‘बाय नाउ, पे लेटर’ आपको ज्यादा खर्च क्यों करवाता है? दिमाग, व्यवहार और डिजिटल कर्ज का पूरा संबंध

Psychology of Spending: ‘बाय नाउ, पे लेटर’ यानी अभी खरीदें, बाद में भुगतान करें, लोगों से ज्यादा खर्च क्यों करवाता है? जानिए छोटी किस्त, डिजिटल कर्ज और दिमाग की खर्च करने की आदत का पूरा मनोविज्ञान।

Yogesh Mishra
Published on: 23 Aug 2026 5:50 PM IST
Psychology of Spending Explained in Hindi
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Psychology of Spending Explained in Hindi

Psychology of Spending: 'बाय नाउ, पे लेटर' - अभी खरीदिए, बाद में भुगतान कीजिए’। यह सुविधा पहली नजर में बेहद सहज लगती है। कोई वस्तु 12,000 रुपये की है। लेकिन भुगतान के समय पूरी कीमत दिखाने के बजाय लिखा आता है - 'सिर्फ 3,000 रुपये अभी, बाकी तीन किस्तों में।’ चीज़ वही है। कीमत वही है। लेकिन दिमाग उसे पहले जैसा महँगा महसूस नहीं करता।

यही 'बाय नाउ, पे लेटर' यानी अभी खरीदो-बाद में चुकाओ, की सबसे बड़ी मनोवैज्ञानिक ताकत है। हाल के शोध बताते हैं कि यह भुगतान-पद्धति लोगों को केवल भुगतान की सुविधा ही नहीं देती, बल्कि वस्तु की कीमत को मानसिक रूप से छोटा महसूस करा सकती है, जिससे खर्च बढ़ सकता है। 2025 में प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया कि किस्तों में दिखाई गई छोटी-छोटी रकम वस्तु को कम महँगा महसूस कराती है और इससे लोग अधिक खर्च करने को तैयार हो जाते हैं। अधिक किस्तें और छोटी पहली किस्त इस प्रभाव को और बढ़ा सकती हैं।

यही इस पूरी व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण विज्ञान है - हमारा दिमाग हमेशा कुल कीमत को उसी तरह नहीं महसूस करता जैसे गणित करता है।

मान लीजिए आपको 20,000 रुपये का एक फोन खरीदना है। यदि भुगतान के समय स्क्रीन पर लिखा हो 20,000 अभी दीजिये तो दिमाग तुरंत तुलना करता है: बैंक खाते में कितना पैसा है, महीने का बजट क्या है, क्या यह खर्च वास्तव में जरूरी है?

लेकिन उसी फोन के नीचे लिखा हो - 5,000 रुपये × 4 तो मानसिक प्रश्न बदल सकता है। अब दिमाग यह नहीं पूछने लगता कि क्या यह फोन 20,000 का है? बल्कि पूछने लगता है कि क्या मैं अभी 5,000 दे सकता हूँ?”

यहीं निर्णय की इकाई बदल गई। कुल कीमत 20,000 ही है, लेकिन मनोवैज्ञानिक कीमत 5,000 महसूस होने लगी।

यही वजह है कि हाल के नियंत्रित प्रयोगों में पाया गया कि बाय नाउ, पे लेटर उपलब्ध होने पर खरीद छोड़ देने की संभावना कम हो सकती है और ग्राहक तत्काल पूर्ण भुगतान की बजाय स्थगित भुगतान की ओर जा सकता है। 2026 के एक अध्ययन ने इसे एक तरह का “दोहरी कीमत” वाला प्रभाव बताया - एक ही वस्तु सामने पूरी कीमत और छोटी तत्काल किस्त, दोनों रूपों में दिखाई देती है; ग्राहक फिर ‘खरीदूँ या न खरीदूँ’ की तुलना से हटकर ‘अभी पूरा दूँ या किस्तों में दूँ’ की तुलना करने लगता है।

यही परिवर्तन बहुत महत्वपूर्ण है।

पहले प्रश्न था - “क्या मुझे यह चीज चाहिए?”

अब प्रश्न हो गया -“मैं इसे किस तरह चुका दूँ?”

और जैसे ही दिमाग दूसरे प्रश्न पर पहुँचता है, खरीदने का मूल निर्णय लगभग आधा हो चुका होता है।

भुगतान का दर्द क्या होता है?

व्यवहार-विज्ञान में एक उपयोगी अवधारणा है - भुगतान का दर्द। जब हम पैसा खर्च करते हैं तो मस्तिष्क केवल आनंद नहीं महसूस करता; खर्च एक तरह की मानसिक हानि भी महसूस होता है।

नकद भुगतान में यह अनुभव बहुत स्पष्ट होता है। आपने ₹5,000 के नोटों का बंडल दिया और वह हाथ से चला गया। खर्च दिखाई और महसूस दोनों देता है।

कार्ड ने इस दर्द को कुछ कम किया। केवल कार्ड लगाया, सामान मिल गया और पैसा कुछ समय बाद खाते से गया। डिजिटल भुगतान ने इस दूरी को और बढ़ा दिया।

बाय नाउ, पे लेटर इसे एक कदम और आगे ले जाता है।सामान अभी मिलता है, लेकिन पूरी आर्थिक चोट भविष्य में बाँट दी जाती है।

यानी सुख वर्तमान में, भुगतान भविष्य में।

मनुष्य के दिमाग के लिए यह संयोजन बहुत आकर्षक है। हम वर्तमान के पुरस्कार को भविष्य की कीमत से अधिक महत्व देने की प्रवृत्ति रखते हैं। इसे व्यवहार-अर्थशास्त्र में वर्तमान-पक्षपात कहा जाता है।

₹20,000 की वस्तु आज मिलने का सुख बहुत स्पष्ट है। अगले तीन महीनों में ₹5,000-₹5,000 की किस्तें अभी दूर दिखाई देती हैं। इसीलिए भविष्य का कर्ज मन में कई बार वर्तमान के पैसे जितना वास्तविक नहीं लगता।

‘बिना ब्याज’ शब्द इतना शक्तिशाली क्यों है?

बाय नाउ, पे लेटर की एक बड़ी बिक्री-रणनीति होती है 'शून्य ब्याज’ की।

ग्राहक सोचता है कि यदि कुल भुगतान वही है, तो नुकसान क्या है? गणित की दृष्टि से यदि वास्तव में कोई ब्याज, शुल्क या दंड नहीं है और सभी भुगतान समय पर किए जाएँ, तो यह सुविधा आर्थिक रूप से खराब होना जरूरी नहीं। लेकिन समस्या ब्याज से पहले व्यवहार में शुरू हो सकती है। यदि बाय नाउ, पे लेटर के कारण आपने ऐसी वस्तु खरीद ली जिसे पूर्ण भुगतान करना पड़ता तो आप नहीं खरीदते, तो “शून्य ब्याज” के बावजूद आपका खर्च बढ़ गया।

उदाहरण के लिए दो विकल्प देखें। पहला व्यक्ति 8,000 का जूता देखकर कहता है बहुत महँगा है, नहीं खरीदूँगा।

दूसरा वही जूता देखता है - 2,000 अभी, तीन और किस्तें।

वह खरीद लेता है। ब्याज शून्य है। लेकिन उसने 8,000 रुपये अतिरिक्त खर्च कर दिया।

सलिए ‘बिना ब्याज’ और ‘बिना आर्थिक प्रभाव’ एक ही बात नहीं हैं।

क्या शोध में वास्तव में ज्यादा खर्च पाया गया है?

हाँ। 2024 में प्रकाशित एक बड़े खुदरा व्यवहार अध्ययन में बाय नाउ, पे लेटर अपनाने वाले ग्राहकों का ऑनलाइन खर्च तुलना समूह की अपेक्षा लगभग 6.42 प्रतिशत अधिक पाया गया। प्रभाव खास तौर पर युवा और कम आय वाले ग्राहकों में ज्यादा दिखाई दिया और अपेक्षाकृत छोटे मूल्य वाली वस्तुओं ने इस वृद्धि में बड़ी भूमिका निभाई।

एक दूसरे अध्ययन ने खुदरा लेन-देन के आँकड़ों में पाया कि बाय नाउ, पे लेटर अपनाने के बाद लोग ज्यादा बार खरीदारी करते हैं और बड़ी रकम की खरीदारी भी करते हैं।

और एक व्यापक आर्थिक अध्ययन में पाया गया कि ऐसी ऋण-सुविधा उपलब्ध होने के बाद उपभोक्ताओं का कुल खर्च बढ़ सकता है, केवल यह नहीं कि वे एक भुगतान-पद्धति से दूसरी पर चले जाते हैं।

इसलिए “बाय नाउ, पे लेटर केवल भुगतान का तरीका बदलता है, खर्च नहीं।”यह बात शोध से पूरी तरह मेल नहीं खाती।

छोटी किस्त दिमाग को कैसे धोखा देती है?

मान लीजिए 24,000 रुपये की घड़ी है। यदि पूरी कीमत सामने हो तो आपका दिमाग उसे 24 हजार रुपये की खरीद मानता है।

अब लिखा है - सिर्फ ₹2,000 × 12।”

अचानक तुलना बदल सकती है।

24,000 रुपये की तुलना आप शायद किराए, स्कूल फीस, बचत या मासिक आय से करते। 2,000 रुपये की तुलना आप शायद एक डिनर, कपड़े या सप्ताहांत खर्च से करने लगते हैं। यानी विक्रेता ने कीमत नहीं बदली, उसने कीमत का मानसिक पैमाना बदल दिया।

2025 के अध्ययन का महत्वपूर्ण निष्कर्ष यही था कि किस्त की रकम दिखाने से वस्तु की महँगाई की अनुभूति कम होती है। जितनी अधिक किस्तें और जितनी छोटी प्रारंभिक राशि, उतना यह प्रभाव बढ़ सकता है।

इसे कीमत का ‘टुकड़े करना’ कह सकते हैं।

बड़ा आर्थिक निर्णय कई छोटे, कम डरावने निर्णयों में टूट गया।

दूसरी समस्या - कर्ज दिखाई नहीं देता

परंपरागत ऋण में कर्ज बहुत स्पष्ट होता है। आपने ₹5 लाख का व्यक्तिगत ऋण लिया, बैंक का खाता है, हर महीने बड़ी किश्त है।

बाय नाउ, पे लेटर में कर्ज कई छोटी खरीदों के रूप में बिखर सकता है।

₹2,500 की किस्त फोन की।

₹1,800 जूतों की।

₹3,000 होटल की।

₹1,200 कपड़ों की।

₹2,100 किसी उपकरण की।

हर खरीद अलग-अलग छोटी लगती है। लेकिन अगले महीने कुल किस्त ₹10,600 हो गई।

यही ऋण का विखंडन है।

दिमाग अक्सर प्रत्येक छोटे भुगतान को अलग देखता है, जबकि आर्थिक वास्तविकता में वे सभी आपके भविष्य की आय पर पहले से कब्जा कर चुके होते हैं।

यहीं बाय नाउ, पे लेटर सामान्य कार्ड से भी अलग मनोवैज्ञानिक समस्या पैदा कर सकता है। कार्ड का एक बड़ा मासिक बिल कम-से-कम आपको कुल कर्ज एक जगह दिखा देता है। कई अलग-अलग बाय नाउ, पे लेटर योजनाएँ अलग ऐप, अलग तारीख और अलग किस्तों में छिप सकती हैं।

‘लोन स्टैकिंग’ क्या है?

जब कोई व्यक्ति एक ही समय में कई बाय नाउ, पे लेटर ऋण ले लेता है तो इसे सामान्यतः कई ऋणों का एक साथ जमा होना कहा जाता है।

अमेरिकी उपभोक्ता वित्त संरक्षण ब्यूरो ने 2025 की अपनी विस्तृत रिपोर्ट में पाया कि बाय नाउ, पे लेटर इस्तेमाल करने वाले बहुत-से उपभोक्ताओं के पास एक ही समय में कई ऐसे ऋण थे। उसके अध्ययन का एक उद्देश्य ही यह समझना था कि अलग-अलग कंपनियों से लिए गए छोटे ऋण मिलकर कुल असुरक्षित कर्ज कितना बना रहे हैं।

समस्या यह है कि प्रत्येक विक्रेता के सामने आपकी पूरी भविष्य की मासिक देनदारी हमेशा स्पष्ट नहीं होती।

आपके दिमाग में भी नहीं।

यही डिजिटल कर्ज का नया स्वरूप है। कर्ज बड़ा नहीं दिखता, लेकिन कई छोटे हिस्सों में फैलकर बड़ा बन जाता है।

युवा और कम आय वाले लोग ज्यादा संवेदनशील क्यों हो सकते हैं?

2024 के खुदरा अध्ययन में खर्च बढ़ने का प्रभाव युवा और कम आय वाले उपभोक्ताओं में अधिक दिखाई दिया। 2025 की अमेरिकी नियामकीय रिपोर्ट में भी युवा उधारकर्ताओं के कुल असुरक्षित कर्ज में बाय नाउ, पे लेटर की हिस्सेदारी अपेक्षाकृत अधिक पाई गई।

इसका कारण केवल ‘युवा लोग गैर-जिम्मेदार हैं’ नहीं है।

युवा व्यक्ति के पास बचत कम हो सकती है। आय अभी स्थिर नहीं हो सकती। तत्काल उपभोग की इच्छा अधिक हो सकती है। डिजिटल खरीदारी अधिक होती है। और छोटी किस्त बड़ी खरीद को उपलब्ध बना देती है।

यदि किसी की मासिक आय ₹25,000 है, तो ₹20,000 का फोन असंभव लग सकता है। लेकिन ₹5,000 की किस्त संभव लग सकती है।

यहीं सुविधा और जोखिम एक-दूसरे से मिलते हैं।

वह फोन वास्तव में ‘सस्ता’ नहीं हुआ। उस व्यक्ति ने केवल अपनी भविष्य की चार तनख्वाहों का एक हिस्सा आज खर्च कर दिया।

भविष्य की आय को आज खर्च करना क्यों खतरनाक हो सकता है?

मान लीजिए आपकी अगले महीने की तनख्वाह ₹50,000 है।

आपको लगता है पूरी ₹50,000 उपलब्ध होगी।

लेकिन वास्तविकता :

₹8,000 पुरानी किस्त।

₹5,000 दूसरी खरीद।

₹4,000 तीसरी योजना।

यानी तनख्वाह आने से पहले ही ₹17,000 खर्च हो चुका है।

अब वास्तविक स्वतंत्र आय केवल ₹33,000 है।

यदि आप इस महीने फिर नई बाय नाउ, पे लेटर खरीद कर लेते हैं तो अगले महीने की आय और पहले से बँध जाती है।

इस प्रक्रिया को लगातार दोहराएँ तो एक समय ऐसा आ सकता है जब व्यक्ति काम आज कर रहा है, लेकिन उसकी आय का बड़ा हिस्सा भूतकाल की खरीदारी चुका रहा है।

यही डिजिटल कर्ज का सबसे खतरनाक रूप है।

भविष्य की आय धीरे-धीरे वर्तमान में खिंच आती है।

फिर नई खरीदारी क्यों नहीं रुकती?

क्योंकि पिछली खरीद का सुख और भविष्य के भुगतान अलग-अलग समय में होते हैं।

नई चीज आज मिली। भुगतान अगले महीने।

अगले महीने जब किस्त गई, तब वस्तु खरीदने वाला उत्साह शायद खत्म हो चुका है। दिमाग भुगतान को उस पुराने आनंद से उतनी मजबूती से नहीं जोड़ता।

इसे खरीद और भुगतान का समयगत अलगाव कहा जा सकता है।

भुगतान जितना खरीद से अलग होता जाता है, खर्च का तत्काल मानसिक दर्द उतना घट सकता है।

यही सिद्धांत पहले क्रेडिट कार्ड में देखा गया और बाय नाउ, पे लेटर उसे किस्तों में और बारीक कर देता है।

नकद में वस्तु मिली और पैसा गया।

बाय नाउ, पे लेटर में वस्तु मिली, खुशी मिली। पैसे का बड़ा हिस्सा नहीं गया। भुगतान बाद में आया।

दिमाग के लिए ये दो अलग घटनाएँ बन सकती हैं।

‘सिर्फ ₹999 प्रति माह’ इतना प्रभावी क्यों होता है?

क्योंकि मानव मस्तिष्क पूर्ण लागत की तुलना में बार-बार आने वाली छोटी संख्या को अधिक आसानी से स्वीकार कर सकता है।

₹23,976 का सामान महँगा लगता है।

₹999 प्रतिमाह कम।

लेकिन 24 महीने × ₹999 भी ₹23,976 ही है, शुल्क अलग हो तो उससे अधिक।

यही तकनीक केवल बाय नाउ, पे लेटर में नहीं—सदस्यता, बीमा, वाहन ऋण, मोबाइल अनुबंध और दूसरे उत्पादों में भी इस्तेमाल होती है।

विक्रेता आपकी नजर कुल कीमत से हटाकर मासिक वहनीयता पर ले जाता है।

आप पूछना बंद कर देते हैं - “इसकी कुल कीमत क्या है?”

और पूछते हैं - “₹999 तो मैं दे ही सकता हूँ।”

यही प्रश्न बदलना खर्च बढ़ा सकता है।

क्या बाय नाउ, पे लेटर हमेशा खराब है?

नहीं।

यदि किसी व्यक्ति ने पहले से आवश्यक खरीद तय कर रखी है, पूरी रकम उसके पास है, योजना वास्तव में बिना ब्याज और शुल्क की है और भुगतान की तारीखें स्पष्ट हैं, तो यह नकदी प्रबंधन का उपयोगी साधन हो सकता है।

उदाहरण के लिए ₹20,000 की आवश्यक वस्तु आपको खरीदनी ही है और भुगतान चार बराबर बिना ब्याज किस्तों में बाँटने से आपकी मासिक नकदी व्यवस्था आसान होती है—तो इसका उपयोग तर्कसंगत हो सकता है।

समस्या तब शुरू होती है जब भुगतान सुविधा खरीद का कारण बन जाए।

यानी आपने इसलिए नहीं कहा—“मुझे यह चीज चाहिए, अब भुगतान कैसे करूँ?”

बल्कि आपने कहा—“चार छोटी किस्तें हैं, इसलिए इसे खरीद लेता हूँ।”

यह बहुत बड़ा फर्क है।

सबसे उपयोगी मानसिक परीक्षण क्या है?

किसी भी बाय नाउ, पे लेटर खरीद से पहले खुद से केवल एक प्रश्न पूछें—

“यदि मुझे आज इसकी पूरी कीमत देनी पड़ती, तो क्या मैं इसे फिर भी खरीदता?”

यदि उत्तर हाँ है, तो किस्त केवल भुगतान व्यवस्था हो सकती है।

यदि उत्तर नहीं है, तो संभव है कि किस्त आपकी खरीदने की इच्छा पैदा कर रही है।

यही वह क्षण है जहाँ व्यवहार-विज्ञान सबसे स्पष्ट दिखाई देता है।

देर से भुगतान करने पर क्या होता है?

यह योजना और देश के अनुसार अलग हो सकता है। कुछ योजनाएँ ब्याज-मुक्त होती हैं लेकिन भुगतान चूकने पर शुल्क, खाते पर रोक या दूसरी कार्रवाइयाँ हो सकती हैं। लंबी अवधि वाले कुछ उत्पादों में ब्याज भी हो सकता है।

इसलिए “बाय नाउ, पे लेटर” का मतलब सार्वभौमिक रूप से ‘हमेशा मुफ्त कर्ज’ नहीं है।

इसके अलावा एक व्यक्ति कई योजनाओं में फँसा हो तो किसी एक भुगतान का छूटना आसान हो जाता है।

मान लीजिए किस्तें 3, 7, 12, 18 और 25 तारीख को हैं। एक ही वेतन से पाँच अलग कटौतियाँ।

यही बिखरी हुई समय-सारिणी मानसिक हिसाब को कठिन बनाती है।

क्या इससे क्रेडिट कार्ड की तुलना में ज्यादा खर्च हो सकता है?

कुछ नए शोधों में ऐसा पाया गया है। 2025 के अध्ययन में बाय नाउ, पे लेटर से खर्च कुछ परिस्थितियों में कार्ड भुगतान से भी अधिक था, और इसका मुख्य कारण किस्त की छोटी कीमत को प्रमुखता से दिखाना था।

कार्ड कहता है—“₹20,000 खर्च हुआ।”

बाय नाउ, पे लेटर कह सकता है—“आज सिर्फ ₹5,000।”

यही भाषा का अंतर व्यवहार बदल सकता है।

दुकानदार को इसमें फायदा क्या है?

बहुत सी कंपनियाँ बाय नाउ, पे लेटर इसलिए उपलब्ध कराती हैं क्योंकि इससे ग्राहक की खरीद पूरी करने की संभावना और औसत खरीद राशि बढ़ सकती है। शोध भी खरीद की आवृत्ति और खरीद मूल्य बढ़ने का संकेत देता है। विक्रेता की समस्या है कि ग्राहक वस्तु पसंद करता है लेकिन कीमत देखकर पीछे हट रहा है। बाय नाउ, पे लेटर उस बाधा को छोटा करता है।

40,000 रुपये देखकर ग्राहक कहता है - नहीं। लेकिन 10,000 × 4 देखकर कहता है - ठीक है।

यहां वस्तु नहीं बदली। ग्राहक की आय नहीं बदली। केवल भुगतान की प्रस्तुति बदल गई। और बिक्री हो गई।

इसीलिए इसे केवल वित्तीय उत्पाद नहीं, बिक्री बढ़ाने वाला मनोवैज्ञानिक उपकरण भी समझना चाहिए।

डिजिटल माध्यम इसे और शक्तिशाली क्यों बनाता है?

क्योंकि पूरा निर्णय कुछ सेकंड में हो जाता है।

पुराने समय में कर्ज के लिए बैंक जाना पड़ता था। फॉर्म, अधिकारी, दस्तावेज और प्रतीक्षा, इन सबके कारण व्यक्ति को सोचने का समय मिलता था।

अब तो वस्तु चुनी। एक बटन दबाया। चार किस्तें दिखीं।मोबाइल से सत्यापन हुआ। खरीद पूरी। इस प्रक्रिया में घर्षण लगभग समाप्त हो गया। व्यवहार-विज्ञान में घर्षण कई बार आत्म-नियंत्रण का अनजाना सहायक होता है। यदि किसी चीज को खरीदने में 20 मिनट लगें तो हम दोबारा सोच सकते हैं। यदि दो स्पर्श में खरीद हो जाए तो आवेग और निर्णय के बीच की दूरी बहुत कम हो जाती है। इसीलिए डिजिटल सुविधा आर्थिक रूप से हमेशा निष्पक्ष सुविधा नहीं होती; वह निर्णय की गति बदलती है।

सबसे खतरनाक भ्रम - ‘यह कर्ज नहीं है’

क्योंकि ‘लोन’ शब्द डराता है।‘किस्त’ कम डराती है। ‘पे लेटर’ तो और भी हल्का लगता है। लेकिन आर्थिक वास्तविकता में आपने वस्तु आज प्राप्त की और उसका पूरा पैसा अभी नहीं दिया तो आपने भविष्य की आय के बदले वर्तमान उपभोग लिया है। यह ऋण का मूल सिद्धांत ही है। यदि इस शब्द को कर्ज की बजाय ‘भुगतान सुविधा’ की तरह देखा जाए तो व्यक्ति कई योजनाएँ ले सकता है जिन्हें वह बैंक से पाँच अलग ऋण के रूप में कभी नहीं लेता। यही भाषा का मनोवैज्ञानिक असर है।

सबसे बड़ा जोखिम तब आता है जब आय अचानक घट जाए

इसका सबसे बड़ा जोखिम तब पैदा होता है जब आय अचानक घट जाए। बाय नाउ, पे लेटर की गणना इस धारणा पर होती है कि आपकी भविष्य की आय उपलब्ध रहेगी। लेकिन भविष्य निश्चित नहीं है। नौकरी जा सकती है। बीमारी आ सकती है। अचानक बड़ा घरेलू खर्च हो सकता है। व्यवसाय की आमदनी गिर सकती है।

यदि भविष्य की आय का बड़ा हिस्सा पहले से किस्तों में बँधा है, तो आर्थिक झटका सहने की क्षमता कम हो जाती है। इसीलिए छोटी-छोटी किस्तों को केवल उनकी व्यक्तिगत राशि से नहीं देखना चाहिए। सवाल होना चाहिए कि मेरी अगले तीन महीनों की कुल निश्चित देनदारी कितनी है?

इससे बचने का सबसे अच्छा तरीका क्या है?

सबसे प्रभावी नियम यह है कि प्रत्येक किस्त के बजाय कुल बकाया देखें। 1,500 रुपये की छह किस्तें मत देखिए बल्कि 9,000 रुपये का कर्ज देखिए।

दूसरा, खरीद के समय पूरी कीमत अपने बैंक खाते से घटाकर कल्पना कीजिए। यदि उस स्थिति में खरीद असुविधाजनक लगती है तो शायद वस्तु आपकी मौजूदा आर्थिक क्षमता से बाहर है।

तीसरा, एक साथ चल रही सभी योजनाओं का कुल मासिक भुगतान लिखिए।

चौथा, आवश्यक वस्तु और इच्छा-आधारित वस्तु में फर्क कीजिए।

और पाँचवाँ, जीरो इंटरेस्ट देखकर खरीद का निर्णय न लें।

पहले खरीद तय करें, उसके बाद भुगतान पद्धति चुनें।

यानी क्रम होना चाहिए:

पहले तय करें कि खरीदनी है या नहीं। फिर तय करें कि भुगतान कैसे करना है।

बाय नाउ, पे लेटर का मनोवैज्ञानिक प्रभाव इस क्रम को उलट सकता है। पहले आसान भुगतान दिखता है, फिर हम खुद को खरीद के लिए राजी कर लेते हैं। यही इसकी असली ताकत है।

आखिर बाय नाउ, पे लेटर इतना प्रभावी क्यों है?

‘अभी खरीदो, बाद में चुकाओ’ का खतरा केवल ब्याज या विलंब शुल्क में नहीं है। उसका गहरा प्रभाव हमारे दिमाग के उस हिस्से पर है जो वर्तमान सुख को अधिक और भविष्य की लागत को कम महत्व देता है।

छोटी किस्त वस्तु को सस्ता महसूस कराती है। भुगतान खरीद से अलग हो जाता है। कई छोटे ऋण कुल कर्ज को छिपा देते हैं। और डिजिटल प्रक्रिया सोचने का समय घटा देती है। शोध में इसी कारण इससे खरीद और कुल खर्च बढ़ने के प्रमाण मिल रहे हैं।

इसे एक वाक्य में समझना हो तो - बाय नाउ, पे लेटर आपकी खरीदने की क्षमता नहीं बढ़ाता; वह आपकी भविष्य की कमाई का एक हिस्सा आज उपलब्ध करा देता है और उसी समय कुल कीमत का मानसिक दर्द छोटा कर देता है। यही कारण है कि 20,000 की चीज कभी-कभी महँगी लगती है, लेकिन ‘सिर्फ 5,000 की चार किस्तें’ अचानक खरीदने लायक लगने लगती हैं।

गणित नहीं बदला बल्कि दिमाग का अनुभव बदल गया।

Yogesh Mishra
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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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