TRENDING TAGS :
Newstrack Special: ओजेम्पिक जैसी दवाएं सिर्फ भूख नहीं, नशे की तलब भी कम कर रही हैं?
Ozempic Addiction Cravings Explained: क्या ओजेम्पिक जैसी GLP-1 दवाएं सिर्फ भूख ही नहीं, शराब और दूसरी नशे की तलब भी कम कर सकती हैं? जानिए सेमाग्लूटाइड दिमाग के रिवॉर्ड सिस्टम और क्रेविंग पर कैसे असर डाल सकती है और रिसर्च क्या कहती है।
Ozempic Addiction Cravings Explained
Ozempic Addiction Cravings Explained: कुछ साल पहले तक ओजेम्पिक (Ozempic ) जैसी दवाओं की कहानी मोटापा और डायबिटीज तक सीमित थी। फिर लोगों ने नोटिस किया कि इन दवाओं को लेने के बाद सिर्फ खाने की इच्छा ही कम नहीं हो रही, बल्कि कुछ लोगों में शराब पीने, धूम्रपान करने और दूसरी चीजों की तलब भी घट रही है। अब वैज्ञानिक यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है। क्या पेट और दिमाग के बीच ऐसा कोई रास्ता है जो भूख और नशे की तलब दोनों को नियंत्रित करता है? क्या ओजेम्पिक सचमुच दिमाग के उस सिस्टम को प्रभावित कर सकती है जो हमें किसी चीज की “क्रेविंग” महसूस कराता है? और क्या भविष्य में ऐसी दवाएं नशे की लत के इलाज का हिस्सा बन सकती हैं?
हाल के शोध इस संभावना को गंभीरता से देख रहे हैं। लेकिन यहां एक जरूरी सावधानी भी है - ओजेम्पिक या सेमाग्लूटाइड (Semaglutide ) को अभी सामान्य नशामुक्ति की दवा नहीं माना जा सकता। इसके असर को लेकर शुरुआती मानव अध्ययनों के नतीजे उत्साहजनक हैं, लेकिन अभी बड़े और लंबे क्लिनिकल ट्रायल की जरूरत है।
ओजेम्पिक करती क्या है?
ओजेम्पिक में सेमाग्लूटाइड (Semaglutide) नाम की दवा होती है। यह GLP-1 रिसेप्टर एगोनिस्ट नाम की दवाओं के समूह का हिस्सा है। GLP-1 हमारे शरीर में स्वाभाविक रूप से बनने वाला एक हार्मोन है, जो खाना खाने के बाद शरीर को यह संकेत देने में मदद करता है कि अब पर्याप्त ऊर्जा मिल गई है। सेमाग्लूटाइड इसी सिस्टम की नकल करती है। यह इंसुलिन के काम को प्रभावित करती है, ब्लड शुगर को नियंत्रित करने में मदद करती है और पेट खाली होने की गति को धीमा करती है। इसका एक बड़ा असर दिमाग में भूख और खाने की इच्छा से जुड़े सिस्टम पर भी पड़ता है। इसी वजह से इसे लेने वाले कई लोगों को जल्दी पेट भरा हुआ महसूस होता है और खाने की मात्रा कम हो जाती है। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती।
भूख और नशे की तलब में एक समानता है
हम सोचते हैं कि भूख और शराब या निकोटीन की तलब बिल्कुल अलग चीजें हैं। लेकिन दिमाग में इनके पीछे काम करने वाले कुछ सिस्टम एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। जब हमें कोई स्वादिष्ट खाना मिलता है तो दिमाग का रिवॉर्ड सिस्टम सक्रिय होता है। डोपामिन जैसे रसायन इस अनुभव में भूमिका निभाते हैं। इसी तरह शराब, निकोटीन और दूसरी नशीली चीजें भी दिमाग के रिवॉर्ड सर्किट को प्रभावित करती हैं। यानी दिमाग के लिए सवाल सिर्फ यह नहीं है कि टमुझे भूख लगी है या नहीं।‘ वह यह भी तय करता है कि “मुझे यह चीज कितनी चाहिए?”
यहीं GLP-1 का सिस्टम दिलचस्प हो जाता है।
वैज्ञानिकों ने पाया है कि GLP-1 के रिसेप्टर सिर्फ शरीर के उन हिस्सों में नहीं हैं जो भूख और पाचन को नियंत्रित करते हैं। वे दिमाग के उन हिस्सों में भी पाए जाते हैं जो रिवॉर्ड और प्रेरणा से जुड़े हैं। इनमें वेंट्रल टेगमेंटल एरिया और न्यूक्लियस अक्यूम्बेंस जैसे क्षेत्र शामिल हैं।
दिमाग में कोई एक ‘क्रेविंग सेंटर’ नहीं है
यहां एक बात साफ करना जरूरी है। वैज्ञानिकों ने दिमाग में ऐसा कोई एक छोटा-सा हिस्सा नहीं खोज लिया है जिसे दबाते ही हर तरह की तलब खत्म हो जाए। “क्रेविंग सेंटर” एक आसान और आकर्षक शब्द है, लेकिन असल में क्रेविंग कई दिमागी नेटवर्क के बीच होने वाली गतिविधि से पैदा होती है। इसमें रिवॉर्ड सिस्टम, याददाश्त, भावनाएं, आदतें, तनाव और किसी चीज से जुड़े संकेत, सभी भूमिका निभाते हैं।
मसलन, किसी व्यक्ति को शराब की बोतल दिखाई देती है, वह किसी बार के पास से गुजरता है या दोस्तों के साथ बैठता है तो उसके दिमाग में पुरानी यादें और रिवॉर्ड सिस्टम सक्रिय हो सकते हैं। अचानक शराब पीने की इच्छा पैदा हो सकती है। इसे ही आसान भाषा में क्रेविंग कहते हैं। अब वैज्ञानिक यह देख रहे हैं कि GLP-1 दवाएं इस पूरे रिवॉर्ड नेटवर्क की प्रतिक्रिया को कितना कम कर सकती हैं।
GLP-1 दिमाग के रिवॉर्ड सिस्टम को कैसे प्रभावित कर सकता है?
इसका पूरा तरीका अभी समझा नहीं गया है, लेकिन मौजूदा शोध से एक तस्वीर उभर रही है। नशे की चीजें दिमाग के मेसोलिम्बिक रिवॉर्ड सिस्टम में डोपामिन से जुड़ी गतिविधियों को बढ़ा सकती हैं। यही सिस्टम किसी अनुभव को “फायदेमंद” या “दोबारा करने लायक” महसूस कराने में भूमिका निभाता है। पशुओं पर किए गए कई अध्ययनों में GLP-1 रिसेप्टर को सक्रिय करने वाली दवाओं ने शराब, निकोटीन, कोकीन, ओपिओइड और दूसरे नशीले पदार्थों के सेवन तथा उन्हें दोबारा पाने की कोशिश जैसे व्यवहारों को कम किया है। इन प्रभावों को दिमाग के रिवॉर्ड सर्किट में GLP-1 की गतिविधि और डोपामिन सिग्नलिंग में बदलाव से जोड़ा गया है। यही वह वैज्ञानिक आधार है जिसकी वजह से अब ओजेम्पिक जैसी दवाओं को नशे की लत के इलाज के लिए भी जांचा जा रहा है।
क्या इंसानों में भी इसका असर दिखा है?
अब तक के शुरुआती नतीजे खास तौर पर शराब के मामले में दिलचस्प हैं। 2025 में प्रकाशित एक छोटे रैंडमाइज्ड क्लिनिकल ट्रायल में शराब से जुड़ी समस्या वाले 48 लोगों को शामिल किया गया। कम खुराक वाली साप्ताहिक सेमाग्लूटाइड लेने वाले लोगों में शराब की craving कम हुई और कुछ परिस्थितियों में शराब की खपत भी कम हुई। अध्ययन में शराब पीने वाले दिनों की औसत संख्या में स्पष्ट बदलाव नहीं मिला, लेकिन जिस दिन शराब पी गई उस दिन मात्रा कम होने और craving घटने के संकेत मिले। फिर 2026 में प्रकाशित एक और छोटे चरण-2 अध्ययन ने ओरल सेमाग्लूटाइड को मध्यम से गंभीर Alcohol Use Disorder वाले 50 लोगों में देखा। इस अध्ययन में प्रयोगशाला में मापी गई क्रेविंग का मुख्य परिणाम प्लेसीबो से महत्वपूर्ण रूप से अलग नहीं था, लेकिन भारी शराब पीने वाले दिनों, एक बार में पी जाने वाली मात्रा और रोजमर्रा की शराब की क्रेविंग में कमी के संकेत मिले। इससे तस्वीर थोड़ी साफ भी होती है और थोड़ी जटिल भी। दवा का असर दिखाई दे रहा है, लेकिन हर अध्ययन में हर पैमाने पर एक जैसा असर नहीं दिखा। यही वजह है कि वैज्ञानिक अभी इसे पक्का इलाज नहीं कह रहे हैं।
सबसे मजबूत सबूत किस जगह मिला?
2026 में प्रकाशित एक और रैंडमाइज्ड ट्रायल में मोटापे और Alcohol Use Disorder वाले 108 लोगों को शामिल किया गया। इसमें साप्ताहिक सेमाग्लूटाइड लेने वाले समूह में भारी शराब पीने वाले दिनों में प्लेसीबो की तुलना में ज्यादा कमी देखी गई। शोधकर्ताओं ने शराब से जुड़े कई दूसरे परिणामों में भी सुधार पाया। लेकिन यह भी छोटा अध्ययन था और इसके प्रतिभागियों में मोटापा और शराब से जुड़ी समस्या दोनों थीं। इसलिए इसके नतीजों को हर व्यक्ति पर लागू नहीं किया जा सकता। यही वजह है कि हालिया समीक्षाएं GLP-1 दवाओं को संभावित नई उपचार पद्धति तो मान रही हैं, लेकिन अभी इसे स्थापित नशामुक्ति उपचार नहीं मानतीं। 2026 की एक व्यवस्थित समीक्षा में 41 अध्ययनों को देखा गया, जिनमें 35 पशु-अध्ययन और केवल छह क्लिनिकल अध्ययन थे। समीक्षा ने माना कि शुरुआती परिणाम उत्साहजनक हैं, लेकिन इंसानों में सबूत अभी सीमित हैं।
लेकिन सिगरेट और ड्रग्स का क्या?
पशुओं पर हुए प्रयोगों में GLP-1 दवाओं का असर शराब के अलावा निकोटीन, ओपिओइड और कुछ दूसरी नशीली चीजों के व्यवहार पर भी देखा गया है। इंसानों में शुरुआती संकेत शराब के लिए सबसे ज्यादा दिखाई दे रहे हैं, जबकि दूसरे नशों के लिए प्रमाण अभी काफी कमजोर हैं।
2025 के सेमाग्लूटाइड वाले छोटे ट्रायल में सिगरेट पीने वाले प्रतिभागियों के एक छोटे समूह में रोजाना सिगरेट की संख्या घटने के संकेत भी मिले थे। लेकिन इससे यह निष्कर्ष निकालना गलत होगा कि सेमाग्लूटाइड अब सिगरेट या ड्रग्स छुड़ाने की दवा बन गई है।
क्या दवा सिर्फ नशे की खुशी कम कर देती है?
यह एक संभावित रास्ता है, लेकिन वैज्ञानिक अभी इसके कई पहलुओं को समझ रहे हैं। नशे की लत में केवल “खुशी” शामिल नहीं होती। इसमें क्रेविंग, आदत, तनाव, withdrawal, यादें और किसी खास परिस्थिति से जुड़ी प्रतिक्रिया भी शामिल होती है। अगर GLP-1 दवा रिवॉर्ड सिस्टम की प्रतिक्रिया को कम करती है तो संभव है कि नशे की चीज पहले जितनी आकर्षक महसूस न हो। यानी व्यक्ति के दिमाग में “मुझे यह अभी चाहिए” वाला सिग्नल कमजोर पड़ सकता है। लेकिन यह केवल एक संभावित व्याख्या है। इंसानों में इस पूरी प्रक्रिया को समझने के लिए अभी ज्यादा शोध की जरूरत है।
वजन घटाने वाली दवा नशे की लत पर असर क्यों डालेगी?
इसका जवाब ये है कि शरीर में भूख और रिवॉर्ड पूरी तरह अलग-अलग सिस्टम नहीं हैं। खाना हमारे लिए सिर्फ पेट भरने की चीज नहीं है। स्वादिष्ट खाना दिमाग के रिवॉर्ड सिस्टम को भी सक्रिय करता है। नशे की चीजें इसी व्यापक रिवॉर्ड सिस्टम को और ज्यादा ताकतवर तरीके से प्रभावित कर सकती हैं। GLP-1 शरीर को यह संकेत देने के अलावा कि “अब पर्याप्त खाना मिल चुका है”, दिमाग के उन नेटवर्क पर भी असर डाल सकता है जो किसी चीज को चाहने और उसके पीछे जाने के व्यवहार से जुड़े हैं। इसी साझा जैविक रास्ते ने वैज्ञानिकों को यह सोचने पर मजबूर किया है कि मोटापे और नशे की लत में कुछ न्यूरोबायोलॉजिकल समानताएं हो सकती हैं।
लेकिन इसे ‘नशे की गोली’ कहना अभी जल्दबाजी होगी
ओजेम्पिक, वेगोवी और दूसरी GLP-1 दवाओं का इस्तेमाल अभी मुख्य रूप से मधुमेह और मोटापे जैसी स्थितियों के इलाज के लिए होता है। नशे की लत के लिए इनका इस्तेमाल एक उभरता हुआ शोध क्षेत्र है। हालिया वैज्ञानिक समीक्षाएं साफ कहती हैं कि इंसानों पर हुए अध्ययन अभी छोटे हैं, कई अध्ययनों की अवधि कम है और अलग-अलग परिणाम मिले हैं। बड़े, लंबे और ज्यादा विविध आबादी वाले क्लिनिकल ट्रायल की जरूरत है। इसका मतलब यह भी है कि किसी व्यक्ति को शराब, सिगरेट या किसी दूसरे नशे की समस्या है तो वह खुद से ओजेम्पिक या सेमाग्लूटाइड शुरू करके इसे इलाज का विकल्प न माने।
आगे क्या हो सकता है?
अगर आने वाले बड़े ट्रायल यह साबित करते हैं कि GLP-1 दवाएं लगातार क्रेविंग और नशे की खपत को कम कर सकती हैं, तो नशे की लत के इलाज में एक बिल्कुल नया रास्ता खुल सकता है। शायद भविष्य में डॉक्टर किसी मरीज की मोटापा, डायबिटीज, शराब की लत या दूसरी समस्याओं को अलग-अलग खानों में देखने के बजाय उनके बीच मौजूद जैविक कनेक्शन को ध्यान में रखकर इलाज चुनें। लेकिन अभी विज्ञान उस मुकाम पर नहीं पहुंचा है।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि जिस दवा को पहले पेट, भूख और ब्लड शुगर के संदर्भ में देखा जाता था, उसने वैज्ञानिकों को दिमाग के रिवॉर्ड सिस्टम के बारे में एक नया सवाल दे दिया है।
क्या भूख और नशे की तलब वास्तव में हमारे सोचने से कहीं ज्यादा एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं?
आज उपलब्ध शोध का जवाब है, संभवतः हां। लेकिन “ओजेम्पिक नशे की लत ठीक करती है” कहना अभी बहुत बड़ा दावा होगा। फिलहाल सही बात यह है कि GLP-1 दवाएं दिमाग के रिवॉर्ड और craving से जुड़े सर्किट को प्रभावित कर सकती हैं और शुरुआती मानव अध्ययनों में खासकर शराब की craving और भारी शराब सेवन में कमी के संकेत मिले हैं। अब अगली चुनौती यह पता लगाना है कि यह असर कितना मजबूत, कितना लंबे समय तक रहने वाला और किन लोगों में सबसे ज्यादा प्रभावी है।


