Newstrack Special: ‘पोर्न’ शब्द कहाँ से आया? इसे देखने की आदत क्यों बनती है, ब्रेन में क्या होता है?

Newstrack Special: पोर्न देखने की आदत क्यों बनती है? डोपामिन, ब्रेन के रिवॉर्ड सिस्टम और नवीनता की इसमें क्या भूमिका है? जानिए ‘पोर्न एडिक्शन’, CSBD और समस्याग्रस्त पोर्न उपयोग पर विज्ञान क्या कहता है। ‘ç

Yogesh Mishra
Published on: 19 Aug 2026 8:07 PM IST
Newstrack Special: ‘पोर्न’ शब्द कहाँ से आया? इसे देखने की आदत क्यों बनती है, ब्रेन में क्या होता है?
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Newstrack Special: ‘पोर्न’ दरअसल ‘पॉर्नोग्राफी’ शब्द का संक्षिप्त रूप है। यह शब्द प्राचीन यूनानी भाषा के दो शब्दों से बना माना जाता है - pornē, जिसका अर्थ वेश्या या देह-व्यापार से जुड़ी स्त्री था। और graphein, जिसका अर्थ है लिखना या वर्णन करना। इस तरह शुरुआती अर्थ लगभग ‘वेश्याओं या यौन व्यापार का वर्णन’ था। अंग्रेज़ी में पोर्नोग्राफी (pornography) शब्द उन्नीसवीं शताब्दी में प्रचलित हुआ। शब्दकोशीय इतिहास इसका अंग्रेज़ी में प्रयोग लगभग सन 1842 से दर्ज करता है। समय के साथ इसका अर्थ बदलकर ऐसे चित्र, लेख, फिल्म या अन्य सामग्री के लिए होने लगा जिसका प्रमुख उद्देश्य यौन उत्तेजना पैदा करना हो।

पोर्नोग्राफी का शब्द नया है। लेकिन कामुक चित्रण नया नहीं है। मनुष्य हजारों वर्षों से काम और यौन व्यवहार को चित्रों, मूर्तियों और साहित्य में प्रस्तुत करता आया है। इसलिए आधुनिक इंटरनेट पोर्न को प्राचीन कामुक कला से सीधे समान मान लेना भी सही नहीं होगा। आज की डिजिटल पोर्नोग्राफी की एक बिल्कुल नई विशेषता है - अनंत उपलब्धता, तत्काल पहुँच, अत्यधिक विविधता और कुछ सेकंड में एक दृश्य से दूसरे दृश्य पर पहुँच जाना। यही विशेषता उसके मनोवैज्ञानिक प्रभाव को पुराने कामुक साहित्य या कला से अलग बना सकती है।

लोग पोर्न बार-बार क्यों देखने लगते हैं?

इसका पहला कारण बहुत सामान्य है। यौन सामग्री स्वयं मनुष्य के लिए शक्तिशाली जैविक संकेत है। भोजन, सामाजिक स्वीकार्यता और यौन अवसर जैसी चीजों को हमारे मस्तिष्क ने विकासक्रम में महत्वपूर्ण माना है। इसलिए कामुक दृश्य ध्यान बहुत तेजी से खींच सकते हैं और मस्तिष्क के पुरस्कार तथा प्रेरणा तंत्र को सक्रिय कर सकते हैं।

इसमें डोपामिन की भूमिका महत्वपूर्ण है।लेकिन लोकप्रिय धारणा कि ‘पोर्न देखते ही डोपामिन (dopamine) की बाढ़ आती है और दिमाग नष्ट हो जाता है’ वैज्ञानिक रूप से बहुत अतिरंजित है। डोपामिन केवल आनंद का रसायन नहीं है। वह इस बात में विशेष भूमिका निभाता है कि कौन-सी चीज महत्वपूर्ण है, किसे फिर तलाशना चाहिए और किस संकेत से पुरस्कार मिलने की उम्मीद है।

मस्तिष्क का वेंट्रल टेगमेंटल एरिया (VTA), वेंट्रल स्ट्रायटम (Ventral Striatum), विशेषकर न्यूक्लियस अकम्बेंस (Nucleus Accumbens), तथा उससे जुड़े अन्य नेटवर्क यौन पुरस्कार और उसकी अपेक्षा में काम करते हैं। समस्याग्रस्त या बाध्यकारी यौन व्यवहार (Compulsive Sexual Behavior Disorder - CSBD) वाले कुछ लोगों पर हुए अध्ययनों में कामुक संकेत आने से पहले ही वेंट्रल स्ट्रायटम की प्रतिक्रिया अधिक पाई गई है। इसका अर्थ यह हो सकता है कि समस्या केवल यौन दृश्य से मिलने वाले आनंद में नहीं बल्कि ‘अब कुछ उत्तेजक मिलने वाला है’ वाली अपेक्षा और चाहत में भी होती है।

यह बहुत महत्वपूर्ण फर्क है liking और wanting में। अर्थात आनंद लेना और चाहना, हमेशा एक ही चीज नहीं होते। कोई व्यक्ति किसी व्यवहार से पहले जितना आनंद लेता था उतना बाद में न भी ले, फिर भी उसे बार-बार करने की इच्छा मजबूत रह सकती है। कई प्रकार के बाध्यकारी व्यवहारों और व्यसनों में यही प्रक्रिया देखी जाती है। अब इंटरनेट पोर्न की खास संरचना समझिए। यदि आपके सामने केवल एक कामुक चित्र हो, तो उत्तेजना कुछ समय बाद घट सकती है। लेकिन इंटरनेट पर अगला दृश्य, अगला व्यक्ति, अगली श्रेणी और अगली नवीनता केवल एक क्लिक दूर है। मस्तिष्क को लगातार नया संकेत मिलता रहता है। नवीनता स्वयं ध्यान और पुरस्कार अपेक्षा को बढ़ा सकती है।

यहीं तथाकथित ‘कूलिज प्रभाव’ (Coolidge Effect) की चर्चा की जाती है जिसके अनुसार इंसानों समेत कई स्तनधारी प्रजातियों में अपने परिचित यौन साथी के साथ संबंध बनाने के बाद बोरियत या थकान हो जाने पर भी, किसी नए यौन साथी के आ जाने से यौन रुचि और उत्तेजना फिर से जागृत हो जाती है। मनुष्य का व्यवहार इससे कहीं अधिक जटिल है, लेकिन डिजिटल पोर्नोग्राफी लगभग असीम नवीनता उपलब्ध कराती है। इसलिए कुछ लोगों में ‘एक वीडियो देखकर बंद कर देना’ मुश्किल हो सकता है। अगला वीडियो संभवतः अधिक नया या उत्तेजक होगा, यही प्रत्याशा खोज जारी रखती है।

इसके साथ आदत का दूसरा तंत्र जुड़ जाता है—संकेत → व्यवहार → पुरस्कार।

मान लीजिए कोई व्यक्ति तनाव में है। वह पोर्न देखता है और कुछ देर के लिए तनाव तथा अकेलापन कम महसूस करता है। अब मस्तिष्क सीख सकता है कि तनाव = पोर्न खोलो = अस्थायी राहत।

कुछ समय बाद यह प्रक्रिया लगभग स्वचालित हो सकती है। व्यक्ति जरूरी नहीं कि हर बार अत्यधिक यौन इच्छा के कारण ही पोर्न देख रहा हो। वह ऊब, तनाव, अकेलेपन, चिंता या नींद न आने पर भी उसी व्यवहार की ओर जा सकता है। यहाँ पोर्न का उपयोग भावना नियंत्रित करने के साधन में बदल जाता है।यही फर्क सामान्य उपयोग और समस्याग्रस्त उपयोग को समझने में बहुत महत्वपूर्ण है।

क्या हर बार पोर्न देखने से ब्रेन में ‘नशे जैसा’ ही होता है?

यौन सामग्री और नशीली दवाएँ कुछ साझा पुरस्कार तंत्रों को प्रभावित कर सकती हैं। लेकिन पोर्न देखना कोकीन या हेरोइन लेने जैसा जैविक प्रभाव नहीं पैदा करता। ड्रग सीधे विशिष्ट रासायनिक प्रणालियों में हस्तक्षेप करते हैं और डोपामिन या दूसरे संदेशवाहकों को असामान्य रूप से तीव्र तथा लंबे समय तक बदल सकते हैं। पोर्न एक प्राकृतिक यौन संकेत के माध्यम से मस्तिष्क के पुरस्कार तंत्र को सक्रिय करता है।

दोनों में कुछ न्यूरल समानताएँ हो सकती हैं। इससे दोनों समान चीज नहीं बन जाते। वैज्ञानिक शोध अधिक सावधान है। समस्याग्रस्त पोर्न उपयोग और बाध्यकारी यौन व्यवहार में संकेतों के प्रति अत्यधिक प्रतिक्रिया, craving यानी तीव्र चाहत और नियंत्रण में कठिनाई जैसे तंत्रों के प्रमाण हैं। लेकिन यह क्षेत्र अभी विकसित हो रहा है और सभी यूजर्स पर एक ही न्यूरोलॉजिकल मॉडल लागू नहीं किया जा सकता।

पोर्न की आदत कैसे मजबूत होती जाती है?

इसके पीछे चार चीजें विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो सकती हैं - आसान उपलब्धता, नवीनता, तत्काल पुरस्कार और गोपनीयता। पहले किसी व्यक्ति को कामुक सामग्री प्राप्त करने के लिए दुकान, पत्रिका या वीडियो की आवश्यकता होती थी। अब फोन पर कुछ सेकंड में लगभग असीम सामग्री उपलब्ध है। व्यवहार जितना आसान और पुरस्कार जितना तत्काल होगा, आदत बनने की संभावना उतनी बढ़ सकती है। यह सोशल मीडिया के सिद्धांत से कुछ मिलता-जुलता है। वहाँ अगली पोस्ट पता नहीं कैसी होगी। यहाँ अगला दृश्य पता नहीं कितना अधिक उत्तेजक होगा। अनिश्चित पुरस्कार मनुष्य को ‘एक बार और’ करने के लिए प्रेरित कर सकता है।

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हर व्यक्ति जो नियमित पोर्न देखता है, उसे लत लग जाएगी। अधिकांश व्यवहारों की तरह इसमें व्यक्ति-विशेष का फर्क बहुत बड़ा है। आनुवंशिक प्रवृत्ति, आवेगशीलता, मानसिक स्वास्थ्य, अकेलापन, तनाव, यौन जीवन, रिश्ते, धार्मिक-सांस्कृतिक विश्वास और उपयोग की परिस्थिति सभी भूमिका निभा सकते हैं।

क्या समय के साथ वही सामग्री कम उत्तेजक लगने लगती है?

कुछ लोगों में ऐसा हो सकता है। लेकिन इसे सार्वभौमिक नियम नहीं मानना चाहिए। बार-बार एक ही प्रकार की उत्तेजना देखने से habituation, यानी अभ्यस्तता हो सकती है। तब नवीन सामग्री की तलाश बढ़ सकती है। समस्याग्रस्त उपयोग के कुछ मामलों में लोग बताते हैं कि समय के साथ अधिक विविध या अधिक तीव्र सामग्री देखने लगे। लेकिन ‘हर पोर्न यूजर लगातार अधिक चरम सामग्री की ओर जाएगा’ इस दावे का समर्थन विज्ञान नहीं करता। यह व्यक्ति के व्यवहार पर निर्भर है, न कि पोर्न देखने की अपरिहार्य जैविक परिणति।

प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स (Prefrontal Cortex) की क्या भूमिका है?

मस्तिष्क का आगे वाला भाग, विशेषकर प्रीफ्रंटल नेटवर्क, योजना, आत्म-नियंत्रण, निर्णय और तत्काल इच्छा रोककर दीर्घकालिक लक्ष्य चुनने में मदद करता है। यदि किसी व्यक्ति में पोर्न उपयोग बाध्यकारी हो गया है तो समस्या केवल ‘पुरस्कार तंत्र बहुत मजबूत’ होने की नहीं बल्कि पुरस्कार की इच्छा और नियंत्रण के बीच संतुलन की भी हो सकती है। शोध में compulsive sexual behaviour यानी बाध्यकारी यौन व्यवहार के संदर्भ में cue-reactivity, craving और inhibitory control - संकेत प्रतिक्रिया, तीव्र चाहत और नियंत्रण - तीनों की चर्चा होती है। लेकिन फिर सावधानी जरूरी है। किसी व्यक्ति का अधिक पोर्न देखना देखकर हम यह नहीं कह सकते कि उसका ‘प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स खराब हो गया।’ मस्तिष्क अध्ययन समूह-स्तर के औसत अंतर बताते हैं; वे किसी एक व्यक्ति की बीमारी का स्कैन नहीं होते।

क्या पोर्न से डोपामिन ‘खत्म’ हो जाता है?

यह इंटरनेट मिथक है कि बार-बार पोर्न देखने से “डोपामिन खत्म” हो जाता है या रिसेप्टर हमेशा के लिए नष्ट हो जाते हैं। वर्तमान विज्ञान ऐसा सरल निष्कर्ष नहीं देता। बार-बार पुरस्कार व्यवहार से सीख, आदत, संकेतों के प्रति संवेदनशीलता और नियंत्रण में परिवर्तन हो सकते हैं, लेकिन इसे “डोपामिन टैंक खाली हो गया” के रूप में समझना गलत है। इसी तरह तथाकथित dopamine detox करके मस्तिष्क को पूरी तरह ‘रीसेट’ करने की लोकप्रिय भाषा भी जैविक रूप से बहुत सरल है।

क्या पोर्न वास्तविक सेक्स में रुचि कम कर सकता है?

कुछ लोगों में अत्यधिक या समस्याग्रस्त उपयोग संबंधों और यौन जीवन से जुड़ी कठिनाइयों के साथ पाया जाता है, लेकिन यहाँ कारण और परिणाम अलग करना कठिन है।उदाहरण के लिए कोई व्यक्ति पहले से रिश्ते में असंतुष्ट है, इसलिए अधिक पोर्न देख सकता है। दूसरी दिशा में अत्यधिक पोर्न उपयोग संबंधों में दूरी या अवास्तविक अपेक्षाएँ बढ़ा सकता है। दोनों एक-दूसरे को प्रभावित भी कर सकते हैं।

कुछ पुरुष पोर्न उपयोग और स्तंभन संबंधी समस्या के बीच संबंध बताते हैं।लेकिन ‘पोर्न देखने से सीधे erectile dysfunction होता है’ यह अभी हर व्यक्ति पर लागू स्थापित नियम नहीं है। चिंता, अवसाद, संबंध तनाव, स्वास्थ्य, दवाएँ और हस्तमैथुन की आदत सहित अनेक कारण भूमिका निभा सकते हैं। इसलिए ऐसे मामलों में केवल ‘पोर्न ही कारण है’ मानकर इलाज करना उचित नहीं।

क्या ‘पोर्न एडिक्शन’ बीमारी है?

‘Porn addiction’ नाम से कोई सार्वभौमिक रूप से स्वीकृत स्वतंत्र चिकित्सकीय निदान नहीं है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की ICD-11 में Compulsive Sexual Behaviour Disorder-CSBD, यानी बाध्यकारी यौन व्यवहार विकार को मान्यता है। लेकिन WHO ने इसे ‘disorders due to addictive behaviours’ यानी व्यसन विकारों की श्रेणी में नहीं बल्कि impulse control disorders - आवेग नियंत्रण विकारों के अंतर्गत रखा है। WHO की व्यसन श्रेणी में वर्तमान में जुआ और गेमिंग जैसे विकार अलग रूप से शामिल हैं।

यह अंतर महत्वपूर्ण है। इसका मतलब ये है कि चिकित्सा विज्ञान यह स्वीकार करता है कि कुछ लोगों में यौन व्यवहार, जिसमें अत्यधिक पोर्नोग्राफी देखना भी शामिल हो सकता है - इतना बाध्यकारी हो सकता है कि व्यक्ति नियंत्रण खो देता है और जीवन में गंभीर समस्या पैदा होती है। लेकिन इसे औपचारिक रूप से केवल ‘पोर्न एडिक्शन’ नाम से परिभाषित करना अभी सर्वमान्य नहीं है।

CSBD में मुख्य समस्या यह है कि व्यक्ति लंबे समय तक तीव्र और दोहराए जाने वाले यौन आवेगों या व्यवहार को नियंत्रित करने में विफल रहता है, और इससे व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक, शैक्षिक या व्यावसायिक जीवन में महत्वपूर्ण नुकसान या परेशानी होती है।इसलिए कोई व्यक्ति सप्ताह में कितनी बार पोर्न देखता है, मात्र उसी संख्या से बीमारी तय नहीं की जा सकती।

बहुत पोर्न देखना और बीमारी - दोनों में फर्क कहाँ है?

मूल कसौटी है नियंत्रण और नुकसान। यदि व्यक्ति चाहता है कि वह पोर्न न देखे लेकिन बार-बार असफल होता है। घंटों उसमें चला जाता है। काम, पढ़ाई या नींद प्रभावित होती है। रिश्ते बिगड़ते हैं। वह नुकसान जानते हुए भी व्यवहार रोक नहीं पाता तब समस्याग्रस्त बाध्यकारी व्यवहार की संभावना गंभीर हो जाती है। इसके विपरीत कोई व्यक्ति पोर्न कभी-कभी देखता है, उसके काम, संबंध और स्वास्थ्य पर प्रभाव नहीं है और वह आसानी से रोक सकता है तो इसे अपने-आप बीमारी नहीं कहा जा सकता।

यह फर्क विशेष रूप से इसलिए जरूरी है क्योंकि यौन व्यवहार के बारे में अपराधबोध और धार्मिक या नैतिक संघर्ष बहुत तीव्र हो सकते हैं। शोध में ‘moral incongruence’ यानी व्यक्ति का व्यवहार उसके अपने नैतिक या धार्मिक विश्वासों से टकराना, समस्याग्रस्त पोर्न उपयोग की स्वयं की धारणा को प्रभावित करता पाया गया है। व्यक्ति संभव है बहुत कम पोर्न देखता हो लेकिन उसे लगता हो कि वह “आदी” है क्योंकि उसका व्यवहार उसकी मान्यताओं के खिलाफ है।

इसीलिए केवल अपराधबोध = बीमारी नहीं। और केवल अधिक यौन इच्छा = बीमारी नहीं।

CSBD का निदान केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि व्यक्ति अपने यौन व्यवहार को लेकर नैतिक असहमति या अपराधबोध महसूस करता है। चिकित्सकीय समस्या के लिए वास्तविक नियंत्रण-हानि और जीवन में उल्लेखनीय व्यवधान देखना जरूरी है।यह महत्वपूर्ण सुरक्षा है, क्योंकि अलग-अलग संस्कृतियों में यौन व्यवहार के प्रति मानदंड बहुत अलग हैं।मेडिकल विज्ञान का काम किसी व्यक्ति के नैतिक जीवन का फैसला करना नहीं, बल्कि यह देखना है कि क्या व्यवहार उसके नियंत्रण से बाहर होकर वास्तविक कार्यक्षमता को नुकसान पहुँचा रहा है।

किशोरों के मामले में प्रश्न अधिक गंभीर क्यों है?

किशोर मस्तिष्क अभी विकासशील होता है और यौन जिज्ञासा स्वाभाविक है। लेकिन इंटरनेट पोर्नोग्राफी वास्तविक यौन संबंध का विश्वसनीय शिक्षण माध्यम नहीं है। उसमें अभिनय, संपादन, शरीरों का चयन और ऐसी गतिविधियाँ हो सकती हैं जो वास्तविक संबंधों में सामान्य या वांछनीय नहीं हैं।यदि किशोर इसे सेक्स शिक्षा समझे तो सहमति, गर्भनिरोध, भावनात्मक संबंध, संचार और वास्तविक शरीर के बारे में गलत अपेक्षाएँ बन सकती हैं।यह मस्तिष्क ‘नष्ट’ होने से अलग समस्या है, यौन पटकथा सीखने की समस्या।हम इंसान केवल जैविक प्रतिक्रिया नहीं सीखते; हम देखकर सामाजिक व्यवहार भी सीखते हैं।

क्या पोर्न देखने से मस्तिष्क स्थायी रूप से बदल जाता है?

हर अनुभव मस्तिष्क को किसी न किसी रूप में बदलता है। नई भाषा सीखना, संगीत का अभ्यास, प्रेम, वीडियो गेम, व्यायाम ये सब न्यूरोप्लास्टिसिटी (Neuroplasticity) पैदा करते हैं। इसलिए “पोर्न ब्रेन बदल देता है” कहना अपने-आप कोई डरावनी वैज्ञानिक खोज नहीं है।

महत्वपूर्ण प्रश्न है कि किस प्रकार का परिवर्तन, कितना बड़ा, किसमें और क्या उससे नुकसान होता है?

कोई कैसे जाने कि उसका उपयोग समस्या बन रहा है?

सबसे अच्छा प्रश्न यह नहीं है कि ‘मैं सप्ताह में कितनी बार देखता हूँ?’ बल्कि ये है कि क्या मैं तय करने के बावजूद इसे रोक नहीं पा रहा? क्या इसमें मेरी अपेक्षा से लगातार अधिक समय जा रहा है? क्या इसके कारण नींद, काम, पढ़ाई या संबंध प्रभावित हो रहे हैं? क्या मैं तनाव या उदासी से भागने के लिए लगभग हमेशा इसी का सहारा लेता हूँ? क्या नुकसान स्पष्ट होने के बावजूद व्यवहार जारी है? क्या मेरी वास्तविक यौन जिंदगी या संबंध इससे प्रभावित हो रहे हैं?

यदि उत्तर बार-बार हाँ है तो एक पेशेवर मूल्यांकन उपयोगी हो सकता है।

क्या इसे रोका या बदला जा सकता है?

बाध्यकारी पोर्न उपयोग कोई अपरिवर्तनीय ‘डोपामिन क्षति’ नहीं है। उपचार का लक्ष्य अक्सर केवल वेबसाइट बंद कर देना नहीं होता। यह समझना होता है कि व्यवहार किससे जुड़ा है - तनाव, अकेलापन, चिंता, अवसाद, ऊब, संबंध समस्या, आवेग नियंत्रण या कोई दूसरी मानसिक स्वास्थ्य समस्या। संज्ञानात्मक-व्यवहार चिकित्सा, ट्रिगर पहचानना, वातावरण में बदलाव, स्वस्थ दिनचर्या और अंतर्निहित चिंता या अवसाद का इलाज मददगार हो सकते हैं। कुछ मामलों में चिकित्सक दूसरे मानसिक स्वास्थ्य विकारों या दवाओं की आवश्यकता का भी मूल्यांकन कर सकता है।

कुछ लोगों में पोर्नोग्राफी सहित यौन व्यवहार वास्तव में बाध्यकारी हो सकता है और गंभीर जीवन-हानि पैदा कर सकता है। ऐसे पैटर्न को WHO की CSBD अवधारणा के अंतर्गत चिकित्सकीय रूप से समझा जा सकता है। सबसे संतुलित वैज्ञानिक निष्कर्ष यह है कि पोर्न स्वयं हर यूजर के लिए नशा नहीं है। लेकिन कुछ लोगों में इसका उपयोग पुरस्कार-सीख, नवीनता, तनाव से राहत और आदत के चक्र में फँसकर बाध्यकारी हो सकता है। उस अवस्था में सवाल सामग्री की नैतिकता से आगे बढ़कर नियंत्रण और मानसिक स्वास्थ्य का हो जाता है। बार-बार उपयोग अपने-आप बीमारी नहीं है। लेकिन जब यौन व्यवहार नियंत्रण से बाहर हो जाए और जीवन को नुकसान पहुँचाए, तब वह वास्तविक चिकित्सकीय समस्या बन सकता है

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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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