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Octopus Facts in Hindi: ऑक्टोपस के 3 दिल, नीला खून और 9 दिमाग क्यों? जानिए विज्ञान
Octopus Facts in Hindi: ऑक्टोपस के 3 दिल और नीला खून क्यों होता है? क्या उसके सच में 9 दिमाग होते हैं? जानिए ऑक्टोपस के अनोखे नर्वस सिस्टम, बुद्धिमत्ता और इसके पीछे का विज्ञान।
Octopus Facts in Hindi
Octopus Facts in Hindi: समुद्र की गहराइयों में रेंगता एक ऐसा जीव, जिसके शरीर में हड्डी नहीं होती जबकि दिल तीन होते हैं, खून का रंग नीला होता है और उसके दिमाग की बनावट इतनी अनोखी है कि वैज्ञानिक आज भी बहस करते हैं कि उसे 'एक दिमाग वाला' कहें या 'नौ दिमाग वाला'! ये जीव है ऑक्टोपस। धरती पर मौजूद सबसे अजीबोगरीब और सबसे चतुर जीवों में से एक है। आइए समझते हैं, इस जीव की बनावट इतनी अनोखी क्यों है, और इसका दिमाग असल में कैसे काम करता है।
तीन दिल क्यों?
ऑक्टोपस के शरीर में इंसानों की तरह एक नहीं, बल्कि तीन अलग-अलग दिल होते हैं और हर एक का काम बिल्कुल अलग होता है। इनमें से दो 'ब्रैंकियल हार्ट' (गिल हार्ट) कहलाते हैं, जो ऑक्टोपस के दो गिल्स (गलफड़ों) के पास स्थित होते हैं और शरीर से आ रहे ऑक्सीजन-रहित (deoxygenated) खून को गिल्स तक पहुंचाते हैं, जहां वह ऑक्सीजन ग्रहण करता है। इसके बाद तीसरा 'सिस्टमिक हार्ट' इस नए ऑक्सीजन युक्त खून को शरीर के बाकी हिस्सों और अंगों तक पहुंचाता है।
यह व्यवस्था इंसानों से इतनी अलग क्यों है
ऑक्टोपस (octopus) का सर्कुलेटरी सिस्टम (circulatory system) काम को बांटता है लेकिन वैसे नहीं जैसा किसी अन्य स्तनधारी में होता है। दो पेरिफेरल (बाहरी) हार्ट, जिन्हें ब्रैंकियल हार्ट (bronchial heart) कहा जाता है, गिल टिश्यू के पास स्थित होते हैं। हर ब्रैंकियल हार्ट शरीर से आ रहा ऑक्सीजन रहित खून लेता है और उसे गिल टिश्यू में पंप करता है, जहां वह समुद्री पानी से ऑक्सीजन सोखता है। यह 'गिल-पंपिंग' सिस्टम एक ऐसे माहौल में गैस के आदान-प्रदान को सुनिश्चित करता है जहां ऑक्सीजन आसानी से उपलब्ध नहीं होती।
नीला खून भी एक हकीकत है
अगर आप कभी किसी ऑक्टोपस को कटते या घायल होते देखें, तो चौंक जाएंगे। उसका खून नीला निकलता है। वजह है कि ऑक्टोपस का खून ऑक्सीजन पहुंचाने के लिए हीमोग्लोबिन (hemoglobin) की जगह हीमोसायनिन (hemosynin) का इस्तेमाल करता है। जहां हीमोग्लोबिन आयरन-युक्त यौगिक (compound) है जो इंसानी खून को लाल रंग देता है, वहीं हीमोसायनिन कॉपर (तांबे) पर आधारित है और यह ऑक्सीजन से जुड़ने पर नीला हो जाता है।
हीमोसायनिन एक बड़ा ही जटिल प्रोटीन है जिसके केंद्र में तांबे के दो परमाणु होते हैं। जब ऑक्सीजन इन तांबे के परमाणुओं से जुड़ता है, तो यह एक खास नीला रंग पैदा करता है बिल्कुल वैसे ही जैसे तांबा लंबे समय तक हवा के संपर्क में रहने पर नीली-हरी परत (पेटिना) बना लेता है।
यह सिर्फ रंग का मामला नहीं
यह सिर्फ एक अजीब संयोग नहीं, बल्कि करोड़ों सालों के विकास (evolution) का नतीजा है। ठंडे, कम ऑक्सीजन वाले गहरे समुद्र जैसे वातावरण में, जहां ज्यादातर ऑक्टोपस प्रजातियां रहती हैं, ऑक्सीजन पहुंचाने में तांबा आयरन से ज्यादा कारगर साबित होता है। ऑक्टोपस के तीन दिल होते हैं और उन्हें ज्यादातर दूसरे अकशेरुकी (invertebrate) जीवों से ज्यादा ऑक्सीजन की जरूरत होती है, इसलिए हीमोसायनिन उन्हें एक स्थिर ऑक्सीजन आपूर्ति देता है, तब भी जब आसपास के वातावरण में ऑक्सीजन आसानी से उपलब्ध न हो। यह उन्हें ऐसे तापमान में भी जीवित रहने की क्षमता देता है, जो कई जीवों के लिए घातक साबित हो सकता है। माइनस 1.8 डिग्री सेल्सियस जितने ठंडे पानी से लेकर समुद्र के थर्मल वेंट्स (गर्म झरनों) के पास के अत्यधिक गर्म तापमान तक।
दुर्भाग्य से, ऑक्टोपस का यह खून पानी की अम्लता (acidity) में बदलाव के प्रति बेहद संवेदनशील भी बनाता है। अगर आसपास के पानी का पीएच (pH) बहुत ज्यादा गिर जाए, तो ये जीव पर्याप्त ऑक्सीजन का संचार नहीं कर पाते और उनकी जान को खतरा हो सकता है। यही वजह है कि वैज्ञानिक चिंतित हैं कि जलवायु परिवर्तन के चलते बढ़ती समुद्री अम्लता का ऑक्टोपस पर क्या असर पड़ेगा।
तीन दिल के बावजूद तैरना इतना थकाऊ क्यों
यहां आती है इस जीव की सबसे अनोखी और दिलचस्प खासियत। जब ऑक्टोपस जेट-प्रोपल्शन (अपने साइफन से पानी का तेज़ झोंका छोड़कर) तैरता है, तो उसका सिस्टमिक हार्ट धड़कना बंद कर देता है। यही वजह है कि तैरना इन जीवों को बहुत जल्दी थका देता है, क्योंकि उनके शरीर को कम ऑक्सीजन आपूर्ति पर काम करना पड़ता है। इसीलिए ऑक्टोपस तैरने की बजाए अपनी आठ भुजाओं का इस्तेमाल करते हुए चट्टानों और मूंगों पर रेंगना पसंद करते हैं। इस खास कार्डियोवैस्कुलर बनावट वाले जीव के लिए चलना, तैरने से कहीं ज्यादा अच्छा है।
क्या सच में 9 दिमाग होते हैं
इस जीव के सबसे रहस्यमयी पहलू इसका नर्वस सिस्टम है। ऑक्टोपस के नर्वस सिस्टम में करीब 50 करोड़ न्यूरॉन्स होते हैं, जबकि इंसानी दिमाग में करीब 8,600 करोड़ न्यूरॉन्स होते हैं। यानी इंसान के मुकाबले ऑक्टोपस के पास सिर्फ 170वां हिस्सा न्यूरॉन्स हैं। लेकिन असली दिलचस्पी की बात यह नहीं कि कितने न्यूरॉन्स हैं, बल्कि यह है कि वे कहां स्थित हैं।
ऑक्टोपस का केंद्रीय दिमाग उसकी आंखों के बीच स्थित होता है, और इसका आकार एक खास 'डोनट' जैसा होता है। यह उसके भोजन नली (esophagus) के चारों ओर एक छल्ले की तरह बना होता है।
ऑक्टोपस के 'नौ दिमाग' वाली इस अवधारणा का स्रोत है इसके आठ बड़े नर्व सेंटर, जिन्हें 'गैंग्लिया' कहा जाता है। ये ऑक्टोपस की हर भुजा में मौजूद होते हैं। हर भुजा में एक विशाल 'एक्सियल नर्व कॉर्ड' होता है, जो केंद्रीय दिमाग से अलग, एक अर्ध-स्वायत्त (semi-autonomous) प्रोसेसिंग यूनिट की तरह काम करता है। ऑक्टोपस के कुल न्यूरॉन्स का करीब दो-तिहाई हिस्सा यानी लगभग 32 करोड़ इन्हीं आठ भुजाओं में फैला हुआ है। यानी हर भुजा में इतनी प्रोसेसिंग पावर है जो कई दूसरे ऐसे जीवों के पूरे नर्वस सिस्टम से भी ज्यादा है।
भुजाएं खुद 'सोचती' हैं
एक प्रयोग में पाया गया कि जब ऑक्टोपस के शरीर से अलग की गई बांह को बिजली के झटके से उत्तेजित किया गया तब भी वह उन्हीं बुनियादी पैटर्न में हिली जैसे कोई ऑक्टोपस से जुड़ी हुई और स्वाभाविक रूप से नियंत्रित बांह हिलती है। यानी बांह को खुद सोचने और हरकत करने के लिए केंद्रीय दिमाग की जरूरत ही नहीं पड़ती।
हर बांह स्पर्श, स्वाद और गति को स्थानीय स्तर पर ही प्रोसेस कर सकती है। केंद्रीय दिमाग हर हरकत को माइक्रोमैनेज नहीं करता। ऑक्टोपस की समझदारी बंटी हुई (distributed) होती है: केंद्रीय दिमाग बड़ी दिशा तय करता है, जबकि भुजाओं के सर्किट रियल-टाइम में ज्यादातर व्यावहारिक काम खुद संभालते हैं।
तो क्या यह वाकई 9 अलग-अलग 'दिमाग' हैं
यह धारणा कि ऑक्टोपस के पास 9 दिमाग हैं, उसके नर्वस सिस्टम की वाकई अनोखी बनावट पर आधारित एक लोकप्रिय अवधारणा है। जबकि तकनीकी तौर पर ऐसा नहीं है। लेकिन ऑक्टोपस के नर्व टिश्यू का यह जटिल बंटवारा धरती के लगभग किसी भी दूसरे जीव जैसा नहीं है, और यही वजह है कि यह व्यापक धारणा बनी है।
यह डिज़ाइन इंसानी रोबोटिक्स को भी सिखा रहा है
दिलचस्प बात यह है कि ऑक्टोपस की शरीर में बंटी हुई इंटेलिजेंस अब सिर्फ जीव विज्ञान का विषय नहीं रह गई बल्कि यह इंजीनियरिंग की दुनिया को भी प्रेरित कर रही है। 2022 में फ्रंटियर्स इन रोबोटिक्स एंड एआई जर्नल में प्रकाशित एक शोधपत्र में तर्क दिया गया कि ऑक्टोपस जैसी भुजा के लिए पारंपरिक केंद्रीकृत नियंत्रण (सेंट्रल प्लानिंग) व्यावहारिक तौर पर असंभव जितना जटिल होगा। ऑक्टोपस एक अलग तरीका सुझाता है कि भुजा में ही ज्यादा इंटेलिजेंस डालें, स्थानीय समस्याओं को स्थानीय नियंत्रण से सुलझाने दें, और केंद्रीय सिस्टम को हर बारीक हरकत तय करने के बजाय सिर्फ दिशा दिखाने का काम दें। यह सिर्फ जीव विज्ञान की एक दिलचस्प जानकारी नहीं है बल्कि यह एक डिज़ाइन दर्शन (design philosophy) है। हमेशा एक बड़े केंद्रीय दिमाग की जरूरत नहीं होती, कभी-कभी ज्यादा चतुर 'किनारों' (edges) की जरूरत होती है।
इंसानी जैसी बुद्धिमत्ता के सबूत क्या हैं
सिर्फ न्यूरॉन्स की बनावट ही नहीं, ऑक्टोपस का व्यवहार भी असाधारण बुद्धिमत्ता दिखाता है। ऑक्टोपस औजारों (tools) का इस्तेमाल करते हैं, पहेलियां सुलझाते हैं, बोरियत होने पर खेलते हैं, अलग-अलग व्यक्तित्व (individual personalities) दिखाते हैं, और यहां तक कि सपने देखते हुए भी नजर आते हैं। 2022 में ब्रिटेन ने आधिकारिक तौर पर इन्हें संवेदनशील (sentient) प्राणी के तौर पर मान्यता दी। इन जीवों में छोटी और लंबी अवधि की याददाश्त होती है, और ये अलग-अलग इंसानों को नज़र से पहचान भी सकते हैं। एक्वेरियम में हुए परीक्षणों में ऑक्टोपस दवा की शीशियां (child-resistant pill bottles) तक खोल चुके हैं। ये उनकी असाधारण समस्या समाधान क्षमता का सबूत है।
इंसान और ऑक्टोपस के दिमाग में असली फर्क क्या है
सबसे बड़ा फर्क सिर्फ आकार का नहीं, बल्कि डिज़ाइन के दर्शन का है। इंसानी दिमाग एक केंद्रीकृत (centralized) सिस्टम है जहां लगभग हर फैसला, चाहे वह उंगली हिलाना हो या कोई बड़ा निर्णय, दिमाग से होकर गुजरता है। ऑक्टोपस का सिस्टम इसके उलट, एक विकेंद्रीकृत (decentralized) नेटवर्क है जहां केंद्रीय दिमाग सिर्फ बड़ी रणनीति तय करता है, और असली, तुरंत लिए जाने वाले फैसले भुजाओं के अपने स्थानीय "मिनी-दिमाग" करते हैं।
ऑक्टोपस सिर्फ एक अजीब समुद्री जीव नहीं है। यह एवोल्यूशन के उन सबसे बेहतरीन प्रयोगों में से एक है, जो साबित करता है कि बुद्धिमत्ता और जीवन रक्षा के लिए इंसानी शरीर जैसा एक केंद्रीकृत ढांचा ही एकमात्र रास्ता नहीं। तीन दिल, तांबे पर आधारित नीला खून, और भुजाओं में बंटा हुआ दिमाग - ये सारी अनोखी बनावटें अलग-अलग समस्याओं के जवाब में विकसित हुईं। और यही वजह है कि आज वैज्ञानिक और इंजीनियर, दोनों ही ऑक्टोपस से सीखने की कोशिश कर रहे हैं, चाहे वह समुद्री जीव विज्ञान हो, या भविष्य के रोबोट्स का डिज़ाइन।


