Newstrack Special: ‘ओलो’ रंग क्या है जिसे सामान्य तरीके से इंसान देख ही नहीं सकता?

What is Olo Color: ‘ओलो’ क्या है जिसे इंसान सामान्य तरीके से नहीं देख सकता? जानिए M-कोन कोशिकाओं, रेटिना, Oz लेजर सिस्टम और 2025 के वैज्ञानिक प्रयोग से बने इस असाधारण रंग-अनुभव का पूरा विज्ञान।

Yogesh Mishra
Published on: 20 Aug 2026 5:35 PM IST
What is Olo Color
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What is Olo Color

What is Olo Color: ‘ओलो’ किसी नए पेंट, नए प्रकाश-वर्णक्रम (Visible Light Spectrum) या इंद्रधनुष में छिपे किसी अज्ञात रंग का नाम नहीं है। यह एक अत्यंत संतृप्त नीला-हरा, मोरपंखी हरा अनुभव है जिसे वैज्ञानिकों ने मानव आँख की रेटिना में मौजूद कुछ विशेष रंग-संवेदी कोशिकाओं (Cone cells) को असामान्य तरीके से चुनकर उत्तेजित करके पैदा किया। इसकी खास बात यह है कि प्राकृतिक प्रकाश सामान्य परिस्थितियों में हमारी आँख को ऐसा संकेत दे ही नहीं सकता। इसलिए कोई व्यक्ति केवल आसमान, स्क्रीन, कपड़ा या पेंट देखकर वास्तविक ‘ओलो’ नहीं देख सकता। इसे देखने के लिए अत्यंत विशेष प्रयोगशाला उपकरण की जरूरत पड़ती है। 2025 में प्रकाशित मूल प्रयोग में पाँच प्रतिभागियों ने इसे देखा और सभी ने इसे असाधारण रूप से संतृप्त नीला-हरा या मोरपंखी हरा बताया।

रंग कैसे देखती हैं आँखें?

इसे समझने के लिए पहले हमारी रंग-दृष्टि (Colour vision) समझनी होगी। मानव रेटिना (retina) में मुख्यतः तीन प्रकार की कोन कोशिकाएँ होती हैं। इन्हें S, M और L कोन कहा जाता है। S कोन छोटी तरंगदैर्घ्य (wave length) वाली, मोटे तौर पर नीली रोशनी के प्रति अधिक संवेदनशील होती हैं। M कोन मध्यम तरंगदैर्घ्य (Medium Wavelength), यानी हरे क्षेत्र के प्रति और L कोन लंबी तरंगदैर्घ्य, यानी पीले-लाल क्षेत्र के प्रति अपेक्षाकृत अधिक प्रतिक्रिया देती हैं। लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि ये तीनों किसी एक रंग पर ताले की तरह अलग-अलग नहीं बैठीं। उनकी संवेदनशीलता आपस में बहुत अधिक ओवरलैप करती है। खास तौर पर M और L कोन की संवेदनशीलता इतनी ज्यादा एक-दूसरे पर चढ़ती है कि जिस प्राकृतिक प्रकाश से M कोन तेज सक्रिय होती हैं, वह L कोन को भी काफी हद तक सक्रिय कर देता है। शोधकर्ताओं के अनुसार M कोन को सक्रिय करने वाली रोशनी का लगभग 85 प्रतिशत प्रभाव L कोन पर भी पड़ता है।

यही ‘ओलो’ की पूरी कुंजी है। प्रकृति में ऐसी कोई एक सामान्य प्रकाश तरंगदैर्घ्य नहीं मिलती जो केवल M कोन को जोर से सक्रिय करे और आसपास की L तथा S कोन को लगभग छोड़ दे। हमारा मस्तिष्क इसलिए उस प्रकार का कोन-संकेत सामान्य जीवन में कभी प्राप्त ही नहीं करता। कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, बर्कले के वैज्ञानिकों ने सोचा, यदि किसी तकनीक से सीधे केवल M कोन को चुनकर उत्तेजित कर दिया जाए तो मस्तिष्क उस असामान्य संकेत को किस रंग के रूप में अनुभव करेगा? यही प्रयोग ‘ओलो’ तक पहुँचा।

कैसे की गयी रिसर्च?

इसके लिए शोधकर्ताओं ने ‘Oz’ नाम की एक प्रणाली विकसित की। यह कोई सामान्य प्रोजेक्टर या स्क्रीन नहीं है। पहले प्रत्येक प्रतिभागी की रेटिना का अत्यंत सूक्ष्म नक्शा बनाया जाता है, क्योंकि हर व्यक्ति की S, M और L कोन कोशिकाएँ थोड़े अलग ढंग से बिखरी होती हैं। इसके बाद बहुत महीन लेज़र किरण रेटिना के छोटे हिस्से पर स्कैन की जाती है। प्रणाली जानती है कि किस बिंदु पर M कोन है और कहाँ L या S कोन। लेज़र केवल चुनी गई कोशिकाओं पर अति सूक्ष्म प्रकाश-पल्स डालता है और बाकी पर बंद रहता है। इस तरह एक समय में लगभग एक हजार तक फोटोरिसेप्टर कोशिकाओं को व्यक्तिगत स्तर पर नियंत्रित किया जा सकता है।

अर्थात वैज्ञानिकों ने कोई नया प्रकाश नहीं खोजा। उन्होंने आँख की सामान्य वायरिंग को एक असामान्य इनपुट दिया। इसे एक उदाहरण से समझिए। हमारे रंग-दर्शन को तीन नियंत्रण-घुंडियों (Control knobs) की तरह मान लें - S, M और L। प्रकृति में आप M वाली घुंडी घुमाएँ तो L वाली भी कुछ न कुछ साथ घूम जाती है। वैज्ञानिकों ने पहली बार ऐसी तकनीक बनाई जिससे उन्होंने लगभग केवल M वाली घुंडी को तेज कर दिया। मस्तिष्क को ऐसा कॉम्बिनेशन मिला जिसे उसने सामान्य जीवन में कभी नहीं देखा था। उसी अनुभव को उन्होंने ‘ओलो’ नाम दिया।

बेहद गाढ़ा रंग है ‘ओलो’

प्रतिभागियों ने इसे बहुत गहरा और असाधारण रूप से संतृप्त नीला-हरा या मोरपंखी हरा बताया। एक शोधकर्ता ऑस्टिन रूर्डा ने इसे इतना गाढ़ा बताया कि उसकी तुलना में प्रकृति का सबसे चमकीला हरा भी फीका लग रहा था। प्रयोग में जब लेज़र की टारगेट सटीकता जानबूझकर थोड़ी बिगाड़ दी गई और वह M कोन के साथ आसपास की दूसरी कोन को भी उत्तेजित करने लगा, तो ‘ओलो’ गायब हो गया और लोगों को सामान्य हरा दिखाई देने लगा। यह नियंत्रण प्रयोग इस बात का महत्वपूर्ण प्रमाण था कि असामान्य अनुभूति वास्तव में चुनिंदा M-कोन उत्तेजना से जुड़ी थी।

इसका नाम ‘ओलो’ क्यों रखा गया?

नाम भी वैज्ञानिक मजाक और गणित का मिश्रण है। रंग-दृष्टि को LMS कलर यूनिवर्स में तीन संख्याओं से दर्शाया जा सकता है - L, M और S कोन की प्रतिक्रिया। जिस आदर्श स्थिति को शोधकर्ता बनाना चाहते थे उसमें मोटे तौर पर L = 0, M = 1, S = 0 जैसा संकेत था, यानी सिर्फ मध्यम वेव लेंथ संवेदनशील M कोन सक्रिय हुआ। इस ‘0-1-0’ को उन्होंने अक्षरों के रूप में पढ़कर ‘olo’ नाम दे दिया। मूल शोध 18 अप्रैल 2025 को Science Advances में प्रकाशित हुआ।

इसे किसने खोजा?

इस खोज को किसी एक वैज्ञानिक का काम कहना उचित नहीं होगा। यह कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, बर्कले और वाशिंगटन विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं की टीम का काम था। शोधपत्र के प्रमुख लेखक जेम्स कार्ल फोंग थे और हन्ना डॉयल सह-प्रमुख प्रयोगकर्ता थीं। वरिष्ठ लेखक रेन एनजी, बर्कले में विद्युत अभियांत्रिकी और कंप्यूटर विज्ञान के प्रोफेसर हैं। आँख की अलग-अलग फोटोरिसेप्टर कोशिकाओं को अत्यंत सटीकता से देखने और उत्तेजित करने की तकनीक में बर्कले के दृष्टि-विज्ञान प्रोफेसर ऑस्टिन रूर्डा की केंद्रीय भूमिका थी। रेटिना में अलग-अलग कोन की पहचान करने के लिए वाशिंगटन विश्वविद्यालय के रामकुमार सबेसन और विमल प्रभु पांडियन सहित अन्य वैज्ञानिकों ने सहयोग किया। इसलिए यदि संक्षेप में नाम लेने हों तो जेम्स फोंग, हन्ना डॉयल, रेन एनजी और ऑस्टिन रूर्डा इस खोज के प्रमुख चेहरे हैं।

क्या हमारी आँखें अब तक एक रंग देखने में असमर्थ थीं?

शोधकर्ताओं का दावा है कि उन्होंने प्राकृतिक मानव रंग स्पेक्ट्रम से बाहर का एक रंग अनुभव उत्पन्न किया। लेकिन कुछ दृष्टि वैज्ञानिकों ने इस बात पर सवाल उठाया कि इसे वास्तव में “नया रंग” कहना चाहिए या ‘असाधारण रूप से गाढ़ा हरा-नीला’। इसलिए इसे किसी नए रंग की खोज कहना ठीक नहीं होगा।

सही बात तो ये है कि वैज्ञानिकों ने मानव रेटिना को ऐसी कृत्रिम उत्तेजना दी जो प्राकृतिक प्रकाश से संभव नहीं है। और उससे प्रतिभागियों को पहले कभी अनुभव न किया गया अत्यधिक संतृप्त नीला-हरा रंग दिखाई दिया। इस तकनीकी उपलब्धि पर व्यापक सहमति है। इसे बिल्कुल नया मूलभूत रंग कहना कितना उचित है ये अभी तय नहीं किया जा सका है।

यह फर्क बहुत महत्वपूर्ण है। रंग स्वयं कोई वस्तु नहीं है जो बाहर हवा में तैर रही हो। बाहर सिर्फ अलग-अलग वेव लेंथ का इलेक्ट्रो मैग्नेटिक प्रकाश है। ‘लाल’, ‘हरा’, ‘नीला’ या ‘ओलो’ हमारे मस्तिष्क द्वारा उन प्रकाश-संकेतों की व्याख्या से पैदा होने वाले अनुभव हैं। इस अर्थ में ‘ओलो’ रंग-विज्ञान से ज्यादा मस्तिष्क-विज्ञान की खोज भी है।

हम रंग कहाँ देखते हैं - आँख में या दिमाग में?

आँख प्रकाश पकड़ती है, रंग दिमाग बनाता है। रेटीना की S, M और L कोन अलग-अलग मात्रा में सक्रिय होती हैं। मस्तिष्क उनके अनुपातों की तुलना करता है। उदाहरण के लिए कोई प्रकाश L और M कोन को एक खास अनुपात में सक्रिय करता है तो हमें पीला या नारंगी जैसा अनुभव हो सकता है। दूसरा कॉम्बिनेशन हरा बनाता है। यानी हमारे पास ‘हरे रंग का फोटोरिसेप्टर’ इस अर्थ में नहीं है कि वह केवल हरा पहचानता हो। मस्तिष्क तीनों कोन से आने वाले संकेतों की तुलना करके रंग का अनुभव बनाता है।

‘ओलो’ प्रयोग ने इसी प्रणाली को चकमा दिया। वैज्ञानिकों ने मस्तिष्क को ऐसा M-प्रधान संकेत भेजा जो सामान्य प्रकृति में नहीं आता। और दिलचस्प बात यह है कि मस्तिष्क ने उस अपरिचित संकेत को अर्थहीन शोर नहीं माना बल्कि उसने उसका एक रंग अनुभव बना दिया। यही इस शोध की वैज्ञानिक दृष्टि से सबसे रोमांचक बातों में है।

क्या मैं अपने फोन की स्क्रीन पर ‘ओलो’ देख सकता हूँ?

इंटरनेट पर जो ‘ओलो कलर’ की तस्वीरें दिखाई जाती हैं वे सिर्फ उसका अनुमान या प्रतीक हैं। अगर आपके फोन की स्क्रीन वाकई में ‘ओलो’ दिखा सकती होती तो वह ‘ओलो’ ही नहीं होता, क्योंकि स्क्रीन लाल, हरे और नीले उप पिक्सेल के सामान्य मिक्सचर से रोशनी बनाती है। वह मिक्सचर फिर S, M और L कोन को सामान्य प्राकृतिक अनुपात में ही सक्रिय करेगा। इसीलिए किसी वेबसाइट पर दिखाई देने वाला तेज टील, सियान या मोरपंखी रंग ओलो का प्रतिनिधित्व भर है, वास्तविक ओलो नहीं। यह ठीक वैसा है जैसे किसी ब्लैक एंड वाइट फोटो में किसी अत्यंत चमकीले रंग का वर्णन करना, आप उसके बारे में समझ सकते हैं, लेकिन उसका असली अनुभव स्क्रीन नहीं दे सकती। ओलो देखने के लिए फिलहाल रेटिना की व्यक्तिगत M कोन पर अत्यंत सटीक लेज़र उत्तेजना आवश्यक है।

फिर ‘हर इंसान इसे नहीं देख सकता’ कहना कितना सही है?

सही बात यह नहीं कि कुछ मनुष्यों में ‘ओलो’ देखने की जन्मजात शक्ति है और बाकी में नहीं। अभी तक ऐसा कोई प्रमाण नहीं है। बेहतर बात यह है कि सामान्य मानव दृष्टि में कोई भी व्यक्ति स्वाभाविक रूप से वास्तविक ओलो नहीं देख सकता। जिन लोगों ने इसे देखा, उन्होंने विशेष Oz प्रयोगशाला उपकरण की सहायता से देखा। 2025 के मूल अध्ययन में पाँच लोगों ने ओलो देखा था। उनमें खुद कुछ शोधकर्ता भी शामिल थे। बाद में तकनीक के साथ और लोगों को भी यह अनुभव कराया गया है लेकिन यह अभी अत्यंत सीमित प्रयोगशाला प्रणाली है। मतलब ये कि यह ‘कुछ दुर्लभ लोगों की सुपरविजन’ नहीं है बल्कि यह सामान्य मानव आँख को असामान्य तरीके से उत्तेजित करने का प्रयोग है।

क्या कलर ब्लाइंड व्यक्ति भी ओलो देख सकता है?

यह अभी शोध का रोचक प्रश्न है। सामान्य कलर ब्लाइंडनेस में अक्सर L या M कोन के वर्णक की संवेदनशीलता में जेनेटिक अंतर होता है, जिसके चलते लाल और हरे के बीच भेद कम हो सकता है। Oz प्रणाली की खासियत यह है कि वैज्ञानिक सीधे चुनी हुई कोन सेल्स को उत्तेजित कर सकते हैं। इसलिए शोधकर्ता यह जाँचना चाहते हैं कि इससे कलर ब्लाइंड लोगों में ऐसे रंग अनुभव उत्पन्न किए जा सकते हैं जो सामान्य रूप से उपलब्ध नहीं होते। अभी इसे कलर ब्लाइंडनेस का उपचार नहीं कहा जा सकता,। लेकिन इस तकनीक का संभावित शोध-उपयोग यही है।

इसके अलावा शोधकर्ता यह भी पूछ रहे हैं कि क्या इसी तकनीक से मनुष्यों में चार कोन वाली दृष्टि यानी टेट्राक्रोमैटिक अनुभव का अनुकरण संभव हो सकता है। कुछ जीवों में हमारे तीन की तुलना में अधिक प्रकार की रंग-संवेदी कोशिकाएँ होती हैं, जिससे उनका रंग जगत संभवतः हमसे कहीं अधिक विस्तृत होता है। बर्कले टीम इसी दिशा को भविष्य के प्रयोगों में देख रही है।

क्या जानवर ऐसे रंग देखते हैं जिन्हें हम नहीं देख सकते?

बहुत संभव है और यह ‘ओलो’ को समझने का सबसे अच्छा रास्ता भी है। हम मनुष्य सामान्यतः तीन प्रकार की कोन कोशिकाओं पर आधारित त्रिवर्णीय दृष्टि (Trichromatic vision) रखते हैं। कई पक्षी चार प्रकार के कोन सेल्स रखते हैं और कुछ अल्ट्रा वायलेट (पराबैंगनी) प्रकाश भी देख सकते हैं। इसका मतलब है कि उनकी रंग दुनिया में ऐसे अनुभव हो सकते हैं जिनकी कल्पना करना हमारे लिए संभव नहीं।

यहाँ एक गहरी समस्या पैदा होती है। जन्म से अंधे किसी व्यक्ति को लाल रंग शब्दों में पूरी तरह समझाना मुश्किल है। उसी तरह यदि किसी जीव के पास हमारी तुलना में एक अतिरिक्त रंग संवेदी चैनल है तो वह जिन रंग-अंतर को देखता है, हम केवल गणित में उनका वर्णन कर सकते हैं, अनुभव नहीं कर सकते। ‘ओलो’ ने पहली बार मनुष्यों को इस सीमा की एक छोटी झलक दी है: शायद हमारी दुनिया में जितना प्रकाश मौजूद है, हमारी अनुभूति उसकी केवल एक जैविक व्याख्या है।

क्या हमारी आँख असल में इससे अधिक रंग देखने में सक्षम है?

यही इस प्रयोग का सबसे चौंकाने वाला निहितार्थ है। हमारी तीन कोन कोशिकाओं में सूचना देने की क्षमता सामान्य प्रकाश के नीचे जितनी इस्तेमाल होती है, उससे अधिक संभावित संयोजन बनाए जा सकते हैं यदि प्रत्येक कोन को स्वतंत्र रूप से नियंत्रित किया जाए। अर्थात सीमा केवल आँख की कोशिकाओं में नहीं, प्रकृति द्वारा उन्हें सक्रिय करने के तरीके में भी है।

सामान्य प्रकाश में M और L कोन हमेशा कुछ हद तक साथ सक्रिय होते हैं। Oz ने उस प्राकृतिक सीमा को तोड़ दिया।इसका अर्थ यह नहीं कि मनुष्य के भीतर हजारों छिपे रंग पड़े हैं जिन्हें खोलने भर की जरूरत है। लेकिन यह जरूर दिखाता है कि रंग-अनुभूति का संभावित क्षेत्र हमारे रोजमर्रा के दृश्य संसार से अधिक व्यापक हो सकता है। यही कारण है कि शोधकर्ताओं ने इसे ‘मानव दृष्टि के अनुभव का विस्तार’ कहा।

Oz तकनीक इतनी कठिन क्यों है?

हर व्यक्ति की रेटिना एक जैसी नहीं है। S, M और L कोन का वितरण सूक्ष्म स्तर पर अलग होता है। इसलिए पहले उस व्यक्ति की रेटिना को अत्यंत उच्च विभेदन से चित्रित करना पड़ता है और हर कोन की पहचान करनी पड़ती है। इसके बाद आँख हर समय छोटे-छोटे अनैच्छिक आंदोलन करती रहती है। यदि लेज़र एक M कोन से मात्र कुछ माइक्रोमीटर हट जाए तो वह L कोन पर जा सकता है और ओलो अनुभव टूट सकता है। इसलिए प्रणाली को वास्तविक समय में आँख की गति का पीछा करना पड़ता है।इतनी जटिल व्यवस्था के कारण यह जल्द ही टेलीविजन, मोबाइल या सामान्य वीआर चश्मे में आने वाली तकनीक नहीं है। अभी यह मुख्यतः प्रयोगशाला अनुसंधान का साधन है।

इसका वास्तविक उपयोग क्या हो सकता है?

ओलो स्वयं शायद इस शोध का सबसे आकर्षक प्रदर्शन है, लेकिन वैज्ञानिकों का असली उद्देश्य सिर्फ नया रंग दिखाना नहीं है।यदि वे एक-एक फोटोरिसेप्टर को नियंत्रित कर सकते हैं तो यह पता लगाया जा सकता है कि रेटिना की कौन-सी कोशिका किस दृश्य अनुभव में कितना योगदान देती है। किसी नेत्र रोग में कुछ कोन नष्ट हो जाती हैं तो स्वस्थ व्यक्ति में उन्हीं कोनों को प्रयोगात्मक रूप से बंद करके देखा जा सकता है कि दृष्टि कैसी होगी। इससे नेत्र रोगों को बेहतर समझने में मदद मिल सकती है। शोधकर्ता रंगांधता और दृष्टि-हानि के अध्ययन में भी इसका इस्तेमाल देख रहे हैं।

इसके आगे एक बड़ा प्रश्न है कि मस्तिष्क कितने नए प्रकार के संवेदनात्मक संकेत समझ सकता है? अगर किसी व्यक्ति को ऐसी दृश्य सूचना दी जाए जो उसके विकास के दौरान कभी नहीं मिली, तो क्या मस्तिष्क उसे समझना सीख सकता है? ओलो प्रयोग में कम-से-कम इतना हुआ कि मस्तिष्क ने एक नए प्रकार के कोन-संयोजन को सुसंगत रंग-अनुभव में बदल दिया। यही बात भविष्य में कृत्रिम दृष्टि, रेटिना प्रत्यारोपण और शायद नए प्रकार के संवेदी उपकरणों के लिए बहुत महत्वपूर्ण हो सकती है।

क्या ‘रंग’ बाहर वास्तव में होते ही नहीं?

भौतिक दुनिया में प्रकाश की वेवलेंथ वास्तविक है। लेकिन “हरा”, “बैंगनी”, ‘मोरपंखी’ या ‘ओलो’ उस प्रकाश की आर्गेनिक अनुभूति है। इसका सबसे प्रसिद्ध उदाहरण मैजेंटा है। एक ही “मैजेंटा वेव लेंथ” नहीं होती। लाल और नीले क्षेत्रों की रोशनी एक साथ आने पर मस्तिष्क एक रंग अनुभव बनाता है जिसे हम मैजेंटा कहते हैं। उसी तरह रंग दुनिया की भौतिक विशेषता और मस्तिष्क की व्याख्या, दोनों की संयुक्त उपज हैं।

‘ओलो’ इस तथ्य को और स्पष्ट कर देता है। वैज्ञानिकों ने दुनिया में नया फोटॉन नहीं बनाया। उन्होंने फोटोरिसेप्टर गतिविधि का नया पैटर्न बनाया, और दिमाग ने उससे नया रंग-अनुभव बनाया।इसलिए ओलो की खोज का सबसे बड़ा महत्व शायद स्वयं उस रंग में नहीं है। असली महत्व यह है कि उसने दिखाया कि जिस रंगीन संसार को हम पूर्ण वास्तविकता समझते हैं, वह हमारे तीन प्रकार के कोन और मस्तिष्क द्वारा बनाया गया एक संस्करण भर है।

यदि हमारी रेटिना चार प्रकार की कोन के साथ विकसित हुई होती तो शायद इंद्रधनुष में हमें ऐसे अनेक भेद दिखाई देते जिन्हें आज हम नाम भी नहीं दे सकते। यदि केवल दो प्रकार की कोन होतीं तो आज के कुछ रंग हमारे लिए एक ही दिखाई देते।और इसी वजह से ‘ओलो’ वैज्ञानिक रूप से इतना आकर्षक है। वह कोई नई क्रेयॉन-पेंसिल नहीं है जिसे रंगों के डिब्बे में जोड़ दिया गया हो। वह एक प्रयोगात्मक खिड़की है जो दिखाती है कि मानव रंग-दृष्टि की सीमाएँ केवल बाहर की दुनिया ने नहीं, हमारी अपनी जैविक आँखों ने भी तय की हैं।

इसलिए इसका सबसे सटीक निष्कर्ष यह है कि ओलो प्राकृतिक दुनिया में मिलने वाला नया प्रकाश-रंग नहीं है। यह सामान्यतः असंभव M-कोन उत्तेजना से पैदा किया गया रंग-अनुभव है। मूल 2025 प्रयोग में पाँच लोगों ने इसे विशेष लेज़र प्रणाली से देखा। सामान्य आँख, फोन, टीवी, कैमरा, पेंट या प्रिंटर इसे वास्तविक रूप में दिखा नहीं सकते। और इसकी खोज का सबसे बड़ा वैज्ञानिक संदेश यह है कि हमारी आँख जितना संसार दिखाती है, दृश्य वास्तविकता शायद उससे कहीं अधिक संभावनाएँ रखती है।

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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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