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Marriage vs Divorce India: सात जन्मों का बंधन, तोड़ने का जश्न
Marriage vs Divorce India: सात जन्मों के बंधन माने जाने वाले विवाह के टूटने पर जश्न क्यों? बढ़ते तलाक, बदलते रिश्ते और सामाजिक मानसिकता पर एक गहरा विश्लेषण।
Marriage vs Divorce India
Marriage vs Divorce India: शादी, विवाह यानी सात सात जनमों का बंधन। दो आत्माओं का एक ऐसा मिलन है, जिसमें जीवन की संपूर्णता का विस्तार छिपा होता है। एक ऐसा युग्म जो इंसान नहीं बल्कि ईश्वर तय करते हैं। विवाह ऊपर तय किये जाते हैं, हम तो बस यहां धरती पर उन्हें एक औपचारिक रूप देते हैं। संस्कृति यही कहती है। हमारी ही नहीं, पश्चिमी भी। विवाह है ही एक नायाब रिश्ता, दुनिया का सबसे अनोखा रिश्ता जो खून का नहीं होते हुए भी खून से बढ़ कर होता है। इसीलिए हम अपनी ही नहीं बल्कि अपने भगवानों तक की विवाह वर्षगाँठें मनाते हैं। हर साल सहालग के महीने आते हैं, कितनी शिद्दत, कितनी शान से अरमानों को पूरा किया जाता है।
सहालग की खिलखिलाती तस्वीर का एक पहलू और भी है जहां विवाह जैसे दैवी संबंध को तोड़ने के जश्न और मनौतियां हैं। एकदम विरोधाभासी। सात जनमों का बंधन बनाने में जश्न फिर उसी बन्धन को तोड़ने का जश्न? क्या ऐसा मुमकिन है?
खबरें देखने पर तो यही तस्वीर सामने आती है। मेरठ में एक पिता ने बेटी को तलाक मिलने पर खूब जश्न मनाया। ढोल नगाड़ों, नाच गाने, भोज के साथ 'तलाक' की उपलब्धि को सेलिब्रेट किया गया। एक खबर बस्ती की थी जहाँ एक युवक ने तलाक की मनौती मांग रखी थी और मनौती पूरी होने पर अपने घर से देवी मंदिर तक 9 किलोमीटर की दंडवत यात्रा की। वाकये और भी हैं। यदाकदा सुर्खियां बनते रहते हैं। अकेले में जश्न कितने होते होंगे, कुछ कहा नहीं जा सकता।
ये सब शादी के 'बंधन' से 'आज़ाद' होने के जश्न हैं। ऐसी आज़ादी जिसके लिए अदालतों में कैसी कैसी लड़ाइयां लड़ी जाती हैं। कहाँ कहाँ मत्थे टेके जाते हैं। मनौतियां मानी जाती हैं।
लेकिन बन्धन टूटने पर जश्न क्यों? क्या ये खुशी की बात है? हम तो समझते थे कि सम्बन्ध विच्छेद एक उदासी, दर्द और आघात वाली स्थिति होती है लेकिन जिस तरह जश्नों की खबरें देख रहे उससे लगता है कि ये आघात नहीं बल्कि आज़ादी की खुशी है। प्रेम से बने रिश्ते हों या अरेंज करके, किसी की कोई गारंटी नहीं। कहने को खराब लगता है लेकिन सब कुछ उसी तरह नजर आता है जैसे किसी ज़माने में कपड़े की दुकानों में तख्ती टँगी होती थी : फैशन के जमाने में गारंटी की उम्मीद न करें।
लगता है विवाह से संस्था भी उसी कपड़े की दुकान हो गई है जहां सब कुछ अनिश्चितता में है। व्यवहार, आचार विचार, संतोष, सदाचार, पवित्रता वगैरह तमाम आदर्श स्थितियां कब कहाँ और कैसे बदल जाएँ, कुछ नहीं कह सकते। ऐसे में बन्धन एक बोझ बन जाता है जिसे तोड़ने में आज़ादी का एहसास होता है।
सच्चाई ये भी है कि हर टूटता हुआ रिश्ता एक जैसा नहीं होता। कई बार विवाह केवल सामाजिक दबाव में निभाया जा रहा एक बोझ बन जाता है। ऐसे मामलों में डोर टूटने का जश्न रिश्ते के टूटने का नहीं, बल्कि उस बोझ से आज़ादी का हो सकता है।
इसके साथ ही एक व्यवहारिक पक्ष भी है। हमारे देश में विवाह करना आसान है। कुछ रस्में और सामाजिक स्वीकृति, और रिश्ता स्थापित। लेकिन जब बात अलग होने की आती है तो लम्बी, जटिल और थकाऊ कानूनी प्रक्रियाएँ सामने होती हैं। बरसों बरस तक मुकदमे चलते हैं। अब तो भरण पोषण की रकम एक बड़ा मसला बन चुका है। ऐसे हालातों में इन सबसे छुटकारा एक मनौती बन जाती है। और जब प्रक्रिया खत्म होती है तो वही खुशी महसूस होती है जो जमीन जायदाद या किसी और मुकदमे की जीत में मिलती है और यही जश्न का रूप ले लेती है।
डेटा बताता है कि तलाक के मामले लगातार साल दर साल बढ़ते जा रहे हैं। माना जाता है कि ये दर 2 फीसदी तक पहुंच चुकी है। यानी हर 100 में 2 बन्धन टूट रहे हैं। दिल्ली, बंगलोर, मुंबई जैसे मेगा शहरों में तो बन्धन टूटने की दर 15 फीसदी तक बताई जा रही है। देश में कोई एक करोड़ शादियां होती हैं। अब इन बन्धनों के आउटकम का अंदाज़ा सहस लगाया जा सकता है। कितने ही सम्बन्ध बिना अदालत जाए ही तोड़ दिए जाते होंगे, उनकी कोई गिनती नहीं।
खबरें और आंकड़े समाज की स्थिति बयां करते हैं। विवाह नामक संस्था की बात और आगे बढ़ाएं तो कई चीजें निकल कर आती हैं जो हैरान करती हैं। विवाह टूटना जहां एक चीज है वहीं एक चीज विवाह न करने की भी है। वैसे तो हमारे देश में ज्यादा न तो सरकारी सर्वे हैं और न ही आंकड़े, लेकिन अलग अलग छिटपुट सर्वे बताते हैं कि 29 साल की उम्र तक 27 फीसदी पुरुष और 20 फीसदी महिलाएं शादी नहीं करती हैं। ये आंकड़ा भी 2019 का है। उसके बाद तो हालात और बहुत बदल चुके हैं। एक सर्वे तो कहता है कि 40 साल की उम्र वाले 42 फीसदी लोग कहते हैं कि उन्हें शादी करनी ही नहीं है। एक पुराना नेशनल फैमिली सर्वे कहता है कि 2 फीसदी भारतीय कभी शादी करते ही नहीं हैं।
एक तरफ जहां सात जनमों के बंधन का ये हाल है वहीं, आंकड़े ये भी बताते हैं कि शादी के बाद भी दूसरे से संबंध बनाने में तेजी से इजाफा हो रहा है। इस काम में अब खास ऐप तक मदद कर रहे हैं। ऐप के जरिये कितने शादीशुदा मर्द-औरत अपने लिए दूसरे साथी ढूंढ रहे हैं, ये आंकड़ा भी हैरान करने वाला है। जरा सोचिए, ऐसे एक ऐप पर 40 लाख विवाहित लोग रजिस्टर्ड हैं। इसी में महिलाओं की तादाद साल भर में डेढ़ गुनी बढ़ गई है।
करोड़ से ज्यादा शादियां, लाखों तलाक, लाखों को शादी से परहेज, लाखों शादी करके नाखुश। सब कुछ गड्डमड्ड है। किस सिरे को पकड़ें समझ नहीं आता। विवाह ऊपर कहीं देवता तय करते हैं तो क्या सोच समझ कर नहीं करते? हम नीचे वाले प्रेम करके, डेटिंग करके, ज्योतिषीय सलाह करके, ग्रहों की चाल देख कर, धार्मिक रस्में पूरी करके एक जोड़ा बनाते हैं, लेकिन अंजाम? हम तो अपने पर, अपनी संस्कृति, अपनी हेरिटेज पर गर्व करते हैं, पश्चिम की संस्कृति को अपसंस्कृति कहते हैं, लेकिन हम जा किधर रहे है? ये सब न चर्चा का विषय बनता है, न गम्भीर चिंतन का। बस रूखे आंकड़ों या हैरान करने वाली रसेदार खबरों में कुछ मिनट में भुला दिया जाता है। क्या कोई डर है कि संजो कर छिपाया हुआ सच सामने आ जायेगा? या रेतीले तूफान में शतुरमुर्ग की तरह मुंह छुपा लेने की रवायत है कि सब ठीक चल रहा है। सच्चाई हमारे बीच है, हमारे इर्दगिर्द है। कुछ बचाना है तो हमीं को बचाना है। कहीं से कोई और कुछ करने नहीं आ रहा।
( लेखक पत्रकार हैं।)


