Phone Camera का Night Mode कैसे काम करता है? जानिए इसका पूरा विज्ञान

फोन का Night Mode अंधेरे में इतनी साफ तस्वीर कैसे खींचता है? जानिए कई फ्रेम, सेंसर, जाइरोस्कोप, HDR, AI और कंप्यूटेशनल फोटोग्राफी मिलकर रात की तस्वीर को कैसे बेहतर बनाते हैं।

Yogesh Mishra
Published on: 18 Aug 2026 5:37 PM IST
Night Mode Camera Smartphones
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Night Mode Camera Smartphones 

Night Mode Camera: आपके फोन कैमरे का ‘नाइट मोड’ बेहतरीन फोटो खींच लेता है, इतनी अच्छी कि मानों दिन की भरपूर रोशनी में खींची हुई हो। लेकिन ऐसा होता कैसे है? जानते हैं इसका रहस्य। दरअसल फोन कैमरे का नाईट मोड अंधेरे को रोशनी में बदलने का कोई जादू नहीं करता। इसका तरीका काफी दिलचस्प है। कम रोशनी में फोन एक ही तस्वीर लेने के बजाय कई तस्वीरें लेता है। फिर इन तस्वीरों को मिलाता है, हाथ की हलचल को ठीक करता है, रंग और रोशनी को संतुलित करता है और आखिर में एक साफ तस्वीर तैयार करता है। यानी नाइट मोड में तस्वीर सिर्फ कैमरा नहीं बनाता, उसके पीछे लगा कंप्यूटर भी उसे तैयार करता है। एप्पल के अनुसार, कम रोशनी पहचानने पर नाइट मोड अपने-आप चालू हो सकता है और कितना अंधेरा है, उसके हिसाब से तस्वीर लेने में कुछ सेकंड लग सकते हैं। गूगल का नाइट साइट भी कई फ्रेम और कंप्यूटिंग तकनीक की मदद से कम रोशनी वाली तस्वीर को बेहतर बनाता है।

नार्मल कैमरे में क्या आती है दिक्कत?

सबसे पहले यह समझते हैं कि अंधेरे में सामान्य कैमरे के सामने परेशानी क्या होती है। तस्वीर बनने के लिए कैमरे के सेंसर पर रोशनी के छोटे-छोटे कण, यानी फोटॉन, पहुंचने चाहिए। दिन में रोशनी बहुत होती है, इसलिए कैमरा बहुत कम समय में पर्याप्त जानकारी जुटा लेता है। रात में रोशनी कम होती है और सेंसर तक कम फोटॉन पहुंचते हैं। ऐसे में अगर कैमरा उतनी ही कम देर के लिए तस्वीर लेगा, तो तस्वीर बहुत अंधेरी और शोर से भरी दिखाई दे सकती है।

इस समस्या का सीधा समाधान है कि सेंसर को ज्यादा देर तक रोशनी लेने दी जाए। लेकिन यहां एक नई परेशानी पैदा होती है। अगर तस्वीर लेते समय फोन जरा-सा भी हिल गया, तो पूरी तस्वीर धुंधली हो सकती है। पुराने कैमरों में इससे बचने के लिए तिपाई का इस्तेमाल किया जाता था। लेकिन फोन से तस्वीर लेते समय हर बार तिपाई लगाना संभव नहीं। इसलिए फोन ने इसका एक अलग तरीका निकाला—एक बहुत लंबी तस्वीर लेने के बजाय कई तस्वीरें लेना और फिर उन्हें जोड़ना।

मान लीजिए नाइट मोड ने दस तस्वीरें लीं। इन सभी तस्वीरों में सामने की दीवार, सड़क, पेड़ या व्यक्ति लगभग वही रहेगा। लेकिन सेंसर में पैदा होने वाला शोर हर तस्वीर में थोड़ा अलग होगा। फोन इन तस्वीरों को एक-दूसरे के ऊपर मिलाता है। जो जानकारी हर तस्वीर में बार-बार दिखाई देती है, वह ज्यादा भरोसेमंद होती है। दूसरी तरफ, जो शोर हर फ्रेम में अलग-अलग जगह दिखाई देता है, उसे कई तस्वीरों की जानकारी मिलाकर काफी हद तक कम किया जा सकता है। यही वजह है कि नाइट मोड की तस्वीर सामान्य अंधेरी तस्वीर की तुलना में ज्यादा साफ और कम दानेदार दिखाई देती है।

जाईरोस्कोप और मोशन सेंसर का क्या है काम?

अगर तस्वीर लेते समय हाथ हिल रहा हो तो ये सारी तस्वीरें एक-दूसरे पर ठीक से बैठती कैसे हैं? इसके लिए फोन के अंदर मौजूद जाइरोस्कोप और दूसरे गति-सेंसर मदद करते हैं। वे फोन की हलचल का पता लगाते हैं। साथ ही कैमरा खुद तस्वीरों में मौजूद स्थिर चीजों, जैसे किसी इमारत का किनारा, खिड़की या दूसरी साफ आकृतियों को पहचानकर यह समझने की कोशिश करता है कि अलग-अलग फ्रेमों में वे कहां हैं। इसके बाद फोन तस्वीरों को इस तरह मिलाता है कि वे एक-दूसरे के साथ ज्यादा से ज्यादा सही बैठें।

अगर फोन को लगे कि वह काफी स्थिर है, तो वह ज्यादा समय तक रोशनी जमा कर सकता है। अगर हाथ ज्यादा हिल रहा हो, तो वह कम समय वाले ज्यादा फ्रेम लेने की कोशिश कर सकता है। यही वजह है कि नाइट मोड में कभी एक सेकंड, कभी तीन सेकंड या उससे ज्यादा समय दिखाई देता है। इसका मतलब हमेशा यह नहीं होता कि कैमरा एक ही तस्वीर के लिए पूरे तीन सेकंड तक खुला रहा। इस दौरान फोन कई फ्रेम ले सकता है और उनसे मिली जानकारी को एक साथ इस्तेमाल कर सकता है। इसके बाद शुरू होता है नाइट मोड का असली खेल।

मान लीजिए आप रात में किसी व्यक्ति की तस्वीर ले रहे हैं। उसके पीछे सड़क की तेज रोशनी है, लेकिन चेहरे पर बहुत कम रोशनी पड़ रही है। अगर कैमरा चेहरे को साफ दिखाने के लिए पूरी तस्वीर को ज्यादा उजला कर दे, तो पीछे की तेज रोशनी पूरी तरह सफेद हो सकती है। अगर वह पीछे की रोशनी को बचाने की कोशिश करे, तो चेहरा बहुत अंधेरा रह सकता है। नाइट मोड इन दोनों समस्याओं के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करता है। अलग-अलग फ्रेम से मिली जानकारी के आधार पर वह तस्वीर के बहुत उजले और बहुत अंधेरे हिस्सों को अलग-अलग तरीके से संभाल सकता है। इसीलिए रात की तस्वीर में कभी-कभी चेहरा, सड़क की लाइट, दुकान का बोर्ड और आसमान एक साथ दिखाई देते हैं, जबकि सामान्य कैमरे से इनमें से कुछ चीजें पूरी तरह अंधेरी या बहुत ज्यादा उजली हो सकती थीं। इसका संबंध एचडीआर जैसी तकनीक से भी है। आसान भाषा में कहें तो एचडीआर का काम तस्वीर में बहुत उजले और बहुत अंधेरे हिस्सों के बीच संतुलन बनाने में मदद करना है। आधुनिक फोन में नाइट मोड और एचडीआर कई बार एक-दूसरे के साथ काम करते हैं।

अँधेरे में कलर कैसे चटक आते हैं?

रात में हमारी आंखें भी रंगों को दिन की तरह साफ नहीं पहचान पातीं। बहुत कम रोशनी में दुनिया फीकी या लगभग धूसर दिखाई दे सकती है। लेकिन कैमरा सेंसर ज्यादा समय तक रोशनी जमा करके कुछ ऐसी जानकारी पकड़ सकता है जिसे हमारी आंख उस समय साफ महसूस नहीं कर पाती। इसके बाद फोन यह अनुमान लगाने की कोशिश करता है कि तस्वीर में रंग वास्तव में कैसे दिखने चाहिए। उदाहरण के लिए सड़क की पीली रोशनी का असर कितना कम करना है, सफेद चीज को कितना सफेद दिखाना है और त्वचा का रंग कितना स्वाभाविक रखना है। इसे श्वेत संतुलन कहा जाता है। आधुनिक फोन इस काम में मशीन लर्निंग और दूसरे कंप्यूटिंग तरीकों का भी इस्तेमाल करते हैं।

इसलिए नाइट मोड सिर्फ किसी फोटो को ‘ब्राइट’ नहीं करता। मान लीजिए आपने सामान्य कैमरे से एक बहुत अंधेरी तस्वीर खींची और बाद में उसकी चमक बढ़ा दी। तस्वीर थोड़ी उजली जरूर हो जाएगी, लेकिन उसके साथ शोर भी बढ़ जाएगा। नाइट मोड में फोन पहले ही कई तस्वीरों से ज्यादा प्रकाश और विवरण की जानकारी जुटा लेता है। फिर उन तस्वीरों को मिलाकर शोर कम करता है। यही दोनों तरीकों में बड़ा अंतर है।

हालांकि इसमें कैमरे के सेंसर की भी बड़ी भूमिका होती है। आम तौर पर बड़ा सेंसर ज्यादा रोशनी पकड़ सकता है। लेंस जितना ज्यादा प्रकाश अंदर आने दे, उतनी ही मदद मिलती है। लेकिन फोन का आकार सीमित है। उसमें बहुत बड़ा कैमरा सेंसर लगाना आसान नहीं। इसलिए मोबाइल कंपनियों ने हार्डवेयर की सीमा को सॉफ्टवेयर और कंप्यूटिंग की ताकत से काफी हद तक पूरा किया है। यही वजह है कि आज का छोटा फोन कई बार रात में ऐसी तस्वीर ले लेता है, जो दस-पंद्रह साल पहले के साधारण डिजिटल कैमरे से बेहतर दिखाई दे सकती है। इसका मतलब यह नहीं कि फोन ने कैमरे के लेंस और सेंसर के मामले में पुराने कैमरे को हरा दिया। असली बढ़त तस्वीर को प्रोसेस करने की उसकी क्षमता में है।

कुछ फोन में प्रकाशीय स्थिरीकरण भी होता है। इसमें लेंस या सेंसर हाथ की छोटी हलचल की उलटी दिशा में थोड़ा-सा हिलता है, ताकि तस्वीर ज्यादा स्थिर रहे। इससे कैमरा थोड़ी ज्यादा देर तक रोशनी ले सकता है और तस्वीर के धुंधले होने की संभावना कम होती है। नाइट मोड में यह स्थिरीकरण और कई तस्वीरों को डिजिटल तरीके से मिलाने की तकनीक साथ काम कर सकती है।

अगर तस्वीर में मौजूद चीज खुद ही हिल रही हो तो?

मान लीजिए आप रात में सड़क पर चलते किसी व्यक्ति या दौड़ते बच्चे की तस्वीर ले रहे हैं। फोन कई तस्वीरें जोड़ना चाहता है, लेकिन व्यक्ति हर तस्वीर में अलग जगह होगा। अगर फोन उन सभी तस्वीरों को सीधे जोड़ दे, तो व्यक्ति की दोहरी या भूत जैसी आकृति दिखाई दे सकती है। इसलिए आधुनिक फोन यह पहचानने की कोशिश करते हैं कि तस्वीर का कौन-सा हिस्सा स्थिर है और कौन-सा हिल रहा है। स्थिर हिस्सों के लिए ज्यादा फ्रेमों की जानकारी ली जा सकती है, जबकि चलते हुए व्यक्ति या वस्तु के लिए कम समय वाली तस्वीर को ज्यादा महत्व दिया जा सकता है। फिर भी यह नाइट मोड की बड़ी सीमाओं में से एक है। स्थिर दृश्य उसके लिए सबसे आसान होता है। तेज गति वाला दृश्य मुश्किल होता है। इसलिए रात में चलती कार, दौड़ते बच्चे या खेलते हुए व्यक्ति की तस्वीर में धुंधलापन अभी भी दिखाई दे सकता है।

अब फ्लैश और नाइट मोड के बीच का फर्क

फ्लैश बाहर से रोशनी डालकर तस्वीर को उजला करता है। नाइट मोड आसपास पहले से मौजूद थोड़ी-सी रोशनी को ज्यादा अच्छी तरह पकड़ने और इस्तेमाल करने की कोशिश करता है।

फ्लैश के इस्तेमाल से चेहरा बहुत उजला और पीछे का वातावरण काफी अंधेरा दिखाई दे सकता है। नाइट मोड अक्सर पूरे माहौल को तस्वीर में बनाए रखने की कोशिश करता है—सड़क की रोशनी, इमारतें, आसमान और आसपास की चीजें भी दिखाई देती हैं। इसलिए कई बार रात में नाइट मोड की तस्वीर फ्लैश वाली तस्वीर से ज्यादा स्वाभाविक लगती है।

लेकिन नाइट मोड की भी एक सीमा है। अगर बिल्कुल रोशनी ही नहीं है, तो वह कुछ नहीं कर सकता। फोन का कैमरा कंप्यूटर की मदद से वास्तविक रोशनी पैदा नहीं कर सकता। सेंसर तक कम-से-कम कुछ फोटॉन पहुंचने जरूरी हैं। पूरी तरह अंधेरे कमरे में अगर कोई प्रकाश ही नहीं है, तो कैमरे के पास दृश्य की जानकारी जुटाने के लिए कुछ होगा ही नहीं। यानी नाइट मोड अंधेरे में बेहतर देख सकता है, लेकिन पूर्ण अंधकार में नहीं।

फोन रात की तस्वीर को ज्यादा उजला क्यों बना देता है?

ऐसा इसलिए क्योंकि फोन हमेशा यह कोशिश नहीं करता कि तस्वीर बिल्कुल वैसी ही दिखे जैसी उस समय हमारी आंखों को दिखाई दे रही थी। उसका लक्ष्य अक्सर यह होता है कि तस्वीर में ज्यादा से ज्यादा उपयोगी विवरण दिखाई दें।

इसलिए कभी-कभी नाइट मोड की तस्वीर में रात, रात से ज्यादा शाम जैसी दिखाई देती है। आसमान ज्यादा उजला लगता है, इमारतें ज्यादा साफ दिखती हैं और आसपास की चीजें हमारी आंखों से देखे गए दृश्य की तुलना में ज्यादा चमकीली लग सकती हैं। कुछ लोगों को ऐसी तस्वीरें पसंद आती हैं, जबकि कुछ लोगों को लगता है कि फोन ने रात का असली माहौल बदल दिया।

अब इसमें कृत्रिम बुद्धिमत्ता की भूमिका भी बढ़ रही है। लेकिन यह कहना कि ‘एआई पूरी फोटो बना देता है’, सही तस्वीर नहीं है। ज्यादातर नाइट मोड तस्वीरों का आधार आज भी कैमरे से ली गई वास्तविक तस्वीरें होती हैं। एआई और दूसरे कंप्यूटिंग तरीके यह पहचानने में मदद करते हैं कि शोर क्या है, किनारे कहां हैं, चेहरा कहां है, रंग कैसा होना चाहिए और तस्वीर को कितना साफ या तीखा करना है। कुछ आधुनिक प्रणालियां इससे आगे जाकर बहुत छोटे विवरणों का अनुमान भी लगा सकती हैं। यही वजह है कि किसी नाइट मोड तस्वीर को बहुत ज्यादा बड़ा करके देखने पर कभी-कभी बाल, घास या दूर की इमारत जैसे छोटे विवरण थोड़े कृत्रिम या चित्रित जैसे लग सकते हैं। फोन को शोर हटाते और तस्वीर को साफ करते समय अनुमान लगाना पड़ता है कि बहुत छोटे विवरण वास्तव में कैसे दिखने चाहिए। इसलिए नाइट मोड का मकसद वैज्ञानिक प्रमाण तैयार करना नहीं है। उसका मकसद कम रोशनी में ऐसी तस्वीर बनाना है जो साफ, उपयोगी और देखने में अच्छी लगे।

ट्राईपौड की क्या है भूमिका

अगर फोन को तिपाई पर रख दिया जाए और वह पूरी तरह स्थिर हो, तो कैमरा ज्यादा देर तक रोशनी जमा कर सकता है। इससे तस्वीर में ज्यादा प्रकाश आता है, शोर कम किया जा सकता है और रात के आसमान जैसी बहुत अंधेरी चीजें ज्यादा साफ दिखाई दे सकती हैं। कुछ फोन इसी तरह कई लंबे फ्रेम लेकर तारों की तस्वीर भी बेहतर बनाते हैं।

अगर फोन हाथ में हो तो इतनी देर तक तस्वीर लेना मुश्किल है, क्योंकि हाथ की हल्की-सी हलचल भी तस्वीर को बिगाड़ सकती है। इसलिए रात में बेहतर तस्वीर लेने का सबसे आसान नियम आज भी यही है, फोन जितना स्थिर रहेगा, तस्वीर उतनी बेहतर आने की संभावना होगी।

लेंस साफ रखना भी रात में दिन की तुलना में ज्यादा जरूरी है। उंगली के तेल या धूल की बहुत पतली परत दिन में शायद दिखाई न दे, लेकिन रात में किसी तेज सड़क की लाइट के आसपास चमक और धुंध पैदा कर सकती है। कई बार लोग इसे कैमरे की खराबी समझ लेते हैं, जबकि असली वजह सिर्फ गंदा लेंस होता है।

यह भी जरूरी नहीं कि फोन का हर कैमरा रात में एक जैसा अच्छा काम करे। आम तौर पर मुख्य कैमरे में बड़ा सेंसर और बेहतर लेंस होता है, इसलिए कम रोशनी में उससे बेहतर तस्वीर मिलती है। अल्ट्रा-वाइड और टेलीफोटो कैमरों में कई बार छोटे सेंसर होते हैं, इसलिए रात में उनकी तस्वीर की गुणवत्ता कम हो सकती है। कुछ फोन कम रोशनी में टेलीफोटो कैमरे का इस्तेमाल करने के बजाय मुख्य कैमरे से ली गई तस्वीर को काटकर बड़ा कर देते हैं। इसलिए रात में बहुत ज्यादा डिजिटल जूम करने पर तस्वीर की गुणवत्ता तेजी से घट सकती है।

नाइट मोड और हमारी आंखों की तुलना

हमारी आंखें शानदार हैं। वे बदलती रोशनी के हिसाब से खुद को लगातार ढालती हैं और बिना कई सेकंड रुके दुनिया को देखती रहती हैं। लेकिन फोन को तस्वीर लेने के लिए कुछ समय मिल सकता है। वह कुछ सेकंड तक रोशनी जमा कर सकता है, कई तस्वीरें जोड़ सकता है और फिर उन पर लाखों गणनाएं कर सकता है।हमारी आंख को उसी पल दृश्य देखना पड़ता है। फोन को उसी पल अंतिम तस्वीर दिखाना जरूरी नहीं।यही उसका बड़ा फायदा है। इसी वजह से कभी-कभी फोन का नाइट मोड तस्वीर में ऐसी चीजें दिखा देता है जिन्हें हमने उसी समय खुली आंखों से साफ नहीं देखा था।

पूरी प्रक्रिया को बहुत आसान भाषा में समझें तो फोन पहले कम रोशनी को पहचानता है। फिर एक के बजाय कई तस्वीरें लेता है। फोन की हलचल का पता लगाता है और इन तस्वीरों को एक-दूसरे के साथ मिलाता है। इसके बाद स्थिर और चलती चीजों को अलग पहचानने की कोशिश करता है। कई तस्वीरों की जानकारी जोड़कर शोर कम करता है, उजले और अंधेरे हिस्सों में संतुलन बनाता है, रंग सुधारता है, चेहरे और दूसरे जरूरी विवरणों को बेहतर करता है और आखिर में एक तस्वीर तैयार करता है।इसीलिए शटर दबाने के बाद कभी-कभी फोन एक-दो सेकंड तक काम करता हुआ दिखाई देता है। वह सिर्फ फोटो सेव नहीं कर रहा होता। वह फोटो बना रहा होता है।और यही आधुनिक मोबाइल कैमरे का सबसे बड़ा बदलाव है। पुराने कैमरों में तस्वीर मुख्य रूप से लेंस और सेंसर पर निर्भर करती थी। आज के फोन में तस्वीर तीन चीजें मिलकर बनाती हैं—लेंस, सेंसर और कंप्यूटर की गणना।

इसीलिए आज नाइट मोड में कैमरे की गुणवत्ता सिर्फ इस बात से तय नहीं होती कि उसमें कितने मेगापिक्सेल हैं। कई बार बेहतर सेंसर, अच्छा लेंस, स्थिरीकरण और सबसे बढ़कर बेहतर कंप्यूटिंग तकनीक रात की तस्वीर में ज्यादा बड़ा फर्क डालती है।तो सबसे आसान जवाब यह है—नाइट मोड अंधेरे में कोई एक शानदार तस्वीर नहीं खींचता। वह अंधेरे में मिली कई छोटी-छोटी और अधूरी तस्वीरों से एक बेहतर तस्वीर तैयार करता है। हर तस्वीर में थोड़ी रोशनी, थोड़ा विवरण और थोड़ा शोर होता है। फोन इन तस्वीरों की उपयोगी जानकारी को जोड़ता है, शोर और हलचल को कम करता है और फिर हमें ऐसी तस्वीर देता है जिसमें रात भी दिखाई देती है और उसका विवरण भी। असल में नाइट मोड ने अंधेरे को हराया नहीं है। उसने उपलब्ध थोड़ी-सी रोशनी को समय और कंप्यूटर की गणना की मदद से इतना बेहतर इस्तेमाल करना सीख लिया है कि हमें लगता है—फोन अंधेरे में भी देख सकता है।

Yogesh Mishra
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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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