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Hypocretin Kya Hai: हाइपोक्रेटिन या ओरेक्सिन क्या है? नींद, भूख और जागने पर कैसे करता है असर?
Hypocretin Kya Hai: हाइपोक्रेटिन या ओरेक्सिन क्या है और शरीर में इसका क्या काम होता है? जानिए यह नींद-जागने के चक्र, भूख, ऊर्जा, प्रेरणा और सतर्कता को कैसे प्रभावित करता है और इसकी कमी से नार्कोलेप्सी क्यों हो सकती है।
Hypocretin Kya Hai
Hypocretin Kya Hai: 1998 में दो अलग-अलग वैज्ञानिक समूहों ने लगभग एक ही समय पर इस पदार्थ की पहचान की। एक समूह ने इसे Hypocretin नाम दिया, क्योंकि यह मुख्यतः मस्तिष्क के हाइपोथैलेमस में पाया गया और इसकी संरचना कुछ अन्य न्यूरोपेप्टाइड से मिलती थी। दूसरे समूह ने इसे Orexin कहा। यह नाम यूनानी शब्द orexis यानी भूख या इच्छा से निकला, क्योंकि शुरुआती प्रयोगों में यह भोजन करने की प्रवृत्ति बढ़ाता दिखाई दिया। बाद में पता चला कि दोनों वैज्ञानिक समूह वास्तव में एक ही प्रणाली का अध्ययन कर रहे थे।
इसके दो प्रमुख रूप हैं—Orexin-A (Hypocretin-1) और Orexin-B (Hypocretin-2)। इनके लिए मस्तिष्क में दो प्रमुख रिसेप्टर होते हैं—OX1R और OX2R। हाइपोथैलेमस में ओरेक्सिन बनाने वाली तंत्रिका कोशिकाएँ संख्या में बहुत अधिक नहीं होतीं। लेकिन इनके तंत्रिका-तंतु मस्तिष्क के अनेक महत्वपूर्ण हिस्सों तक जाते हैं। इसी कारण इतनी छोटी-सी न्यूरॉन आबादी हमारे पूरे नींद-जागरण चक्र को प्रभावित कर सकती है।
शरीर में इसका सबसे बड़ा काम—हमें जगाए रखना
ओरेक्सिन का सबसे महत्वपूर्ण काम जागृत अवस्था को स्थिर बनाए रखना है। इसे केवल ऐसा रसायन समझना ठीक नहीं होगा जो नींद भगाता है। इसका वास्तविक काम यह सुनिश्चित करना है कि जब मस्तिष्क को जागना चाहिए, तब वह लगातार जागृत और सतर्क बना रहे।
मस्तिष्क में जागने और सोने की कई प्रणालियाँ एक-दूसरे के साथ काम करती हैं। ओरेक्सिन जागृति से जुड़े कई केंद्रों को सक्रिय रखता है। जब इसकी गतिविधि अधिक होती है, व्यक्ति जागा हुआ, सतर्क और वातावरण के प्रति प्रतिक्रिया देने की स्थिति में रहता है। सामान्यतः दिन में इसकी सक्रियता अधिक और नींद के समय कम होती है।
इस प्रणाली की महत्ता का सबसे अच्छा प्रमाण नार्कोलेप्सी नामक रोग है। विशेष रूप से नार्कोलेप्सी टाइप-1 में ओरेक्सिन बनाने वाले न्यूरॉनों की भारी कमी हो जाती है। परिणाम यह होता है कि व्यक्ति को दिन में अचानक अत्यधिक नींद आने लग सकती है और जागने तथा सोने की अवस्थाओं के बीच सामान्य सीमा अस्थिर हो जाती है। कुछ लोगों में हँसी, आश्चर्य या तीव्र भावना के समय अचानक मांसपेशियों की शक्ति चली जाती है। इसे कैटाप्लेक्सी कहते हैं।
यानी ओरेक्सिन की भूमिका को एक उदाहरण से समझें तो यह मस्तिष्क का केवल अलार्म नहीं। बल्कि जागृत अवस्था को स्थिर रखने वाला नियंत्रक तंत्र है।
भूख और ऊर्जा से इसका क्या संबंध है?
ओरेक्सिन की खोज के समय सबसे अधिक ध्यान इसके भूख बढ़ाने वाले प्रभाव पर गया था। भूख लगने, ऊर्जा की कमी होने या लंबे समय तक भोजन न मिलने जैसी स्थितियों में इसकी प्रणाली सक्रिय हो सकती है। इसका जैविक अर्थ बहुत रोचक है। यदि किसी जीव को ऊर्जा चाहिए तो केवल भूख महसूस करना पर्याप्त नहीं है। उसे भोजन खोजने के लिए जागना, चलना, सतर्क होना और प्रेरित होना भी आवश्यक है। ओरेक्सिन इन प्रक्रियाओं को आपस में जोड़ने का काम करता है। इसलिए इसे केवल भूख का रसायन कहना अधूरा होगा। यह मस्तिष्क को शरीर की ऊर्जा की स्थिति के अनुसार व्यवहार बदलने में सहायता करता है।
प्रेरणा, आनंद और नशे से संबंध
ओरेक्सिन प्रणाली का संबंध मस्तिष्क की पुरस्कार और प्रेरणा प्रणाली से भी है। जब हमें किसी वस्तु को प्राप्त करने की तीव्र इच्छा होती है, भोजन खोजते हैं या किसी पुरस्कार के लिए प्रयास करते हैं, तब यह प्रणाली सक्रिय हो सकती है। इसके संबंध डोपामिन से जुड़ी मस्तिष्क प्रणालियों से भी हैं। इसी कारण वैज्ञानिक ओरेक्सिन और नशे की लत के संबंध का भी अध्ययन कर रहे हैं। कुछ शोध बताते हैं कि यह नशीले पदार्थ की चाह, पुराने नशे की ओर दोबारा लौटने और पुरस्कार खोजने वाले व्यवहार में भूमिका निभा सकता है। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि अधिक ओरेक्सिन होना ही नशे का कारण है। वास्तविक प्रणाली इससे कहीं अधिक जटिल है।
तनाव, हृदय और शरीर की सक्रियता
ओरेक्सिन शरीर की तनाव प्रतिक्रिया और स्वायत्त तंत्रिका तंत्र से भी जुड़ा हुआ है। आवश्यकता पड़ने पर यह सतर्कता, हृदय गति, रक्तचाप और शरीर की सक्रियता को प्रभावित कर सकता है। खतरे या चुनौती की स्थिति में शरीर को केवल जागना नहीं होता। बल्कि तेजी से प्रतिक्रिया करने के लिए तैयार भी होना पड़ता है। ओरेक्सिन इस समन्वय में भाग लेता है। इसीलिए अत्यधिक सक्रिय ओरेक्सिन प्रणाली को कुछ परिस्थितियों में अति-सतर्कता और नींद की समस्या से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन यह सीधा समीकरण नहीं है कि किसी को अनिद्रा है तो उसके शरीर में ओरेक्सिन अधिक ही होगा। अनिद्रा के अनेक कारण हो सकते हैं।
ओरेक्सिन कम हो जाए तो क्या नुकसान होता है?
इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण नार्कोलेप्सी है। ओरेक्सिन बनाने वाले न्यूरॉनों के नष्ट हो जाने पर व्यक्ति की जागृत अवस्था अस्थिर हो सकती है। दिन में असहनीय नींद, अचानक सो जाना, कैटाप्लेक्सी, नींद में जाते या जागते समय भ्रम जैसी अनुभूतियाँ और कभी-कभी स्लीप पैरालिसिस हो सकता है।दिलचस्प बात यह है कि समस्या केवल ‘बहुत अधिक नींद’ नहीं होती। असल समस्या नींद और जागने की अवस्थाओं का ठीक तरह से नियंत्रित न रहना है। इसलिए नार्कोलेप्सी वाला व्यक्ति दिन में अचानक सो सकता है और रात में उसकी नींद भी कई बार खंडित हो सकती है।
यदि ओरेक्सिन बहुत सक्रिय हो तो?
दूसरी दिशा भी महत्वपूर्ण है। यदि जागृत रखने वाली ओरेक्सिन प्रणाली आवश्यकता से अधिक सक्रिय बनी रहे तो सोना कठिन हो सकता है। इसी सिद्धांत को आधार बनाकर अनिद्रा की कुछ आधुनिक दवाएँ विकसित की गई हैं जिन्हें Dual Orexin Receptor Antagonists—DORA कहा जाता है। ये ओरेक्सिन के रिसेप्टरों को रोककर मस्तिष्क की जागृत रखने वाली प्रणाली को शांत करती हैं, जिससे नींद आने में सहायता मिलती है।
इस दृष्टि से ओरेक्सिन अपने आप में न तो ‘अच्छा’ है, न ‘बुरा’। सही समय पर इसकी सही मात्रा में सक्रियता महत्वपूर्ण है। दिन में जागने के समय इसकी आवश्यकता है, जबकि रात में इसकी गतिविधि का कम होना नींद के लिए उपयोगी है।
क्या भोजन या व्यायाम से ओरेक्सिन बढ़ाया जा सकता है?
यहाँ इंटरनेट पर काफी भ्रम है। ‘ओरेक्सिन बढ़ाने वाले खाद्य पदार्थ’, ‘हाइपोक्रेटिन बूस्टर’ जैसी बातें अक्सर वैज्ञानिक प्रमाण से कहीं अधिक बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत की जाती हैं। ओरेक्सिन प्रणाली शरीर की ऊर्जा स्थिति, रक्त में ग्लूकोज़, अमीनो अम्ल, भूख, शारीरिक गतिविधि, तनाव और जैविक घड़ी सहित कई संकेतों से प्रभावित होती है। लेकिन किसी एक भोजन को खाकर ओरेक्सिन को मनचाहे ढंग से बढ़ा लेना अभी स्थापित चिकित्सकीय तरीका नहीं है।
नियमित नींद-जागरण का समय, दिन में पर्याप्त प्रकाश, शारीरिक गतिविधि और स्वस्थ भोजन हमारी समग्र जागृति और जैविक घड़ी के लिए लाभकारी हैं। लेकिन इन्हें सीधे ‘ओरेक्सिन बढ़ाने की चिकित्सा’ कहना उचित नहीं होगा।
एक छोटी-सी प्रणाली, लेकिन बहुत बड़ा नियंत्रण
हाइपोक्रेटिन/ओरेक्सिन की कहानी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पता चलता है कि मस्तिष्क में किसी पदार्थ की मात्रा या उसे बनाने वाली कोशिकाओं की संख्या कम होने का अर्थ यह नहीं कि उसका महत्व भी कम होगा। ओरेक्सिन नींद, जागृति, भूख, ऊर्जा, सतर्कता, प्रेरणा, पुरस्कार-व्यवहार और तनाव प्रतिक्रिया के बीच एक प्रकार के सेतु की तरह काम करता है।
इसे सरल शब्दों में कहें तो शरीर में ऊर्जा कम है तो भोजन खोजने की जरूरत है। भोजन खोजने के लिए जागना और सक्रिय होना आवश्यक है। किसी लक्ष्य के पीछे जाने के लिए प्रेरणा चाहिए; और वातावरण में खतरा हो तो सतर्कता चाहिए। ओरेक्सिन इन अलग-अलग आवश्यकताओं को मस्तिष्क में एक-दूसरे से जोड़ने वाली महत्वपूर्ण प्रणालियों में से एक है।
और इसी में इसका सबसे रोचक विरोधाभास छिपा है—ओरेक्सिन की गंभीर कमी व्यक्ति को अनियंत्रित नींद की ओर ले जा सकती है, जबकि ओरेक्सिन की क्रिया को दवा से रोकना अनिद्रा के उपचार में उपयोगी हो सकता है। यानी चिकित्सा में लक्ष्य ओरेक्सिन को हमेशा बढ़ाना या हमेशा घटाना नहीं। बल्कि उसकी गतिविधि को सही परिस्थिति में सही दिशा में नियंत्रित करना है।


