Déjà vu क्यों होता है? अचानक क्यों लगता है कि 'यह पल मैं पहले भी जी चुका हूँ'?

Déjà Vu Science: ज्ञान की नज़र से यह सामान्यतः स्मृति और परिचय-बोध के बीच क्षणिक असंगति मानी जाती है। वर्तमान अनुभव नया है, लेकिन मस्तिष्क का परिचय पहचानने वाला तंत्र क्षण भर के लिए संकेत देता है कि यह जाना-पहचाना है।

Yogesh Mishra
Published on: 16 Aug 2026 7:47 PM IST
Déjà Vu Science
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Déjà Vu Science: कभी आप किसी ऐसी जगह पहली बार जाते हैं जहाँ पहले कभी नहीं गए, सामने कोई व्यक्ति कुछ कहता है, कमरे में रोशनी एक खास तरह से पड़ रही होती है और अचानक भीतर बहुत तीव्र अनुभूति होती है कि यह सब पहले भी बिल्कुल इसी तरह हो चुका है। कुछ सेकंड के लिए घटना इतनी परिचित लगती है कि व्यक्ति को विश्वास होने लगता है कि शायद उसने इसे पहले देखा, जिया या सपने में अनुभव किया है। फिर वह यह याद नहीं कर पाता कि आखिर कब और कहाँ। इसी विचित्र अनुभव को फ्रांसीसी शब्द Déjà vu (डेजा वू) कहा जाता है, जिसका अर्थ 'पहले देखा हुआ' है।

विज्ञान की नज़र से यह सामान्यतः स्मृति और परिचय-बोध के बीच क्षणिक असंगति मानी जाती है। वर्तमान अनुभव नया है, लेकिन मस्तिष्क का परिचय पहचानने वाला तंत्र क्षण भर के लिए संकेत देता है कि यह जाना-पहचाना है। स्वस्थ लोगों में ऐसा होना आम है और अपने-आप में बीमारी का संकेत नहीं माना जाता।

दो विरोधी जानकारियों का टकराव

इस अनुभव की सबसे रोचक बात यह है कि Déjà vu में व्यक्ति के भीतर दो विरोधी जानकारियाँ एक साथ मौजूद होती हैं। एक तरफ वह जानता है -"मैं इस जगह पहले कभी नहीं आया।" दूसरी तरफ उसे महसूस होता है -"मैं यहाँ पहले आ चुका हूँ।" यही विरोध Déjà vu की पहचान है। यदि वाकई में आपको याद आ जाए कि पाँच साल पहले आप इसी कमरे में बैठे थे, तो वह Déjà vu नहीं, नॉर्मल मेमोरी होगी। Déjà vu में परिचय की भावना बहुत मजबूत होती है, लेकिन उसके पीछे कोई वास्तविक, स्पष्ट स्मृति नहीं मिलती। आधुनिक शोध इसे 'पहचानेपन का अहसास' यानी परिचित लगने और 'स्मरण' यानी घटना को संदर्भ सहित याद करने के बीच असंगति से जोड़ता है।

परिचय-बोध और संदर्भ सहित स्मरण: दो अलग व्यवस्थाएँ

हमारी स्मृति केवल एक व्यवस्था नहीं है। किसी व्यक्ति को देखकर दो अलग बातें हो सकती हैं - पहली यह कि, 'यह चेहरा जाना-पहचाना लग रहा है।' दूसरी यह कि, 'हाँ, यह वही व्यक्ति है जिससे मैं पिछले वर्ष जयपुर में मिला था।'

पहली चीज परिचय-बोध है, दूसरी संदर्भ सहित स्मरण। सामान्य जीवन में दोनों अक्सर साथ आते हैं। लेकिन कभी परिचय-बोध सक्रिय हो जाए और मस्तिष्क उस परिचय का स्रोत न खोज पाए, तो वर्तमान दृश्य रहस्यमय रूप से 'पहले देखा हुआ' लग सकता है। Déjà vu की एक प्रमुख वैज्ञानिक व्याख्या यही है।

मान लीजिए आप पहली बार किसी पुराने होटल में गए। सामने लंबा गलियारा है, दाईं ओर खिड़की, बाईं ओर सीढ़ी और दूर एक लाल दरवाजा। हो सकता है आपने यह होटल पहले कभी न देखा हो, लेकिन वर्षों पहले किसी दूसरे स्थान पर लगभग यही डेकोरेशन या आर्किटेक्चर देखा हो - गलियारा, खिड़की, सीढ़ी और दरवाजे का संबंध। पुरानी घटना पूरी तरह याद नहीं आती, लेकिन उसका ढाँचा मस्तिष्क में बचा हुआ है। नया दृश्य उस पुराने ढाँचे से पर्याप्त समानता रखता है और परिचय-बोध पैदा हो जाता है। आपको स्थान नया पता है, लेकिन वह 'अजीब तरह से जाना-पहचाना' लगता है।

यही कारण है कि Déjà vu कभी किसी एक वस्तु के बजाय पूरे दृश्य की संरचना से पैदा हो सकता है। कुर्सी याद नहीं, व्यक्ति याद नहीं, कमरा याद नहीं, फिर भी सब मिलाकर कोई पुरानी छाप जाग गई। स्मृति हमेशा शब्दों और स्पष्ट चित्रों में संग्रहित नहीं होती। उसका कुछ हिस्सा संबंधों, संकेतों और अधूरी समानताओं के रूप में भी प्रभाव डाल सकता है।

मस्तिष्क में कहाँ होता है यह अनुभव

मस्तिष्क में इस प्रक्रिया से विशेष रूप से सेंट्रल टेम्पोरल क्षेत्र, हिप्पोकैम्पस और उसके आसपास की संरचनाएँ जुड़ी मानी जाती हैं। ये क्षेत्र नई घटनाओं को स्मृति से जोड़ने और परिचित या नए अनुभव के आकलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। Déjà vu पर न्यूरो साइंस के अध्ययनों में para-hippocampal तथा hippocampal तंत्रों की भूमिका बार-बार सामने आई है।

मिर्गी से जुड़ाव और इलेक्ट्रोड अध्ययन

इस रहस्य का एक अत्यंत महत्वपूर्ण वैज्ञानिक सुराग भी मिलता है। कुछ लोगों में temporal lobe epilepsy, यानी मस्तिष्क के टेम्पोरल क्षेत्र से शुरू होने वाले मिर्गी के दौरे, से ठीक पहले या दौरे के हिस्से के रूप में बहुत तीव्र Déjà vu हो सकता है। चिकित्सा साहित्य में यह संबंध लंबे समय से दर्ज है। इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं कि हर व्यक्ति जिसे कभी Déjà vu हुआ है उसे मिर्गी है। बल्कि सामान्य लोगों में Déjà vu बहुत आम है। लेकिन टेम्पोरल लोब की असामान्य विद्युत गतिविधि से परिचय-बोध पैदा हो सकना इस बात का मजबूत संकेत है कि Déjà vu मस्तिष्क की स्मृति-व्यवस्था से उत्पन्न अनुभव है।

वास्तव में कुछ मिर्गी रोगियों में मस्तिष्क की गहराई में लगाए गए इलेक्ट्रोड से विशिष्ट क्षेत्रों को विद्युत रूप से उत्तेजित करने पर Déjà vu जैसा अनुभव दोबारा उत्पन्न किया गया है। 2022 के एक अध्ययन में ब्रेन के इन्सुला सहित कुछ क्षेत्रों को स्टिमुलेट करने से दो रोगियों में Déjà vu अनुभव दर्ज हुए। इसका महत्व बहुत बड़ा है।यदि किसी विशेष तंत्रिका जाल को उत्तेजित करके 'मैंने यह पहले जिया है' वाला अनुभव पैदा किया जा सकता है, तो इस अनुभूति के लिए अलौकिक कारण मानना वैज्ञानिक रूप से आवश्यक नहीं रह जाता। दवा या सर्जरी से जब मिर्गी के दौरे नियंत्रित होते हैं, तो अक्सर Déjà vu भी कम हो जाता है। यह भी दिखाता है कि परिचय की यह असाधारण अनुभूति मस्तिष्क के भीतर ही उत्पन्न की जा सकती है, और केवल अनुभूति की प्रबलता से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि वह किसी वास्तविक पिछले जन्म की घटना है।

स्वस्थ लोगों में यह गलत संकेत क्यों शुरू होता है

कोई एक अंतिम सिद्धांत अभी सिद्ध नहीं है। Déjà vu पर शोध कठिन है, क्योंकि इसे प्रयोगशाला में आसानी से पैदा नहीं किया जा सकता। इसलिए वैज्ञानिक स्मृति परीक्षण, आभासी दृश्य, न्यूरोइमेजिंग, मिर्गी रोगियों के अध्ययन और व्यक्तिगत अनुभव रिपोर्टों को जोड़कर इसके तंत्र को समझते हैं।

एक प्रमुख विचार परिचय और नवीनता के संघर्ष का है। वर्तमान दृश्य को मस्तिष्क का एक हिस्सा सही रूप से 'नया' पहचानता है, जबकि स्मृति प्रणाली का दूसरा हिस्सा गलती से 'परिचित' संकेत भेज देता है। व्यक्ति इस विरोध को महसूस करता है और यही असामान्य अनुभव Déjà vu बन सकता है।

एक दूसरी व्याख्या यह है कि वर्तमान दृश्य का कोई छोटा हिस्सा, जैसे कि गंध, आवाज, स्थान की बनावट, किसी व्यक्ति का हावभाव, किसी भूली हुई पुरानी घटना से मिलता है। पुरानी स्मृति सचेत रूप से वापस नहीं आती लेकिन उससे जुड़ा परिचय संकेत आ जाता है। तब मस्तिष्क स्रोत के बिना familiarity महसूस करता है। यह कुछ वैसा है जैसे आपको कोई धुन बहुत परिचित लगे लेकिन आप याद न कर पाएँ कि उसे कहाँ सुना था। फर्क केवल इतना है कि Déjà vu में परिचय की भावना किसी एक धुन नहीं, वर्तमान पूरे क्षण पर चढ़ जाती है।

कभी यह भी कहा जाता है कि Déjà vu इसलिए होता है क्योंकि आँखों से आने वाली जानकारी मस्तिष्क तक थोड़ी देर से पहुँचती है और वही दृश्य दो बार दर्ज हो जाता है। पहली बार अवचेतन रूप में, दूसरी बार सचेत रूप में। यह इंटरनेट पर बहुत लोकप्रिय व्याख्या है, लेकिन इसे Déjà vu का स्थापित वैज्ञानिक कारण नहीं माना जाता। मस्तिष्क में सूचना प्रोसेसिंग समय के सूक्ष्म अंतर अवश्य होते हैं, लेकिन "एक आँख पहले और दूसरी बाद में देखती है, इसलिए Déjà vu होता है" जैसी कहानी पर्याप्त प्रमाणित नहीं है।

इसी तरह यह कहना कि मस्तिष्क ने गलती से वर्तमान घटना को 'दीर्घकालिक स्मृति' में पहले भेज दिया और इसलिए हमें लगता है कि वह पुरानी है, आकर्षक व्याख्या है। लेकिन इसे भी स्थापित तथ्य नहीं माना जाना चाहिए। मस्तिष्क कंप्यूटर की तरह अलग 'नया फोल्डर' और 'पुराना फोल्डर' में स्मृतियाँ नहीं डालता। स्मृति का निर्माण और पुनर्प्राप्ति कहीं अधिक गतिशील प्रक्रिया है।

किन लोगों में यह ज्यादा होता है

Déjà vu युवावस्था में अधिक क्यों दिखाई देता है? पुराने सर्वेक्षण और समीक्षाएँ संकेत देती हैं कि यह अनुभव युवा लोगों में अपेक्षाकृत अधिक और उम्र बढ़ने पर कम रिपोर्ट होता है। लगभग 60 प्रतिशत लोगों ने जीवन में कभी न कभी Déjà vu अनुभव करने की बात कही है, हालांकि अलग अध्ययनों में संख्या बदलती है। तनाव और थकान के साथ इसकी आवृत्ति बढ़ने के संकेत भी पुराने अध्ययनों में मिले हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि नींद कम होते ही Déjà vu निश्चित रूप से होगा, बल्कि मस्तिष्क की ध्यान और स्मृति व्यवस्था थकी अवस्था में थोड़ी अधिक अस्थिर हो सकती है।

यात्रा करने वाले लोगों में भी Déjà vu कुछ अध्ययनों में अधिक रिपोर्ट हुआ है। इसका एक संभावित कारण यह हो सकता है कि उन्हें लगातार नए लेकिन पुराने अनुभवों से आंशिक समानता रखने वाले दृश्य मिलते हैं—नए होटल, स्टेशन, सड़कें, कमरे, शहर। मस्तिष्क के लिए परिचय और नवीनता के बीच भ्रम पैदा होने के अवसर अधिक हो सकते हैं। लेकिन इसे भी कठोर कारण-परिणाम के बजाय संभावित संबंध की तरह देखना चाहिए।

"मुझे पहले से पता था कि आगे क्या होगा" वाली अनुभूति

कभी हमें क्यों लगता है कि हमें यह भी पता है कि अगले क्षण क्या होने वाला है? मान लीजिए आप कहते हैं - 'मुझे लगा था कि अब वह व्यक्ति यही वाक्य बोलेगा।' और वह सचमुच वैसा ही बोल देता है। अनुभव अत्यंत चौंकाने वाला हो सकता है। लेकिन इसमें स्मृति की पुनर्निर्माण प्रकृति महत्वपूर्ण है। हमारी स्मृति वीडियो रिकॉर्डिंग नहीं है, घटना के बाद मस्तिष्क उसे पुनर्निर्मित करता है। Déjà vu के दौरान पहले से ही 'यह हो चुका है' वाला भाव मौजूद है। इसलिए अगले कुछ सेकंड की सामान्य घटना भी उस परिचय की भावना में शामिल हो सकती है और व्यक्ति को लग सकता है कि उसे पहले से पता था।

प्रयोगात्मक शोध ने यह जाँचने की कोशिश की है कि Déjà vu वास्तव में भविष्यवाणी करने की क्षमता देता है या केवल पूर्वज्ञान की अनुभूति देता है। उपलब्ध प्रमाण अलौकिक भविष्यवाणी क्षमता को स्थापित नहीं करते। दिलचस्प रूप से temporal lobe epilepsy में 'अगले क्षण क्या होगा यह जानने' जैसी prescience अनुभूतियाँ भी दर्ज हुई हैं और उन्हें Déjà vu से अलग तंत्रिका अनुभव माना गया है। यानी "मुझे पता था आगे क्या होगा" जैसी अनुभूति स्वयं मस्तिष्क पैदा कर सकता है; अनुभूति की तीव्रता उसके वस्तुगत रूप से सच होने का प्रमाण नहीं है।

क्या यह पुनर्जन्म की स्मृति हो सकती है?

धार्मिक और दार्शनिक परंपराओं में पुनर्जन्म की अवधारणा हजारों वर्षों से मौजूद है, और अनेक लोग Déjà vu को उससे जोड़कर व्यक्तिगत अर्थ निकालते हैं। किसी अनजान जगह को अत्यंत परिचित महसूस करना स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न पैदा कर सकता है -"यदि मैं यहाँ इस जीवन में नहीं आया, तो शायद किसी पिछले जीवन में आया था?" अनुभव की तीव्रता के कारण यह व्याख्या व्यक्ति को बहुत वास्तविक भी लग सकती है।

लेकिन वर्तमान वैज्ञानिक प्रमाण Déjà vu को पुनर्जन्म की स्मृति सिद्ध नहीं करते। इसके विपरीत हमारे पास ऐसे प्रमाण हैं कि परिचय-बोध में असंगति, टेम्पोरल लोब की गतिविधि और स्मृति तंत्र की असामान्य सक्रियता से Déjà vu जैसा अनुभव पैदा हो सकता है। स्वस्थ लोगों में यह सामान्य स्मृति-भ्रम के रूप में होता है और मिर्गी के कुछ रोगियों में असामान्य तंत्रिका गतिविधि के साथ भी हो सकता है।

यहाँ विज्ञान की सीमा भी स्पष्ट रखनी चाहिए। विज्ञान यह कह सकता है कि Déjà vu पुनर्जन्म का प्रमाण नहीं है, क्योंकि इस अनुभव को समझाने के लिए ज्ञात तंत्रिका और स्मृति प्रक्रियाएँ मौजूद हैं और पिछले जन्म की आवश्यकता नहीं पड़ती। विज्ञान किसी व्यक्ति की आध्यात्मिक आस्था को प्रयोगशाला से 'निरस्त' करने का दावा नहीं करता। वह केवल यह पूछता है कि उपलब्ध परीक्षण योग्य प्रमाण किस व्याख्या को समर्थन देते हैं। Déjà vu के मामले में प्रमाण मस्तिष्क और स्मृति की व्याख्या का समर्थन करते हैं, पुनर्जन्म की स्मृति का नहीं।

déjà-rêvé: सपने से जुड़ा एक अलग अनुभव

सपनों के साथ भी Déjà vu का संबंध लोगों को बहुत आकर्षित करता है। कई बार व्यक्ति कहता है -"मैंने यह जगह पहले सपने में देखी थी।" यह संभव है कि उसने वास्तव में किसी पुराने सपने में मिलती-जुलती संरचना देखी हो और वर्तमान दृश्य ने उसकी धुंधली स्मृति जगाई हो। लेकिन इसके अलावा एक अलग शब्द déjà-rêvé भी इस्तेमाल किया जाता है, जिसका अर्थ मोटे तौर पर 'पहले सपना देखा हुआ' अनुभव है। तंत्रिका-विज्ञान में इसे Déjà vu से अलग अनुभव माना गया है और मिर्गी संबंधी मस्तिष्क उत्तेजना अध्ययनों में भी इसका अध्ययन हुआ है।

यह फर्क महत्वपूर्ण है। "मुझे यह दृश्य परिचित लगता है, लेकिन पता नहीं क्यों" - Déjà vu। "मुझे लगता है कि मैंने यही दृश्य किसी सपने में देखा था" - déjà-rêvé। दोनों रहस्यमय महसूस हो सकते हैं, लेकिन समान नहीं हैं।

Jamais vu: उल्टा अनुभव

Déjà vu का एक उलटा अनुभव भी होता है - jamais vu, यानी अत्यंत परिचित चीज अचानक अपरिचित लगने लगे। उदाहरण के लिए आप किसी सामान्य शब्द को लगातार बीस बार लिखें। कभी वह अचानक विचित्र लगने लगता है, जैसे उसकी वर्तनी गलत हो या आपने उसे पहली बार देखा हो। कभी परिचित सड़क या चेहरा कुछ क्षण के लिए "अजनबी" महसूस हो सकता है। यह परिचय-तंत्र की दूसरी दिशा है और हमें दिखाता है कि "यह परिचित है" की अनुभूति वस्तु में मौजूद नहीं; मस्तिष्क उसे पैदा करता है।

ठीक यही तथ्य Déjà vu की सबसे गहरी बात समझाता है। हम आम तौर पर मानते हैं कि किसी चीज का परिचित लगना इस बात का प्रमाण है कि हमने उसे पहले देखा होगा। अधिकतर समय यह अनुमान सही होता है। लेकिन Déjà vu दिखाता है कि 'परिचित महसूस होना' स्वयं एक मानसिक संकेत है और कभी-कभी वह संकेत गलत भी हो सकता है।

यह जल्दी खत्म क्यों हो जाता है

हमारा मस्तिष्क हर क्षण अपने अनुभव के ऊपर एक प्रकार का आंतरिक प्रमाणपत्र लगाता है। नया, जाना-पहचाना, याद आया, अनिश्चित। सामान्यतः यह प्रणाली इतनी अच्छी काम करती है कि हमें उसकी मौजूदगी का एहसास भी नहीं होता। Déjà vu उस क्षण की तरह है जब इस प्रणाली की दो सूचनाएँ आपस में मेल नहीं खातीं। इसलिए यह अनुभव इतना विचित्र लगता है।

और संभवतः यही कारण है कि Déjà vu अक्सर कुछ सेकंड में समाप्त हो जाता है। मस्तिष्क का निरीक्षण तंत्र तुरंत पकड़ लेता है कि परिचय का अहसास है, लेकिन उसके समर्थन में वास्तविक स्मृति नहीं मिल रही। कुछ शोधकर्ता स्वस्थ लोगों में Déjà vu को इसी memory signal और memory monitoring के बीच असंगति से जोड़ते हैं। इस दृष्टि से Déjà vu केवल स्मृति की 'गलती' ही नहीं, बल्कि एक अर्थ में मस्तिष्क की गलती पकड़ने की क्षमता भी दिखाता है। आपको परिचय महसूस होता है, लेकिन साथ ही आप जानते हैं कि यह अनुभव तर्कसंगत नहीं है।

इसीलिए स्वस्थ व्यक्ति सामान्यतः Déjà vu के बाद यह नहीं मान लेता कि 'अब निश्चित रूप से मैं यहाँ पहले आया था।' उसके भीतर वास्तविकता की जाँच बनी रहती है। 'ऐसा लग रहा है, लेकिन मैं जानता हूँ कि ऐसा नहीं हुआ।'

कब डॉक्टर से बात करनी चाहिए

यदि कभी-कभार कुछ सेकंड का Déjà vu होता है और बाकी कोई समस्या नहीं है तो सामान्यतः चिंता की जरूरत नहीं होती। लेकिन यदि यह बहुत बार होने लगे, लंबे समय चले, साथ में कुछ क्षण चेतना या संपर्क टूटे, असामान्य गंध या स्वाद महसूस हो, अचानक तीव्र भय आए, शरीर में झटके हों, खाली निगाह से देखते रहने की घटनाएँ हों, भ्रम हो या घटना के बाद याददाश्त में खालीपन रहे, तो चिकित्सकीय मूल्यांकन उचित है, क्योंकि Déjà vu कुछ focal seizures में एक लक्षण हो सकता है। टेम्पोरल लोब मिर्गी के चिकित्सा साहित्य में इसका संबंध अच्छी तरह दर्ज है।

सामान्य Déjà vu से डरने की जरूरत नहीं। यह मानव अनुभव की उन दुर्लभ खिड़कियों में से एक है जिनसे हमें पता चलता है कि स्मृति वास्तव में कैमरा नहीं है। मस्तिष्क अतीत को केवल संग्रहित नहीं करता, हर बार याद करते समय उसका पुनर्निर्माण भी करता है। वह परिचय और स्मरण के लिए अलग-अलग संकेतों का इस्तेमाल करता है और कभी-कभी दोनों क्षण भर के लिए असंगत हो जाते हैं।

शायद Déjà vu की सबसे सुंदर व्याख्या यही है कि उस क्षण वर्तमान घटना दो बार नहीं घटती; हमारा मस्तिष्क एक बार घट रही घटना को क्षण भर के लिए दो अलग पहचान देता है - 'यह नया है' और 'यह पहले हो चुका है।' इन दोनों संकेतों की टक्कर से पैदा होती है वह रहस्यमय अनुभूति, जिसे हम कहते हैं Déjà vu।

Yogesh Mishra
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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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