Ram Mandir Chadhawa Chori: राम मंदिर चढ़ावा चोरी! चंपत राय के पत्र से उठे जवाबदेही पर सवाल

Ram Mandir Chadhawa Chori: राम मंदिर चढ़ावा चोरी मामले में 8 गिरफ्तारियों और 79.80 लाख रुपये की बरामदगी के बाद चंपत राय के पत्र से मंदिर की व्यवस्था, नृपेंद्र मिश्र की भूमिका और जवाबदेही पर नए सवाल उठे हैं।

Yogesh Mishra
Published on: 21 Aug 2026 6:59 PM IST
Ram Mandir Chadhawa Chori Explained in Hindi
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Ram Mandir Chadhawa Chori Explained in Hindi

Ram Mandir Chadhawa Chori: अयोध्या। श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के चढ़ावे में कथित चोरी का मामला अब आठ कर्मचारियों की गिरफ्तारी और लगभग 80 लाख रुपये की बरामदगी से कहीं आगे निकल चुका है। विशेष जांच दल की प्रारंभिक जांच में 45 दिनों के सीसीटीवी फुटेज में चोरी की करीब 70 संदिग्ध घटनाएं मिलने, गणना कक्ष की निगरानी और तलाशी व्यवस्था में गंभीर कमियां सामने आने, 2020 में ही एक निजी लेखा-परीक्षण संस्था द्वारा ट्रस्ट की वित्तीय व्यवस्था में खामियों की चेतावनी दिए जाने और अब पूर्व महासचिव चंपत राय के नौ पन्नों के पत्र में मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्र की निर्णयकारी भूमिका का विस्तार से उल्लेख किए जाने के बाद सबसे बड़ा सवाल बदल गया है। अब प्रश्न केवल यह नहीं है कि चढ़ावे की रकम किसने चुराई। बल्कि यह भी है कि वह कौन-सी प्रशासनिक व्यवस्था थी जिसमें लंबे समय तक कथित चोरी संभव हुई और उस व्यवस्था की जवाबदेही किसकी थी?

चंपत राय द्वारा 18 अगस्त को जारी नौ पन्नों के दस्तावेज ने इसी कारण पूरे विवाद को नया मोड़ दिया है। उन्होंने मंदिर निर्माण की पूरी निर्णय-व्यवस्था बताते हुए बार-बार यह रेखांकित किया है कि निर्माण संबंधी महत्वपूर्ण फैसलों में नृपेंद्र मिश्र की भूमिका के केंद्रीय होने की बात कही है। चंपत राय के अनुसार ऐसा कोई निर्माण कार्य नहीं हुआ जिसका निर्णय निर्माण समिति में न हुआ हो। समिति की स्वीकृति के बिना लिए गए निर्णय को मान्यता नहीं मिलती थी और यदि ऐसे निर्णय के आधार पर कोई काम हो भी गया तो उसे हटाया तक गया। समिति सामान्यतः हर महीने बैठक करती थी और एक अवधि में बैठकें 15-15 दिन में भी होने लगी थीं।

यह पत्र इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि यह ऐसे समय सामने आया है जब चंपत राय के विरुद्ध चोरी में प्रत्यक्ष संलिप्तता का प्रमाण न मिलने की खबरें आई हैं और दूसरी तरफ नृपेंद्र मिश्र ने चोरी सामने आने के बाद मंदिर की प्रबंधन व्यवस्था में व्यापक सुधार की जरूरत पर जोर दिया था। इस तरह चंपत राय का दस्तावेज एक सामान्य निर्माण-विवरण भर नहीं रह जाता। उसकी पृष्ठभूमि उसे जवाबदेही के बंटवारे का दस्तावेज भी बनाती है। हालांकि पत्र की भाषा और उसके राजनीतिक अर्थ के बीच अंतर रखना आवश्यक है। पत्र यह स्थापित करने की कोशिश करता दिखाई देता है कि मंदिर के निर्माण और उससे जुड़े महत्वपूर्ण फैसले किसी एक महासचिव के निजी विवेक से नहीं, बल्कि निर्माण समिति और उसके अध्यक्ष की केंद्रीय भूमिका वाली व्यवस्था से होते थे।

नृपेंद्र मिश्र की भूमिका पर चंपत राय ने आखिर क्या लिखा?

चंपत राय के पत्र के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद केंद्र सरकार ने 15 सदस्यीय श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का गठन किया और नृपेंद्र मिश्र को मंदिर निर्माण समिति का अध्यक्ष बनाया गया। निर्माण से संबंधित तकनीकी, वास्तु और प्रबंधन संबंधी विषय निर्माण समिति में आते थे। चंपत राय का कहना है कि नृपेंद्र मिश्र ने इस पूरी प्रक्रिया में स्वयं को केंद्र में रखा और महत्वपूर्ण फैसलों में उनकी प्रमुख भूमिका रही।

चंपत राय ने यह भी लिखा कि नृपेंद्र मिश्र ने निर्माण समिति की सहायता के लिए अपनी पसंद अथवा रुचि के कुछ लोगों को जोड़ा। इनमें एक व्यक्ति पिछले छह वर्षों में केवल एक-दो बार अयोध्या आया, जबकि दूसरे व्यक्ति से सुरक्षा संबंधी सलाह ली जाती थी। सबसे उल्लेखनीय नाम राष्ट्रीय भवन निर्माण निगम के पूर्व अध्यक्ष अनूप मित्तल का है। मित्तल सिविल इंजीनियर हैं और चंपत राय के अनुसार वे नृपेंद्र मिश्र के साथ लगातार निर्माण समिति की बैठकों में शामिल होते तथा इंजीनियरिंग संबंधी मामलों में सलाह देते थे।

लार्सन एंड टुब्रो, टाटा कंसल्टिंग इंजीनियर्स तथा अन्य संस्थाओं के चयन का विवरण भी पत्र में है। हालांकि यहां एक महत्वपूर्ण सावधानी आवश्यक है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार एलएंडटी के चयन की पृष्ठभूमि में दिवंगत अशोक सिंघल की पुरानी इच्छा अथवा सुझाव का भी उल्लेख है। इसलिए इसे केवल नृपेंद्र मिश्र द्वारा मनमाने तरीके से कंपनी चुनने का मामला कहना उपलब्ध तथ्यों से आगे जाना होगा। दूसरी ओर अन्य भवनों के डिजाइन के लिए नोएडा की डिजाइन एसोसिएट्स जैसी संस्था के चयन में नृपेंद्र मिश्र की भूमिका का उल्लेख किया गया है।

दिलचस्प बात यह है कि चंपत राय केवल नृपेंद्र मिश्र की आलोचना नहीं करते। वे मंदिर निर्माण को समयबद्ध ढंग से आगे बढ़ाने, तकनीकी समस्याओं के समाधान के लिए देश के विशेषज्ञों को जोड़ने और कोरोना जैसी असाधारण परिस्थितियों में काम जारी रखने के लिए उनके योगदान की प्रशंसा भी करते हैं। यही तथ्य पत्र को एकतरफा आरोप-पत्र मानने से रोकता है। इसे अधिक सही ढंग से पढ़ें तो चंपत राय जैसे कह रहे हैं—निर्माण की सफलता में यदि नृपेंद्र मिश्र की भूमिका केंद्रीय थी तो निर्माण-व्यवस्था की जिम्मेदारी का इतिहास लिखते समय भी उस भूमिका को उसी अनुपात में दर्ज किया जाना चाहिए।

लेकिन चढ़ावे की चोरी और मंदिर निर्माण दो अलग व्यवस्थाएं हैं

यहीं सबसे महत्वपूर्ण तथ्यात्मक विभाजन आवश्यक है। मंदिर का निर्माण और श्रद्धालुओं के नकद चढ़ावे की गणना एक ही प्रशासनिक कार्य नहीं हैं। नृपेंद्र मिश्र मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष हैं। चंपत राय के पत्र में जिस केंद्रीय भूमिका का विस्तार से वर्णन है, वह मुख्यतः निर्माण, वास्तु, तकनीकी सलाह, एजेंसियों और परिसर से जुड़े फैसलों की है। इससे यह अपने-आप सिद्ध नहीं होता कि दानपात्रों से निकली नकदी की गणना, गणना-कक्ष की तलाशी, कर्मचारियों की नियुक्ति अथवा रोजमर्रा की नकदी सुरक्षा की प्रत्यक्ष जिम्मेदारी भी नृपेंद्र मिश्र की थी।चंपत राय ने नृपेंद्र मिश्र की व्यापक निर्णयकारी भूमिका दर्ज की है। यही इस पूरे प्रकरण की रिपोर्टिंग में सबसे महत्वपूर्ण तथ्यात्मक सावधानी है।

कहानी की जड़ 2026 नहीं, 2020 तक जाती है

चढ़ावा प्रकरण की सबसे चौंकाने वाली परत चंपत राय के नए पत्र से भी पुरानी है। श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का गठन फरवरी 2020 में हुआ था। उसी वर्ष नवंबर में एक निजी लेखा-परीक्षण संस्था ने ट्रस्ट की व्यवस्था की समीक्षा की। इंडियन एक्सप्रेस की पड़ताल के अनुसार उस रिपोर्ट में प्रबंधन के क्रियान्वयन स्तर को अत्यधिक गैर-पेशेवर बताया गया था और दान का व्यवस्थित वित्तीय रिकॉर्ड न होने पर चिंता जताई गई थी। संस्था ने लेन-देन, आंकड़ों के प्रबंधन, कर्मचारियों और अन्य संसाधनों के प्रत्येक स्तर के लिए स्पष्ट मानक संचालन प्रक्रिया बनाने की सिफारिश की थी, ताकि जिम्मेदारी और जवाबदेही तय की जा सके।

यह तथ्य इस पूरे विवाद की गंभीरता कई गुना बढ़ाता है। क्योंकि 2026 में एसआईटी ने जिन कमियों की ओर इशारा किया—कमजोर पर्यवेक्षण, गणना प्रक्रिया की खामियां, सुरक्षा नियमों का पालन न होना और कर्मचारियों के प्रबंधन में दोष—उनमें से कई की बुनियादी आशंका छह साल पहले ही सामने आ चुकी थी। एसआईटी की अंतिम रिपोर्ट से जुड़े सूत्रों ने भी कहा कि गणना कक्ष की मानक प्रक्रियाओं का पालन नहीं हुआ, अयोग्य लोगों को संवेदनशील कार्यों में लगाया गया और पर्यवेक्षण की कमियों ने कथित गबन को संभव बनाया। यही वह बिंदु है जहां मामला व्यक्तिगत चोरी से संस्थागत विफलता में बदल जाता है।

35 दानपात्र, रोज लाखों का चढ़ावा और बेसमेंट में गणना

मंदिर की दान व्यवस्था का आकार भी समझना जरूरी है। जून में प्रकाशित जमीनी पड़ताल के अनुसार मंदिर परिसर में लगभग 35 दानपात्रों से एकत्र नकदी और अन्य सामग्री करीब 200 मीटर दूर स्थित यात्री सुविधा केंद्र के बेसमेंट में बने गणना कक्ष में लाई जाती थी। प्रतिदिन नकद दान सामान्य दिनों में लगभग आठ से 13 लाख रुपये बताया गया, जबकि कुछ दिनों में यह 50 से 60 लाख रुपये तक पहुंच सकता था।

इतनी बड़ी मात्रा में नकदी की रोजाना आवाजाही वाली व्यवस्था में सीसीटीवी, कर्मचारियों की तलाशी, गणना करने वालों का रोटेशन, प्रवेश-निकास नियंत्रण और दोहरे सत्यापन जैसी व्यवस्थाएं अत्यंत महत्वपूर्ण थीं। लेकिन एसआईटी की प्रारंभिक रिपोर्ट ने इन्हीं क्षेत्रों में गंभीर कमियां पकड़ीं।

45 दिन के फुटेज में चोरी की 70 संदिग्ध घटनाएं

एसआईटी की नौ पन्नों की प्रारंभिक रिपोर्ट इस प्रकरण का सबसे महत्वपूर्ण जांच दस्तावेज है। इसमें 45 दिनों के सीसीटीवी फुटेज की जांच में कथित चोरी की लगभग 70 घटनाएं चिह्नित किए जाने की बात सामने आई। रिपोर्ट में सीसीटीवी के ऐसे क्षेत्र जहां पर्याप्त निगरानी नहीं थी, तलाशी नियमों में ढील, कमजोर पर्यवेक्षण और नकदी गणना व्यवस्था की कमियां बताई गईं।

यदि यह निष्कर्ष अंतिम आपराधिक जांच में भी पुष्ट होता है तो इसका अर्थ यह होगा कि यह एक दिन की आकस्मिक चोरी नहीं थी। कथित रूप से बार-बार पैसा निकालने के लिए व्यवस्था की कमजोरियों का इस्तेमाल किया जा रहा था। इसलिए प्रश्न स्वाभाविक है कि नियमित पर्यवेक्षण में इतनी घटनाएं क्यों नहीं पकड़ी गईं?

4 जून की रात चोरी का पता चला लेकिन एफआईआर 25 जून को

इस प्रकरण की एक और बेहद महत्वपूर्ण कड़ी चंपत राय का पहले का पत्र है, जिसका विवरण 30 जुलाई को इंडियन एक्सप्रेस ने प्रकाशित किया। उस पत्र के अनुसार कथित चोरी की जानकारी 4 जून की रात मिली थी। अगले दिन सीसीटीवी फुटेज की जांच की गई और कुछ संदिग्ध कर्मचारियों की पहचान हुई। लेकिन तत्काल पुलिस में एफआईआर नहीं हुई।

चंपत राय के पत्र के आधार पर प्रकाशित रिपोर्ट में कहा गया कि ट्रस्ट ने पहले संदिग्धों से स्वयं पूछताछ की। कथित आरोपियों और उनके परिजनों ने 8 जून तक रकम वापस कर दी और अपनी संलिप्तता स्वीकार करते हुए लिखित बयान भी दिए। बाद में मामला सार्वजनिक चर्चा में आने लगा तो स्वतंत्र जांच की आवश्यकता महसूस की गई और राज्य सरकार से एसआईटी गठित करने का अनुरोध किया गया।

यहीं इस मामले का एक बड़ा अनुत्तरित प्रश्न पैदा होता है—यदि 4-5 जून तक चोरी और संदिग्धों की पहचान हो चुकी थी और 8 जून तक कथित चोरी की रकम भी वापस ली जा चुकी थी, तो प्राथमिकी दर्ज कराने के लिए 25 जून तक इंतजार क्यों किया गया?

यह केवल राजनीतिक सवाल नहीं है। संभावित आपराधिक घटना की सूचना मिलने के बाद संस्थागत प्रतिक्रिया की प्रकृति से जुड़ा गंभीर प्रश्न है।

एफआईआर में आठ नाम, अगले दिन सभी गिरफ्तार

25 जून को कोतवाली राम जन्मभूमि में ट्रस्ट सदस्य कृष्ण मोहन की शिकायत पर आठ व्यक्तियों और कुछ अज्ञात लोगों के विरुद्ध चोरी, धन के दुरुपयोग तथा श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाई गई नकदी और बहुमूल्य सामग्री के गबन से संबंधित प्राथमिकी दर्ज हुई। यह कार्रवाई एसआईटी की प्रारंभिक रिपोर्ट सरकार को दिए जाने के दो दिन बाद हुई।

अगले दिन आठों नामजद आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया। पुलिस ने सात आरोपियों से 79.80 लाख रुपये बरामद करने का दावा किया।

इसके बाद जांच केवल इन आठ लोगों तक सीमित नहीं रही। लगभग 30 और कर्मचारियों की भूमिका की जांच शुरू हुई। इनमें कई ऐसे लोग बताए गए जिन्हें ट्रस्ट से जुड़े पदाधिकारियों या उनके परिचितों की सिफारिश पर संवेदनशील नकदी-गणना के काम में लगाया गया था।

यहीं से एक और महत्वपूर्ण प्रश्न उभरता है—इतने संवेदनशील काम के लिए कर्मचारियों की नियुक्ति किस प्रक्रिया से होती थी और अंतिम जवाबदेही किसकी थी?

एसआईटी की अंतिम रिपोर्ट पर भी एक तथ्यात्मक विवाद

यहां मीडिया रिपोर्टिंग में एक महत्वपूर्ण विरोधाभास सामने आया है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। कई समाचार संस्थानों ने 17-18 अगस्त को खबर दी कि एसआईटी की अंतिम रिपोर्ट में चंपत राय के साथ डॉ. अनिल मिश्र को भी क्लीन चिट मिल गई है। लेकिन द प्रिंट ने 18 अगस्त को एसआईटी से जुड़े स्रोत के हवाले से अलग विवरण दिया। उसके अनुसार चंपत राय के विरुद्ध प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संलिप्तता का कोई प्रमाण नहीं मिला, इसलिए उन्हें क्लीन चिट दी गई, लेकिन अनिल मिश्र की भूमिका की जांच जारी थी, विशेष रूप से आरोपी कर्मचारियों से उनके संबंधों को लेकर।

इसलिए इस समय “दोनों को अंतिम और निर्विवाद क्लीन चिट” कहना सावधानी की मांग करता है। सार्वजनिक रूप से एसआईटी की संपूर्ण अंतिम रिपोर्ट उपलब्ध न होने के कारण मीडिया स्रोतों के बीच इस अंतर को दर्ज करना जरूरी है।

सर्वोच्च न्यायालय ने भी जांच को समाप्त नहीं माना

इस कहानी में एक और महत्वपूर्ण घटनाक्रम 17 अगस्त को सर्वोच्च न्यायालय में हुआ। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहन की पीठ ने एसआईटी से जांच की प्रगति की स्थिति रिपोर्ट मांगी और जांच को उसके तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाने को कहा। न्यायालय ने संकेत दिया कि एसआईटी रिपोर्ट देखने के बाद श्रद्धालुओं के दान के प्रबंधन में सुधार संबंधी निर्देशों पर भी विचार किया जा सकता है।इसका सीधा अर्थ यह है कि राज्य सरकार की एसआईटी की एक रिपोर्ट ट्रस्ट को सौंप दिए जाने भर से पूरे प्रकरण को न्यायिक रूप से समाप्त मान लेना जल्दबाजी होगी।

क्लीन चिट के अगले दिन चंपत राय का नौ पन्नों का पत्र—क्या समय महज संयोग है?

यहीं इस पूरे घटनाक्रम का सबसे दिलचस्प राजनीतिक और प्रशासनिक पहलू सामने आता है। 17-18 अगस्त को एसआईटी की अंतिम रिपोर्ट और चंपत राय को राहत मिलने की खबर आती है। 18 अगस्त को ही चंपत राय मंदिर निर्माण की पूरी व्यवस्था पर अपना नौ पन्नों का दस्तावेज जारी करते हैं।

इस समयक्रम का महत्व है। चंपत राय ने पहले कहा था कि जांच पूरी होने के बाद वे अपने ऊपर लगे आरोपों का बिंदुवार जवाब देंगे। अब जब उनके विरुद्ध आपराधिक संलिप्तता का प्रमाण नहीं मिलने की खबर सामने आई, तो उनका विस्तृत पत्र केवल अपनी सफाई देने तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने मंदिर निर्माण की पूरी शक्ति-संरचना सार्वजनिक करते हुए यह दर्ज किया कि कौन-से निर्णय किस व्यवस्था से लिए गए और नृपेंद्र मिश्र की उसमें क्या भूमिका थी।

इसी कारण पत्र को केवल मंदिर निर्माण का ऐतिहासिक विवरण मानना भी कठिन है। इसका समय और विषय दोनों संकेत करते हैं कि चंपत राय अपने कार्यकाल की जिम्मेदारियों की सीमारेखा सार्वजनिक रिकॉर्ड पर दर्ज करना चाहते हैं।

नृपेंद्र मिश्र ने अब क्या कहा?

21 अगस्त को इस विवाद में नृपेंद्र मिश्र की पहली महत्वपूर्ण प्रतिक्रिया भी सामने आ गई। उन्होंने मीडिया में चंपत राय के पत्र के आधार पर अपने और चंपत राय के बीच विवाद की खबरों को खारिज किया। उनका कहना था कि उन्होंने पत्र देखा ही नहीं है और बिना पत्र देखे प्रतिक्रिया देना उचित नहीं होगा। उन्होंने मीडिया पर विवाद पैदा करने का आरोप भी लगाया।

इस प्रतिक्रिया का महत्व इसलिए है कि नृपेंद्र मिश्र ने अभी चंपत राय के पत्र में बताए गए विशिष्ट तथ्यों—निर्माण समिति में उनकी केंद्रीय भूमिका, कंपनियों के चयन, सलाहकारों को जोड़ने अथवा समिति की मंजूरी के बिना निर्णय लागू न होने—का बिंदुवार खंडन नहीं किया है। उनका तत्काल प्रतिवाद मुख्यतः इस व्याख्या से है कि पत्र दोनों के बीच किसी खुली लड़ाई का प्रमाण है।

इसलिए अभी ‘चंपत बनाम नृपेंद्र’ को व्यक्तिगत युद्ध घोषित करना भी जल्दबाजी होगी। लेकिन दोनों पक्षों के सार्वजनिक वक्तव्यों से जवाबदेही की परिभाषा को लेकर अंतर अवश्य दिखाई देता है।

नौ पन्ने या 20 पन्ने—एक और उलझन

इस खोज में एक रोचक विसंगति और सामने आई है। अधिकांश विश्वसनीय रिपोर्टें चंपत राय के दस्तावेज को नौ पन्नों का पत्र बता रही हैं। लेकिन 21 अगस्त की एक रिपोर्ट इसे 20 पन्नों का दस्तावेज बता रही है और साथ ही यह भी कहती है कि सोशल मीडिया में प्रसारित प्रति पर चंपत राय के हस्ताक्षर नहीं हैं। इसलिए जब तक चंपत राय अथवा ट्रस्ट की ओर से मूल प्रमाणित प्रति सार्वजनिक नहीं होती, दस्तावेज की लंबाई, उसका अंतिम स्वरूप और सोशल मीडिया में घूम रही सभी प्रतियों की प्रामाणिकता को लेकर सावधानी रखनी चाहिए। हालांकि विभिन्न स्वतंत्र समाचार संस्थानों द्वारा प्रकाशित मुख्य विषय-वस्तु—निर्माण समिति और नृपेंद्र मिश्र की केंद्रीय भूमिका—में पर्याप्त समानता है।

सबसे बड़ा प्रश्न—चोरी की वास्तविक रकम कितनी?

पुलिस ने 79.80 लाख रुपये बरामद किए। लेकिन एसआईटी की प्रारंभिक जांच में 45 दिनों में लगभग 70 संदिग्ध घटनाएं मिलने का दावा हुआ। दोनों तथ्यों को साथ रखने पर स्वाभाविक सवाल पैदा होता है कि क्या बरामद रकम ही कथित चोरी की पूरी राशि है? यदि कथित चोरी इससे पहले भी होती रही हो तो उसका पता कैसे लगाया जाएगा? 2020 में ही व्यवस्थित वित्तीय रिकॉर्ड की कमी चिन्हित की गई थी, जिससे पुरानी अवधि का स्वतंत्र मिलान और कठिन हो सकता है।

अभी उपलब्ध जांच सामग्री इस सवाल का निर्णायक उत्तर नहीं देती। इसलिए किसी बहुत बड़ी राशि की चोरी का अनुमान लगाना भी तथ्य नहीं होगा। लेकिन 79.80 लाख को अंतिम कुल नुकसान मान लेना भी अभी प्रमाणित नहीं है।

चोरी से कहीं बड़ा है व्यवस्था का प्रश्न

अब तक सामने आए तथ्यों को जोड़ें तो तीन अलग-अलग स्तर स्पष्ट दिखाई देते हैं। पहला आपराधिक स्तर है—किसने नकदी या बहुमूल्य सामग्री चुराई और कितनी चुराई? इस स्तर पर आठ आरोपी गिरफ्तार हैं और पुलिस ने बड़ी नकदी बरामद की है।

दूसरा प्रशासनिक स्तर है—गणना कक्ष में किसने कर्मचारियों की नियुक्ति की, उनकी निगरानी किसके जिम्मे थी, सीसीटीवी के कमजोर हिस्से क्यों रहे, तलाशी के नियम क्यों टूटे और 2020 की चेतावनी के बाद भी छह वर्षों में पूर्ण मानक प्रक्रिया क्यों लागू नहीं हुई?

और तीसरा शीर्ष संस्थागत जवाबदेही का प्रश्न है—ट्रस्ट, निर्माण समिति और मंदिर प्रबंधन के अलग-अलग अधिकार क्षेत्र वास्तव में क्या थे? चंपत राय के अधिकार कहां समाप्त होते थे? अनिल मिश्र की जिम्मेदारी क्या थी? नृपेंद्र मिश्र की निर्माण संबंधी व्यापक निर्णयकारी भूमिका का मंदिर के समग्र प्रशासन से कितना संबंध था?

इन तीन स्तरों को मिलाकर किसी एक व्यक्ति को दोषी घोषित करना अभी उपलब्ध प्रमाणों से संभव नहीं है। लेकिन इन्हें अलग-अलग करके जांचना उतना ही आवश्यक है।

चंपत राय का पत्र सफाई है या जवाबदेही का नया दस्तावेज?

यही इस पूरी पड़ताल का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष है। चंपत राय के नौ पन्नों के पत्र को यदि केवल नृपेंद्र मिश्र के खिलाफ हमला मान लिया जाए तो कहानी का बड़ा हिस्सा छूट जाता है। और यदि इसे केवल मंदिर निर्माण की उपलब्धियों का सामान्य विवरण मान लिया जाए तो इसके जारी होने के समय और भाषा का महत्व गायब हो जाता है।

पत्र का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक-प्रशासनिक संदेश यह दिखाई देता है कि चंपत राय अब लिखित रिकॉर्ड पर यह स्थापित कर रहे हैं कि राम मंदिर जैसा विशाल प्रकल्प अकेले महासचिव के निर्णयों से नहीं चला। उसकी अपनी निर्माण समिति, उसका अध्यक्ष, विशेषज्ञ और निर्णय प्रक्रिया थी और नृपेंद्र मिश्र उस व्यवस्था के अत्यंत शक्तिशाली केंद्र थे।

लेकिन इससे अगला प्रश्न और कठिन हो जाता है।यदि मंदिर निर्माण के लिए इतनी सुव्यवस्थित समिति, देश की बड़ी इंजीनियरिंग कंपनियां, वरिष्ठ नौकरशाह और विशेषज्ञ मौजूद थे, तो श्रद्धालुओं के प्रतिदिन लाखों रुपये के नकद चढ़ावे के लिए छह वर्ष पहले सुझाई गई मजबूत मानक संचालन प्रक्रिया क्यों नहीं बन सकी या प्रभावी ढंग से लागू क्यों नहीं हुई?

यदि 2020 में व्यवस्था की कमजोरी बता दी गई थी तो सुधार किसे करना था? यदि कर्मचारियों की गतिविधियों पर संदेह हुआ तो कार्रवाई किस स्तर पर रुक गई? यदि 4 जून को चोरी पकड़ी गई और 8 जून तक रकम तथा लिखित स्वीकारोक्ति कथित रूप से मिल गई थी तो पुलिस को 25 जून तक क्यों नहीं बताया गया?यदि 45 दिन में 70 संदिग्ध घटनाएं सीसीटीवी में बाद में दिखाई दे सकती थीं तो वास्तविक समय की निगरानी उन्हें पहले क्यों नहीं पकड़ सकी?और यदि संवेदनशील गणना कार्य में लोगों को सिफारिशों के आधार पर लगाया गया था तो उन नियुक्तियों की जवाबदेही किसकी थी?

यही वे सवाल हैं जिनका उत्तर अभी बाकी है।

चंपत राय के नए पत्र ने चोरी का अपराधी नहीं बताया है। उसने उससे कहीं बड़ा दरवाजा खोल दिया है—राम मंदिर की प्रशासनिक शक्ति-संरचना और जवाबदेही का दरवाजा। अब इस प्रकरण की असली खोज इसी बात की होनी चाहिए कि श्रद्धालुओं के चढ़ावे की सुरक्षा की जिम्मेदारी कागज पर किसकी थी, व्यवहार में किसके पास थी और चेतावनियां मिलने के बावजूद वह व्यवस्था क्यों विफल हुई।

जब तक इन सवालों के दस्तावेजी उत्तर सामने नहीं आते, अयोध्या चढ़ावा प्रकरण में आठ गिरफ्तारियों और करीब 80 लाख रुपये की बरामदगी को कहानी का अंत नहीं माना जा सकता।

Yogesh Mishra
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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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