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Sexual Desire Explained: सेक्सुअल डिज़ायर कम-ज्यादा क्यों होती है? हार्मोन, तनाव और नींद का असर
Sexual Desire Explained in Hindi: सेक्सुअल डिज़ायर यानी कामेच्छा क्यों बदलती रहती है? जानिए टेस्टोस्टेरोन, एस्ट्रोजन, तनाव, नींद, रिश्तों, उम्र और स्वास्थ्य का libido पर कितना असर पड़ता है।
Sexual Desire Explained in Hindi
Sexual Desire Explained in Hindi: सेक्सुअल डिज़ायर यानी यौन इच्छा कोई ऐसी स्थिर चीज नहीं है जो जीवन भर एक ही स्तर पर बनी रहे। यह दिन, सप्ताह, उम्र, संबंध, मानसिक स्थिति, हार्मोन, नींद, स्वास्थ्य, दवाओं और जीवन की परिस्थितियों के साथ बदल सकती है। कभी इच्छा बहुत ज्यादा होती है, कभी सामान्य, तो कभी बहुत कम। इस उतार-चढ़ाव का होना अपने आप में कोई बीमारी नहीं है। समस्या तब मानी जाती है जब इच्छा में कमी लंबे समय तक बनी रहे, व्यक्ति को खुद इससे परेशानी हो, संबंधों पर असर पड़े या उसके पीछे किसी शारीरिक अथवा मानसिक कारण का संदेह हो।
यौन इच्छा का केंद्र: मस्तिष्क और हार्मोन तंत्र
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि यौन इच्छा सिर्फ सेक्स हार्मोन का सीधा परिणाम नहीं है। मस्तिष्क इसका केंद्रीय नियंत्रण केंद्र है। इच्छा बनने में स्मृति, आकर्षण, भावनात्मक निकटता, तनाव, सुरक्षा का अनुभव, कल्पना, पुरानी यादें और शारीरिक स्थिति सब शामिल होते हैं।
मस्तिष्क में हाइपोथैलेमस और पिट्यूटरी ग्लैंड जैसी संरचनाएँ पूरे प्रजनन हार्मोन तंत्र को नियंत्रित करती हैं। यही तंत्र अंडाशय और वृषण को संकेत भेजता है, और एस्ट्रोजन (प्रमुख स्त्री लैंगिक हार्मोन), प्रोजेस्टेरोन (गर्भधारण और मासिक चक्र से जुड़ा प्रमुख हार्मोन) व टेस्टोस्टेरोन (प्रमुख पुरुष लैंगिक हार्मोन) जैसे हार्मोन यौन कार्य और इच्छा को प्रभावित करते हैं।
पुरुषों में टेस्टोस्टेरॉन और कामेच्छा
पुरुषों में टेस्टोस्टेरॉन का कामेच्छा से संबंध सबसे स्पष्ट हार्मोनल संबंधों में से एक है। टेस्टोस्टेरॉन कम होने वाले पुरुषों में यौन इच्छा कम होना एक मान्य लक्षण है।
विज्ञान संस्था Endocrine Society के अनुसार जनन ग्रंथियों की कार्यक्षमता में कमी, यानी कम टेस्टोस्टेरॉन, की पहचान सिर्फ रक्त में कम लेवल देखकर नहीं की जाती; साथ में कम कामेच्छा जैसे लक्षण भी होने चाहिए और कारण की उचित जाँच आवश्यक है। यही कारण है कि किसी पुरुष की इच्छा कुछ दिनों के लिए कम हो जाए तो केवल इस आधार पर "टेस्टोस्टेरॉन कम है" मान लेना सही नहीं है।
टेस्टोस्टेरॉन और कामेच्छा का संबंध भी ऐसा नहीं है कि उसे "जितना अधिक टेस्टोस्टेरॉन, उतनी अधिक इच्छा" मां लिया जाए। अगर किसी स्वस्थ व्यक्ति का टेस्टोस्टेरॉन पहले से नॉर्मल लिमिट में है तो उसे बाहरी टेस्टोस्टेरॉन देकर कामेच्छा को मनमाने ढंग से बहुत ऊपर ले जाने की अवधारणा वैज्ञानिक रूप से उतनी सरल नहीं है। इसके उलट जिन पुरुषों में वास्तविक एंड्रोजन हार्मोन की कमी है उनमें उचित टेस्टोस्टेरॉन उपचार से यौन रुचि सुधर सकती है। अध्ययनों में यह प्रभाव देखा गया है।
महिलाओं में हार्मोन की जटिलता
महिलाओं में कहानी और अधिक जटिल होती है। एस्ट्रोजन, प्रोजेस्टेरोन और टेस्टोस्टेरॉन तीनों अलग-अलग स्तरों पर भूमिका निभा सकते हैं, लेकिन इच्छा केवल इनकी मात्रा से तय नहीं होती। मासिक धर्म चक्र, गर्भावस्था, प्रसव के बाद का समय, स्तनपान, रजोनिवृत्ति-पूर्व संक्रमण काल और रजोनिवृत्ति में हार्मोन बदलते हैं और इनके साथ यौन रुचि तथा यौन सहजता भी बदल सकते हैं।
रजोनिवृत्ति (menopause) के आसपास एस्ट्रोजन (estrogen) कम होने से योनि के ऊतकों (tissue) में पतलापन, सूखापन और सूजन हो सकती है। इससे संभोग में दर्द हो तो स्वाभाविक रूप से इच्छा कम हो सकती है। यानी यहाँ कामेच्छा सिर्फ मस्तिष्क का प्रश्न नहीं रहता। यदि सेक्स दर्दनाक हो गया तो शरीर स्वयं उससे बचना शुरू कर सकता है।
मासिक धर्म चक्र के दौरान भी कुछ महिलाओं में इच्छा बदलती हुई महसूस होती है। अंडोत्सर्जन के आसपास कुछ अध्ययनों में यौन रुचि बढ़ने के संकेत मिले हैं, लेकिन यह हर महिला में एक जैसा नहीं होता। किसी में स्पष्ट बदलाव महसूस होता है, किसी में लगभग नहीं। इसलिए यह कहना कि 'चक्र के अमुक दिन हर महिला की इच्छा जरूर बढ़ती है' वैज्ञानिक रूप से बहुत कठोर दावा होगा।
तनाव कामेच्छा को कैसे दबाता है
तनाव कामेच्छा का सबसे शक्तिशाली नॉन हार्मोनल नियंत्रक हो सकता है। यदि व्यक्ति नौकरी, आर्थिक समस्या, संबंध तनाव, परिवार, बीमारी या लगातार चिंता में घिरा है तो मस्तिष्क की प्राथमिकताएँ बदल जाती हैं। शरीर 'आराम, आनंद और निकटता' की अवस्था से 'समस्या से निपटना है' वाली अवस्था में चला जाता है।तनाव, चिंता और अवसाद को कम यौन रुचि के प्रमुख कारणों में रखते हैं।
तनाव में कार्टिसोल (cortisol) और अनुकंपी तंत्रिका तंत्र की गतिविधि बढ़ सकती है। कार्टिसोल स्वयं शरीर का आवश्यक हार्मोन है। समस्या तब होती है जब तनाव बहुत लंबे समय तक बना रहे। लगातार ऊँचा तनाव नींद बिगाड़ सकता है, मनोदशा बदल सकता है, ऊर्जा कम कर सकता है और अप्रत्यक्ष रूप से कामेच्छा को दबा सकता है।
इसे सरल उदाहरण से समझिए। यदि मस्तिष्क दिनभर यह सोच रहा है कि नौकरी बची रहेगी या नहीं, बच्चे की बीमारी कैसे संभालें, कर्ज कैसे चुकाएँ या साथी से लगातार झगड़ा हो रहा है, तो शाम को केवल टेस्टोस्टेरॉन या एस्ट्रोजन सामान्य होने से कामेच्छा अपने आप नहीं लौट आती। कामेच्छा सुरक्षित, आरामदायक और मानसिक रूप से उपलब्ध अवस्था पसंद करती है।
संबंधों की गुणवत्ता का असर
साथी के प्रति आकर्षण बना हुआ हो, लेकिन गुस्सा, अविश्वास, अपमान, संवादहीनता या भावनात्मक दूरी हो तो इच्छा कम हो सकती है। उलटे अच्छे संबंध, भावनात्मक निकटता और सुरक्षित अनुभव कामेच्छा को बढ़ा सकते हैं। Mayo Clinic कम कामेच्छा में रिश्तों की समस्याओं को महत्वपूर्ण कारण मानता है और यह भी बताता है कि कम इच्छा से संबंध तनाव बढ़ सकता है, जो फिर इच्छा और कम कर सकता है। यानी एक दुष्चक्र बन सकता है।
नींद और कामेच्छा का संबंध
नींद और यौन रुचि का संबंध गहरा है, लेकिन केवल 'आठ घंटे सोएँ और कामेच्छा बढ़ जाएगी' जैसा सीधा सूत्र नहीं है। नींद शरीर के हार्मोन, ऊर्जा, मूड और तनाव नियंत्रण से जुड़ी है। लगातार कम नींद से थकान बढ़ती है, चिड़चिड़ापन और तनाव बढ़ता है और अंतरंगता के लिए मानसिक व शारीरिक ऊर्जा कम हो सकती है। ब्रिटेन की स्वास्थ्य सेवा (NHS) कम कामेच्छा के कारणों में थकान को स्पष्ट रूप से शामिल करती है।
पुरुषों में टेस्टोस्टेरॉन का दैनिक लय नींद से जुड़ा होता है, इसलिए लंबे समय की नींद की कमी कामेच्छा को अप्रत्यक्ष और कभी-कभी हार्मोनल रास्ते से भी प्रभावित कर सकती है। लेकिन किसी एक खराब रात के बाद यौन रुचि कम हो जाए तो इसका अर्थ हार्मोन संबंधी बदलाव नहीं है। शरीर अक्सर अगले दिन केवल थका हुआ होता है।
महिलाओं में भी नींद की खराब गुणवत्ता कामेच्छा को प्रभावित कर सकती है, विशेष रूप से रजोनिवृत्ति के आसपास जहाँ अचानक तेज गर्मी महसूस होना, रात में जागना और मनोदशा का बार-बार बदलना एक साथ हो सकते हैं।
नींद का एक व्यवहारिक पक्ष भी है। दो लोग रात 12 बजे तक काम, फोन, बच्चों और घर के काम में व्यस्त रहें और बिस्तर तक पहुँचते-पहुँचते पूरी तरह थक चुके हों, तो वहाँ हार्मोन की समस्या न होते हुए भी कामेच्छा कम दिखाई दे सकती है। इसलिए कई बार यौन इच्छा की समस्या वास्तव में समय और ऊर्जा की समस्या होती है।
अवसाद, चिंता और दवाओं का असर
अवसाद (depression) में आनंद महसूस करने की क्षमता कम हो सकती है। इसे anhedonia कहा जाता है। यदि व्यक्ति भोजन, संगीत, मित्रता और दूसरे आनंददायक अनुभवों में भी रुचि खो रहा है तो यौन रुचि भी कम हो सकती है। चिंता में शरीर लगातार सतर्क अवस्था में रह सकता है और यौन उत्तेजना कठिन हो सकती है।
यहाँ एक जटिलता और आती है। कुछ अवसादरोधी (anti depressent) दवाएँ स्वयं यौन इच्छा कम कर सकती हैं। विशेष रूप से कुछ सेरोटोनिन (sroton in) बढ़ाने वाली दवाएँ यौन रुचि, orgasm या उत्तेजना को प्रभावित कर सकती हैं। रक्तचाप (blood pressure) की कुछ दवाएँ और अन्य औषधियाँ भी sexual function पर असर डाल सकती हैं। कम कामेच्छा के संभावित कारणों में अवसादरोधी दवाएँ और कुछ ब्लड प्रेशर की दवाओं का उल्लेख किया जाता है। इसका अर्थ यह नहीं कि ऐसी दवा स्वयं बंद कर देनी चाहिए। यदि समस्या महत्वपूर्ण हो तो डॉक्टर दवा, मात्रा या विकल्प की समीक्षा कर सकता है।
शराब का दोहरा असर
शराब का प्रभाव भी दोहरा है। थोड़ी मात्रा में व्यक्ति की झिझक कम महसूस हो सकती है और इसलिए इच्छा अधिक लग सकती है, लेकिन ज्यादा शराब तंत्रिका तंत्र और यौन क्रिया क्षमता दोनों को दबा सकती है। लंबे समय तक अत्यधिक सेवन पुरुषों में स्तंभन संबंधी समस्या और हार्मोन संबंधी बदलाव से जुड़ सकता है। इसलिए शराब को कामेच्छा बढ़ाने की रणनीति समझना गलत होगा।
इच्छा बनाम उत्तेजना: फर्क समझना जरूरी
यौन इच्छा और sexual arousal भी एक ही चीज नहीं हैं। कामेच्छा यानी मन में यौन रुचि या इच्छा; उत्तेजना यानी शरीर का यौन प्रतिक्रिया में आना। किसी पुरुष की इच्छा हो सकती है लेकिन स्तंभन में दिक्कत हो सकती है। किसी महिला की इच्छा हो सकती है लेकिन योनि में सूखेपन के कारण शरीर की प्रतिक्रिया असुविधाजनक हो सकती है। उलटे कभी शरीर शारीरिक उत्तेजना दिखा सकता है लेकिन व्यक्ति मानसिक रूप से सेक्स नहीं चाहता। इन दोनों को मिलाने से बहुत गलत निष्कर्ष निकलते हैं।
इसी तरह स्तंभन कम होना अपने-आप टेस्टोस्टेरॉन की कमी का प्रमाण नहीं है। स्तंभन संबंधी विकार में रक्तवाहिकाएँ, मधुमेह, रक्तचाप, धूम्रपान, दवाएँ, चिंता और कई दूसरे कारण शामिल हो सकते हैं। NHS भी स्तंभन संबंधी समस्या के कारणों में तनाव, थकान, मधुमेह, हृदय और रक्तवाहिकाओं से संबंधित समस्याएँ, अवसाद और हार्मोनल समस्याएँ, सभी को गिनता है।
उम्र का असर: सच और भ्रम
उम्र का असर वास्तविक है लेकिन इसे भी गलत ढंग से समझा जाता है। पुरुषों में उम्र के साथ टेस्टोस्टेरॉन धीरे-धीरे घट सकता है और यौन रुचि में कुछ कमी आ सकती है, लेकिन यह महिलाओं में रजोनिवृत्ति जैसा अचानक और स्पष्ट हार्मोनल बदलाव नहीं है। Mayo Clinic के अनुसार बहुत से पुरुष 60 और 70 के दशक तक भी यौन रुचि बनाए रखते हैं, और इच्छा में कमी की मात्रा व्यक्ति-व्यक्ति में काफी अलग होती है।
महिलाओं में रजोनिवृत्ति अधिक स्पष्ट हार्मोनल बदलाव है, लेकिन वहाँ भी कामेच्छा का परिणाम एक जैसा नहीं। किसी की इच्छा कम होती है, किसी की लगभग समान रहती है, और कुछ महिलाओं में गर्भधारण की चिंता समाप्त होने, बच्चों के बड़े हो जाने या संबंध बेहतर होने के कारण इच्छा बढ़ भी सकती है। इसलिए 'उम्र = इच्छा समाप्त' यह धारणा गलत है।
शारीरिक स्वास्थ्य और प्रसव के बाद का असर
मधुमेह, थायरॉयड संबंधी विसंगति, मोटापा, असाध्य दर्द, हृदय रोग, तंत्रिका तंत्र संबंधी रोग और कई दूसरी स्थितियाँ ऊर्जा, हार्मोन, रक्त प्रवाह या मानसिक स्वास्थ्य के माध्यम से यौन रुचि को प्रभावित कर सकती हैं। कम कामेच्छा कभी-कभी शरीर की दूसरी समस्या का संकेत हो सकती है, खासकर जब यह अचानक और स्पष्ट रूप से बदली हो।
प्रसव के बाद कामेच्छा का कम होना भी सामान्य हो सकता है। हार्मोन बदलते हैं, स्तनपान के दौरान यौन जरूरत कम हो सकती है, नींद टूटती है, शरीर प्रसव से उबर रहा होता है और बच्चे की देखभाल का तनाव बहुत बढ़ जाता है। NHS गर्भावस्था और बच्चा होने के बाद बदलते हार्मोन स्तर, तनाव और थकान को कामेच्छा में कमी के सामान्य कारणों में रखता है। इस स्थिति को केवल "साथी में रुचि खत्म हो गई" समझना अक्सर गलत होता है।
शरीर की धारणा और आत्मविश्वास
अपने शरीर के प्रति धारणा और आत्मविश्वास भी कामेच्छा को बदल सकते हैं। यदि व्यक्ति अपने शरीर को लेकर लगातार असहज है, वजन, उम्र, बीमारी या किसी ऑपरेशन के बाद स्वयं को आकर्षक नहीं मानता, तो मानसिक इच्छा दब सकती है। Mayo Clinic कम आत्मसम्मान और अपने शरीर के प्रति नकारात्मक धारणा को मनोवैज्ञानिक कारणों में शामिल करता है।
इसका उलटा भी संभव है। व्यायाम, बेहतर फिटनेस, अच्छा मूड और शरीर के प्रति आत्मविश्वास यौन रुचि को बढ़ा सकते हैं। लेकिन यहाँ भी व्यायाम को टेस्टोस्टेरॉन बढ़ाने वाला कोई सरल नुस्खा नहीं समझना चाहिए। अत्यधिक प्रशिक्षण, बहुत कम कैलोरी और लगातार थकान कुछ लोगों में प्रजनन हार्मोन और कामेच्छा कम कर सकते हैं।
सामान्य libido जैसी कोई एक संख्या नहीं होती
"सामान्य कामेच्छा कितनी होनी चाहिए?" इसका कोई सार्वभौमिक आंकड़ा नहीं है। सप्ताह में कितनी बार इच्छा होनी चाहिए, महीने में कितनी बार सेक्स करना चाहिए।चिकित्सा विज्ञान ऐसी कोई सामान्य संख्या तय नहीं करता। किसी व्यक्ति के लिए सप्ताह में कई बार इच्छा सामान्य हो सकती है और दूसरे के लिए महीने में कुछ बार। जब तक व्यक्ति स्वयं संतुष्ट है और कोई कष्ट नहीं है, केवल दूसरे लोगों से तुलना करके बीमारी तय नहीं की जा सकती।
इसीलिए 'मेरे साथी की इच्छा मुझसे ज्यादा है' अपने-आप यह साबित नहीं करता कि किसी एक को हार्मोन संबंधी समस्या है। साथियों की यौन इच्छा की आवृत्ति में अंतर होना काफी सामान्य है। समस्या तब बनती है जब इस अंतर पर संवाद न हो या दबाव, अपराधबोध और अस्वीकार की भावना पैदा होने लगे।
कभी इच्छा स्वतः पैदा होती है। व्यक्ति अचानक यौन रुचि महसूस करता है। लेकिन बहुत से लोगों में, विशेषकर लंबे संबंधों में, इच्छा परिस्थिति या अंतरंगता के प्रत्युत्तर में भी उत्पन्न हो सकती है। पहले निकटता, स्पर्श, बातचीत या आराम आता है और उसके बाद इच्छा जागती है। इसलिए यह मानना कि 'यदि पहले से इच्छा नहीं हुई तो यौन इच्छा खत्म है' भी हमेशा सही नहीं।
कब डॉक्टर से मिलें और जाँच कैसे हो
यदि यौन इच्छा कुछ दिनों या तनाव के दौर में कम हुई और बाद में लौट आई तो यह सामान्य उतार-चढ़ाव हो सकता है। लेकिन यदि कई महीनों तक स्पष्ट कमी बनी रहे, व्यक्ति इससे परेशान हो, साथ में थकान, वजन में बड़ा बदलाव, मासिक धर्म में बदलाव, नपुंसकता, दर्द, योनि का सूखापन, अवसाद या दूसरे लक्षण हों, तो डॉक्टर से बात करना उचित है। NHS भी कामेच्छा में लगातार कमी या चिंता पैदा करने वाली स्थिति में चिकित्सकीय सलाह लेने को कहता है।
जाँच भी सरल एक-कदम प्रक्रिया नहीं है। पुरुषों में टेस्टोस्टेरॉन की जाँच केवल किसी ऑनलाइन कामेच्छा जाँच या एक अनियमित रक्त जाँच से नहीं की जानी चाहिए। Endocrine Society की गाइडलाइन स्पष्ट करती है कि जनन-ग्रंथि की कमी का निदान संगत लक्षण और लगातार कम टेस्टोस्टेरॉन स्तर, दोनों पर आधारित होना चाहिए; असामान्य परिणाम की पुष्टि और कारण की जाँच जरूरी है। महिलाओं में भी "एक हार्मोनल टेस्ट करा लो और कारण मिल जाएगा" अक्सर सही नहीं है।रजोनिवृत्ति, दवाएँ, दर्द, संबंध, अवसाद, थायरॉयड और दूसरी स्थितियों का पूरा संदर्भ देखना पड़ता है। यौन इच्छा वास्तव में जैव-मनो-सामाजिक, यानी जैविक, मानसिक और सामाजिक, तीनों स्तरों का परिणाम है।
कामेच्छा वर्धक पूरकों को लेकर सावधानी
बाजार में मिलने वाले कामेच्छा वर्धक और हर्बल यौन पूरकों को लेकर सावधानी जरूरी है। यदि असली समस्या दीर्घकालिक तनाव, कम नींद, अवसादरोधी दवा का दुष्प्रभाव या दर्दनाक संभोग है, तो कोई सामान्य 'कामेच्छा बढ़ाने वाला' पूरक मूल कारण नहीं सुलझाएगा। पुरुषों में बिना सिद्ध कमी के टेस्टोस्टेरॉन लेना भी उचित नहीं; Endocrine Society उचित नैदानिक जाँच प्रक्रिया के बाद ही बाहर से टेस्टोस्टेरॉन लेने की सिफारिश करती है।
कोई एक सबसे बड़ा कारण नहीं
सबसे सही वैज्ञानिक निष्कर्ष यही है कि यौन इच्छा शरीर के किसी एक 'कामेच्छा हार्मोन' का मीटर नहीं है। यह मस्तिष्क, हार्मोन, शरीर, नींद, संबंध और जीवन-परिस्थितियों का संयुक्त परिणाम है। टेस्टोस्टेरॉन और एस्ट्रोजन जैसे हार्मोन इसे प्रभावित करते हैं, तनाव इसे दबा सकता है, नींद ऊर्जा और हार्मोनल चक्र को प्रभावित करती है लेकिन आकर्षण, भावनात्मक सुरक्षा, दर्द, दवाएँ और मानसिक स्वास्थ्य भी उतने ही महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
इसलिए कामेच्छा का कभी बढ़ना और कभी घटना सामान्य मानव जीवविज्ञान का हिस्सा है। चिंता संख्या की नहीं, बदलाव की होनी चाहिए। क्या आपकी इच्छा आपके अपने सामान्य स्तर से अचानक बहुत बदल गई है, क्या यह लंबे समय से है, और क्या इससे आपको परेशानी हो रही है? यदि नहीं, तो उतार-चढ़ाव अक्सर सामान्य है। यदि हाँ, तो 'हार्मोन कम हैं' मानकर स्वयं उपचार करने के बजाय कारण की व्यवस्थित जाँच अधिक समझदारी है।


