुरुष केवल एक काम कर सकते हैं', दोनों मान्यताएं हैं, वैज्ञानिक निष्कर्ष नहीं।

व्यक्तिगत अंतर, प्रशिक्षण और उम्र का असर

क्या कुछ लोग सचमुच दूसरों से बेहतर कार्य बदल सकते हैं? हाँ। ध्यान नियंत्रण, कार्यशील स्मृति, अभ्यास, उम्र और परिस्थिति में व्यक्तिगत अंतर होते हैं। लेकिन 'मैं मल्टीटास्किंग में अच्छा हूँ' कहने का अर्थ यह जरूरी नहीं कि उस व्यक्ति पर कोई कार्य-परिवर्तन लागत नहीं पड़ती। प्रयोगों में सामान्य मानव पैटर्न यही है कि स्विच के बाद गति और सटीकता प्रभावित होती है।

प्रशिक्षण से कुछ सुधार हो सकता है। 2025 के एक अध्ययन में गहन कार्य-परिवर्तन अभ्यास से कुछ प्रकार की परिवर्तन लागत में सुधार देखा गया। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि अभ्यास के बाद मस्तिष्क असीम कामों को समानांतर करने लगता है। अधिक सही बात यह है कि वह विशिष्ट परिवर्तन प्रक्रिया में अधिक कुशल हो सकता है।

उम्र का असर भी है। बच्चों में कार्यकारी नियंत्रण अभी विकसित हो रहा होता है, जबकि वृद्धावस्था में कार्य-परिवर्तन की गति कम हो सकती है। 2026 के मस्तिष्क-चित्रण अध्ययन सहित वर्तमान शोध दिखाता है कि कार्य बदलने से जुड़ी संज्ञानात्मक लचक वयस्क जीवन के अलग चरणों में बदलती रहती है।

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वृद्ध व्यक्ति 'मल्टीटास्क नहीं कर सकते।' जीवन का अनुभव और अत्यधिक अभ्यास कई कामों में उनकी मदद कर सकता है। उम्र के साथ गति का कुछ पहलू घट सकता है, लेकिन ज्ञान और रणनीति उसकी कुछ भरपाई कर सकते हैं।

थकान और कार्य-परिवर्तन

थकान भी कार्य-परिवर्तन को कठिन बनाती है। जब कार्यशील स्मृति और नियंत्रण पहले से थके हुए हों तो बार-बार काम बदलना अधिक महँगा हो सकता है। प्रयोगों में लंबे समय तक काम करने से विशेष रूप से उन कार्य-परिवर्तन परिस्थितियों में असर देखा गया है जहाँ कार्यशील स्मृति की जरूरत अधिक होती है। इसीलिए रात में थका हुआ व्यक्ति फोन पर बात करते हुए जटिल काम करने में सुबह की तुलना में अधिक गलतियाँ कर सकता है। समस्या केवल नींद आना नहीं, नियंत्रण संसाधनों की गुणवत्ता भी गिर सकती है।

वाहन चलाते समय फोन: सबसे गंभीर उदाहरण

मल्टीटास्किंग का सबसे गंभीर उदाहरण वाहन चलाते समय फोन है। चालक को वाहन की गति, आसपास की दूरी, संकेत, पैदल यात्रियों और अप्रत्याशित घटनाओं पर निगरानी रखनी है। यदि उसी समय गंभीर फोन वार्ता में भाषा, कल्पना और निर्णय जुड़ जाएँ तो मस्तिष्क का ध्यान बाँटा जाता है। यह समझना जरूरी है कि केवल हाथ में फोन पकड़ना समस्या नहीं; बातचीत की संज्ञानात्मक मांग भी महत्वपूर्ण है। इसलिए हैंड्स फ्री बातचीत भी पूरी तरह 'मानसिक रूप से मुक्त' नहीं होती।

इसके विपरीत साथ बैठा यात्री कई बार चालक की स्थिति देखकर बातचीत रोक सकता है। मुश्किल मोड़ आया तो स्वयं शांत हो गया। फोन पर मौजूद व्यक्ति सड़क नहीं देख रहा, इसलिए वह बातचीत जारी रख सकता है। यही वास्तविक जीवन में दो परिस्थितियों का महत्वपूर्ण अंतर है।

सर्जरी, विमानन, परमाणु संयंत्र और अन्य उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में भी मनुष्य की इसी सीमा को ध्यान में रखकर प्रणालियाँ बनाई जाती हैं। पेशेवरों को कई सूचनाओं पर निगरानी रखनी पड़ती है, लेकिन महत्वपूर्ण क्षणों में अनावश्यक बातचीत और व्यवधान कम करना सुरक्षा संस्कृति का हिस्सा होता है। इसका कारण यही है कि मानव ध्यान अनंत नहीं है।

व्यस्त महसूस होना बनाम असल में उत्पादक होना

फिर ऐसा क्यों लगता है कि मल्टीटास्किंग करने पर हम बहुत व्यस्त और उत्पादक हैं? क्योंकि काम बदलने से लगातार नवीनता मिलती है। ईमेल का उत्तर दिया, छोटी उपलब्धि। मैसेज देखा, नई सूचना। फिर रिपोर्ट पर दो मिनट काम किया। दिमाग को गतिविधि बहुत महसूस होती है, लेकिन गतिविधि और उत्पादकता एक ही चीज नहीं हैं।

गहरे काम में लंबे समय तक परिणाम दिखाई नहीं देता। आप एक घंटे तक कठिन लेख पढ़ते हैं और केवल दो पृष्ठ नोट बनते हैं। इसके विपरीत उसी घंटे 25 ईमेल, दस संदेश और तीन छोटे काम पूरे हो सकते हैं। दूसरा अनुभव अधिक 'उत्पादक' महसूस हो सकता है, जबकि वास्तविक मूल्य आपके उद्देश्य पर निर्भर करता है।

बेहतर तरीके से काम बदलने की व्यावहारिक रणनीति

इसलिए सबसे प्रभावी तरीका हर परिस्थिति में 'केवल एक ही काम' का कठोर नियम नहीं है। सही रणनीति कामों को उनकी मानसिक मांग के अनुसार समूहित करना है। ऐसे काम जो लगभग स्वचालित हैं, उन्हें कभी-कभी जोड़ा जा सकता है—चलते हुए हल्का पॉडकास्ट, कपड़े तह करते हुए संगीत, परिचित व्यायाम के साथ बातचीत। लेकिन जो काम गहरी समझ, लेखन, निर्णय या स्मृति मांगते हैं उन्हें अकेला समय देना लाभकारी है।

एक और उपयोगी उपाय समान छोटे कामों को एक साथ करना है। हर पाँच मिनट में ईमेल खोलने के बजाय एक निश्चित समय पर कई ईमेल एक साथ देखना कार्य-परिवर्तन घटा सकता है। फोन की अनावश्यक सूचनाएँ बंद करना भी केवल समय बचाना नहीं बल्कि मानसिक संदर्भ बचाना है।

महत्वपूर्ण काम शुरू करने से पहले अगला कदम स्पष्ट करना भी मददगार होता है। यदि व्यवधान आ जाए तो लौटकर लिखी हुई एक छोटी पंक्ति—'अगला काम यह तर्क पूरा करना है'—मस्तिष्क को संदर्भ जल्दी पकड़ने में मदद कर सकती है।

ब्रेक लेना और मल्टीटास्किंग करना भी अलग बातें हैं। यदि 45 मिनट गहरा काम करके पाँच मिनट टहलते हैं तो यह जरूरी नहीं कि उत्पादकता घटा रहा हो। मस्तिष्क को आराम मिल सकता है। लेकिन उसी 45 मिनट में हर तीन मिनट पर अलग ऐप खोलना लगातार कार्य-परिवर्तन है।

यानी समस्या कामों की संख्या नहीं, ध्यान की विखंडित अवस्था है।

कुलमिलाकर, दिमाग को अधिक उत्पादक बनाने का रास्ता उसे हर क्षण पाँच काम देने में नहीं, बल्कि यह तय करने में है कि कौन-सा काम सचेत ध्यान का हकदार है और कौन-सा काम स्वचालित रूप से साथ चल सकता है। मस्तिष्क की ताकत असीम मल्टीटास्किंग में नहीं; सही समय पर सही चीज पर पूरा ध्यान लगाने और आवश्यकता पड़ने पर लचीले ढंग से ध्यान बदलने में है।

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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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