Toothbrush History in Hindi: टूथब्रश और टूथपेस्ट का इतिहास, किसने किया आविष्कार, जाने इसका महत्व?

Toothbrush History Explained in Hindi: टूथब्रश और टूथपेस्ट का इतिहास हजारों साल पुराना है। जानिए दातून से आधुनिक ब्रश और फ्लोराइड टूथपेस्ट तक का सफर, किसने टूथब्रश बनाया और दांतों के लिए फ्लोराइड क्यों जरूरी है।

Yogesh Mishra
Published on: 15 Aug 2026 7:47 PM IST
Toothbrush History Explained in Hindi
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Toothbrush History Explained in Hindi

Toothbrush History Explained in Hindi: यदि हम आज के टूथब्रश और टूथपेस्ट को देखें तो लगता है कि जैसे यह कोई आधुनिक आविष्कार हो - प्लास्टिक का ब्रश, मुलायम रेशे, रंगीन पेस्ट, फ्लोराइड, स्वाद और चमकदार पैकेजिंग। लेकिन दाँत साफ करने की मानव कोशिश हजारों वर्ष पुरानी है। टूथब्रश और टूथपेस्ट दोनों का कोई एक अकेला आविष्कारक नहीं है। प्राचीन सभ्यताओं ने लकड़ी की टहनियों, चबाने वाली दातून, कपड़े, राख, नमक और विभिन्न घर्षक पदार्थों से दाँत साफ किए। चीन में बालों वाले ब्रश विकसित हुए।

अठारहवीं शताब्दी में इंग्लैंड के William Addis ने टूथब्रश का बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू किया। बीसवीं शताब्दी में नायलॉन ब्रिसल आए। और टूथपेस्ट कई हजार वर्षों के दंतमंजन से विकसित होकर फ्लोराइड वाले आधुनिक चिकित्सकीय पेस्ट तक पहुँचा। आज वैज्ञानिक प्रमाण यह कहते हैं कि दाँतों पर जमा प्लाक को नियमित रूप से हटाना जरूरी है। और दिन में दो बार फ्लोराइड वाले टूथपेस्ट से ब्रश करना दाँतों की सड़न रोकने के सबसे मजबूत घरेलू उपायों में से एक है। विश्व स्वास्थ्य संगठन भी दिन में दो बार 1000–1500 ppm फ्लोराइड वाले टूथपेस्ट से ब्रश करने को प्रोत्साहित करता है।

प्लाक क्या है और दाँत साफ करने की जरूरत क्यों पड़ी

सबसे पहले यह समझना चाहिए कि मनुष्य को दाँत साफ करने की जरूरत आखिर महसूस क्यों हुई होगी। दाँतों पर भोजन के सूक्ष्म अवशेष, लार और बैक्टीरिया मिलकर एक चिपचिपी जैविक परत बनाते हैं, जिसे डेंटल प्लाक कहते हैं। यह केवल अटका हुआ खाना नहीं है। यह जीवाणुओं का संगठित समुदाय है। यदि इसे नियमित रूप से न हटाया जाए तो कुछ बैक्टीरिया भोजन में मौजूद शर्करा का उपयोग करके अम्ल बनाते हैं। यह अम्ल दाँत की बाहरी कठोर परत, यानी इनेमल, से खनिज बाहर निकाल सकता है। बार-बार ऐसा होने पर कैविटी बन सकती है। प्लाक मसूड़ों के किनारे जमा रहे तो सूजन, रक्तस्राव और आगे चलकर मसूड़ों की बीमारी में भी योगदान कर सकता है। टूथब्रश का मूल काम इसी जैविक परत को यांत्रिक रूप से हटाना है। अमेरिकन डेंटल एसोसिएशन (ADA) के वर्तमान दिशा-निर्देश दिन में दो बार दो मिनट तक फ्लोराइड टूथपेस्ट से ब्रश करने की सलाह इसी आधार पर देते हैं।

दातून: दाँत साफ करने का सबसे पुराना तरीका

दाँत साफ करने की शुरुआत आधुनिक ब्रश से नहीं हुई थी। पुरातात्त्विक और ऐतिहासिक प्रमाण बताते हैं कि हजारों वर्ष पहले मनुष्य चबाने वाली लकड़ी या दातून इस्तेमाल करता था। ऐसी टहनी के एक सिरे को चबाकर रेशेदार बनाया जाता और उसी से दाँत रगड़े जाते। अमेरिकी कांग्रेस का पुस्तकालय आधुनिक टूथब्रश के पूर्वजों को लगभग 3000 ईसा पूर्व तक ले जाता है। अन्य ऐतिहासिक अभिलेख दक्षिण मेसोपोटामिया, मिस्र और चीन में भी प्राचीन दातून का उल्लेख करते हैं।

भारत में दातून और मिस्वाक की परंपरा

भारत में दातून की परंपरा अत्यंत पुरानी है। नीम, बबूल और दूसरी वनस्पतियों की टहनियों से दाँत साफ करना केवल ग्रामीण आदत नहीं। बल्कि प्राचीन दंत-स्वच्छता पद्धति का उदाहरण है। इसी व्यापक परंपरा का एक प्रसिद्ध रूप मिस्वाक है। ये मिस्वाक या पीलू के पेड़ जैसी वनस्पतियों की टहनी से बनाया जाता है और पश्चिम एशिया, अफ्रीका तथा दक्षिण एशिया में लंबे समय से इस्तेमाल होता रहा है। आधुनिक समीक्षाओं में भी मिस्वाक से प्लाक हटाने और कुछ मौखिक स्वास्थ्य लाभों के प्रमाण मिले हैं, हालांकि इसका प्रभाव सही तकनीक, उपयोग की आवृत्ति और व्यक्ति की आदत पर निर्भर करता है।

यानी प्लास्टिक का आधुनिक ब्रश मानव शरीर की जैविक आवश्यकता नहीं है। आवश्यकता है दाँतों और मसूड़ों के किनारे से प्लाक नियमित और सुरक्षित ढंग से हटाने की। आधुनिक ब्रश यह काम अधिक सुविधाजनक, मानकीकृत और नियंत्रित तरीके से करता है।

चीन में बालों वाले ब्रश का विकास और यूरोप में प्रसार

जिस चीज को हम आधुनिक 'ब्रिसल टूथब्रश' का पूर्वज मानते हैं, उसका विकास चीन में हुआ। चीनी ब्रशों में बाँस या हड्डी के हैंडल पर सूअर के कठोर बाल लगाए जाते थे। अमेरिकी कांग्रेस के पुस्तकालय आधुनिक टूथब्रश के इतिहास में ऐसे बालों वाले ब्रश को महत्वपूर्ण चरण मानता है। बाद में यह विचार यूरोप पहुँचा, जहाँ घोड़े के बाल और अन्य पदार्थ भी इस्तेमाल किए गए। लेकिन यूरोप में लंबे समय तक बहुत से लोग कपड़े, स्पंज, उँगली या दंत-मंजन से ही दाँत साफ करते रहे।

William Addis और टूथब्रश का व्यावसायिक उत्पादन

इसके बाद कहानी में आते हैं विलियम एडिस (William Addis), जिनका नाम आधुनिक टूथब्रश के इतिहास में सबसे अधिक लिया जाता है। अठारहवीं शताब्दी के इंग्लैंड में Addis को उस व्यक्ति के रूप में माना जाता है, जिसने लगभग 1780 में टूथब्रश का बड़े पैमाने पर व्यावसायिक उत्पादन शुरू किया। लोकप्रिय कथा के अनुसार वे जेल में थे। वहाँ उन्होंने हड्डी में छोटे छेद करके उनमें पशुओं के बाल लगाए। रिहा होने के बाद इसी डिजाइन को व्यवसाय बना दिया। इस कथा के कुछ विवरण बाद की परंपरा से आए हैं, इसलिए हर छोटे प्रसंग को पूर्णतः दस्तावेजित तथ्य नहीं समझना चाहिए, लेकिन स्मिथसोनियन संस्थान और अमेरिकी कांग्रेस का पुस्तकालय दोनों Addis को शुरुआती बड़े पैमाने पर उत्पादित आधुनिक टूथब्रश के इतिहास से जोड़ते हैं।

सही उत्तर होगा कि दाँत साफ करने वाले उपकरण का कोई एक आविष्कारक नहीं था। दातून हजारों वर्ष पुराने हैं। बालों वाला ब्रश चीन में विकसित हुआ। और William Addis को लगभग 1780 के आसपास आधुनिक प्रकार के टूथब्रश के बड़े पैमाने पर निर्माण का श्रेय दिया जाता है। यह विकास-क्रम है, किसी एक दिन हुई खोज नहीं।

नायलॉन ब्रिसल का आगमन

उन्नीसवीं शताब्दी में यूरोप और अमेरिका में ब्रश बनाना धीरे-धीरे औद्योगिक व्यवसाय बन गया। लेकिन तब भी ब्रिसल मुख्यतः पशुओं के बालों से बनते थे। इन प्राकृतिक बालों में कई समस्याएँ थीं। वे पानी सोखते थे, जल्दी खराब हो सकते थे, उनके भीतर सूक्ष्मजीव रह सकते थे और उनकी कठोरता समान नहीं रहती थी। फिर बीसवीं शताब्दी के रसायन उद्योग ने बड़ा परिवर्तन किया।

1938 में नायलॉन ब्रिसल वाले आधुनिक टूथब्रश का दौर शुरू हुआ। अमेरिकी कांग्रेस के पुस्तकालय आधुनिक टूथब्रश को इसी समय के नायलॉन ब्रिसल के साथ आज के परिचित रूप में विकसित हुआ बताता है। सिंथेटिक नायलॉन के फायदे स्पष्ट थे। रेशों की मोटाई नियंत्रित की जा सकती थी, वे पशु बालों की तुलना में अधिक एकरूप थे, बड़े पैमाने पर उत्पादन आसान था और स्वच्छता भी बेहतर नियंत्रित की जा सकती थी।

आधुनिक टूथब्रश में लगातार बदलाव

इसके बाद टूथब्रश में लगातार बदलाव आते गए। छोटे सिर, विभिन्न कोणों पर लगे रेशे, साफ्ट, मीडियम और हार्ड ब्रिसल, जीभ साफ करने वाला हिस्सा, पकड़ बेहतर करने वाले हैंडल, बच्चों के छोटे ब्रश और अंततः इलेक्ट्रिक टूथब्रश। आज ADA सामान्यतः मुलायम रेशों वाला टूथब्रश की सलाह देता है और लगभग हर तीन से चार महीने में, या रेशे पहले फैल जाएँ तो उससे पहले, ब्रश बदलने की बात कहता है। बहुत कठोर ब्रश और बहुत अधिक दबाव मसूड़ों तथा दाँत की सतह को नुकसान पहुँचा सकते हैं।

टूथपेस्ट का प्राचीन इतिहास: दंत-मंजन से शुरुआत

अब टूथपेस्ट की कहानी और भी पुरानी है। आधुनिक ट्यूब वाला पेस्ट भले नया हो। लेकिन दंत-मंजन हजारों वर्षों से मौजूद हैं। प्राचीन मिस्र, यूनान, रोम, चीन और भारत में दाँत साफ करने के लिए विभिन्न चूर्ण और मिश्रण इस्तेमाल किए जाते थे। उपलब्ध ऐतिहासिक समीक्षाएँ बताती हैं कि पुराने दाँत साफ करने वाले पदार्थ / दंत-मंजन सामग्री में राख, नमक, जली सामग्री, पिसी हड्डियाँ, सीप या दूसरे घर्षक पदार्थ इस्तेमाल किए जाते थे। उनका उद्देश्य दाँत की सतह से मैल और दाग रगड़कर हटाना तथा दुर्गंध कम करना था। आधुनिक टूथपेस्ट के इतिहास पर प्रकाशित वैज्ञानिक समीक्षा भी दंत-मंजन / दाँत साफ करने वाला पदार्थ की हजारों वर्ष पुरानी परंपरा को दर्ज करती है।

इन पुराने मिश्रणों में एक बड़ी समस्या थी कि वे कई बार बहुत खुरदरे हो सकते थे। यदि अत्यधिक घर्षक पदार्थ से बार-बार दाँत रगड़े जाएँ तो दाँत की सतह घिस सकती है। आधुनिक टूथपेस्ट इसलिए केवल 'दाँत चमकाने वाला पाउडर' नहीं है। उसमें नियंत्रित घर्षक, नमी बनाए रखने वाले पदार्थ, झाग या फैलाव देने वाले घटक, स्वाद, गाढ़ापन देने वाले पदार्थ और सबसे महत्वपूर्ण, कई पेस्टों में फ्लोराइड जैसे सक्रिय तत्व शामिल होते हैं। ADA की वर्तमान समीक्षा टूथपेस्ट को केवल सफाई सामग्री नहीं। बल्कि कैविटी रोकने और दूसरी दंत समस्याओं के लिए चिकित्सकीय सक्रिय उत्पाद भी मानती है।

पाउडर से पेस्ट और ट्यूब पैकेजिंग तक

उन्नीसवीं शताब्दी में यूरोप और अमेरिका में दंत-मंजन के पाउडर धीरे-धीरे पेस्ट में बदलने लगे। पहले इन्हें डिब्बों या जार में रखा जाता था। फिर ट्यूब पैकेजिंग आई और टूथपेस्ट अधिक स्वच्छ तथा सुविधाजनक हो गया। बीसवीं शताब्दी के आरंभ तक टूथपेस्ट सामान्य उपभोक्ता वस्तु बन चुका था। लेकिन उसका सबसे बड़ा वैज्ञानिक परिवर्तन अभी बाकी था यानी फ्लोराइड का प्रवेश।

फ्लोराइड की खोज: पानी के धब्बों से बड़ी वैज्ञानिक समझ तक

दाँतों पर फ्लोराइड के प्रभाव को समझने की वैज्ञानिक यात्रा बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में तेज हुई। शोधकर्ताओं ने देखा कि कुछ क्षेत्रों में पीने के पानी में प्राकृतिक फ्लोराइड अधिक होने के कारण लोगों के दाँतों पर धब्बे तो थे। लेकिन उनमें कैविटी अपेक्षाकृत कम दिखाई देती थी। बाद के दशकों में यह समझ विकसित हुई कि नियंत्रित मात्रा में फ्लोराइड दाँत के इनेमल को अम्ल से होने वाले खनिज नुकसान के खिलाफ अधिक प्रतिरोधी बना सकता है और शुरुआती खनिज क्षति को फिर से भरने यानी पुनः खनिजीकरण / खनिजों की पुनःपूर्ति में मदद करता है। आधुनिक वैज्ञानिक साहित्य फ्लोराइड को कैविटी रोकने का अत्यंत महत्वपूर्ण साधन मानता है।

1950 के दशक में फ्लोराइड वाला व्यावसायिक टूथपेस्ट आधुनिक दंत-स्वास्थ्य इतिहास की निर्णायक उपलब्धि बना। Crest ने 1955 में स्टैनस फ्लोराइड (यह एक फ्लोराइड यौगिक है जिसका रासायनिक सूत्र SnF₂ है। इसका उपयोग कुछ टूथपेस्ट में दाँतों की सड़न से बचाव, दाँतों की संवेदनशीलता कम करने और मसूड़ों की समस्याओं को नियंत्रित करने के लिए किया जाता है।) वाला टूथपेस्ट बाजार में उतारा, और उस दौर के ADA अभिलेख इसके शुरुआती राष्ट्रीय विपणन को दर्ज करते हैं। यह कहना सही नहीं होगा कि Crest ने 'फ्लोराइड की खोज' की। फ्लोराइड और कैविटी पर दशकों से शोध चल रहा था। लेकिन फ्लोराइड को बड़े पैमाने के व्यावसायिक टूथपेस्ट में सफलतापूर्वक शामिल करने का यह महत्वपूर्ण चरण था।

फ्लोराइड असल में करता क्या है

और यहीं से टूथपेस्ट की भूमिका मूल रूप से बदल गई। पहले दंत-मंजन का मुख्य उद्देश्य साफ करना था। आधुनिक फ्लोराइड टूथपेस्ट का प्रमुख अतिरिक्त उद्देश्य दाँत की सड़न रोकना हो गया। फ्लोराइड वास्तव में करता क्या है? जब हम चीनी या स्टार्च वाला भोजन खाते हैं तो प्लाक में मौजूद जीवाणु अम्ल बना सकते हैं। इससे इनेमल से कैल्शियम और फॉस्फेट जैसे खनिज निकलने लगते हैं। यदि यह प्रक्रिया बार-बार होती रहे तो कैविटी बनती है। फ्लोराइड दाँत की सतह पर उपलब्ध रहकर इस खनिजों का क्षय / विखनिजीकरण को कम करने और खनिजों की पुनःपूर्ति / पुनः खनिजीकरण को बढ़ाने में मदद करता है। यही कारण है कि बार-बार थोड़ी मात्रा में स्थानीय फ्लोराइड संपर्क, जैसे दिन में दो बार टूथपेस्ट से, बहुत उपयोगी है।

क्या फ्लोराइड का लाभ सचमुच प्रमाणित है?

हाँ। यह टूथपेस्ट से जुड़े सबसे मजबूत वैज्ञानिक प्रमाणों में से एक है। आधी सदी से अधिक शोध के आधार पर फ्लोराइड टूथपेस्ट की कैविटी-रोधी प्रभावशीलता स्थापित मानी जाती है। इसलिए यह सवाल कि 'क्या टूथपेस्ट जरूरी है?' दो हिस्सों में उत्तर मांगता है। दाँतों की यांत्रिक सफाई जरूरी है। आधुनिक फ्लोराइड टूथपेस्ट कैविटी से अतिरिक्त और महत्वपूर्ण सुरक्षा देता है। केवल पानी से ब्रश करने पर प्लाक का कुछ हिस्सा हट सकता है। लेकिन आपको फ्लोराइड का वह कैविटी-रोधी लाभ नहीं मिलेगा जिसके लिए मजबूत वैज्ञानिक प्रमाण मौजूद हैं। इसी कारण WHO और ADA दोनों फ्लोराइड युक्त टूथपेस्ट से दिन में दो बार ब्रश करने की सलाह देते हैं।

क्या इसका अर्थ है कि टूथपेस्ट के बिना दाँत साफ ही नहीं हो सकते? नहीं। दातून, मिस्वाक और ब्रश से यांत्रिक सफाई संभव है। लेकिन आधुनिक सार्वजनिक स्वास्थ्य के स्तर पर प्रश्न यह है कि उपलब्ध, सस्ता और व्यापक रूप से प्रमाणित उपाय कौन-सा है। वहाँ फ्लोराइड टूथपेस्ट + सही ब्रशिंग की जोड़ी बहुत मजबूत है। WHO ने फ्लोराइड टूथपेस्ट को कैविटी रोकने का प्रभावी उपाय माना है। इसे आवश्यक औषधि सूची में शामिल करने पर भी विचार और समर्थन किया है।

टूथपेस्ट के अलग-अलग दावे: व्हाइटनिंग, चारकोल, हर्बल

अब यह समझना भी जरूरी है कि टूथपेस्ट का हर दावा समान वैज्ञानिक मूल्य नहीं रखता। बाजार में दाँतों की सफेदी, सक्रिय चारकोल, वनौषधीय, नमक, लौंग, संपूर्ण सुरक्षा, मसूड़ों की देखभाल, दाँतों की संवेदनशीलता / ठंडा-गरम लगना, साँसों की ताजगी / मुँह की दुर्गंध से बचाव (whitening/charcoal/herbal/salt/clove/total/protection/gum care/sensitivity/fresh breath) जैसी अनेक श्रेणियाँ हैं। इनका मूल्य सामग्री पर निर्भर करता है। स्टैनस फ्लोराइड जैसे सक्रिय घटक उपयोगी हो सकते हैं। मसूड़ों से संबंधित उत्पादों में antimicrobial घटक हो सकते हैं। Whitening पेस्ट प्रायः दाँत की बाहरी सतह के दाग हटाने के लिए अधिक घर्षक या रासायनिक तत्व इस्तेमाल कर सकते हैं; वे दाँत के प्राकृतिक अंदरूनी रंग को हमेशा 'सफेद' नहीं करते। इसलिए चमकदार विज्ञापन से अधिक महत्वपूर्ण सक्रिय सामग्री और वास्तविक आवश्यकता है।

चारकोल टूथपेस्ट के बारे में विशेष सावधानी उपयोगी है। काला पेस्ट देखकर ऐसा लगता है कि यह दाँतों से 'टॉक्सिन खींच' लेता होगा। लेकिन दाँतों से विष खींचने जैसी लोकप्रिय भाषा का मजबूत वैज्ञानिक आधार नहीं है। कुछ चारकोल उत्पाद अधिक घर्षक पदार्थ हो सकते हैं और यदि उनमें पर्याप्त फ्लोराइड नहीं है तो कैविटी सुरक्षा भी कम हो सकती है। इसलिए केवल 'प्राकृतिक' या 'डिटॉक्स' शब्द किसी पेस्ट को वैज्ञानिक रूप से बेहतर नहीं बनाता।

इसी तरह 'हर्बल' टूथपेस्ट अपने-आप खराब भी नहीं है। यदि उसमें उपयोगी सामग्री है, पर्याप्त फ्लोराइड है और उसका घर्षण सुरक्षित सीमा में है तो वह सामान्य टूथपेस्ट की तरह उपयोगी हो सकता है। सवाल 'हर्बल बनाम केमिकल' का नहीं। कौन-सी सामग्री, कितनी मात्रा और किस उद्देश्य के लिए, यह ज्यादा महत्वपूर्ण है।

बच्चों के लिए फ्लोराइड: फायदा और सावधानी

अब बच्चों का सवाल आता है। यहाँ फ्लोराइड लाभकारी है, लेकिन मात्रा पर नियंत्रण महत्वपूर्ण है क्योंकि छोटे बच्चे पेस्ट निगल सकते हैं। ADA और दूसरी दंत संस्थाएँ बहुत छोटे बच्चों के लिए बहुत कम मात्रा और बड़े बच्चों के लिए उम्र के अनुसार नियंत्रित मात्रा की सलाह देती हैं, साथ ही वयस्क निगरानी भी महत्वपूर्ण है। अत्यधिक फ्लोराइड निगलना, विशेषकर दाँत विकसित होने की उम्र में, dental fluorosis का जोखिम बढ़ा सकता है। इसलिए "फ्लोराइड अच्छा है, जितना ज्यादा उतना अच्छा" गलत है।

यहीं मात्रा की विज्ञान-सम्मत सोच जरूरी है। लगभग हर उपयोगी पदार्थ की तरह फ्लोराइड का भी सही मात्रा में लाभ और अनुचित अधिक मात्रा में नुकसान हो सकता है। इसका अर्थ फ्लोराइड टूथपेस्ट से डरना नहीं। बल्कि उसे निर्देशानुसार इस्तेमाल करना है।

ब्रशिंग से जुड़े आम सवाल

क्या ब्रश दिन में एक बार पर्याप्त है? कुछ सफाई निश्चित रूप से एक बार से भी होगी, लेकिन वर्तमान मानक सलाह दिन में दो बार है। रात की ब्रशिंग विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि सोते समय लार का प्रवाह कम हो जाता है। लार सामान्यतः अम्ल को निष्क्रिय करने और दाँत की सतह की रक्षा करने में मदद करती है। इसलिए रात भर प्लाक और भोजन-अवशेष छोड़ना अनुकूल स्थिति नहीं है। ADA दिन में दो बार दो मिनट की सलाह देता है।

क्या हर भोजन के तुरंत बाद ब्रश करना चाहिए? जरूरी नहीं। बहुत अम्लीय भोजन या पेय के तुरंत बाद दाँत की सतह कुछ समय के लिए अपेक्षाकृत नरम हो सकती है। ऐसी स्थिति में जोर से ब्रश करना घिसाव बढ़ा सकता है। इसलिए सामान्यतः सुबह और रात की अच्छी ब्रशिंग पर्याप्त आधार है; व्यक्तिगत जरूरत के अनुसार दंत चिकित्सक अलग सलाह दे सकता है।

ब्रश कितनी देर करना चाहिए? वर्तमान सलाह लगभग दो मिनट है। कारण यह नहीं कि 1 मिनट 59 सेकंड पर कोई वैज्ञानिक सीमा टूट जाती है। बल्कि अध्ययन बताते हैं कि पर्याप्त समय देने से दाँतों की सभी सतहें अधिक व्यवस्थित रूप से साफ होने की संभावना बढ़ती है। ADA इसे दो मिनट, दिन में दो बार के सरल व्यवहारिक नियम में बदलता है।

बहुत लोग दाँत जोर से रगड़ते हैं और सोचते हैं कि जितना अधिक दबाव, उतनी अधिक सफाई। यह भी गलत है। ब्रशिंग का उद्देश्य दाँत घिसना नहीं, प्लाक हटाना है। बहुत तेज दबाव और कठोर ब्रिसल मसूड़ों के पीछे हटने, संवेदनशीलता और दाँत की जड़ के पास घिसाव में योगदान कर सकते हैं। इसीलिए मुलायम रेशों वाला ब्रश सामान्यतः बेहतर विकल्प माना जाता है।

इलेक्ट्रिक टूथब्रश क्या साधारण ब्रश से बहुत बेहतर है? जरूरी नहीं कि हर व्यक्ति के लिए भारी अंतर हो। अच्छी तकनीक से इस्तेमाल किया गया साधारण साफ्ट ब्रश भी प्रभावी हो सकता है। लेकिन कुछ सुव्यवस्थित शोध-समीक्षाएँ में विद्युत चालित टूथब्रश, विशेष रूप से आगे-पीछे घूमने वाला प्रकार, से दंत मैल और मसूड़ों की सूजन में कुछ अतिरिक्त कमी देखी गई है। उनके टाइमर और दबाव-संकेत उन लोगों के लिए उपयोगी हो सकते हैं जो समय कम देते हैं या बहुत जोर लगाते हैं। फिर भी इलेक्ट्रिक ब्रश अच्छे मौखिक स्वास्थ्य की अनिवार्य शर्त नहीं है।

फ्लॉस, जीभ की सफाई और माउथवॉश की भूमिका

क्या केवल ब्रश कर लेना पर्याप्त है? पूरी तरह नहीं, क्योंकि ब्रश के रेशे दो दाँतों के बीच के बहुत संकरे संपर्क क्षेत्र तक हमेशा अच्छी तरह नहीं पहुँचते। इसलिए कई दंत संस्थाएँ धागे से दाँतों के बीच की सफाई या अंतरदंतीय ब्रश जैसे साधनों से दाँतों के बीच सफाई की भी सलाह देती हैं, विशेषकर जहाँ भोजन और प्लाक फँसता है। यानी अच्छा oral hygiene केवल टूथब्रश खरीद लेने से नहीं आता; तकनीक और नियमितता अधिक महत्वपूर्ण हैं।

जीभ साफ करना भी उपयोगी हो सकता है, विशेषकर दुर्गंध कम करने के लिए, क्योंकि जीभ की सतह पर बैक्टीरिया और अवशेष जमा हो सकते हैं। लेकिन जीभ इतनी जोर से नहीं रगड़नी चाहिए कि ऊतक घायल हो जाएँ।

और माउथवॉश? यह भी टूथब्रश और फ्लोराइड टूथपेस्ट का अनिवार्य विकल्प नहीं है। कुछ लोगों में विशेष फ्लोराइड या रोगाणुरोधी माउथवॉश उपयोगी हो सकते हैं। लेकिन सामान्य व्यक्ति के लिए अच्छा ब्रशिंग आधार बना रहता है। बच्चों में fluoride mouthrinse पर अध्ययनों ने कैविटी में अतिरिक्त कमी दिखाई है, पर आवश्यकता जोखिम और अन्य fluoride exposure पर निर्भर करती है।

एक लोकप्रिय प्रश्न है—ब्रश करने के बाद बहुत पानी से कुल्ला करना चाहिए या नहीं? यदि आप फ्लोराइड टूथपेस्ट इस्तेमाल करते हैं तो बहुत जोर से बार-बार पानी से कुल्ला करने पर मुँह में बचा फ्लोराइड जल्दी हट सकता है। कुछ दंत दिशानिर्देश अतिरिक्त पानी से जोरदार कुल्ला न करने, केवल अतिरिक्त पेस्ट थूकने की सलाह देते हैं ताकि फ्लोराइड कुछ समय सतह पर बना रहे। ADA भी तत्काल अधिक कुल्ला करने से फ्लोराइड संपर्क घटने की बात करता है।

आधुनिक आहार ने सफाई को और जरूरी क्यों बना दिया

अब एक बड़ा सवाल—हमारे पूर्वज टूथपेस्ट के बिना रहते थे, तो हमें इसकी इतनी जरूरत क्यों पड़ गई? इसका उत्तर केवल तकनीक में नहीं, आधुनिक भोजन में भी है। आज परिष्कृत चीनी, मीठे पेय, लगातार स्नैकिंग और आसानी से चिपकने वाले प्रसंस्कृत कार्बोहाइड्रेट की उपलब्धता प्राचीन मनुष्य की तुलना में बहुत अधिक है। दाँतों पर बार-बार अम्ल बनने का अवसर बढ़ सकता है। इसलिए आधुनिक आहार में कैविटी रोकने के लिए नियमित प्लाक नियंत्रण और फ्लोराइड का महत्व बहुत अधिक हो जाता है।

यहाँ यह भ्रम भी दूर होना चाहिए कि कैविटी केवल 'ब्रश न करने' से होती है। दाँत की सड़न बहु-कारक बीमारी है—बैक्टीरिया, चीनी की आवृत्ति, लार, दाँत की बनावट, फ्लोराइड, स्वच्छता और समय सभी भूमिका निभाते हैं। कोई व्यक्ति दिन में तीन बार ब्रश करे लेकिन पूरे दिन मीठा पेय पीता रहे तो जोखिम बना रह सकता है। WHO की मौखिक स्वास्थ्य रणनीति भी मुक्त शर्करा घटाने और फ्लोराइड टूथपेस्ट दोनों को महत्वपूर्ण मानती है।

इसीलिए टूथब्रश को 'कैविटी की दवा' नहीं समझना चाहिए। ब्रश प्लाक हटाता है। फ्लोराइड टूथपेस्ट इनेमल को रासायनिक सुरक्षा देता है। कम चीनी अम्ल बनने की आवृत्ति घटाती है। लार प्राकृतिक रक्षा करती है। और दंत चिकित्सक शुरुआती समस्याएँ पहचान सकता है। अच्छे दंत स्वास्थ्य में ये सभी परतें मिलकर काम करती हैं।

क्या दातून-मिस्वाक इस्तेमाल करने वाले को प्लास्टिक ब्रश की जरूरत है?

अब यह प्रश्न कि यदि कोई व्यक्ति दातून या मिस्वाक बहुत अच्छी तरह इस्तेमाल करता है तो क्या उसे प्लास्टिक टूथब्रश की अनिवार्य जरूरत है? जैविक दृष्टि से नहीं—यदि वह सभी आवश्यक सतहों से प्लाक प्रभावी रूप से हटा रहा है, मसूड़ों को चोट नहीं पहुँचा रहा और कैविटी-रोधी फ्लोराइड का उपयुक्त स्रोत भी है, तो सफाई का उद्देश्य पूरा हो सकता है। मिस्वाक पर उपलब्ध समीक्षाएँ इसके प्रभावी होने की संभावना दिखाती हैं। लेकिन आधुनिक टूथब्रश का लाभ यह है कि उसकी बनावट और तकनीक अधिक मानकीकृत हैं और सही उपयोग सिखाना आसान है।

यही कारण है कि दातून को केवल 'पुराना और बेकार' तथा आधुनिक ब्रश को 'एकमात्र वैज्ञानिक' कहना भी सही नहीं। इतिहास बताता है कि दातून ही ब्रश का पूर्वज है। विज्ञान का प्रश्न यह है कि किस विधि से प्लाक प्रभावी और सुरक्षित ढंग से हटता है तथा कैविटी से अतिरिक्त सुरक्षा कैसे मिलती है।

प्लास्टिक टूथब्रश और टूथपेस्ट ट्यूब की पर्यावरणीय चुनौती

टूथब्रश की एक पर्यावरणीय समस्या भी है। प्लास्टिक के अरबों ब्रश नियमित रूप से फेंके जाते हैं और उनके मिश्रित प्लास्टिक-नायलॉन ढाँचे को पुनर्चक्रित करना आसान नहीं। इसी कारण बाँस के हैंडल और बदलने योग्य brush heads लोकप्रिय हुए हैं। लेकिन किसी इको फ्रेंडली ब्रश का मूल्य तभी है जब उसके रेशे सुरक्षित हों और उससे अच्छी सफाई हो। पर्यावरण और दंत-स्वास्थ्य दोनों को संतुलित करना होगा।

टूथपेस्ट की ट्यूब भी इसी पर्यावरणीय चुनौती का हिस्सा रही है। पारंपरिक बहुस्तरीय ट्यूबों को पुनर्चक्रित करना कठिन था; अब उद्योग अधिक रिसाइकिल सामग्री विकसित कर रहा है। भविष्य में टैबलेट, refill और कम पैकेजिंग वाले दंत-मंजन बढ़ सकते हैं। लेकिन स्वरूप बदलने से मूल विज्ञान नहीं बदलता—यांत्रिक सफाई और प्रमाणित दाँतों की सड़न रोकने वाले पदार्थ की जरूरत बनी रहती है।

इतिहास का सार-संक्षेप

तो पूरे इतिहास को क्रम में रखें तो तस्वीर यह बनती है। हजारों वर्ष पहले मनुष्य दातून और चूर्ण से दाँत साफ करता था। चीन में पशु-बाल वाले हैंडलयुक्त ब्रश विकसित हुए। यूरोप में यह विचार पहुँचा। लगभग 1780 में William Addis ने इंग्लैंड में टूथब्रश का बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू किया। औद्योगिक क्रांति ने इसे आम वस्तु बनाया। 1938 के आसपास नायलॉन ब्रिसल ने पशु-बालों की जगह लेना शुरू किया। बीसवीं शताब्दी में ब्रश नियमित घरेलू स्वच्छता का हिस्सा बना और विद्युत ब्रश भी आए।

टूथपेस्ट की यात्रा भी प्राचीन दंत-मंजन से शुरू हुई, उन्नीसवीं शताब्दी में पेस्ट और ट्यूब तक पहुँची और बीसवीं शताब्दी के मध्य में फ्लोराइड के जुड़ने से वास्तव में आधुनिक चिकित्सकीय उत्पाद बनी। 1950 के दशक में fluoride toothpaste का व्यापक व्यावसायिक उपयोग शुरू हुआ और आज कैविटी रोकने में उसके लाभ के पीछे कई दशकों का मजबूत वैज्ञानिक प्रमाण है।

क्या टूथब्रश और टूथपेस्ट जरूरी हैं? का सबसे सही उत्तर यह है: आधुनिक प्लास्टिक टूथब्रश और किसी खास ब्रांड का पेस्ट मानव जीवन के लिए जैविक रूप से अनिवार्य नहीं हैं, लेकिन दाँतों से प्लाक की नियमित सफाई अत्यंत महत्वपूर्ण है और फ्लोराइड टूथपेस्ट कैविटी रोकने का अत्यंत प्रमाणित साधन है।

इसलिए सुबह और रात हम जो दो मिनट ब्रश करते हैं। उसके पीछे लगभग पाँच हजार वर्ष की मानव आदत, चीनी दंत-कौशल, भारतीय दातून परंपरा, अठारहवीं शताब्दी का ब्रिटिश उद्योग, बीसवीं शताब्दी का नायलॉन विज्ञान और आधुनिक फ्लोराइड रसायन, सब एक साथ मौजूद हैं।

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Yogesh Mishra

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Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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