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Saura Art in Odisha: सौरा इडितल कला के आखिरी रक्षक लबा गमांग की कहानी
Saura Art in Odisha: ओडिशा के रायगड़ा में 72 वर्षीय लबा गमांग आज भी सौरा जनजाति की प्राचीन इडितल कला को जिंदा रखने की कोशिश कर रहे हैं। आधुनिकता की दौड़ में विलुप्त होती इस विरासत और इसे बचाने के उनके संघर्ष की कहानी जरूर पढ़ें।
Saura Art Laba Gamang | Odisha Tribal Culture | Indian Heritage | Idital Painting | Newstrack Hindi
Saura Art in Odisha: "ये सिर्फ दीवार पर खिंचे चित्र नहीं हैं। ये हमारे देवताओं के घर हैं। जब बाहरी दुनिया का कोई इंसान इन पर रंग लगाता है, तो वह इसे सिर्फ सजावट समझता है। लेकिन हमारे लिए, यह हमारी संस्कृति की आख़िरी साँस है।"
ओडिशा के रायगड़ा जिले के सुदूर और दुर्गम पहाड़ियों के बीच बसा है 'लांजिया सौरा' आदिवासियों का एक छोटा सा गाँव। आधुनिक दुनिया की चकाचौंध से कोसों दूर, इस गाँव की मिट्टी के घरों की दीवारों पर एक अद्भुत नज़ारा दिखता है। लाल मिट्टी से पुती दीवारों पर सफेद रंग से इंसानों, घोड़ों, तीरों, सूरज और मवेशियों की आकृतियाँ बनी हुई हैं। पहली नज़र में यह कला मध्य प्रदेश की 'भील' या महाराष्ट्र की 'वारली' पेंटिंग जैसी लग सकती है। लेकिन गौर से देखने पर पता चलता है कि यह 'सौरा इडितल' (Saura Idital) कला है, जो भारत की सबसे प्राचीन जनजातियों में से एक की ३,००० साल पुरानी धार्मिक और आध्यात्मिक विरासत है। इस कला की सबसे कड़वी और डरावनी हकीकत यह है कि नई पीढ़ी द्वारा ईसाई धर्म अपनाने या शहरों की तरफ पलायन करने के कारण, इस कला को उसके मूल धार्मिक अनुष्ठान के साथ जानने और दीवारों पर उकेरने वाले अब उंगलियों पर गिने जा सकने वाले बुज़ुर्ग ही बचे हैं। इन्हीं में से एक आखिरी प्रहरी हैं—७२ वर्षीय लबा गमांग।
लबा गमांग का जीवन इस प्राचीन आदिवासी पहचान को आधुनिकता के मरुस्थल में विलीन होने से बचाने की एक नितांत अकेली और कड़वी लड़ाई है। सौरा जनजाति में 'इडितल' महज़ कोई कला या चित्रकारी नहीं रही है। यह उनके लिए देवताओं (इदुम) को प्रसन्न करने का एक माध्यम था। जब गाँव में कोई बीमार होता था, या फसल कटती थी, तो 'कुदरान' (आदिवासी पुजारी) के कहने पर दीवार पर यह चित्र बनाए जाते थे। लबा गमांग ने यह हुनर अपने दादा से सीखा था। वे बचपन में घने जंगलों से जंगली लताओं की टहनियाँ तोड़कर लाते थे, जिन्हें चबाकर वे ब्रश (कूंची) बनाते थे। दीवारों को लीपने के लिए वे खुद मीलों दूर से लाल मिट्टी और चावल के दानों को पीसकर सफेद रंग तैयार करते थे। लेकिन १९८० के दशक के बाद, जब जंगलों पर पाबंदियां बढ़ीं और आदिवासी समाज में मिशनरियों के प्रभाव से पारंपरिक रीति-रिवाजों को 'अंधविश्वास' कहकर खारिज किया जाने लगा, तो इस कला की रीढ़ ही टूट गई। गाँवों के मिट्टी के घर पक्के कंक्रीट के मकानों में बदलने लगे, जिन पर लाल मिट्टी का लेप लगाना नामुमकिन हो गया।
लबा गमांग का असली संघर्ष तब शुरू हुआ जब उनके अपने बच्चों ने इस काम को 'गरीबी का धंधा' कहकर छोड़ दिया। उनके बेटों ने अपनी जड़ों से नाता तोड़ लिया और पास के शहरों में जाकर दिहाड़ी मजदूरी करने लगे। पूरे गाँव में लबा गमांग अकेले रह गए जो आज भी त्योहारों पर लाल मिट्टी की तलाश में पहाड़ियों पर भटकते हैं। जब वे दीवार पर चित्र बनाने के लिए बांस की कूंची उठाते हैं, तो गाँव के पढ़े-लिखे युवा उन पर हँसते हैं। लोग कहते हैं, "बुढ़ापे में दीवारों पर भूत-प्रेत छापने से क्या पेट भरेगा? राशन की दुकान पर कूपन जमा करो।" आर्थिक तंगी का आलम यह है कि कई बार उनके घर में नमक-रोटी के भी लाले पड़ जाते हैं। लेकिन लबा गमांग का संकल्प पत्थर की लकीर है। वे कहते हैं कि "जिस दिन सौरा आदिवासी अपनी दीवार पर इडितल बनाना भूल जाएगा, उस दिन हमारी संस्कृति का देवता हमेशा के लिए इस जंगल को छोड़कर चला जाएगा।"
सौरा कला की एक और विडंबना यह है कि आज बड़े-बड़े शहरों के आलीशान होटलों और सरकारी दफ्तरों की दीवारों पर इसके नकली, मशीनी प्रिंट सजाए जा रहे हैं। बड़ी-बड़ी कंपनियाँ इस कला के नाम पर लाखों रुपये कमा रही हैं। लेकिन इस असली उस्ताद को, जो जंगलों में इस कला की रूह को सहेजे बैठा है, बाज़ार ने पूरी तरह भुला दिया है। लबा गमांग को न तो कोई रॉयल्टी मिलती है और न ही कोई पेंशन। वे आज भी अपनी टूटी हुई झोपड़ी के फर्श पर बैठकर, कमजोर होती आँखों से दीवारों पर रेखाएं खींचते हैं। उनका यह गुमनाम और ऑर्गेनिक संघर्ष दिखाता है कि जब कोई प्राचीन सभ्यता दम तोड़ रही होती है, तो उसे किसी सरकारी म्यूजियम के कांच के बक्से की नहीं, बल्कि लबा गमांग जैसे एक ज़िद्दी और आखिरी चिराग की ज़रूरत होती है जो अपनी भूख भूलकर भी पुरखों की इबादत को ज़िंदा रखता है।


