Why Do Old Books Smell: पुरानी किताबों की महक क्यों आती है? पन्ने पीले क्यों पड़ते हैं?

Why Do Old Books Smell: पुरानी किताबों से खास महक क्यों आती है और उनके पन्ने समय के साथ पीले क्यों पड़ जाते हैं? जानिए बिब्लिओकोर, वैनिलिन, लिग्निन और सेल्युलोज का पूरा विज्ञान

Neel Mani Lal
Published on: 15 Aug 2026 6:36 PM IST
Why Do Old Books Smell
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Why Do Old Books Smell

Why Do Old Books Smell: किसी पुरानी किताब को खोलते ही आने वाली वो खास, थोड़ी मीठी सी महक एक अलग ही एहसास कराती है। एक ऐसा एहसास जो किसी और चीज में नहीं मिलता। इस खास महक को किताब प्रेमी अक्सर 'बिब्लिचोर' (bibliochor) कहते हैं। असल में ये कोई जादू नहीं है बल्कि शुद्ध केमिस्ट्री है। दिलचस्प बात यह है कि यही केमिकल प्रक्रिया किताबों के पीले पड़ने के पीछे भी जिम्मेदार है। आइए, कागज़ की इस पूरी कहानी को समझते हैं।

किताब की महक आती कहां से है

किसी भी किताब की खुशबू का राज़ छिपा है उसके कागज़ की बुनियादी बनावट में। लकड़ी के गूदे (wood pulp) से बना कागज़, खासकर 20वीं सदी के आखिर से पहले बना कागज़, दो बड़े जैविक पॉलिमर (organic polymer) से भरपूर होता है - सेल्युलोज़ (cellulose) और लिग्निन (lignin)। सेल्युलोज़ फाइबर कागज़ को मजबूती देते हैं जबकि लिग्निन इन फाइबर्स को आपस में बांधकर रखता है जैसा कि यह मूल लकड़ी में करता था।

समय के साथ पुराने कागज़ का अम्लीय (acidic) वातावरण इस प्राकृतिक क्षरण (decay) को तेज़ कर देता है। सेल्युलोज़ की लंबी शृंखलाएं 'एसिड हाइड्रोलिसिस' नाम की प्रक्रिया से गुज़रती हैं और छोटे, ज्यादा वाष्पशील (volatile) अणुओं (molecules) में टूट जाती हैं। इसके साथ ही, लिग्निन की संरचना ऑक्सीकृत (oxidize) होकर टूटने लगती है। यही वह प्रतिक्रिया है जो पुराने कागज़ को पीला या भूरा बना देती है।

महक का सबसे मशहूर घटक है वैनिलिन

कागज कक इस जटिल खुशबू में सबसे पहचानी जाने वाली चीज़ है वैनिलिन (vanalin), जो लिग्निन के टूटने पर बनती है और उस मीठी, वैनिला जैसी हल्की महक का कारण बनती है। पुरानी किताबों से सच में वैनिला जैसी महक आने की वजह यह है कि वे धीरे-धीरे अपनी लकड़ी की सामग्री को उसी रसायन प्रक्रिया से वैनिलिन में बदल रही होती हैं, जिसका इस्तेमाल इंडस्ट्री वैनिला फ्लेवरिंग बनाने के लिए करती है। आज भी दुनिया के करीब 15% वैनिलिन का उत्पादन लिग्निन से ही होता है, जो कागज़ बनाने की प्रक्रिया का एक बाइप्रोडक्ट (byproduct) है।

महक और पीलापन एक ही सिक्के के दो पहलू

जो ऑक्सीकरण (oxydation) प्रतिक्रिया वैनिलिन छोड़ती है, वही 'क्विनोन क्रोमोफोर्स' नाम की प्रकाश-अवशोषी (light absorbant) संरचनाएं भी बनाती है, जो कागज़ को पीला बना देती हैं। यानी महक और पीलापन, दोनों एक ही रासायनिक प्रक्रिया के दो अलग-अलग नतीजे हैं। जब आप भूरे पड़ चुके पन्ने देखते हैं, तो असल में आप उसी प्रतिक्रिया का दृश्य सबूत देख रहे होते हैं, जो वह खुशबू भी पैदा करती है।

पूरा केमिकल कॉकटेल है

किताब की महक कोई एक अकेला रसायन नहीं बल्कि सैकड़ों यौगिकों का मेल है। कागज़ एक जैविक (organic) पदार्थ है और उम्र बढ़ने के साथ उसके घटक एसिड हाइड्रोलिसिस से टूटते हैं, हवा में वाष्पशील और अर्धवाष्पशील जैविक यौगिक (VOCs) छोड़ते हुए, जिनमें वैनिला (वैनिलिन), बादाम (बेंज़ल्डिहाइड) या हल्की मस्की-फूलों जैसी महक (एथाइल्स, टॉलुईन और हेक्सानॉल) के संकेत हो सकते हैं।

2009 में यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन (UCL) में हुए एक अध्ययन ने गैस क्रोमैटोग्राफी-मास स्पेक्ट्रोमेट्री तकनीक का इस्तेमाल करके कागज़ के क्षरण से निकलने वाले 15 प्रमुख वाष्पशील जैविक यौगिकों की पहचान की। जब UCL की टीम ने ऐतिहासिक पुस्तकालयों में आने वाले लोगों से इस महक का वर्णन करने को कहा, तो सबसे आम जवाब था 'चॉकलेटी'।

तापमान और भंडारण से भी बदलती है महक की तीव्रता

तापमान सीधे तौर पर इन प्रतिक्रियाओं की रफ्तार तय करता है। गर्म परिस्थितियां रासायनिक टूट-फूट को तेज़ करती हैं, जिससे VOCs जल्दी रिलीज़ होते हैं। इसके उलट, ठंडी और स्थिर भंडारण स्थितियां इन यौगिकों के उत्सर्जन को धीमा कर देती हैं, जिससे महक विकसित होने में ज्यादा समय लगता है। किताब के आसपास का माहौल भी अहम भूमिका निभाता है। पुराने गोंद, चमड़े की बाइंडिंग, और यहां तक कि लकड़ी की अलमारियां भी अपने खुद के क्षरणशील यौगिक इस मिश्रण में जोड़ती हैं।

आज की नई किताबें ऐसी महक क्यों नहीं देतीं

अगर आपने कभी गौर किया हो कि किसी दुकान से खरीदी नई किताब से वो गहरी, गर्म महक नहीं आती।वजह ये है कि 1980 के दशक से प्रकाशकों ने क्षारीय-बफर्ड (alkaline buffered), एसिड मुक्त कागज़ की तरफ रुख करना शुरू किया। पुराने कागज़ अम्लीय (pH 4-5) होते थे, जिसका मतलब था कि वे अपने खुद के क्षरण को उत्प्रेरित (catalyze) करते थे। यानी अम्ल खुद सेल्युलोज़ को हाइड्रोलाइज़ कर देता था। आधुनिक, उच्च गुणवत्ता वाले कागज़ों को रासायनिक प्रक्रिया से गुज़ारकर उनमें से लिग्निन हटाया जाता है इसलिए आज की किताबें उतनी जल्दी वो खास महक विकसित नहीं करतीं, भले ही सेल्युलोज़ का टूटना भी होता रहता है।

पन्ने पीले क्यों पड़ते हैं?

कागज़ का पीलापन कोई अलग घटना नहीं, बल्कि उसी क्षरण प्रक्रिया का दृश्य नतीजा है जो महक पैदा करती है। संक्षेप में समझें तो:

1. लिग्निन का ऑक्सीकरण: हवा में मौजूद ऑक्सीजन लिग्निन के अणुओं से प्रतिक्रिया करके उन्हें छोटे यौगिकों में तोड़ती है, जिनमें कुछ प्रकाश को खास तरीके से सोखने वाले (क्रोमोफोर) होते हैं यही रासायनिक बदलाव पीले भूरे रंग का कारण बनता है

2. एसिड हाइड्रोलिसिस: पुराने, एसिडिक कागज़ में मौजूद सेल्युलोज़ की चेन टूटती रहती हैं, जिससे कागज़ कमजोर और भंगुर (brittle) होता जाता है।

3. प्रकाश और नमी का असर: सूरज की रोशनी और नमी दोनों ही इन प्रतिक्रियाओं की रफ्तार बढ़ा देते हैं। इसलिए धूप में रखी या नम जगह में पड़ी किताबें ज्यादा तेज़ी से पीली पड़ती हैं

दीमक कागज़ क्यों खाती है?

दीमक असल में वह जिस चीज़ की तलाश में रहती है, वह है लकड़ी में मौजूद सेल्युलोज़ (cellulose)। सेल्युलोज़ धरती पर सबसे प्रचुर मात्रा में पाया जाने वाला जैविक यौगिक (organic compound) है। यह पौधों की कोशिका दीवार (cell wall) का मुख्य घटक है। यह इंसानों के लिए भी एक बेहद महत्वपूर्ण पदार्थ है, और यह अपने मूल रूप में निर्माण सामग्री के तौर पर, या ज्यादा रिफाइंड रूपों जैसे कागज़ में, यहां तक कि हमारे खाने में भी पाया जाता है।

भले ही दीमक लगभग किसी भी सेल्युलोज युक्त सामग्री को खा सकती है, वह अपने पाचन तंत्र में रहने वाले सहजीवी (symbiotic) सूक्ष्मजीवों की मदद के बिना उससे कोई पोषण हासिल नहीं कर सकती। उनके पाचन तंत्र में मौजूद बैक्टीरिया, फंगस और प्रोटोज़ोआ सेल्युलोज़ को तोड़ते हैं और पोषक तत्व छोड़ते हैं, जिन्हें दीमक अवशोषित कर पाती है।

निचली श्रेणी के दीमकों (lower termites) में सेल्युलोज़ पचाने की क्षमता पूरी तरह सहजीवी फ्लैजेलेट प्रोटोज़ोआ पर निर्भर करती है, जो बिना ऑक्सीजन के दीमक की हिंडगट (आंत के पिछले हिस्से) में रहते हैं और सेल्युलेज़ व सेलोबायेज़ जैसे एंजाइम छोड़ते रहते हैं। ये सेल्युलोज़ को साधारण ग्लूकोज़ और एसिटिक एसिड में तोड़ते हैं। दीमक इन प्रोटोज़ोआ पर इतनी पूरी तरह निर्भर हैं कि इनके बिना वे भूखे मर जाएंगी।

नई पैदा हुई दीमकें ये प्रोटोज़ोआ अपने से बड़ी, संक्रमित दीमकों से 'एनल फीडिंग' (गुदा-भोजन) नाम की एक खास प्रक्रिया के जरिए हासिल करती हैं। चूंकि हर बार केंचुली उतारने (molt) पर ये प्रोटोज़ोआ खत्म हो जाते हैं, इन्हें दोबारा सिर्फ इसी एनल फीडिंग से हासिल किया जा सकता है। इसलिए दीमकें समूहों में रहती हैं, ताकि केंचुली उतार रहे युवा सदस्यों का संक्रमित, बिना केंचुली वाले सदस्यों से संपर्क बना रहे। यह भी माना जाता है कि इन्हीं प्रोटोज़ोआ को ट्रांसफर करने की जरूरत ने दीमकों में सामाजिक समूह जीवन (termite society) के विकास को जन्म दिया होगा।

उच्च श्रेणी की दीमकों की अलग रणनीति

उच्च श्रेणी की दीमकों (higher termites) में सहजीवी प्रोटोज़ोआ नहीं होते, सिर्फ बैक्टीरिया मौजूद होते हैं। दीमक और उनके सूक्ष्मजीव, दोनों को इस रिश्ते से फायदा होता है, इसलिए इसे 'म्यूचुअलिज्म' (परस्पर-लाभकारी सहजीवन) कहा जाता है। दीमकें लकड़ी को चबाकर तोड़ती हैं जबकि सूक्ष्मजीव लकड़ी को छोटे अणुओं में रासायनिक रूप से पचाते हैं, जिन्हें दीमकें अवशोषित करके इस्तेमाल कर पाती हैं। दीमक की आंत सूक्ष्मजीवों को एक स्थिर वातावरण और भोजन देती है।एक अकेली दीमक प्रजाति की आंत में सैकड़ों प्रजातियों के सूक्ष्मजीव मौजूद हो सकते हैं, जो उसी प्रजाति के साथ-साथ विकसित (co-evolve) हुए हैं।

कागज़ दीमक के लिए इतना आकर्षक क्यों

चूंकि कागज़ मूल रूप से शुद्ध सेल्युलोज़ फाइबर से बना होता है (जिसमें से लिग्निन काफी हद तक निकाला जा चुका होता है), यह दीमक के लिए एक तरह से पहले से आधा-प्रोसेस्ड भोजन जैसा होता है। लकड़ी के मुकाबले इसे तोड़ना और पचाना आसान होता है, इसीलिए किताबें, पुराने दस्तावेज़ और कार्डबोर्ड दीमकों के सबसे पसंदीदा निशानों में गिने जाते हैं।

किताब की वह प्यारी-सी महक, उसके पीले पड़ते पन्ने, और दीमक का उसे चट कर जाना - ये तीनों घटनाएं असल में एक ही कहानी की अलग-अलग कड़ियां हैं, जिसके केंद्र में है कागज़ की मूल बनावट: सेल्युलोज़ और लिग्निन।

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