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Newstrack Special: हिटलर के पतन के बाद नाज़ी अफसर ब्राज़ील और अर्जेंटीना क्यों भागे? जानिए कहानी
Newstrack Special: हिटलर की हार के बाद नाज़ी अफसर अर्जेंटीना और ब्राज़ील क्यों भागे? जानिए रैटलाइन नेटवर्क, नकली दस्तावेज, वेटिकन से जुड़े कुछ लोगों की भूमिका, जुआन पेरोन की नीतियां, आइखमैन, मेंगले और शीत युद्ध की पूरी कहानी।
Nazi Ratline Ratline Network Nazis in Argentina
Newstrack Special: द्वितीय विश्व युद्ध के अंतिम चरण में 30 अप्रैल 1945 को जर्मनी के तानाशाह एडॉल्फ हिटलर ने आत्महत्या कर ली और कुछ ही दिनों बाद नाज़ी जर्मनी ने आत्मसमर्पण कर दिया। यूरोप में करीब छह साल से चल रहा द्वितीय विश्व युद्ध खत्म हो गया। नाज़ी शासन टूट चुका था, बर्लिन पर मित्र देशों का कब्जा था और दुनिया को लग रहा था कि हिटलर के साथ उसका पूरा खूंखार तंत्र भी खत्म हो गया।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।
हिटलर के कई अधिकारी, एसएस (सीक्रेट सर्विस) के सदस्य, खुफिया एजेंट और नाज़ी सहयोगी यूरोप से गायब होने लगे। जिन लोगों पर यहूदियों के नरसंहार, सामूहिक हत्याओं, यातनाओं और युद्ध अपराधों में शामिल होने के आरोप थे, उनमें से कुछ नकली नामों और नकली दस्तावेजों के साथ इटली, स्पेन और दूसरे यूरोपीय देशों तक पहुंचे। वहां से जहाज पकड़कर वे दक्षिण अमेरिका चले गए।
अर्जेंटीना उनका सबसे बड़ा ठिकाना बना। ब्राज़ील, पैराग्वे, बोलीविया और चिली भी ऐसे लोगों के लिए रास्ते या नए ठिकाने बने। इनमें दुनिया के सबसे कुख्यात नाज़ी अपराधियों में से कुछ शामिल थे। एडॉल्फ आइखमैन अर्जेंटीना पहुंचा। आइखमैन यहूदियों को यूरोप से मौत के शिविरों तक भेजने की नाज़ी व्यवस्था का प्रमुख हिस्सा था। जोसेफ मेंगले अर्जेंटीना होते हुए पैराग्वे और फिर ब्राज़ील पहुंचा। फ्रांज स्टैंगल, जो सोबिबोर और ट्रेब्लिंका जैसे हत्या केंद्रों का कमांडेंट था, भी दक्षिण अमेरिका पहुंच गया।
सवाल है कि ऐसा हुआ कैसे? क्या नाज़ियों के लिए कोई बाकायदा गुप्त नेटवर्क काम कर रहा था? क्या इसे ‘रैटलाइन’ या ‘रैटलाइन नेटवर्क’ कहा जाता था? इसमें वेटिकन की क्या भूमिका थी? क्या पूरी कैथोलिक चर्च इस काम में शामिल थी? और अर्जेंटीना के राष्ट्रपति जुआन पेरोन आखिर इन लोगों को अपने देश में क्यों आने देना चाहते थे?
इन सवालों का जवाब एक ऐसी कहानी सामने लाता है जिसमें युद्ध के बाद की अफरातफरी, नकली पहचान, चर्च के कुछ अधिकारियों की भूमिका, अर्जेंटीना की राजनीति, जर्मन वैज्ञानिकों की तलाश और तेजी से शुरू होती शीत युद्ध की राजनीति, सब एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं।
नाज़ी जर्मनी गिरा तो अपराधियों के सामने सबसे बड़ा डर क्या था?
1945 के बाद मित्र देशों ने नाज़ी शासन के प्रमुख लोगों को पकड़ना शुरू किया। नूर्नबर्ग ट्रायल ने दुनिया के सामने नाज़ी अपराधों का एक बड़ा हिस्सा रखा। लेकिन समस्या यह थी कि नाज़ी शासन केवल कुछ नेताओं तक सीमित नहीं था। उसके प्रशासन, सेना, पुलिस, एसएस और कब्जे वाले इलाकों की मशीनरी में हजारों लोग अलग-अलग स्तर पर जुड़े हुए थे। युद्ध खत्म होते ही ऐसे लोगों के सामने दो रास्ते थे। या तो वे पकड़े जाएं और मुकदमे का सामना करें, या किसी तरह यूरोप से निकल जाएं। यूरोप उस समय पूरी तरह अस्त-व्यस्त था। लाखों लोग विस्थापित थे। सीमाएं और प्रशासनिक व्यवस्थाएं बदल रही थीं। पहचान की जांच हर जगह मजबूत नहीं थी। कई लोग नकली नामों से छिप गए। कुछ ने अपने पुराने संपर्कों का इस्तेमाल किया और कुछ को ऐसे लोगों की मदद मिली जो उन्हें सुरक्षित स्थान तक पहुंचाना चाहते थे। यही वह माहौल था जिसमें बाद में ‘रैटलाइन’ नाम से मशहूर हुए भागने के रास्ते सक्रिय हुए।
‘रैटलाइन’ आखिर क्या था?
‘Ratline’ यानी ‘चूहे की लाइन’ सुनने में ऐसा लगता है जैसे यह कोई एक विशाल गुप्त संगठन था, जिसका मुख्यालय कहीं था और जहां से नाज़ी अपराधियों को एक-एक करके दक्षिण अमेरिका भेजा जाता था। लेकिन इतिहास इससे थोड़ा ज्यादा जटिल है। रैटलाइन वास्तव में अलग-अलग भागने के रास्तों, संपर्कों और मददगारों का एक समूह था। ये नेटवर्क एक जैसे नहीं थे और सभी लोग एक ही संगठन के सदस्य भी नहीं थे। कुछ रास्ते जर्मनी से ऑस्ट्रिया और इटली होते हुए रोम तथा जेनोआ तक जाते थे। वहां से लोग जहाजों के जरिए दक्षिण अमेरिका पहुंचते थे। कुछ नेटवर्क स्पेन के रास्ते भी काम करते थे। इन रास्तों में पूर्व नाज़ी संपर्क, दक्षिणपंथी और फासीवादी समर्थक, कुछ चर्च अधिकारी, स्थानीय सरकारी अधिकारी, एजेंट और दूसरे मददगार शामिल हो सकते थे। इसलिए यह कहना ज्यादा सही है कि ‘रैटलाइन’ एक अकेली संस्था नहीं थी, बल्कि कई आपस में जुड़े और कभी-कभी स्वतंत्र रूप से काम करने वाले भागने के रास्तों का नाम था। यही वजह है कि इतिहासकारों में ओडेसा (ODESSA) को लेकर भी बहस है।
क्या ओडेसा सचमुच नाज़ियों का गुप्त संगठन था?
नाज़ियों के भागने की कहानी में ‘ओडेसा’ नाम बहुत चर्चित हुआ। फिल्मों, किताबों और लोकप्रिय इतिहास में इसे एक ऐसे विशाल गुप्त संगठन के रूप में दिखाया गया है जिसने युद्ध के बाद एसएस अधिकारियों को बचाने का काम किया। लेकिन इतिहासकारों के बीच इस बात पर सहमति नहीं है कि युद्ध के बाद ‘ODESSA’ नाम की एक केंद्रीकृत, एकीकृत और उसी नाम से चलने वाली विशाल संस्था वास्तव में मौजूद थी। कुछ शोधकर्ताओं ने इस नाम का इस्तेमाल नाज़ी अपराधियों के अलग-अलग भागने वाले नेटवर्क के लिए किया है, जबकि दूसरे इतिहासकारों का मानना है कि इससे वास्तविक व्यवस्था जरूरत से ज्यादा संगठित दिखाई देती है। यानी ‘ODESSA’ को लेकर जितनी रोमांचक कहानियां मिलती हैं, वास्तविक इतिहास उससे अधिक बिखरा हुआ था। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि नाज़ी अपराधियों को बचाने वाले नेटवर्क नहीं थे। वे थे। और उनके दस्तावेजी सबूत भी मिलते हैं।
वेटिकन की भूमिका सबसे विवादित क्यों है?
यहीं से इस पूरी कहानी का सबसे संवेदनशील हिस्सा शुरू होता है। युद्ध के बाद इटली में कई नाज़ी और उनके सहयोगी छिपे हुए थे। रोम ऐसा महत्वपूर्ण पड़ाव बन गया जहां से दक्षिण अमेरिका जाने की व्यवस्था की जा सकती थी। इसी दौरान कैथोलिक चर्च से जुड़े कुछ लोगों ने भगोड़ों की मदद की। कुछ कैथोलिक अधिकारियों या पादरियों की भूमिका को पूरी कैथोलिक चर्च या पूरे वेटिकन की आधिकारिक नीति मान लेना इतिहास को बहुत सरल बना देना होगा। बहरहाल, सबसे चर्चित नामों में ऑस्ट्रियाई बिशप अलोइस हुडल और क्रोएशियाई पादरी क्रुनोस्लाव ड्रागानोविच शामिल हैं। अमेरिकी राष्ट्रीय अभिलेखागार में मौजूद दस्तावेजों के अनुसार ड्रागानोविच ने युद्ध के बाद अनेक क्रोएशियाई युद्ध अपराधियों को दक्षिण अमेरिका पहुंचाने में मदद की। बाद में अमेरिकी खुफिया तंत्र ने भी उससे संपर्क रखा और वह अमेरिकी सेना की खुफिया गतिविधियों में काम करने लगा। इससे एक और महत्वपूर्ण बात सामने आती है कि युद्ध के बाद की दुनिया में नैतिकता और शीत युद्ध की राजनीति हमेशा एक दिशा में नहीं चल रही थी। जिस व्यक्ति पर युद्ध अपराधों में भूमिका का आरोप था, वही बाद में कम्युनिस्ट विरोधी खुफिया नेटवर्क के लिए उपयोगी समझा जा सकता था।
आइखमैन की कहानी वेटिकन की भूमिका को कैसे समझाती है?
इस पूरे मामले का सबसे प्रसिद्ध उदाहरण एडॉल्फ आइखमैन है। आइखमैन कोई मामूली नाज़ी अधिकारी नहीं था। वह यूरोपीय यहूदियों को निर्वासन और हत्या के लिए भेजने वाली नाज़ी व्यवस्था में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभा चुका था। युद्ध के बाद वह अमेरिकी हिरासत से भाग गया और छिपकर रहने लगा। बाद में उसने नया नाम अपनाया - रिकार्डो क्लेमेंट। आइखमैन की कहानी के बारे में आधिकारिक ऐतिहासिक स्रोत बताते हैं कि वह 1950 में इटली से अर्जेंटीना पहुंचा। यद वाशेम के रिकॉर्ड के मुताबिक उसे कैथोलिक चर्च से जुड़ा एक ‘certificate of indulgence’ मिला, जिसने उसकी यात्रा में मदद की और वह झूठी पहचान के साथ अर्जेंटीना पहुंच गया। अमेरिकी होलोकॉस्ट मेमोरियल म्यूजियम भी बताता है कि 1946 के बाद आइखमैन अर्जेंटीना पहुंचा और इसमें कुछ वेटिकन अधिकारियों की मदद का उल्लेख मिलता है। यही वह जगह है जहां वेटिकन की भूमिका पर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं।
लेकिन यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि उपलब्ध दस्तावेजों से ‘वेटिकन ने आधिकारिक तौर पर सभी नाज़ियों को बचाने का आदेश दिया था’ जैसी कहानी साबित नहीं होती। मामला ज्यादा जटिल था और इसमें व्यक्तिगत पादरियों, चर्च संस्थानों, शरणार्थी सहायता व्यवस्था और अलग-अलग सरकारी अधिकारियों की भूमिकाएं अलग-अलग थीं।
नकली पासपोर्ट और ‘मानवीय’ दस्तावेज कैसे बने भागने का रास्ता?
युद्ध के बाद बड़ी संख्या में लोग विस्थापित थे। ऐसे लोगों की पहचान और यात्रा के लिए अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और सहायता एजेंसियों की व्यवस्था काम कर रही थी। इस व्यवस्था का उद्देश्य असली शरणार्थियों की मदद करना था। लेकिन इसी व्यवस्था का दुरुपयोग भी हुआ। कुछ नाज़ी अपराधियों ने नए नाम अपनाए। दस्तावेजों में उनकी पुरानी पहचान गायब कर दी गई या बदल दी गई। इसी तरह वे ऐसे रास्तों से यात्रा करने में सफल हुए जिनका मूल उद्देश्य युद्ध और विस्थापन से प्रभावित लोगों की मदद करना था। आइखमैन इसका एक बड़ा उदाहरण था। वह ‘रिकार्डो क्लेमेंट’ के नाम से अर्जेंटीना पहुंचा और वर्षों तक वहां सामान्य जीवन जीता रहा। 1950 के दशक में वह अर्जेंटीना में इतना सुरक्षित महसूस कर रहा था कि परिवार के साथ रहने लगा। लेकिन 1960 में इजरायली एजेंटों ने उसे पकड़ लिया। बाद में यरुशलम में उसका मुकदमा चला और 1962 में उसे फांसी दी गई।
अर्जेंटीना ही सबसे बड़ा ठिकाना क्यों बना?
अब सवाल आता है कि दक्षिण अमेरिका में अर्जेंटीना ही सबसे महत्वपूर्ण ठिकाना क्यों बना? जवाब है कि इसमें जुआन डोमिंगो पेरोन की नीतियां इसमें महत्वपूर्ण थीं। पेरोन 1946 में अर्जेंटीना के राष्ट्रपति बने। वे यूरोपीय फासीवादी राजनीति से प्रभावित रहे थे और युद्ध के बाद उन्होंने यूरोप से वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और तकनीकी विशेषज्ञों को अर्जेंटीना लाने में दिलचस्पी दिखाई। युद्ध ने जर्मनी की तकनीकी क्षमता को पूरी तरह खत्म नहीं किया था। रॉकेट, विमान, इंजीनियरिंग, सैन्य तकनीक और औद्योगिक अनुसंधान में जर्मन विशेषज्ञों का बड़ा अनुभव था। पेरोन अर्जेंटीना को एक मजबूत औद्योगिक और सैन्य शक्ति बनाना चाहते थे। इसलिए जर्मन तकनीकी विशेषज्ञों को लाने की कोशिश अपने आप में कोई असामान्य बात नहीं थी। समस्या तब पैदा हुई जब इसी बड़े प्रवाह के बीच ऐसे लोग भी अर्जेंटीना पहुंचने लगे जिनका संबंध नाज़ी अपराधों से था।
अर्जेंटीना के होलोकॉस्ट म्यूजियम के शोध के अनुसार, युद्ध के बाद जर्मन प्रवासियों को आकर्षित करने की नीति के पीछे अर्जेंटीना का औद्योगिक और जनसंख्या विकास भी था। इसी व्यापक प्रवास के बीच नाज़ी और सहयोगी भी देश में प्रवेश कर गए। अमेरिकी सीनेट के लिए 2026 में प्रस्तुत शोध-सामग्री में भी कहा गया है कि पेरोन सरकार ने नाज़ी वैज्ञानिकों और तकनीकी विशेषज्ञों को अर्जेंटीना लाने की योजना बनाई थी, खास तौर पर सैन्य और तकनीकी क्षमता बढ़ाने के उद्देश्य से। लेकिन इस व्यवस्था का लाभ उन लोगों ने भी उठाया जिनके पास कोई विशेष तकनीकी योग्यता नहीं थी।
पेरोन नाज़ियों को क्यों बचाना चाहते थे?
इसके पीछे कई कारण थे। एक कारण वैचारिक था। पेरोन की राजनीति में यूरोपीय फासीवाद का प्रभाव दिखाई देता था। दूसरा कारण रणनीतिक था। उन्हें लगता था कि जर्मन तकनीक अर्जेंटीना को मजबूत बना सकती है। तीसरा कारण शीत युद्ध था। 1945 के बाद दुनिया तेजी से अमेरिका और सोवियत संघ के दो खेमों में बंटने लगी। कम्युनिज्म का डर बढ़ रहा था। ऐसे माहौल में कई पश्चिमी देशों ने भी पूर्व नाज़ी अधिकारियों और खुफिया विशेषज्ञों के साथ संबंध बनाए। चौथा कारण यह था कि अर्जेंटीना के पास यूरोप से आए जर्मन लोगों का पहले से बड़ा समुदाय था। इसलिए किसी जर्मन नाम वाले व्यक्ति के लिए वहां घुल-मिल जाना अपेक्षाकृत आसान हो सकता था। लेकिन यह कहना कि अर्जेंटीना में आने वाला हर जर्मन नाज़ी था, बिल्कुल गलत होगा। बड़ी संख्या में जर्मन प्रवासी ऐसे थे जिनका नाज़ी अपराधों से कोई संबंध नहीं था। यही फर्क ऐतिहासिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण है।
ब्राज़ील क्यों पहुंचते थे नाज़ी?
अर्जेंटीना के मुकाबले ब्राज़ील की भूमिका कुछ अलग थी। ब्राज़ील भी जर्मन प्रवासियों का पुराना ठिकाना था और वहां नाज़ी अपराधियों के लिए समुदाय और संपर्क उपलब्ध थे। लेकिन दक्षिण अमेरिका में नाज़ी भागने वालों का सबसे बड़ा पसंदीदा ठिकाना अर्जेंटीना ही रहा। फिर भी कुछ बेहद महत्वपूर्ण अपराधी ब्राज़ील पहुंचे। सबसे प्रसिद्ध नाम जोसेफ मेंगले का है। मेंगले ऑशविट्ज में कैदियों पर अमानवीय प्रयोगों के लिए कुख्यात था। वह 1949 में अर्जेंटीना पहुंचा। बाद में अर्जेंटीना से पैराग्वे गया और फिर ब्राज़ील पहुंचा। वह ब्राज़ील में नकली नाम से वर्षों तक रहा। 1979 में उसकी मौत हुई। उसके शव की पहचान बाद में फोरेंसिक जांच और 1992 में डीएनए परीक्षण से पक्की हुई।
ब्राज़ील में फ्रांज स्टैंगल जैसे लोग भी पहुंचे। स्टैंगल सोबिबोर और ट्रेब्लिंका के हत्या केंद्रों का कमांडेंट रह चुका था। युद्ध के बाद वह यूरोप से निकलकर सीरिया और फिर ब्राज़ील पहुंचा। बाद में उसे गिरफ्तार कर जर्मनी लाया गया और मुकदमा चला। इसलिए ब्राज़ील को नाज़ियों का सबसे बड़ा ठिकाना कहना सही नहीं होगा, लेकिन यह निश्चित रूप से उन देशों में था जहां कुछ बड़े अपराधी लंबे समय तक छिपे रहे।
दक्षिण अमेरिका ही क्यों?
उस समय दक्षिण अमेरिका यूरोप से हजारों किलोमीटर दूर था। यह दूरी अपने आप में सुरक्षा देती थी। अगर कोई अपराधी अर्जेंटीना या ब्राज़ील पहुंच गया, तो यूरोप की पुलिस और जांच एजेंसियों के लिए उसे पकड़ना बहुत मुश्किल हो जाता था। इसके अलावा कई देशों में जर्मन और इतालवी मूल के बड़े समुदाय पहले से मौजूद थे। भाषा, कारोबार और सामाजिक संपर्क के कारण नए नाम से जीवन शुरू करना संभव था। और सबसे महत्वपूर्ण बात ये कि युद्ध के बाद दुनिया की प्राथमिकताएं बदल रही थीं। 1945 में नाज़ी अपराधियों को पकड़ना सबसे बड़ा लक्ष्य था। लेकिन कुछ ही वर्षों में सोवियत संघ और पश्चिमी देशों के बीच टकराव बढ़ने लगा। अब सवाल था कि कम्युनिज्म के खिलाफ किसके पास उपयोगी जानकारी है? यही वह मोड़ था जहां कुछ पूर्व नाज़ी अधिकारियों की उपयोगिता अचानक बदल गई।
अमेरिका और ब्रिटेन भी इस कहानी से पूरी तरह बाहर नहीं थे
नाज़ी अपराधियों के भागने की कहानी सिर्फ वेटिकन और अर्जेंटीना की कहानी नहीं थी। शीत युद्ध ने अमेरिका और ब्रिटेन समेत पश्चिमी देशों को भी पूर्व नाज़ी खुफिया अधिकारियों और वैज्ञानिकों के साथ काम करने के लिए प्रेरित किया। अमेरिका ने कुछ पूर्व नाज़ी वैज्ञानिकों और खुफिया विशेषज्ञों को अपने कार्यक्रमों में इस्तेमाल किया। सबसे चर्चित उदाहरण ‘Operation Paperclip’ है, जिसके जरिए जर्मन वैज्ञानिकों को अमेरिका लाया गया। इसी तरह अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने पूर्व नाज़ी खुफिया अधिकारियों से भी संपर्क किया। यह विरोधाभास बेहद महत्वपूर्ण है। दुनिया ने नूर्नबर्ग में नाज़ी अपराधों की निंदा की, लेकिन शीत युद्ध शुरू होते ही कुछ पूर्व नाज़ियों की जानकारी और विशेषज्ञता को रणनीतिक संपत्ति की तरह देखा जाने लगा। यानी 1945 के बाद की दुनिया में ‘न्याय’ और ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ कई बार एक-दूसरे से टकरा रहे थे।
क्या वेटिकन ने जानबूझकर नाज़ियों को बचाया?
यह तथ्य दर्ज है कि चर्च से जुड़े कुछ लोगों ने नाज़ी अपराधियों और सहयोगियों की भागने में मदद की। आइखमैन और क्रोएशियाई युद्ध अपराधियों से जुड़े दस्तावेज इस बात को मजबूत करते हैं। ड्रागानोविच की भूमिका अमेरिकी अभिलेखागार में भी दर्ज है। लेकिन इससे यह निष्कर्ष निकालना कि कैथोलिक चर्च का हर अधिकारी या पूरा वेटिकन नाज़ी भागने की योजना में शामिल था, सही नहीं है। युद्ध के बाद यूरोप में चर्च से जुड़े कई लोग शरणार्थियों की सहायता भी कर रहे थे। समस्या यह थी कि उस सहायता व्यवस्था का कुछ हिस्सा अपराधियों ने भी इस्तेमाल कर लिया और कुछ चर्च अधिकारियों ने जानबूझकर उनकी मदद की। यही इस इतिहास का सबसे कठिन और विवादित हिस्सा है।
फिर ‘रैटलाइन’ खत्म कैसे हुई?
समय के साथ दुनिया को पता चलने लगा कि दक्षिण अमेरिका में नाज़ी अपराधी छिपे हुए हैं। नाज़ी शिकारी साइमन विसेंथल और दूसरे जांचकर्ताओं ने उनकी तलाश जारी रखी। लेकिन कई लोग दशकों तक बचते रहे। आइखमैन की गिरफ्तारी ने पूरी दुनिया का ध्यान इस मुद्दे पर खींच दिया। 1960 में इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद ने उसे अर्जेंटीना से पकड़ लिया और इजरायल ले गई। उसका मुकदमा 1961 में शुरू हुआ और उसने नाज़ी शासन की मशीनरी में अपनी भूमिका के बारे में दुनिया के सामने गवाही दी। मेंगले कभी मुकदमे के सामने नहीं आया। स्टैंगल पकड़ा गया। क्लाउस बार्बी जैसे दूसरे अपराधी भी लंबे समय तक दक्षिण अमेरिका में रहे। अमेरिकी होलोकॉस्ट मेमोरियल म्यूजियम के अनुसार बार्बी को अमेरिकी सैन्य खुफिया तंत्र से जुड़े लोगों ने भी दक्षिण अमेरिका भागने में मदद की थी। इससे साफ होता है कि नाज़ी अपराधियों के भागने की कहानी किसी एक देश, संस्था या विचारधारा की कहानी नहीं थी।
इस पूरी कहानी से क्या समझ आता है?
हिटलर की मौत और नाज़ी जर्मनी के पतन के साथ नाज़ीवाद खत्म नहीं हुआ था। उसके अपराधियों का पीछा कई दशकों तक चलता रहा। दक्षिण अमेरिका, खासकर अर्जेंटीना, उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण गंतव्य बना जो यूरोप में न्याय से बचना चाहते थे। ब्राज़ील भी कई अपराधियों का ठिकाना बना, हालांकि वह अर्जेंटीना जितना बड़ा केंद्र नहीं था। ‘रैटलाइन’ कोई एक जादुई गुप्त संगठन नहीं था। यह अलग-अलग भागने के रास्तों और मददगारों का जाल था। इसमें पूर्व नाज़ी संपर्कों से लेकर स्थानीय अधिकारी, कुछ चर्च से जुड़े लोग, नकली दस्तावेज बनाने वाले और अलग-अलग देशों के सरकारी तंत्र के लोग शामिल हो सकते थे। वेटिकन की कहानी भी इसी वजह से बेहद संवेदनशील है। यह कहना गलत होगा कि पूरा चर्च नाज़ियों को बचा रहा था, लेकिन यह भी इतिहास के दस्तावेजों के खिलाफ होगा कि चर्च से जुड़े कुछ प्रभावशाली लोगों ने नाज़ी अपराधियों की भागने में मदद नहीं की। और अर्जेंटीना की भूमिका को भी सिर्फ ‘नाज़ियों का देश’ कहकर समझना पर्याप्त नहीं है। वहां बड़ी संख्या में सामान्य यूरोपीय प्रवासी भी आए। लेकिन पेरोन सरकार की नीतियों, तकनीकी विशेषज्ञों की तलाश, राजनीतिक विचारधारा और प्रशासनिक मदद ने कुछ कुख्यात अपराधियों के लिए वहां पहुंचना और छिपना संभव बनाया। सबसे बड़ा सबक शायद यही है कि किसी तानाशाही के गिरने के साथ उसके अपराधों की कहानी खत्म नहीं होती। सत्ता बदल सकती है, सरकार गिर सकती है, युद्ध खत्म हो सकता है, लेकिन अपराधियों को न्याय तक पहुंचाने का काम कई दशक तक चल सकता है। और इतिहास का एक दूसरा कड़वा सच भी यही है कि जब दुनिया का राजनीतिक नक्शा बदलता है, तो कल के अपराधी कभी-कभी आज की नई राजनीति के लिए उपयोगी साबित होने लगते हैं। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद नाज़ी अपराधियों की भागने की कहानी इसी विरोधाभास की सबसे भयावह मिसालों में से एक है।


