भेड़ की ऊन से निकले केराटिन से जुड़ेगी हड्डी! लेकिन ये होगा कैसे? क्या बताती है नई रिसर्च?

Sheep Wool Keratin Research: भेड़ की ऊन से निकले केराटिन से वैज्ञानिकों ने खास झिल्ली तैयार की, जिसने मानव कोशिकाओं और चूहों में हड्डी के पुनर्निर्माण की उम्मीद जगाई। जानिए कैसे काम करता है यह जैविक स्कैफोल्ड और 2026 की रिसर्च में क्या सामने आया।

Yogesh Mishra
Published on: 18 Aug 2026 6:24 PM IST
Sheep Wool Keratin Bone Regeneration
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Sheep Wool Keratin Bone Regeneration 

Sheep Wool Keratin Research: भेड़ की ऊन से हड्डी बनाने की बात पहली नजर में किसी विज्ञान कथा जैसी लग सकती है। लेकिन इसके पीछे वास्तविक वैज्ञानिक शोध है। वैज्ञानिकों ने भेड़ की ऊन से केराटिन नाम का प्रोटीन निकाला फिर उससे एक खास आर्गेनिक झिल्ली बनाई और प्रयोगशाला के साथ-साथ चूहों में भी इसे हड्डी के बड़े नुकसान की भरपाई के लिए आजमाया। नतीजे उत्साह बढ़ाने वाले रहे हैं, लेकिन अभी इसे इंसानों की टूटी हड्डी जोड़ने का इलाज कहना जल्दबाजी होगी। 2026 के इस शोध में केराटिन झिल्ली ने हड्डी बनाने वाले सेल्स के लिए अनुकूल माहौल बनाया और क्षतिग्रस्त जगह पर नई हड्डी बनने में मदद की। खास बात यह रही कि केराटिन से बनी नई हड्डी की बनावट ज्यादा व्यवस्थित दिखाई दी। लेकिन कुल मात्रा में कोलेजन से बनी हड्डी अधिक थी।

सवाल यह है कि ऊन का यह प्रोटीन हड्डी बनाने में आखिर मदद कैसे करता है और क्या भविष्य में इससे इंसानों के लिए नई चिकित्सा सामग्री तैयार हो सकती है?

सबसे पहले समझिए- केराटिन क्या है?

केराटिन कोई कृत्रिम रसायन नहीं है। यह एक मजबूत रेशेदार प्रोटीन है, जो हमारे बाल और नाखूनों के साथ-साथ कई जानवरों के बाल, ऊन, सींग, खुर और कुछ अन्य कठोर संरचनाओं का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। भेड़ की ऊन में केराटिन काफी मात्रा में पाया जाता है। केराटिन की मजबूती का एक कारण इसमें मौजूद सल्फर वाले अमीनो अम्ल, खासकर सिस्टीन, और उनके बीच बनने वाले मजबूत रासायनिक बंध हैं। इसी वजह से बाल और ऊन आसानी से टूटते या पानी में घुलकर खत्म नहीं होते। लेकिन चिकित्सा में कच्ची ऊन सीधे शरीर में नहीं लगाई जाती। वैज्ञानिक पहले ऊन से केराटिन निकालते हैं, उसे साफ और शुद्ध करते हैं और फिर उससे ऐसा पदार्थ बनाते हैं जिसे शरीर के ऊतक (tissue) स्वीकार कर सकें। केराटिन से झिल्ली, जेल, स्पंज या रेशेदार ढाँचे जैसी कई तरह की जैविक सामग्री बनाई जा सकती है। इस नए शोध में खास तौर पर केराटिन की झिल्ली पर ध्यान दिया गया।

हड्डी को दोबारा बनाने के लिए ढाँचे की जरूरत क्यों पड़ती है?

हमारा शरीर छोटी-मोटी हड्डी की चोटों की मरम्मत खुद कर सकता है। हड्डी टूटने के बाद सबसे पहले वहां खून जमा होता है। फिर शरीर की मरम्मत प्रक्रिया शुरू होती है। नई कोशिकाएं आती हैं, अस्थायी ऊतक बनता है और धीरे-धीरे वह मजबूत नई हड्डी में बदलने लगता है। सामान्य फ्रैक्चर में प्लास्टर, प्लेट, स्क्रू या रॉड का काम मुख्य रूप से हड्डी के टूटे हिस्सों को सही जगह पर स्थिर रखना होता है, ताकि शरीर खुद उसकी मरम्मत कर सके। मुश्किल तब होती है जब हड्डी का कोई बड़ा हिस्सा ही गायब हो जाए। दुर्घटना में हड्डी का टुकड़ा नष्ट हो सकता है, कैंसर की सर्जरी के बाद बड़ा खाली स्थान बन सकता है या जबड़े में दांत लगाने के लिए पर्याप्त हड्डी नहीं बची हो। ऐसी स्थिति में सिर्फ हड्डी के दोनों सिरों को जोड़ना काफी नहीं होता। नई हड्डी बनाने वाली कोशिकाओं को बढ़ने के लिए जगह और सहारा भी चाहिए।

यहीं जैविक ढाँचा, यानी जैविक स्कैफोल्ड, काम आता है। इसे मकान बनाने के दौरान लगाई जाने वाली मचान की तरह समझिए। मचान खुद मकान नहीं होती, लेकिन दीवारें बनने तक कामगारों को सहारा और काम करने की जगह देती है। उसी तरह केराटिन की झिल्ली खुद हड्डी नहीं बन जाती। वह ऐसा माहौल तैयार करती है जिसमें शरीर की अपनी कोशिकाएं नई हड्डी बनाने का काम बेहतर तरीके से कर सकें।

अभी हड्डी को दोबारा बनाने में क्या इस्तेमाल होता है?

हड्डी को दोबारा बनाने के लिए डॉक्टर कई तरह की सामग्री इस्तेमाल करते हैं। मरीज के अपने शरीर से ली गई हड्डी कई मामलों में बहुत प्रभावी होती है, लेकिन इसके लिए शरीर के किसी दूसरे हिस्से में भी सर्जरी करनी पड़ती है। डोनर या पशु स्रोत से मिलने वाली सामग्री का भी इस्तेमाल किया जाता है। हड्डी को दोबारा बनाने में कोलेजन से बनी झिल्लियां भी लंबे समय से इस्तेमाल हो रही हैं। इनका एक महत्वपूर्ण काम यह है कि हड्डी बनने वाली जगह में आसपास के मुलायम ऊतक बहुत तेजी से न भर जाएं। इससे हड्डी बनाने वाली कोशिकाओं को काम करने के लिए जरूरी जगह और समय मिलता है। लेकिन कोलेजन की भी कुछ सीमाएं हैं। यह अपेक्षाकृत नरम हो सकता है और कुछ परिस्थितियों में जल्दी टूट सकता है। बड़े या मुश्किल अस्थि-दोषों में ऐसी सामग्री की जरूरत होती है जो पर्याप्त समय तक अपनी संरचना बनाए रखे और फिर धीरे-धीरे शरीर में सुरक्षित तरीके से टूट जाए। यहीं केराटिन वैज्ञानिकों के लिए दिलचस्प हो जाता है।

वैज्ञानिकों ने भेड़ की ऊन से क्या बनाया?

शोधकर्ताओं ने भेड़ की ऊन से केराटिन निकाला और उसे केवल सूखे प्रोटीन के रूप में इस्तेमाल नहीं किया। उन्होंने उससे ऐसी झिल्ली बनाई जो शरीर के अंदर कुछ समय तक अपना आकार और मजबूती बनाए रख सके। इस झिल्ली का उद्देश्य दोहरा था। एक तरफ वह ऐसी बाधा का काम करे जिससे आसपास का मुलायम ऊतक हड्डी बनने वाली जगह में बहुत तेजी से न घुस पाए। दूसरी तरफ वह हड्डी बनाने वाली कोशिकाओं के लिए ऐसा जैविक वातावरण दे, जिसमें वे टिक सकें, बढ़ सकें और नई हड्डी बनाने की दिशा में आगे बढ़ सकें। यही इस शोध की सबसे दिलचस्प बात है। केराटिन सिर्फ एक निष्क्रिय दीवार की तरह काम करता नहीं दिखा। उसने कोशिकाओं के लिए ऐसा वातावरण भी बनाया जो हड्डी बनने की प्रक्रिया के अनुकूल था।

प्रयोगशाला में मानव कोशिकाओं पर क्या हुआ?

इसके बाद शोधकर्ताओं ने मानव अस्थि-मज्जा (bone marrow) से प्राप्त कोशिकाओं को केराटिन की झिल्ली पर विकसित किया। इन कोशिकाओं में उचित परिस्थितियों में हड्डी बनाने वाली कोशिकाओं में बदलने की क्षमता होती है। शोध में कोशिकाएं केराटिन की झिल्ली पर जीवित रहीं और उनमें हड्डी बनाने से जुड़े कई जैविक संकेत बढ़े। इसका मतलब यह था कि केराटिन केवल ऐसा पदार्थ नहीं था जिस पर कोशिकाएं किसी तरह टिक गईं। वह उन्हें हड्डी बनाने की दिशा में आगे बढ़ने के लिए अनुकूल माहौल भी दे रहा था। लेकिन प्रयोगशाला में कोशिकाओं का अच्छा व्यवहार करना एक बात है। जीवित शरीर में वही सामग्री कैसे काम करती है, यह जानना दूसरी और ज्यादा महत्वपूर्ण बात है।

चूहों की खोपड़ी में क्या किया गया?

इसके लिए वैज्ञानिकों ने चूहों की खोपड़ी में एक निश्चित आकार का बड़ा हड्डी दोष बनाया। इसे ‘क्रिटिकल-साइज डिफेक्ट’ कहा जाता है। इसका मतलब है कि यह इतना बड़ा नुकसान होता है जिसे शरीर सामान्य परिस्थितियों में आसानी से पूरी तरह नहीं भर पाता। इसके बाद इस जगह पर अलग-अलग प्रकार की केराटिन झिल्लियां लगाई गईं। उनकी तुलना कोलेजन की झिल्ली से भी की गई। कुछ समय बाद वैज्ञानिकों ने सूक्ष्म सीटी स्कैन और ऊतक की जांच के जरिए देखा कि कितनी नई हड्डी बनी और उसकी संरचना कैसी थी। नतीजे दिलचस्प थे क्योंकि केराटिन झिल्ली वाले क्षेत्रों में भी नई हड्डी बनी। नई हड्डी क्षतिग्रस्त जगह के आसपास के ऊतक से जुड़ती दिखाई दी। सबसे दिलचस्प बात यह थी कि केराटिन से बनी नई हड्डी की संरचना ज्यादा व्यवस्थित दिखाई दी।

क्या केराटिन ने कोलेजन से ज्यादा हड्डी बनाई?

कुल नई हड्डी की मात्रा के मामले में कोलेजन झिल्ली वाले समूह में ज्यादा हड्डी बनी थी। केराटिन का फायदा किसी और जगह दिखाई दिया, उससे बनी हड्डी की बनावट ज्यादा व्यवस्थित थी और उसकी संरचना प्राकृतिक हड्डी के ज्यादा करीब दिखाई दी। यह अंतर बहुत महत्वपूर्ण है। हड्डी के पुनर्निर्माण में सिर्फ यह देखना पर्याप्त नहीं होता कि कितनी हड्डी बनी। यह भी मायने रखता है कि वह किस तरह की बनी, उसकी संरचना कैसी है और आसपास के ऊतक के साथ उसका मेल कितना अच्छा है। सही बात यह है कि कोलेजन ने कुल मात्रा में ज्यादा नई हड्डी बनाई, जबकि केराटिन से बनी नई हड्डी की संरचना ज्यादा व्यवस्थित दिखाई दी।

इसे ‘हड्डी जल्दी जोड़ने वाला’ क्यों कहा जा रहा है?

यहीं वैज्ञानिक शोध और खबर की भाषा के बीच फर्क समझना जरूरी है। अध्ययन ने यह साबित नहीं किया कि किसी इंसान की टूटी हुई हाथ या पैर की हड्डी में केराटिन लगाने से वह छह सप्ताह के बजाय तीन सप्ताह में जुड़ जाएगी। ऐसा कोई बड़ा मानव परीक्षण अभी नहीं हुआ है। शोध ने यह दिखाया है कि केराटिन की झिल्ली हड्डी के पुनर्जनन में मदद कर सकती है और नई हड्डी बनने के लिए अनुकूल वातावरण तैयार कर सकती है। इसलिए ज्यादा सटीक बात होगी कि भेड़ की ऊन से निकला केराटिन भविष्य में हड्डी के पुनर्निर्माण के लिए एक नई जैविक सामग्री बन सकता है।

केराटिन हड्डी बनाने वाली कोशिकाओं की मदद कैसे कर सकता है?

पहली बात, केराटिन की सतह पर कोशिकाएं चिपक सकती हैं। जब कोशिकाएं किसी सतह पर अच्छी तरह टिक जाती हैं, तो उनके फैलने, बढ़ने और ऊतक बनाने की प्रक्रिया आसान हो सकती है। दूसरी बात, केराटिन खुद एक प्रोटीन है। हमारे शरीर के ऊतकों के आसपास भी प्रोटीन से बना एक जटिल ढाँचा मौजूद होता है। इसलिए सही तरीके से तैयार किया गया केराटिन शरीर की कोशिकाओं को एक ऐसा वातावरण दे सकता है जो पूरी तरह कृत्रिम पदार्थ की तुलना में ज्यादा जैविक लगे। तीसरी बात, झिल्ली हड्डी बनने वाली जगह को सुरक्षित रखती है। अगर वहां मुलायम ऊतक बहुत तेजी से भर जाए, तो हड्डी बनाने वाली कोशिकाओं के लिए जगह कम पड़ सकती है। झिल्ली इस समस्या को कम करने में मदद कर सकती है।

भेड़ की ऊन ही क्यों?

केराटिन सिर्फ भेड़ की ऊन में नहीं मिलता। यह हमारे बालों और कई दूसरे जानवरों के बालों में भी पाया जाता है। लेकिन भेड़ की ऊन का एक बड़ा फायदा है, यह बड़ी मात्रा में उपलब्ध होती है।

ऊन का इस्तेमाल कपड़े बनाने में होता है, लेकिन हर तरह की ऊन की बाजार में समान कीमत नहीं होती। कुछ ऊन कम गुणवत्ता वाली होती है और उसका आर्थिक उपयोग सीमित हो सकता है। अगर ऐसी ऊन से उच्च मूल्य वाली चिकित्सा सामग्री बनाई जा सके, तो एक साथ दो फायदे हो सकते हैं—एक नई चिकित्सा सामग्री मिल सकती है और कम मूल्य वाली ऊन का बेहतर इस्तेमाल हो सकता है। यानी भविष्य में यह सिर्फ चिकित्सा की कहानी नहीं, बल्कि संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल की कहानी भी बन सकती है।

क्या शरीर इसे आसानी से स्वीकार कर लेगा?

कच्ची ऊन को सीधे शरीर में लगाने की बात नहीं हो रही। उसमें वसा, सूक्ष्मजीव, दूसरे प्रोटीन और कई तरह की अशुद्धियां हो सकती हैं। इसलिए केराटिन को निकालने, साफ करने, शुद्ध करने और उससे चिकित्सा सामग्री बनाने की पूरी प्रक्रिया बेहद महत्वपूर्ण है। 2026 के अध्ययन में तैयार केराटिन झिल्ली ने प्रयोगों में अच्छी जैव-संगतता दिखाई और पशु मॉडल में आसपास के ऊतक के साथ जुड़ती दिखाई दी। लेकिन चूहों में इसका अच्छी तरह काम करना यह साबित नहीं करता कि यह हजारों इंसानों में भी बिना किसी समस्या के काम करेगा। इंसानों में एलर्जी, सूजन, प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया, संक्रमण और दूसरे संभावित जोखिमों की जांच जरूरी होगी।

क्या यह शरीर के अंदर हमेशा रहेगा?

नहीं। आदर्श अस्थि-पुनर्जनन सामग्री का लक्ष्य यह होता है कि वह शुरुआत में पर्याप्त मजबूत रहे, जब शरीर नई हड्डी बना रहा हो, और बाद में धीरे-धीरे टूटकर शरीर से सुरक्षित तरीके से हट जाए। अगर सामग्री बहुत जल्दी टूट जाए तो नई हड्डी बनने से पहले उसका सहारा खत्म हो सकता है। अगर वह बहुत लंबे समय तक बनी रहे तो शरीर में अनावश्यक विदेशी पदार्थ की तरह मौजूद रह सकती है। इसलिए वैज्ञानिकों के लिए यह तय करना बहुत महत्वपूर्ण है कि केराटिन की झिल्ली कितनी मजबूत हो और कितनी तेजी से टूटे। 2026 के शोध में झिल्ली को पर्याप्त स्थिर बनाने की प्रक्रिया भी अध्ययन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा थी।

इसका सबसे पहले इस्तेमाल कहां हो सकता है?

अगर आगे के मानव परीक्षण सफल रहे, तो इसका इस्तेमाल सामान्य फ्रैक्चर से पहले दंत चिकित्सा और जबड़े की सर्जरी जैसे क्षेत्रों में होने की संभावना हो सकती है। मिसाल के तौर पर किसी व्यक्ति के जबड़े में दांत लगाने के लिए पर्याप्त हड्डी न हो तो नई हड्डी बनाने की जरूरत पड़ सकती है। ऐसी स्थिति में अभी भी निर्देशित अस्थि पुनर्जनन के लिए झिल्लियों का इस्तेमाल किया जाता है। क्योंकि मौजूदा शोध भी इसी तरह की झिल्ली पर केंद्रित है और शोध टीम का काम दंत तथा कपाल-मुख विज्ञान (Craniofacial Science) से जुड़ा है, इसलिए दंत प्रत्यारोपण, जबड़े की हड्डी और चेहरे की हड्डी के पुनर्निर्माण जैसे क्षेत्र इसके संभावित शुरुआती इस्तेमाल हो सकते हैं। बड़े अस्थि-दोष, दुर्घटना के बाद हड्डी का पुनर्निर्माण या कैंसर की सर्जरी के बाद हड्डी की मरम्मत जैसे क्षेत्र भी भविष्य में संभावित हो सकते हैं। लेकिन अभी इन्हें संभावना के तौर पर ही देखना चाहिए।

क्या सामान्य टूटी हड्डी में इसका इंजेक्शन लगाया जाएगा?

इस शोध में इस्तेमाल सामग्री कोई गोली, इंजेक्शन या मरहम नहीं है। यह एक झिल्ली है, जिसे भविष्य में सर्जरी के दौरान क्षतिग्रस्त हड्डी के आसपास या ऊपर लगाया जा सकता है, ताकि नई हड्डी बनने के लिए सही जगह और वातावरण मिल सके। केराटिन से जेल और दूसरे तरह के त्रि-आयामी ढाँचे बनाने पर भी शोध हो रहा है। इसलिए भविष्य में इसके दूसरे रूपों में इस्तेमाल की संभावना हो सकती है। लेकिन 2026 के जिस शोध की चर्चा हो रही है, उसका केंद्र केराटिन की जैविक झिल्ली है।

ऊन से निकले केराटिन पर वैज्ञानिक कई वर्षों से काम कर रहे हैं। इसे घाव भरने, तंत्रिका पुनर्जनन, कोशिकाओं के विकास और दंत प्रत्यारोपण के आसपास हड्डी बनने जैसे क्षेत्रों में पहले भी परखा जा चुका है। कुछ पुराने अध्ययनों में ऊन से निकले केराटिन से बने जेल और दूसरे पदार्थों ने हड्डी के निर्माण में संभावनाएं दिखाई थीं। इस शोध की खासियत यह है कि वैज्ञानिकों ने ऊन से तैयार केराटिन की झिल्ली को बड़े अस्थि-दोष वाले जीवित पशु मॉडल में व्यवस्थित तरीके से परखा और उसकी तुलना कोलेजन की झिल्ली से की।

इसका दांतों से भी संबंध है

केराटिन को सिर्फ हड्डी के लिए ही नहीं देखा जा रहा। वैज्ञानिक दांतों की सतह और इनेमल जैसी संरचनाओं में भी इसकी संभावनाएं तलाश रहे हैं।इसका कारण सिर्फ यह नहीं है कि केराटिन मजबूत होता है। इसकी प्रोटीन संरचना कोशिकाओं के साथ बातचीत और खनिज जमने की प्रक्रिया के लिए भी उपयोगी हो सकती है।यानी भविष्य में केराटिन दंत चिकित्सा और हड्डी के पुनर्निर्माण—दोनों क्षेत्रों में काम आने वाली जैविक सामग्री बन सकता है।

क्या केराटिन खुद हड्डी बना देता है?

केराटिन खुद कैल्शियम लेकर खाली जगह को हड्डी में नहीं बदल देता। वह मुख्य रूप से शरीर की अपनी हड्डी बनाने वाली कोशिकाओं को सही जगह पर टिकने और काम करने के लिए अनुकूल वातावरण देता है।वास्तविक हड्डी एक जीवित ऊतक है। उसमें प्रोटीन, खनिज, रक्त वाहिकाएं और कई तरह की कोशिकाएं होती हैं। इसलिए किसी खाली जगह को सिर्फ कोई कठोर पदार्थ भरकर छोड़ देना स्वस्थ हड्डी बनाने के बराबर नहीं है। नई अस्थि चिकित्सा का लक्ष्य अब सिर्फ खाली जगह भरना नहीं, बल्कि शरीर को अपनी जीवित हड्डी बनाने में मदद करना है। केराटिन इसी सोच का हिस्सा है।

क्या इससे प्लेट और स्क्रू की जरूरत खत्म हो जाएगी?

अगर जांघ की हड्डी टूट गई है, तो उसे सही जगह पर स्थिर रखना जरूरी है। प्लेट, स्क्रू और रॉड का काम यही है। केराटिन जैसी जैविक सामग्री का काम अलग है। वह नई हड्डी बनने में मदद कर सकती है, लेकिन टूटे हुए भार उठाने वाले हिस्सों को खुद स्थिर रखने के लिए पर्याप्त यांत्रिक ताकत नहीं देती।भविष्य में संभव है कि किसी मुश्किल फ्रैक्चर में प्लेट या स्क्रू जैसी यांत्रिक स्थिरता के साथ केराटिन जैसा जैविक ढाँचा भी इस्तेमाल किया जाए। लेकिन यह अभी आगे के शोध का विषय है।

इस खोज का महत्व इतना बड़ा क्यों है?

क्योंकि इसमें कई दिलचस्प बातें एक साथ जुड़ती हैं। पहली, केराटिन शरीर के लिए अनजान रसायन नहीं है। दूसरी, इसे ऐसी झिल्ली में बदला जा सकता है जो हड्डी बनने वाली जगह को सहारा दे। तीसरी, इसका स्रोत भेड़ की ऊन है, जो बड़ी मात्रा में उपलब्ध प्राकृतिक सामग्री है। अगर आगे के परीक्षण सफल होते हैं, तो भविष्य में कम मूल्य वाली ऊन से उच्च मूल्य वाली चिकित्सा सामग्री बनाई जा सकती है। यानी जो सामग्री अभी कपड़ा उद्योग में कम कीमत की हो सकती है, वही शुद्धिकरण और जैव-अभियांत्रिकी के बाद हड्डी के पुनर्निर्माण में काम आने वाली जैविक ‘मचान’ बन सकती है।

शोध में भेड़ की ऊन से निकले केराटिन ने मानव कोशिकाओं और चूहों के अस्थि-दोष वाले मॉडल में उत्साहजनक परिणाम दिए हैं। उसने यह साबित नहीं किया है कि इंसानों की टूटी हड्डी इससे जल्दी जुड़ जाएगी। बल्कि शोध में कोलेजन ने कुल नई हड्डी की मात्रा ज्यादा बनाई, जबकि केराटिन से बनी नई हड्डी की संरचना ज्यादा व्यवस्थित दिखाई दी।

सटीक बात यह है कि भेड़ की ऊन से निकला केराटिन भविष्य में हड्डी के पुनर्निर्माण के लिए एक उपयोगी जैविक पदार्थ बन सकता है और अगर आगे के परीक्षणों में यह उम्मीद सही साबित होती है, तो एक साधारण प्राकृतिक सामग्री चिकित्सा विज्ञान में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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