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Newstrack Special: ‘Sadist’ शब्द कहाँ से आया? Marquis de Sade की विवादित कहानी
Sadist Meaning Explained in Hindi: ‘सैडिस्ट’ शब्द का संबंध Marquis de Sade से कैसे जुड़ा? जानिए इस विवादित फ्रांसीसी लेखक, सैडिज्म शब्द की उत्पत्ति और चिकित्सा इतिहास में इसके इस्तेमाल की पूरी कहानी।
Sadist Meaning Sadist Word Origin Explained in Hindi
Sadist Meaning Explained in Hindi: ‘सैडिस्ट’ यानी दूसरे व्यक्ति को दर्द या अपमान पहुँचाकर यौन उत्तेजना पाने की प्रवृत्ति। और जो ऐसी प्रवृत्ति वाला होता है उसे कहा जाता है सैडिस्टिक। ये शब्द कितने आम हो गए हैं लेकिन ये शब्द आया कहां से, इसका एक रोचक इतिहास है। सैडिस्टिक शब्द किसी प्राचीन चिकित्सा शब्द से नहीं निकला। बल्कि यह सीधे एक आदमी के नाम से बना है - Donatien Alphonse François de Sade, जिसे दुनिया Marquis de Sade के नाम से जानती है। 18वीं सदी के इस फ्रांसीसी कुलीन, लेखक और कुख्यात व्यक्तित्व ने ऐसी रचनाएँ लिखीं जिनमें यौन इच्छा, हिंसा, अपमान, क्रूरता और सत्ता के चरम रूप बार-बार दिखाई देते थे।
बाद में मनोचिकित्सकों और यौन-विज्ञान के शुरुआती विद्वानों ने दूसरे व्यक्ति को दर्द या अपमान पहुँचाकर यौन उत्तेजना पाने की प्रवृत्ति के लिए उसी के नाम से ‘सैडिज्म’ शब्द गढ़ा। इसी से ‘सैडिस्ट’ बना। यानी ऐसा व्यक्ति जिसकी क्रूरता या दूसरे के कष्ट से मिलने वाली उत्तेजना को उस अवधारणा से जोड़ा गया।
Marquis de Sade कौन था?
लेकिन Marquis de Sade (मार्की दे साद) केवल किसी शब्दकोश का नाम नहीं था। उसका जीवन स्वयं इतना विवादित था कि वह साहित्य, अपराध, दर्शन, कामुकता और मानसिक चिकित्सा - इन सबके इतिहास में अलग-अलग रूपों में दिखाई देता है।
दे साद का जन्म 2 जून, 1740 को पेरिस में एक कुलीन परिवार में हुआ। वह उस फ्रांसीसी अभिजात वर्ग से आता था जिसके पास धन, प्रतिष्ठा और सामाजिक अधिकार थे। युवावस्था में उसने सेना में सेवा की और सात वर्षीय युद्ध में भी भाग लिया।
बाद में उसकी जिंदगी लगातार यौन घोटालों, हिंसा के आरोपों, मुकदमों, जेल और निर्वासन से जुड़ती चली गई। उसके खिलाफ वेश्याओं के साथ दुर्व्यवहार, मारपीट और दूसरे गंभीर यौन अपराधों के आरोप लगे। 1772 में एक मामले में उसे मृत्यु-दंड तक सुनाया गया, हालांकि वह उससे बच निकला। बाद में उसे गिरफ्तार किया गया और उसके जीवन का बड़ा हिस्सा अलग-अलग जेलों और अंततः मानसिक चिकित्सालय में बीता।
जेल में शुरू हुआ उसके लेखन का बड़ा दौर
यही लंबी कैद उसके लेखक बनने की कहानी का भी बड़ा हिस्सा है। वह Bastille सहित अलग-अलग कारागारों में बंद रहा और वहीं उसने बहुत-सा लेखन किया। उसकी रचनाओं में Justine, Juliette, Philosophy in the Bedroom और अत्यंत कुख्यात The 120 Days of Sodom जैसी कृतियाँ शामिल हैं।
इन पुस्तकों में केवल यौन वर्णन नहीं था। दे साद का साहित्य सत्ता, धर्म, नैतिकता, हिंसा, इच्छा और मनुष्य की क्रूरता के बारे में एक बहुत कट्टर दार्शनिक प्रयोग भी था। लेकिन उसमें ऐसे चरम यौन-अत्याचार और हिंसक प्रसंग हैं कि उसके साहित्य को केवल ‘कामुक साहित्य’ कहना भी बहुत हल्का वर्णन होगा।
उसके साहित्य में इच्छा और क्रूरता का खतरनाक मेल
दे साद की दुनिया में अक्सर ताकतवर पात्र यह तर्क देते दिखाई देते हैं कि यदि प्रकृति में हिंसा है, यदि शक्ति ही वास्तविक नियम है, तो मनुष्य को अपनी इच्छा पर नैतिक रोक क्यों लगानी चाहिए। उसके पात्र धर्म, नैतिकता और सामाजिक कानून का मजाक उड़ाते हुए अपने सुख को सर्वोच्च मानते हैं। कई बार दूसरे व्यक्ति की पीड़ा स्वयं उनके आनंद का हिस्सा बन जाती है।
यही कारण था कि बाद की पीढ़ियों को उसके नाम और ‘दूसरे को पीड़ा देकर आनंद’ की धारणा के बीच सीधा संबंध दिखाई दिया। लेकिन एक दिलचस्प ऐतिहासिक तथ्य यह है कि ‘सैडिज्म’ शब्द दे साद ने स्वयं नहीं बनाया था। वह 1814 में मर गया। उसके नाम से यह शब्द बाद में विकसित हुआ।
‘सैडिज्म’ शब्द डॉक्टरों ने कैसे बनाया?
फ्रांसीसी भाषा में sadisme शब्द 19वीं सदी के मध्य तक दिखाई देने लगा था। एक ऐतिहासिक चिकित्सा अध्ययन में 1840 के दशक में इसके उपयोग के प्रमाण मिलते हैं। लेकिन इसे आधुनिक मनोचिकित्सकीय अर्थ देने का काम मुख्य रूप से ऑस्ट्रो-जर्मन मनोचिकित्सक Richard von Krafft-Ebing ने किया।
Krafft-Ebing ने 1886 में अपनी प्रसिद्ध पुस्तक Psychopathia Sexualis प्रकाशित की। यह आधुनिक यौन-विज्ञान के शुरुआती प्रभावशाली ग्रंथों में थी। बाद के संस्करणों में उसने यौन व्यवहारों की अलग-अलग श्रेणियाँ बनाने की कोशिश की। इसी प्रक्रिया में उसने ‘sadism’ को Marquis de Sade से और ‘masochism’ को ऑस्ट्रियाई लेखक Leopold von Sacher-Masoch से जोड़ा।
दो लेखकों के नाम बन गए यौन-विज्ञान के शब्द
यहाँ एक अद्भुत भाषाई घटना हुई। दो लेखकों के उपनाम मानव यौन व्यवहार के वैज्ञानिक शब्द बन गए।
साद से 'सैडिज्म।' और साखर-मासोख से 'मासोकिज्म।'
Krafft-Ebing के लिए सैडिज्म का आशय मोटे तौर पर ऐसी यौन उत्तेजना से था जिसमें दूसरे व्यक्ति को दर्द पहुँचाना, उस पर शक्ति जमाना या उसे अपमानित करना आनंद का स्रोत बनता है। दूसरी ओर मासोकिज्म में दर्द सहना या दूसरे के नियंत्रण में होना यौन उत्तेजना से जुड़ सकता है। आधुनिक मनोविज्ञान और मनोरोग-विज्ञान ने इन अवधारणाओं को बाद में काफी बदला और अधिक सावधानी से परिभाषित किया।
आम भाषा का ‘सैडिस्ट’ और चिकित्सा का ‘सैडिज्म’ एक नहीं
यहीं एक बहुत महत्वपूर्ण फर्क समझना चाहिए। रोजमर्रा की भाषा में हम किसी बेहद निर्दयी व्यक्ति के लिए कह देते हैं कि ‘वह तो सैडिस्ट है।’ लेकिन चिकित्सकीय अर्थ और आम बोलचाल का अर्थ एक नहीं हैं। आम भाषा में ‘सैडिस्ट’ का अर्थ ऐसे व्यक्ति से हो सकता है जिसे दूसरों को परेशान करने या पीड़ा देने में आनंद आता है। यह यौन होना जरूरी नहीं। लेकिन यौन-विज्ञान में ‘सैडिज्म’ ऐतिहासिक रूप से विशेष रूप से दूसरे के दर्द, भय, अपमान या अधीनता से जुड़ी यौन उत्तेजना के अर्थ में विकसित हुआ।
और आधुनिक चिकित्सा इससे भी एक कदम आगे जाती है। सिर्फ किसी कल्पना या सहमति-आधारित व्यवहार के कारण किसी व्यक्ति को रोगी घोषित नहीं किया जाता। आज मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान यह देखता है कि क्या यह प्रवृत्ति ऐसी स्थिति बन गई है जिसमें व्यक्ति की अपनी जिंदगी गंभीर रूप से प्रभावित हो रही है या जिसमें बिना सहमति वाले व्यक्ति को नुकसान पहुँचाने की इच्छा या व्यवहार शामिल है।
इसलिए आधुनिक सहमति-आधारित यौन व्यवहार और अपराधपूर्ण हिंसा को एक ही चीज मानना गलत है।
Marquis de Sade को BDSM का सीधा मॉडल क्यों नहीं माना जा सकता?
इसीलिए दे साद के साहित्य को आधुनिक सहमति-आधारित BDSM संस्कृति का सीधा मॉडल भी नहीं माना जा सकता। आधुनिक BDSM का केंद्रीय सिद्धांत सहमति, सीमा और सुरक्षा है, जबकि दे साद की रचनाओं में जबरदस्ती, हिंसा और पीड़ा कई बार इसी सहमति के बिना चित्रित होती है। इस फर्क को समझना जरूरी है, क्योंकि केवल ‘दर्द’ या ‘नियंत्रण’ जैसे शब्द दोनों जगह मिलने से दोनों अवधारणाएँ एक जैसी नहीं हो जातीं।
दे साद इतना चरम साहित्य लिख क्यों रहा था?
अब प्रश्न यह है कि दे साद इतना चरम साहित्य लिख क्यों रहा था? इसके कई उत्तर हैं और इतिहासकारों में मतभेद भी हैं। एक स्तर पर उसका अपना जीवन यौन उच्छृंखलता और अपराध के आरोपों से भरा था। दूसरे स्तर पर उसका साहित्य 18वीं सदी के यूरोप की धार्मिक और नैतिक व्यवस्था पर हमला था। वह फ्रांसीसी प्रबोधन के उस युग में जी रहा था जिसमें चर्च, राजशाही, नैतिक कानून और मानव स्वतंत्रता पर बड़े दार्शनिक प्रश्न उठाए जा रहे थे। लेकिन दे साद इन प्रश्नों को चरम तक ले गया।
यदि मनुष्य स्वतंत्र है, तो क्या उसकी इच्छा की कोई सीमा है? यदि भगवान नहीं है, तो नैतिकता कहाँ से आएगी?
यदि प्रकृति में हिंसा है, तो हिंसा गलत क्यों है? यदि ताकतवर कमजोर पर शासन कर सकता है, तो उसे रोकने वाला कौन है? उसकी रचनाएँ इन सवालों के उत्तर अक्सर जानबूझकर भयावह तरीके से देती हैं। वह ऐसी दुनिया दिखाता है जिसमें नैतिक सीमा हटा दी गई है और मनुष्य की इच्छा का अंतिम परिणाम अत्याचार बन सकता है।
बाद के दार्शनिकों ने भी दे साद को गंभीरता से पढ़ा
यही कारण है कि बाद के दार्शनिकों ने दे साद को केवल अश्लील लेखक नहीं माना। 20वीं सदी में Simone de Beauvoir, Georges Bataille, Michel Foucault और दूसरे विचारकों ने उसके लेखन को शक्ति, नैतिकता और स्वतंत्रता की समस्या के संदर्भ में पढ़ा।
इसका अर्थ उसे स्वीकार करना नहीं था; बल्कि यह देखना था कि अगर ‘पूर्ण व्यक्तिगत स्वतंत्रता’ को दूसरे मनुष्य के अधिकार से अलग कर दिया जाए तो वह कहाँ पहुँच सकती है।
लेकिन उसके वास्तविक जीवन और उसके साहित्य के बीच फर्क भी जरूरी है। उसकी पुस्तकों में वर्णित हर अपराध को उसकी वास्तविक जिंदगी का तथ्य नहीं माना जा सकता। वह कथा-साहित्य लिख रहा था, भले उसमें उसकी विचारधारा और व्यक्तिगत प्रवृत्तियों के संकेत हों।
उसी तरह उसके खिलाफ ऐतिहासिक आरोपों में से हर कहानी समान रूप से प्रमाणित नहीं है। लेकिन इतना निश्चित है कि उसके खिलाफ वास्तविक यौन दुर्व्यवहार और हिंसा से संबंधित गंभीर कानूनी मामले थे और उसकी बार-बार कैद केवल साहित्य लिखने के कारण नहीं हुई थी।
फ्रांसीसी क्रांति में भी उलझा रहा दे साद
उसकी जिंदगी फ्रांसीसी क्रांति के बीच से भी गुजरी। 1789 में जब Bastille पर क्रांति का संकट बढ़ रहा था, दे साद वहीं कैद था। बाद में उसे दूसरे संस्थान में भेज दिया गया और क्रांति के दौरान रिहाई मिली।
कुछ समय उसने राजनीतिक गतिविधियों में भी भाग लिया। यह भी विडंबना है कि अत्यंत हिंसक साहित्य लिखने वाला दे साद वास्तविक Reign of Terror के दौरान राजनीतिक हिंसा से पूरी तरह सहज नहीं था। वह स्वयं फिर गिरफ्तार हुआ और लगभग गिलोटिन तक पहुँच गया। लेकिन बच गया।
आखिरी साल मानसिक चिकित्सालय में बीते
1801 में नेपोलियन बोनापार्ट के शासन के दौरान उसे फिर गिरफ्तार किया गया। कारण उसके अश्लील और राजनीतिक रूप से विवादास्पद लेखन से जुड़ा था।
अंततः उसे पेरिस के पास Charenton मानसिक चिकित्सालय में रखा गया, जहाँ उसने जीवन के अंतिम वर्ष बिताए और 2 दिसंबर 1814 को उसकी मृत्यु हुई।
वह मर गया। लेकिन उसका नाम जीवित रह गया और शायद उस रूप में जिससे वह स्वयं भी अनुमान नहीं लगा सकता था।
एक लेखक का उपनाम कैसे बन गया चिकित्सा का शब्द?
19वीं सदी के यौन-विज्ञान को मानवीय यौन व्यवहार के लिए नए शब्द चाहिए थे। Krafft-Ebing जैसे चिकित्सक विभिन्न व्यवहारों को वर्गीकृत कर रहे थे।
दे साद की रचनाएँ दूसरे को दर्द पहुँचाकर यौन सुख के वर्णन के लिए इतनी कुख्यात थीं कि उसका नाम एक तैयार प्रतीक बन गया। इस तरह किसी व्यक्ति का उपनाम धीरे-धीरे एक मनोवैज्ञानिक अवधारणा बन गया।
भाषा में ऐसी घटनाएँ दुर्लभ हैं। लेकिन होती हैं। किसी व्यक्ति का नाम किसी व्यवहार, वस्तु या विचार का सामान्य शब्द बन जाता है। ‘सैडिज्म’ इसका सबसे प्रसिद्ध उदाहरणों में है।
‘मासोकिज्म’ के पीछे भी छिपी है एक लेखक की कहानी
और यहाँ एक दिलचस्प साथी कहानी भी है। Leopold von Sacher-Masoch नामक ऑस्ट्रियाई लेखक ने 19वीं सदी में Venus in Furs जैसी रचनाएँ लिखीं, जिनमें अधीनता और पीड़ा से जुड़ी कामुक कल्पनाएँ थीं। Krafft-Ebing ने उसी के नाम से ‘masochism’ शब्द बनाया। Sacher-Masoch स्वयं इस बात से खुश नहीं था कि उसका नाम चिकित्सा में यौन विकृति की श्रेणी बन गया। इसलिए ‘sadomasochism’ शब्द के दोनों हिस्सों के पीछे वास्तव में दो साहित्यकारों के नाम छिपे हैं।
क्या हर ऐसी यौन कल्पना रखने वाला व्यक्ति ‘सैडिस्ट’ है?
मानव यौन कल्पनाएँ बहुत विविध होती हैं। आधुनिक मनोविज्ञान व्यवहार, कल्पना, सहमति और चिकित्सकीय विकार के बीच फर्क करता है। किसी कल्पना का होना अपने-आप बीमारी नहीं है। सहमति-आधारित व्यवहार और बिना सहमति किसी को नुकसान पहुँचाना नैतिक और चिकित्सकीय रूप से बिल्कुल अलग स्थितियाँ हैं।
इसी वजह से 19वीं सदी की Krafft-Ebing वाली भाषा को सीधे आज लागू करना उचित नहीं। उस समय जिन बहुत-सी यौन प्रवृत्तियों को ‘विकृति’ कहा जाता था, आधुनिक चिकित्सा उन्हें अलग तरीके से देखती है। यौन-विज्ञान का पूरा इतिहास इसी बदलाव से भरा है।
‘सैडिस्ट’ का अर्थ अब सिर्फ यौन नहीं रह गया
आम बोलचाल में भी ‘सैडिस्ट’ शब्द का विस्तार हो चुका है। कोई बेहद कठोर बॉस बार-बार कर्मचारियों को अपमानित करे तो लोग उसे सैडिस्ट कह सकते हैं। कोई व्यक्ति जानवर को पीड़ा देकर आनंद ले तो भी यह शब्द इस्तेमाल हो सकता है। यहाँ यौन अर्थ जरूरी नहीं रह जाता।
मनोविज्ञान में इस गैर-यौन प्रवृत्ति पर भी शोध हुआ है और कभी-कभी इसे everyday sadism, यानी रोजमर्रा की परपीड़क प्रवृत्ति कहा जाता है। दूसरे की पीड़ा, अपमान या असहायता देखकर आनंद लेने की व्यक्तित्व प्रवृत्ति।
लेकिन यह Marquis de Sade के नाम से निकले मूल यौन-विज्ञान संबंधी शब्द से विकसित व्यापक अर्थ है।
क्रूरता और सैडिस्टिक आनंद में क्या फर्क है?
सबसे महत्वपूर्ण फर्क शायद यह है कि क्रूरता में कोई व्यक्ति दूसरे को नुकसान पहुँचा सकता है। सैडिस्टिक आनंद में उस नुकसान या पीड़ा का अनुभव स्वयं उस व्यक्ति के लिए सुख या संतोष का स्रोत बन जाता है।
यही ‘दूसरे की पीड़ा’ और ‘उस पीड़ा से मिलने वाला आनंद’ का संबंध इस शब्द का केंद्रीय अर्थ बना।
और यही कारण है कि Marquis de Sade का नाम दो सौ वर्ष बाद भी भाषा में मौजूद है।
दे साद की सबसे अजीब विरासत क्या है?
वह न सबसे महान फ्रांसीसी लेखक था, न सबसे बड़ा दार्शनिक, न सबसे बड़ा अपराधी। फिर भी उसका नाम मनुष्य के व्यवहार की एक ऐसी अंधेरी संभावना से स्थायी रूप से जुड़ गया जिसमें शक्ति, यौन इच्छा और दूसरे की पीड़ा एक-दूसरे में मिल जाती हैं।
इस पूरी कहानी का सबसे असाधारण पहलू यही है—एक फ्रांसीसी कुलीन व्यक्ति ने 18वीं सदी में ऐसे चरम और हिंसक साहित्य लिखे कि लगभग एक सदी बाद डॉक्टरों को जब दूसरे की पीड़ा से यौन आनंद पाने की प्रवृत्ति के लिए शब्द चाहिए था, तो उन्होंने किसी यूनानी या लैटिन शब्द को नहीं चुना। उन्होंने उसी लेखक का नाम चिकित्सा का शब्द बना दिया।
इसलिए आज जब हम ‘सैडिस्ट’ कहते हैं तो अनजाने में 1740 में जन्मे उस फ्रांसीसी लेखक Marquis de Sade का नाम ले रहे होते हैं।
भाषा ने व्यक्ति को शब्द में बदल दिया और शायद यही उसकी सबसे विचित्र ऐतिहासिक विरासत है।


