Placebo Effect Explained: प्लेसीबो इफ़ेक्ट क्या है, विश्वास से शरीर में बदलाव कैसे हो सकता है?

Placebo Effect Explained in Hindi: प्लेसीबो इफ़ेक्ट क्या है और सिर्फ विश्वास से शरीर में वास्तविक बदलाव कैसे हो सकते हैं? जानिए मस्तिष्क, डोपामिन, एंडोर्फिन, दर्द और नोसीबो प्रभाव के पीछे का विज्ञान।

Yogesh Mishra
Published on: 17 Aug 2026 5:24 PM IST
Placebo Effect Explained in Hindi
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Placebo Effect Explained in Hindi

Placebo Effect Explained in Hindi: प्लेसीबो प्रभाव को सरल भाषा में समझें तो यह वह स्थिति है जिसमें किसी व्यक्ति को ऐसा इलाज दिया जाता है जिसमें बीमारी पर किसी दवा का सीधा प्रभाव नहीं होता, फिर भी उसे कुछ असली राहत महसूस हो सकती है, जैसे कि दर्द कम होना, चिंता घट जाना, नींद बेहतर लगना या कुछ लक्षणों में सुधार। इसका कारण सिर्फ ‘कल्पना’ नहीं है। विश्वास, अपेक्षा, इलाज का माहौल, डॉक्टर पर भरोसा, पिछले अनुभव और मस्तिष्क की अपनी दर्द तथा तनाव नियंत्रित करने वाली प्रणालियाँ मिलकर शरीर में वास्तविक जैविक परिवर्तन पैदा कर सकती हैं।

लेकिन यह भी उतना ही जरूरी है कि प्लेसीबो को चमत्कार न समझा जाए। प्लेसीबो प्रभाव कुछ लक्षणों, विशेषकर दर्द, चिंता, मतली, थकान और कुछ कार्यात्मक शिकायतों, को प्रभावित कर सकता है। लेकिन यह टूटे हुए हड्डी को जोड़ नहीं देता। जीवाणु संक्रमण को खत्म नहीं करता। कैंसर को अपने आप खत्म नहीं करता और डायबिटीज में इंसुलिन की जगह नहीं ले सकता। यानी प्लेसीबो का प्रभाव वास्तविक हो सकता है, पर उसकी सीमा भी वास्तविक है।

कहाँ से आया ये शब्द और किसने किया लोकप्रिय?

“Placebo” शब्द लैटिन से आया है, जिसका अर्थ लगभग ‘मैं प्रसन्न करूँगा’ है। चिकित्सा इतिहास में यह शब्द ऐसे उपचार के लिए इस्तेमाल होने लगा जिसका उद्देश्य बीमारी का प्रत्यक्ष इलाज करना नहीं। बल्कि मरीज को आश्वस्त करना था। लेकिन आधुनिक वैज्ञानिक अर्थ में प्लेसीबो प्रभाव का विकास किसी एक व्यक्ति की एक दिन की खोज नहीं है। फिर भी अगर पूछा जाए कि आधुनिक चिकित्सा में प्लेसीबो प्रभाव को वैज्ञानिक रूप से लोकप्रिय और व्यवस्थित ढंग से सामने किसने रखा, तो सबसे प्रसिद्ध नाम हेनरी के. बीचर का है। 1955 में उन्होंने एक प्रभावशाली लेख प्रकाशित किया - ‘The Powerful Placebo’ - जिसमें उन्होंने विभिन्न चिकित्सकीय अध्ययनों के आधार पर दावा किया कि लगभग एक-तिहाई मरीजों में प्लेसीबो से सुधार दिखाई दे सकता है। बाद में इस ‘एक-तिहाई’ वाले निष्कर्ष की काफी आलोचना हुई और आधुनिक शोध ने दिखाया कि प्लेसीबो का प्रभाव बीमारी, लक्षण, अध्ययन पद्धति और परिस्थिति के अनुसार बहुत बदलता है। इसलिए बीचर को ‘प्लेसीबो की खोज करने वाला’ कहना पूरी तरह सही नहीं होगा।लेकिन आधुनिक प्लेसीबो शोध के इतिहास में उनका नाम अत्यंत महत्वपूर्ण है।

इससे पहले भी चिकित्सा में नकली या निष्क्रिय उपचार देकर तुलना की परंपरा मौजूद थी। अठारहवीं और उन्नीसवीं शताब्दी में कई डॉक्टरों ने ऐसी पद्धतियों का इस्तेमाल किया। 1799 में ब्रिटिश चिकित्सक जॉन हेगार्थ ने तथाकथित ‘Perkins tractors’ नामक धातु उपकरणों के उपचार दावे की जाँच के लिए नकली लकड़ी के उपकरण इस्तेमाल किए और पाया कि मरीजों को उनसे भी लगभग वैसी ही राहत महसूस हुई। यह इतिहास के शुरुआती नियंत्रित प्लेसीबो प्रयोगों में गिना जाता है।

क्या विश्वास से शरीर में वास्तविक बदलाव हो सकता है?

जब व्यक्ति विश्वास करता है कि उसे असरदार इलाज मिल रहा है, तो उसका मस्तिष्क उस अपेक्षा के अनुसार अपनी जैविक प्रतिक्रियाएँ बदल सकता है। उदाहरण के लिए, दर्द में मस्तिष्क की अपनी प्राकृतिक दर्द निवारक प्रणाली सक्रिय हो सकती है। शरीर ‘एंडोर्फिन’ जैसे पदार्थ छोड़ सकता है, जो दर्द को कम करने में भूमिका निभाते हैं। कुछ प्रयोगों में जब प्लेसीबो से दर्द कम हुआ और फिर नालोक्सोन नामक ऐसी दवा दी गई जो शरीर के ओपिऑइड तंत्र को रोकती है, तो प्लेसीबो से मिली दर्द-राहत भी कम हो गई। इससे यह मजबूत प्रमाण मिला कि कम-से-कम कुछ स्थितियों में प्लेसीबो प्रभाव शरीर के वास्तविक रासायनिक दर्द-नियंत्रण तंत्र से जुड़ा है।

‘डोपामिन’ भी भूमिका निभा सकता है। विशेष रूप से पार्किंसन रोग पर हुए अध्ययनों में पाया गया कि यदि मरीज को विश्वास हो कि उसे प्रभावी दवा दी गई है, तो मस्तिष्क के कुछ हिस्सों में डोपामिन का निकलना बदल सकता है। यानी अपेक्षा मस्तिष्क के पुरस्कार और गति नियंत्रित करने वाले तंत्र को प्रभावित कर सकती है।

तनाव भी इसमें महत्वपूर्ण है। यदि व्यक्ति डॉक्टर, अस्पताल और उपचार को सुरक्षा के संकेत के रूप में देखता है, तो चिंता कम हो सकती है। इससे तनाव प्रतिक्रिया घट सकती है, हृदय गति, मांसपेशियों का तनाव और दर्द की अनुभूति बदल सकती है। इसलिए कभी-कभी दवा से पहले ही डॉक्टर की आश्वस्त करने वाली बातचीत मरीज को राहत देने लगती है।

सादी गोली और डॉक्टर का भरोसा

प्लेसीबो प्रभाव में सीख और शर्तबद्ध प्रतिक्रिया भी महत्वपूर्ण है। उदाहरण के लिए यदि कोई व्यक्ति कई बार सफेद गोली खाने के बाद दर्द से राहत अनुभव कर चुका है, तो भविष्य में उसी आकार की निष्क्रिय गोली भी मस्तिष्क में राहत से जुड़ी प्रतिक्रिया पैदा कर सकती है। यहाँ डॉक्टर की भूमिका भी असाधारण होती है। एक ही सादी गोली यदि मरीज को ठंडे ढंग से दी जाए कि ‘पता नहीं काम करेगी या नहीं’ तो उसका प्रभाव कम हो सकता है। वही गोली अगर भरोसेमंद वातावरण में दी जाए कि ‘यह उपचार बहुत लोगों को राहत देता है’ तो अपेक्षा अधिक बन सकती है। इसलिए चिकित्सा केवल गोली का रासायनिक प्रभाव नहीं है बल्कि इलाज की पूरी रस्म भी मरीज के अनुभव को प्रभावित करती है।

गोली का रंग, आकार, कीमत और देने का तरीका भी प्रभाव डाल सकते हैं। कुछ अध्ययनों में महँगी बताई गई निष्क्रिय दवा सस्ती बताई गई दवा से अधिक प्रभावी महसूस हुई। इंजेक्शन कभी गोली से ‘ज्यादा शक्तिशाली’ महसूस हो सकता है क्योंकि मरीज उसे गंभीर उपचार मानता है। दो गोलियाँ एक से अधिक प्रभावशाली लग सकती हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि शरीर रंग देखकर जादू करता है; इसका अर्थ है कि उपचार से जुड़ी अपेक्षा जैविक प्रतिक्रिया को आकार देती है।

अपने आप ठीक होना अलग बात है

प्लेसीबो प्रभाव और ‘अपने-आप ठीक होना’ एक ही चीज नहीं हैं। कई बीमारियाँ समय के साथ स्वतः बेहतर होती हैं। सर्दी-जुकाम कुछ दिनों में स्वयं ठीक हो सकता है। यदि उसी समय व्यक्ति प्लेसीबो ले और ठीक हो जाए, तो जरूरी नहीं कि सुधार प्लेसीबो से ही हुआ हो। इसी कारण आधुनिक शोध में प्लेसीबो समूह के साथ कभी-कभी बिना उपचार वाला समूह भी रखा जाता है, ताकि यह समझा जा सके कि सुधार कितना स्वाभाविक था और कितना प्लेसीबो से।

एक और भ्रम है जिसे ‘रेग्रेशन टू द मीन’ कहा जाता है। व्यक्ति अक्सर डॉक्टर के पास तब जाता है जब लक्षण अपने सबसे खराब स्तर पर होते हैं। समय के साथ वे स्वाभाविक रूप से औसत स्तर की ओर लौट सकते हैं। यदि उसी समय कोई निष्क्रिय उपचार दिया गया हो तो व्यक्ति सुधार का श्रेय उसे दे सकता है। इसलिए वैज्ञानिक अध्ययन प्लेसीबो प्रभाव को बहुत सावधानी से मापते हैं।

क्या व्यक्ति को यह पता हो कि वह प्लेसीबो ले रहा है, तब भी असर हो सकता है? आश्चर्यजनक रूप से कुछ अध्ययनों में खुला प्लेसीबो यानी मरीज को साफ बताया गया कि यह सक्रिय दवा नहीं है, फिर भी कुछ लक्षणों में सुधार देखा गया। इसका संभावित कारण यह है कि उपचार की प्रक्रिया, नियमितता, सकारात्मक अपेक्षा और शरीर की सीखी हुई प्रतिक्रिया तब भी काम कर सकती है। लेकिन यह प्रभाव हर बीमारी में समान नहीं है और इस क्षेत्र में अभी शोध जारी है।

उलटा असर भी होता है

प्लेसीबो का उल्टा भी होता है जिसे ‘नोसीबो प्रभाव’ कहते हैं। यदि व्यक्ति को विश्वास हो कि कोई उपचार नुकसान करेगा या उसे कोई दुष्प्रभाव होगा, तो कभी-कभी वह वास्तव में सिरदर्द, मतली, दर्द या दूसरे लक्षण महसूस कर सकता है, भले ही उसे निष्क्रिय पदार्थ दिया गया हो। यही कारण है कि दवाओं के दुष्प्रभाव पढ़ने के बाद कुछ लोगों को वे लक्षण अधिक महसूस होने लगते हैं। यह ‘झूठ बोलना’ नहीं; अपेक्षा शरीर की संवेदनाओं की व्याख्या बदल सकती है।

नोसीबो प्रभाव चिकित्सा में बहुत महत्वपूर्ण है। यदि डॉक्टर कहे कि ‘यह इंजेक्शन बहुत दर्द करेगा’तो मरीज अधिक दर्द महसूस कर सकता है। यदि वही बात संतुलित भाषा में कही जाए कि ‘कुछ क्षण असुविधा हो सकती है’ तो अनुभव अलग हो सकता है। इसलिए चिकित्सकीय संवाद भी उपचार का हिस्सा है।

क्या प्लेसीबो से रक्तचाप बदल सकता है?

कभी-कभी थोड़े समय के लिए तनाव कम होने से रक्तचाप बदल सकता है। क्या दिल की धड़कन बदल सकती है? हाँ, चिंता घटने से संभव है। क्या दर्द घट सकता है? यह सबसे अच्छी तरह स्थापित प्रभावों में है। क्या अवसाद में प्रभाव हो सकता है? कुछ लोगों में लक्षणों की धारणा और अपेक्षा से सुधार हो सकता है। लेकिन गंभीर अवसाद का उपचार केवल प्लेसीबो पर नहीं छोड़ा जाना चाहिए।

क्या कैंसर छोटा हो सकता है?

प्लेसीबो से कैंसर के वास्तविक आकार में विश्वसनीय प्रत्यक्ष कमी का प्रमाण नहीं है। यहीं प्लेसीबो की सीमा सबसे स्पष्ट होती है, यह मुख्यतः लक्षणों और अनुभवों पर अधिक प्रभाव डालता है, रोग की मूल जैविक प्रक्रिया पर कम या बिल्कुल नहीं। दर्द एक अनुभव है जिसे मस्तिष्क संसाधित करता है, इसलिए अपेक्षा उसे काफी प्रभावित कर सकती है। लेकिन जीवाणुओं की संख्या, टूटी हुई हड्डी या कैंसर कोशिकाओं को केवल विश्वास से समाप्त करना अलग बात है। फिर भी यह कहना भी गलत होगा कि प्लेसीबो ‘सिर्फ मन में’ है। दर्द स्वयं भी मस्तिष्क में अनुभव होता है, लेकिन दर्द काल्पनिक नहीं है। यदि मस्तिष्क की दर्द-नियंत्रण प्रणाली सक्रिय होकर वास्तविक राहत देती है तो वह वास्तविक जैविक प्रभाव है। ‘मन’ और ‘शरीर’ को पूरी तरह अलग मानना यहाँ समस्या पैदा करता है। मस्तिष्क स्वयं शरीर का अंग है और उसके संकेत पूरे शरीर को प्रभावित करते हैं।

नई दवाओं की जांच में प्लेसिबो की भूमिका

प्लेसीबो का एक सबसे बड़ा उपयोग नई दवाओं की जाँच में होता है। किसी नई दवा का प्रभाव जानने के लिए मरीजों को दो समूहों में बाँटा जा सकता है, एक को असली दवा, दूसरे को देखने में बिल्कुल वैसी ही निष्क्रिय गोली। आदर्श स्थिति में मरीज और कभी-कभी डॉक्टर दोनों नहीं जानते कि किसे कौन-सी गोली मिली है। फिर देखा जाता है कि असली दवा वाला समूह प्लेसीबो समूह से कितना बेहतर है। यदि दोनों समान सुधार दिखाएँ, तो संभव है कि दवा का अतिरिक्त औषधीय लाभ कम हो।

इसी वजह से प्लेसीबो आधुनिक चिकित्सा अनुसंधान का एक अत्यंत शक्तिशाली उपकरण है। यह हमें बताता है कि उपचार का कितना असर दवा के रसायन से है और कितना उम्मीद, प्राकृतिक सुधार, डॉक्टर-मरीज संबंध तथा अन्य कारणों से। लेकिन प्लेसीबो प्रयोगों में नैतिक प्रश्न भी हैं। यदि किसी गंभीर बीमारी का प्रभावी उपचार पहले से मौजूद है, तो मरीज को केवल प्लेसीबो देकर प्रभावी उपचार से वंचित करना कई स्थितियों में नैतिक नहीं होगा। इसलिए आधुनिक परीक्षणों में प्लेसीबो का उपयोग नैतिक नियमों और सूचित सहमति के साथ किया जाता है।

क्या हर व्यक्ति में सामान असर होता है?

एक दिलचस्प बात यह है कि प्लेसीबो प्रभाव हर व्यक्ति में समान नहीं होता। कुछ लोग अधिक प्रतिक्रिया देते हैं, कुछ कम। व्यक्तित्व, अपेक्षा, पिछले अनुभव, बीमारी की प्रकृति, डॉक्टर पर भरोसा और उपचार का संदर्भ सब भूमिका निभा सकते हैं। अभी ऐसा कोई सरल परीक्षण नहीं है जिससे यह निश्चित रूप से कहा जा सके कि ‘यह व्यक्ति प्लेसीबो रिस्पॉन्डर है।’ क्या सम्मोहन, प्रार्थना या सकारात्मक सोच भी प्लेसीबो हैं? इनमें अलग मनोवैज्ञानिक और सामाजिक प्रक्रियाएँ हो सकती हैं। लेकिन यदि किसी व्यक्ति की सकारात्मक अपेक्षा से लक्षणों में सुधार होता है तो उसमें प्लेसीबो-जैसे तंत्र शामिल हो सकते हैं। इसका यह अर्थ नहीं कि हर धार्मिक या मनोवैज्ञानिक अनुभव को प्लेसीबो कह दिया जाए।

प्लेसीबो प्रभाव का सबसे बड़ा गलत उपयोग तब होता है जब कोई कहता है, “देखिए, विश्वास से सब ठीक हो सकता है, इसलिए दवा की जरूरत नहीं।” यह खतरनाक निष्कर्ष है। सही बात यह है कि विश्वास उपचार के प्रभाव को बढ़ा सकता है। लेकिन वह प्रमाणित चिकित्सा का विकल्प नहीं है। कई बार सबसे अच्छा परिणाम सक्रिय दवा और सकारात्मक उपचार वातावरण दोनों के संयुक्त प्रभाव से आता है।

उदाहरण के लिए दर्द की दवा वास्तव में जैविक रूप से काम करती है। लेकिन यदि मरीज को भरोसा हो कि दवा उसे राहत देगी, तो कुल अनुभव और बेहतर हो सकता है। इसके उलट यदि उसे डर हो कि दवा बेकार है या नुकसान करेगी, तो वही औषधीय प्रभाव कम महसूस हो सकता है। इसीलिए आधुनिक चिकित्सा में डॉक्टर का व्यवहार ‘अतिरिक्त सजावट’ नहीं है। स्पष्ट जानकारी, सम्मान, भरोसा और आश्वासन उपचार के परिणाम को प्रभावित कर सकते हैं। यही प्लेसीबो विज्ञान का सकारात्मक सबक है, मरीज को धोखा देना नहीं, बल्कि उपचार के संदर्भ को चिकित्सकीय रूप से बेहतर बनाना।

प्लेसीबो प्रभाव हमें एक गहरी बात भी सिखाता है। हमारा मस्तिष्क शरीर को केवल बाहर से मिलने वाली वास्तविकता के आधार पर संचालित नहीं करता।,वह अपेक्षा के आधार पर भी शरीर को तैयार करता है। यदि आपको लगता है कि खतरा आने वाला है तो वास्तव में खतरा आए बिना भी हृदय गति बढ़ सकती है। यदि आपको लगता है कि सुरक्षित वातावरण में उपचार मिल रहा है तो तनाव प्रतिक्रिया कम हो सकती है। भविष्य की भविष्यवाणी करना मस्तिष्क का मूल काम है। और प्लेसीबो इसी भविष्यवाणी की जैविक शक्ति का उदाहरण है।

सबसे छोटा निष्कर्ष यही है कि प्लेसीबो कोई नकली बीमारी का नकली इलाज नहीं। यह वास्तविक मस्तिष्क-शरीर प्रतिक्रिया है। लेकिन इसकी शक्ति सीमित है। यह दर्द की अनुभूति बदल सकता है, पर टूटी हड्डी नहीं जोड़ता। चिंता कम कर सकता है, पर जीवाणु नहीं मारता। इसलिए प्लेसीबो विज्ञान विश्वास की ताकत भी दिखाता है और उसकी सीमा भी।

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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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