How Internet Works: फोटो दूसरे फोन तक कैसे पहुंचती है? जाने इंटरनेट की पूरी कहानी!

How Internet Works: फोन से भेजी गई फोटो, वीडियो और ऑडियो दूसरे फोन तक कैसे पहुंचते हैं? जानिए डेटा पैकेट, मोबाइल टावर, राउटर, सर्वर और समुद्र के नीचे बिछी फाइबर-ऑप्टिक केबल की पूरी डिजिटल यात्रा।

Neel Mani Lal
Published on: 17 Aug 2026 6:22 PM IST
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How Internet Works: आपने फोन से किसी दोस्त को एक फोटो भेजी। कुछ सेकंड बाद उसके फोन पर वही फोटो दिखाई देने लगी। आपने एक वीडियो भेजा, सामने वाले ने हजारों किलोमीटर दूर बैठकर उसे लगभग तुरंत देख लिया। आपने आवाज का संदेश भेजा तो वह भी कुछ ही पलों में दूसरे फोन तक पहुंच गया।

हमें यह सब इतना नार्मल लगता है कि हम शायद ही कभी सोचते हैं कि आखिर एक फोन से निकली तस्वीर या आवाज दूसरे फोन तक पहुंचती कैसे है? क्या फोटो सीधे एक फोन से दूसरे फोन में उड़कर जाती है? क्या इंटरनेट में कोई ऐसी सड़क है जिस पर हमारा डेटा दौड़ता है? और अगर फोटो भारत से अमेरिका भेजी जा रही है तो वह रास्ते में कहां-कहां जाती है?

असल में जब आप कोई फोटो, वीडियो या ऑडियो भेजते हैं तो वह एक पूरी डिजिटल यात्रा पर निकलता है। फोन उस फाइल को छोटे-छोटे हिस्सों में बांटता है, उन हिस्सों पर जरूरी जानकारी लगाता है और फिर आपका इंटरनेट कनेक्शन उन्हें अलग-अलग नेटवर्क के रास्ते आगे भेजता है। रास्ते में मोबाइल टावर, वाई-फाई राउटर, इंटरनेट कंपनियों के नेटवर्क, बड़े डेटा सेंटर और समुद्र के नीचे बिछी फाइबर-ऑप्टिक केबल तक शामिल हो सकती हैं।

और सबसे दिलचस्प बात यह है कि आपकी फोटो एक ही रास्ते से पूरी की पूरी नहीं जाती। उसके अलग-अलग हिस्से अलग रास्तों से भी जा सकते हैं और आखिर में दूसरे फोन पर फिर से जुड़कर वही फोटो बन जाते हैं।

सबसे पहले फोन फोटो को समझता है

मान लीजिए आपने अपने दोस्त को एक फोटो भेजी। फोटो आपके फोन की गैलरी में एक डिजिटल फाइल के रूप में मौजूद है। कैमरे ने जब फोटो खींची थी तब असल दुनिया की रोशनी को सेंसर ने डिजिटल जानकारी में बदला था। फोन ने उस जानकारी को एक फाइल में रखा। अब जब आप “भेजें” बटन दबाते हैं तो मैसेजिंग ऐप उस फाइल को इंटरनेट के जरिए भेजने की तैयारी करता है। यहां से फोटो की डिजिटल यात्रा शुरू होती है। फोन फोटो को एक विशाल एकल टुकड़े की तरह इंटरनेट पर नहीं भेजता। नेटवर्क में डेटा को छोटे-छोटे हिस्सों में बांटकर भेजना ज्यादा आसान और भरोसेमंद होता है। इन हिस्सों को आम तौर पर ‘पैकेट’ कहा जाता है। यानी आपकी 10 एमबी की फोटो या 200 एमबी का वीडियो नेटवर्क पर छोटे-छोटे डिजिटल पैकेटों के रूप में यात्रा कर सकता है।

पैकेट आखिर होते क्या हैं?

इसे डाक भेजने के उदाहरण से समझिए। मान लीजिए आपको एक बड़ी किताब दूसरे शहर भेजनी है। पूरी किताब को एक ही बहुत बड़े पैकेट में भेजने के बजाय आप उसे कई छोटे डिब्बों में बांट सकते हैं। हर डिब्बे पर लिखा होगा कि यह किसके लिए है और किताब का कौन सा हिस्सा इसमें है। इंटरनेट में भी कुछ ऐसा ही होता है। आपकी फाइल को छोटे हिस्सों में बांटा जाता है। हर हिस्से के साथ यह जानकारी जुड़ी होती है कि डेटा कहां से आया है और उसे आखिर जाना कहां है। नेटवर्क के अलग-अलग उपकरण इन पैकेटों को आगे बढ़ाते हैं। दूसरे फोन तक पहुंचने के बाद ये हिस्से फिर सही क्रम में जुड़ते हैं और आपकी पूरी फोटो, वीडियो या ऑडियो वापस बन जाता है। यानी सामने वाले को जो फोटो दिखाई देती है वह इंटरनेट पर एक ही चीज के रूप में यात्रा नहीं कर रही थी। वह बहुत सारे छोटे डिजिटल हिस्सों में सफर कर रही थी।

इंटरनेट में आपका फोन अकेला नहीं होता

अब सवाल आता है कि ये पैकेट फोन से बाहर निकलकर जाते कहां हैं? अगर आप मोबाइल डेटा इस्तेमाल कर रहे हैं तो आपका फोन सबसे पहले आसपास के मोबाइल टावर से जुड़ता है। फोन और टावर के बीच रेडियो तरंगों के जरिए डेटा का आदान-प्रदान होता है। यानी फोटो आपके फोन से टावर तक हवा के रास्ते जाती है। लेकिन टावर से आगे की यात्रा हवा में नहीं होती। मोबाइल नेटवर्क के पीछे जमीन पर बिछे फाइबर नेटवर्क, राउटर, स्विच और दूसरे नेटवर्क उपकरण काम करते हैं। अगर आप वाई-फाई पर हैं तो पहला पड़ाव आपका घर या ऑफिस का राउटर होता है। फोन रेडियो सिग्नल के जरिए राउटर से जुड़ता है और राउटर उस डेटा को आपके इंटरनेट सेवा प्रदाता के नेटवर्क तक पहुंचाता है। यहीं से आपकी फोटो इंटरनेट की बड़ी दुनिया में प्रवेश करती है।

इंटरनेट असल में है क्या?

हम इंटरनेट को अक्सर एक अदृश्य चीज समझते हैं। लेकिन इंटरनेट का बड़ा हिस्सा बिल्कुल भौतिक है। दुनिया भर में जमीन के नीचे और समुद्र के नीचे फाइबर-ऑप्टिक केबल बिछी हैं। बड़े डेटा सेंटर हैं। इंटरनेट एक्सचेंज हैं। हजारों-लाखों राउटर और दूसरे नेटवर्क उपकरण हैं। इन सबको जोड़कर दुनिया का इंटरनेट नेटवर्क बनता है। फाइबर-ऑप्टिक केबल में डेटा बिजली के रूप में नहीं, बल्कि रोशनी के संकेतों (light signals) के रूप में बहुत तेज गति से यात्रा करता है। यानी जब आप भारत से किसी दूसरे देश में फोटो भेजते हैं तो उस फोटो के डिजिटल डेटा का एक बड़ा हिस्सा समुद्र के नीचे बिछी फाइबर-ऑप्टिक केबल से भी गुजर सकता है।

समुद्र के नीचे केबल क्यों चाहिए?

दुनिया के अलग-अलग देशों को जोड़ने के लिए समुद्र के नीचे हजारों किलोमीटर लंबी केबल बिछी हुई हैं। अगर आप भारत से अमेरिका किसी व्यक्ति को फोटो भेज रहे हैं तो डेटा को किसी न किसी अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क के जरिए अमेरिका तक जाना होगा। इस यात्रा में समुद्र के नीचे की केबल बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। इन केबलों में बेहद पतले फाइबर होते हैं, जिनमें प्रकाश के जरिए डेटा भेजा जाता है। यानी आपकी फोन में मौजूद एक साधारण-सी फोटो के पीछे एक ऐसी वैश्विक व्यवस्था काम कर सकती है जिसमें मोबाइल टावर से लेकर समुद्र की गहराई में पड़ी केबल तक शामिल है।

फोटो सीधे दोस्त के फोन पर क्यों नहीं जाती?

ऐसा इसलिए कि आपका दोस्त सामान्य तौर पर इंटरनेट पर सीधे आपके फोन से जुड़ा नहीं होता। आप दोनों अलग-अलग मोबाइल नेटवर्क, वाई-फाई, शहर, देश या इंटरनेट सेवा प्रदाता इस्तेमाल कर सकते हैं। इसलिए आपके फोन से निकला डेटा पहले उस सेवा तक पहुंचता है जिसके जरिए आप संदेश भेज रहे हैं। यह सेवा आपके संदेश को उसके सिस्टम या सर्वर के जरिए आगे पहुंचाती है। उदाहरण के लिए जब आप किसी मैसेजिंग ऐप के जरिए फोटो भेजते हैं तो ऐप की तकनीक और सर्वर यह तय करने में मदद करते हैं कि संदेश किस प्राप्तकर्ता तक पहुंचाना है। यही कारण है कि सामने वाले का फोन उस समय बंद हो तब भी कई सेवाओं में संदेश बाद में पहुंच सकता है। संदेश पहले सेवा के सर्वर पर सुरक्षित रह सकता है और जब सामने वाला इंटरनेट से जुड़ता है तो उसे भेज दिया जाता है।

सर्वर क्या करता है?

सर्वर को आप इंटरनेट की दुनिया में एक शक्तिशाली कंप्यूटर समझ सकते हैं जो लगातार नेटवर्क से जुड़ा रहता है और लोगों की रिक्वेस्ट का जवाब देता है। जब आप किसी ऐप पर फोटो भेजते हैं तो सेवा के सर्वर उस डेटा को संभाल सकते हैं। कई सेवाएं फाइल को कुछ समय के लिए अपने सिस्टम में रखती हैं ताकि प्राप्तकर्ता उसे डाउनलोड कर सके। कुछ सेवाओं में फोटो को छोटे आकार में बदलना, वीडियो को अलग-अलग गुणवत्ता में तैयार करना या डेटा को एन्क्रिप्ट करना जैसी प्रक्रियाएं भी हो सकती हैं। यानी “भेजें” बटन दबाने के बाद फोन का काम खत्म नहीं होता। उसके बाद भी कई कंप्यूटर और नेटवर्क उपकरण काम करते हैं।

डेटा को रास्ता कौन बताता है?

इंटरनेट में राउटर बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। राउटर का काम मोटे तौर पर यह तय करना है कि डेटा को आगे किस दिशा में भेजना है। इसे सड़क के चौराहे की तरह समझिए। आपके पैकेट एक नेटवर्क से दूसरे नेटवर्क की तरफ जाते हैं और रास्ते में मौजूद राउटर उन्हें आगे भेजते रहते हैं। लेकिन इंटरनेट की खासियत यह है कि कोई एक तय सड़क जरूरी नहीं है। अगर किसी रास्ते में समस्या है तो नेटवर्क परिस्थितियों के हिसाब से दूसरे रास्ते का इस्तेमाल कर सकता है। इसी वजह से इंटरनेट एक विशाल और आपस में जुड़े हुए नेटवर्क का नेटवर्क है।

क्या फोटो के सभी पैकेट एक ही रास्ते से जाते हैं?

डेटा पैकेटों को नेटवर्क के अलग-अलग रास्तों से भेजा जा सकता है। आखिर में प्राप्त करने वाला सिस्टम उन्हें फिर से सही क्रम में जोड़ देता है। मान लीजिए किसी फोटो के पैकेट A, B, C और D हैं। संभव है A और B एक नेटवर्क रास्ते से जाएं और C और D दूसरे रास्ते से। अगर कोई पैकेट रास्ते में खो जाए या खराब हो जाए तो इस्तेमाल किए जा रहे नेटवर्क प्रोटोकॉल के आधार पर उसे दोबारा भेजने की व्यवस्था हो सकती है। यही वजह है कि इंटरनेट सिर्फ तेज ही नहीं, बल्कि काफी भरोसेमंद भी बनाया गया है।

सामने वाले फोन पर फोटो बिल्कुल सही कैसे पहुंचती है?

क्योंकि नेटवर्क में सिर्फ डेटा भेजना ही नहीं, उसे सही तरीके से पहुंचाना भी जरूरी है। प्राप्त करने वाले सिस्टम को पता होना चाहिए कि कौन सा पैकेट किस डेटा का हिस्सा है और किस क्रम में उसे जोड़ा जाना है। जब सभी जरूरी हिस्से मिल जाते हैं तो सिस्टम उन्हें फिर से जोड़ता है। उसके बाद मैसेजिंग ऐप फोटो को पहचानता है और आपके दोस्त के फोन पर वही तस्वीर दिखाई देती है। आपको पूरी प्रक्रिया दिखाई नहीं देती। आपको सिर्फ एक छोटा-सा संदेश दिखता है - “फोटो भेजी गई।”

वीडियो भेजना ज्यादा मुश्किल क्यों है?

फोटो की तुलना में वीडियो बहुत बड़ा डेटा हो सकता है। मान लीजिए आपने 500 एमबी का वीडियो भेजा। उसे इंटरनेट पर छोटे-छोटे पैकेटों में भेजना होगा। जितना बड़ा डेटा होगा, उतना ज्यादा नेटवर्क संसाधन और समय लग सकता है। इसीलिए कई मैसेजिंग सेवाएं वीडियो को भेजने से पहले उसका आकार कम कर देती हैं। वीडियो की गुणवत्ता और रिजॉल्यूशन भी घटाया जा सकता है ताकि फाइल जल्दी भेजी जा सके और कम डेटा खर्च हो। यही कारण है कि आपने कई बार देखा होगा कि फोन की गैलरी में वीडियो साफ दिखाई देता है लेकिन मैसेजिंग ऐप पर भेजने के बाद उसकी गुणवत्ता थोड़ी कम हो गई।

ऑडियो कैसे पहुंचता है?

ऑडियो भी डिजिटल डेटा है। जब आप आवाज रिकॉर्ड करते हैं तो फोन का माइक्रोफोन आपकी आवाज से पैदा होने वाली हवा की कंपन को विद्युत संकेत में बदलता है। फोन उस संकेत को डिजिटल डेटा में बदलकर एक ऑडियो फाइल तैयार करता है। फिर वही फाइल इंटरनेट के जरिए छोटे पैकेटों में भेजी जा सकती है। दूसरे फोन पर पहुंचने के बाद फोन उस डिजिटल डेटा को फिर से आवाज में बदल देता है। स्पीकर हवा में कंपन पैदा करता है और आपके कान उस कंपन को आवाज के रूप में सुनते हैं। यानी आपके “हैलो” की आवाज ने फोन से निकलने के बाद एक बेहद लंबी डिजिटल यात्रा की और फिर दूसरे फोन में जाकर दोबारा आवाज का रूप ले लिया।

क्या इंटरनेट पर फोटो वास्तव में बिजली की तरह दौड़ती है?

इंटरनेट में डेटा अलग-अलग माध्यमों से यात्रा कर सकता है। फोन से मोबाइल टावर तक रेडियो तरंगों का इस्तेमाल हो सकता है। टावर या राउटर के बाद डेटा फाइबर-ऑप्टिक केबल से प्रकाश के संकेतों के रूप में जा सकता है। कुछ नेटवर्क हिस्सों में दूसरे प्रकार के कनेक्शन भी इस्तेमाल हो सकते हैं। इसलिए “फोटो इंटरनेट में उड़ रही है” कहना सिर्फ बोलचाल का तरीका है। वास्तव में फोटो से जुड़ी डिजिटल जानकारी अलग-अलग नेटवर्क तकनीकों के जरिए आगे बढ़ रही होती है।

इंटरनेट इतना तेज कैसे हो गया?

इंटरनेट की गति सिर्फ इसलिए नहीं बढ़ी कि हमारे फोन बेहतर हो गए हैं। इसके पीछे पूरी दुनिया का नेटवर्क ढांचा लगातार बेहतर हुआ है। फाइबर-ऑप्टिक नेटवर्क की क्षमता बढ़ी है। मोबाइल नेटवर्क 3जी से 4जी और फिर 5जी तक पहुंचे हैं। डेटा सेंटर ज्यादा शक्तिशाली हुए हैं। सर्वर और स्टोरेज तकनीक बेहतर हुई है। इंटरनेट कंपनियों ने दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में सर्वर और डेटा सेंटर लगाए हैं। इसके अलावा कंटेंट डिलीवरी नेटवर्क यानी CDN जैसी तकनीकें भी महत्वपूर्ण हैं। इनका मकसद यह है कि लोकप्रिय सामग्री को उपयोगकर्ताओं के अपेक्षाकृत करीब रखा जा सके ताकि उसे दूर बैठे किसी एक सर्वर से हर बार खींचना न पड़े। यही कारण है कि आज कोई वीडियो कुछ ही सेकंड में चलना शुरू हो जाता है, जबकि शुरुआती इंटरनेट के दौर में छोटी-सी तस्वीर भी खुलने में काफी समय लग सकती थी।

क्या फोटो भेजने पर वह हमेशा इंटरनेट पर कहीं पड़ी रहती है?

यह उस ऐप और उसकी तकनीक पर निर्भर करता है जिसका आप इस्तेमाल कर रहे हैं। कुछ सेवाएं संदेश या मीडिया को अपने सर्वर पर कुछ समय तक रख सकती हैं। कुछ सेवाओं में फाइल डिलीवरी के बाद उसे हटाने की व्यवस्था हो सकती है। कुछ सेवाएं अलग तरीके से काम करती हैं। इसके अलावा एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन जैसी तकनीकें भी महत्वपूर्ण हैं। इसमें संदेश भेजने वाले फोन पर डेटा को इस तरह सुरक्षित किया जाता है कि बीच के सिस्टम के लिए उसका मूल कंटेंट पढ़ना मुश्किल या असंभव हो। प्राप्तकर्ता का फोन उसे खोलने के लिए जरूरी प्रक्रिया पूरी करता है। इसलिए इंटरनेट पर डेटा का सफर सिर्फ “कहां गया?” का सवाल नहीं है। यह भी महत्वपूर्ण है कि किसने उसे देखा, किस रूप में रखा और किस तरह सुरक्षित किया।

अगली बार फोटो भेजें तो क्या याद रखें?

जब आप अगली बार फोन से कोई फोटो भेजें और सामने वाले के फोन पर कुछ सेकंड में वही तस्वीर दिखाई दे, तो समझिए कि आपने सिर्फ “भेजें” बटन नहीं दबाया है। आपके फोन ने फोटो को डिजिटल डेटा के रूप में तैयार किया। उसे छोटे-छोटे हिस्सों में बांटा गया। ये हिस्से मोबाइल टावर या वाई-फाई राउटर से होते हुए अलग-अलग नेटवर्क में गए। रास्ते में कई राउटर और नेटवर्क उपकरणों ने उन्हें आगे भेजा। जरूरत पड़ने पर डेटा देश से बाहर गया और समुद्र के नीचे बिछी फाइबर-ऑप्टिक केबल से भी गुजर सकता है। आखिर में वह प्राप्तकर्ता की सेवा और फिर उसके फोन तक पहुंचा। वहां सारे हिस्से दोबारा जुड़े और आपके दोस्त की स्क्रीन पर वही फोटो दिखाई देने लगी। और यह पूरी यात्रा अक्सर कुछ सेकंड या उससे भी कम समय में पूरी हो जाती है। यानी इंटरनेट कोई जादुई बादल नहीं है। उसके पीछे हजारों किलोमीटर केबल, मोबाइल टावर, राउटर, सर्वर, डेटा सेंटर और दुनिया भर में फैला एक विशाल नेटवर्क है। कुल मिला कर आपके फोन में दिखाई देने वाली एक छोटी-सी फोटो दरअसल डिजिटल दुनिया की एक लंबी यात्रा का अंतिम नतीजा होती है।

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