Wi-Fi vs Mobile Internet:

Wi-Fi vs Mobile Internet: पहले वह आपके राउटर से रेडियो वेव्स के जरिए जुड़ता है फिर राउटर आपके डेटा को इंटरनेट सेवा प्रदाता तक भेजता है। मोबाइल इंटरनेट में यह पहला वायरलेस संपर्क राउटर से नहीं, बल्कि मोबाइल नेटवर्क के बेस स्टेशन से होता है।

Yogesh Mishra
Published on: 16 Aug 2026 7:34 PM IST
Wi-Fi vs Mobile Internet
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Wi-Fi vs Mobile Internet

Wi-Fi vs Mobile Internet: वाई-फाई अब आम है। कहीं जाइये, वाई फाई की बात जरूर हो जाती है। कोई पासवर्ड मांगता है तो कोई पूछता है कि वाई फाई स्लो क्यों है। एक बात ये भी है कि वाई फाई को हम अक्सर किसी अदृश्य 'इंटरनेट की हवा' की तरह समझ लेते हैं, जबकि वास्तव में वाई फाई खुद कोई इंटरनेट नहीं है। वाई-फाई एक लोकल वायरलेस संचार तकनीक है जो रेडियो वेव्स के जरिए आपके फोन, लैपटॉप या टीवी को राउटर से जोड़ती है। इंटरनेट वह विशाल ग्लोबल नेटवर्क है जिससे आपका राउटर आगे फाइबर, केबल या किसी अन्य माध्यम से जुड़ा होता है। इसलिए जब आपका फोन वाई-फाई से जुड़ता है, तो वह सीधे 'इंटरनेट से बात' नहीं कर रहा होता। पहले वह आपके राउटर से रेडियो वेव्स के जरिए जुड़ता है फिर राउटर आपके डेटा को इंटरनेट सेवा प्रदाता तक भेजता है। मोबाइल इंटरनेट में यह पहला वायरलेस संपर्क राउटर से नहीं, बल्कि मोबाइल नेटवर्क के बेस स्टेशन से होता है।

वाई-फाई दीवार के पार कैसे जाता है

वाई-फाई दीवार के पार कैसे चला जाता है? इसका उत्तर रेडियो वेव्स में है। वाई-फाई सामान्यतः 2.4 गीगाहर्ट्ज, 5 गीगाहर्ट्ज और नए मानकों में 6 गीगाहर्ट्ज के आसपास की रेडियो फ्रीक्वेंसी का उपयोग करता है। ये तरंगें प्रकाश की तरह इलेक्ट्रो मैग्नेटिक तरंगें ही हैं, लेकिन उनकी वेवलेंथ, विज़िबल लाइट से बहुत बड़ी होती है। दृश्य प्रकाश किसी ईंट की दीवार को पार नहीं कर पाता क्योंकि वह उसके पदार्थ से बहुत अधिक अवशोषित (absorb) और परावर्तित (reflect) होता है। लेकिन वाई-फाई की रेडियो तरंगों का कुछ हिस्सा दीवार के पदार्थ से गुजर सकता है, कुछ हिस्सा लौट जाता है और कुछ अवशोषित हो जाता है। यानी दीवार वाई-फाई को पूरी तरह रोकती नहीं, बल्कि उसकी शक्ति कम करती है।

इसे ऐसे समझिए जैसे धूप और आवाज में फर्क होता है। धूप दीवार के पार नहीं आती, लेकिन दूसरे कमरे की तेज आवाज सुनाई दे सकती है। कारण यह नहीं कि आवाज दीवार से बिना प्रभावित हुए निकल गई, बल्कि उसकी तरंगों का कुछ भाग दीवार के भीतर कंपन और प्रसारण के रूप में दूसरी तरफ पहुँच गया। वाई-फाई भी इसी तरह पदार्थ से गुजरते समय कमजोर होता जाता है।

हर दीवार एक जैसी नहीं होती

साधारण लकड़ी, प्लास्टर और पतली ईंटें वाई-फाई संकेत को अपेक्षाकृत कम कमजोर कर सकती हैं। मोटी कंक्रीट की दीवार, लोहे की जाली, धातु की चादर या प्रबलित कंक्रीट संकेत को बहुत अधिक रोक सकती है। धातु विशेष रूप से रेडियो तरंगों को परावर्तित और अवरुद्ध करने में प्रभावी होती है। यही कारण है कि लिफ्ट के अंदर मोबाइल और वाई-फाई संकेत अक्सर कमजोर पड़ जाते हैं।

पानी भी वाई-फाई संकेतों को प्रभावित करता है। मानव शरीर में बड़ी मात्रा में पानी है, इसलिए लोगों की भीड़ में 2.4 और विशेष रूप से ऊँची आवृत्तियों के संकेतों का कुछ अवशोषण हो सकता है। यही वजह है कि बड़े सभागार में राउटर ठीक होने के बावजूद भीड़ बढ़ने पर प्रदर्शन बदल सकता है।

2.4, 5 और 6 गीगाहर्ट्ज में क्या फर्क है

2.4 और 5 गीगाहर्ट्ज में सबसे बड़ा व्यावहारिक अंतर यही है कि कम आवृत्ति वाली 2.4 गीगाहर्ट्ज तरंगें सामान्यतः दीवारों को अपेक्षाकृत बेहतर पार करती हैं और अधिक दूरी तक पहुँच सकती हैं, जबकि 5 गीगाहर्ट्ज अधिक गति दे सकता है लेकिन दूरी और दीवारों से जल्दी कमजोर पड़ता है। 6 गीगाहर्ट्ज पर उपलब्ध चौड़े चैनल और कम भीड़ बहुत तेज गति दे सकते हैं, लेकिन दीवारों से पार जाने की क्षमता और कम हो सकती है। इसलिए यदि आपका राउटर दूसरे कमरे में है और एक मोटी दीवार बीच में है, तो संभव है कि 2.4 गीगाहर्ट्ज नेटवर्क ठीक चले लेकिन 5 गीगाहर्ट्ज कमजोर दिखाई दे।

राउटर और फोन के बीच डेटा कैसे चलता है

राउटर रेडियो तरंग भेजता कैसे है? उसके भीतर रेडियो प्रेषक और एंटीना होते हैं। आपका फोन भी इसी तरह एंटीना और रेडियो चिप रखता है। जब आप कोई वेबसाइट खोलते हैं तो फोन डिजिटल डेटा को रेडियो संकेतों में बदलकर राउटर तक भेजता है। राउटर उन्हें प्राप्त करता है, फिर आगे आपके इंटरनेट सेवा प्रदाता तक भेज देता है। वेबसाइट से आने वाला डेटा उल्टी दिशा में लौटता है—इंटरनेट से राउटर, फिर राउटर से रेडियो तरंग के रूप में आपके फोन तक।

इसमें सबसे दिलचस्प बात यह है कि वाई-फाई केवल 'एक सीधी किरण' नहीं होता। कमरे में रेडियो तरंगें दीवारों, फर्नीचर, छत और दूसरी वस्तुओं से टकराकर कई रास्तों से आपके फोन तक पहुँच सकती हैं। इसे बहुपथ प्रसारण कहा जाता है। कभी यही परावर्तन मदद करता है और संकेत किसी कोने तक पहुँचा देता है; कभी अलग-अलग रास्तों से आई तरंगें एक-दूसरे को कमजोर कर देती हैं और कमरे में "डेड ज़ोन" बन जाता है।

आधुनिक वाई-फाई ने इसी समस्या को लाभ में बदलने की तकनीक विकसित की है। कई एंटीना और जटिल संकेत-प्रसंस्करण के जरिए एक ही समय कई डेटा धाराएँ भेजी जा सकती हैं। इसी विचार को एमआईएमओ कहा जाता है। नए मानकों में बीमफॉर्मिंग जैसी तकनीकें भी होती हैं, जिनमें राउटर संकेत ऊर्जा को उपयोगकर्ता की दिशा में अधिक प्रभावी ढंग से भेजने का प्रयास करता है। यही कारण है कि नया राउटर पुराने राउटर से केवल 'ज्यादा शक्तिशाली' नहीं होता; वह रेडियो संकेतों को कहीं अधिक बुद्धिमानी से इस्तेमाल कर सकता है।

वाई-फाई और मोबाइल इंटरनेट का मूल अंतर

अब वाई-फाई और मोबाइल इंटरनेट का वास्तविक अंतर समझते हैं। वाई-फाई में आपका फोन सामान्यतः कुछ मीटर या कुछ दर्जन मीटर दूर स्थित निजी या सार्वजनिक राउटर से जुड़ता है। मोबाइल इंटरनेट में आपका फोन सैकड़ों मीटर या कई किलोमीटर दूर मोबाइल टावर के रेडियो तंत्र से जुड़ सकता है। दोनों रेडियो तरंगों का उपयोग करते हैं, लेकिन नेटवर्क का पैमाना, आवृत्तियाँ, नियंत्रण और गतिशीलता अलग है।

वाई-फाई को घर के निजी प्रवेश-द्वार की तरह समझिए। आपका राउटर आपके घर का छोटा वायरलेस केंद्र है। मोबाइल नेटवर्क को शहर के विशाल सड़क-जाल की तरह समझिए—आप चलते हुए एक टावर के क्षेत्र से दूसरे में जाते रहते हैं और नेटवर्क आपकी कड़ी को एक बेस स्टेशन से दूसरे बेस स्टेशन में सौंपता रहता है।

गतिशीलता, पहचान और स्पेक्ट्रम लाइसेंस का अंतर

मोबाइल नेटवर्क का सबसे बड़ा गुण गतिशीलता है। आप कार में 100 किलोमीटर प्रति घंटा से चल रहे हों, फिर भी 4G या 5G नेटवर्क आपको अलग-अलग बेस स्टेशनों के बीच स्थानांतरित कर सकता है। इसे हैंडओवर कहते हैं। वाई-फाई में आम घर का राउटर इस स्तर की क्षेत्रव्यापी निरंतरता के लिए नहीं बनाया गया है।

वाई-फाई में सामान्यतः उपयोगकर्ता को पासवर्ड से नेटवर्क में प्रवेश मिलता है। मोबाइल नेटवर्क में फोन की पहचान सिम या ई-सिम और नेटवर्क प्रमाणीकरण से होती है। आपका मोबाइल ऑपरेटर जानता है कि कौन-सा ग्राहक किस नेटवर्क सेवा का अधिकृत उपयोगकर्ता है और उसी के अनुसार डेटा सेवा देता है।

दूसरा बड़ा अंतर आवृत्ति का है। वाई-फाई मुख्यतः बिना विशेष व्यक्तिगत लाइसेंस वाली साझा आवृत्तियों पर चलता है, इसलिए आपके पड़ोसी का राउटर, ब्लूटूथ और अनेक दूसरे उपकरण उसी रेडियो क्षेत्र में शोर पैदा कर सकते हैं। मोबाइल ऑपरेटर इसके विपरीत सरकार से लाइसेंस प्राप्त स्पेक्ट्रम खरीदते या आवंटित कराते हैं, इसलिए उनके पास विशेष आवृत्ति-बैंड होते हैं जिन पर वे अपने नेटवर्क का अधिक नियंत्रित संचालन कर सकते हैं। इसी कारण मोबाइल स्पेक्ट्रम की नीलामी अरबों रुपये में होती है, जबकि घर का वाई-फाई चलाने के लिए अलग स्पेक्ट्रम लाइसेंस खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती।

मोबाइल नेटवर्क अलग-अलग आवृत्तियों का उपयोग अलग कामों के लिए कर सकता है। कम आवृत्ति वाले बैंड दूर तक पहुँचते हैं और भवनों के भीतर बेहतर प्रवेश कर सकते हैं। ऊँची आवृत्तियाँ अधिक डेटा क्षमता दे सकती हैं लेकिन छोटी दूरी में अधिक प्रभावी होती हैं। 5G में इसी कारण कम, मध्यम और कुछ क्षेत्रों में बहुत ऊँची आवृत्ति वाले बैंडों का मिश्रण इस्तेमाल किया जाता है। इसलिए 5G का मतलब केवल '4G से तेज' नहीं है; इसके पीछे रेडियो नेटवर्क की पूरी नई संरचना, अधिक क्षमता, कम विलंब और एक ही क्षेत्र में अधिक उपकरण संभालने की क्षमता जुड़ी है।

बिना इंटरनेट के वाई-फाई किस काम का

यदि वाई-फाई इंटरनेट नहीं है तो बिना इंटरनेट के वाई-फाई किस काम का? यदि आपका राउटर इंटरनेट से कटा हुआ है लेकिन फोन और लैपटॉप दोनों उसी वाई-फाई नेटवर्क पर जुड़े हैं, तो वे स्थानीय रूप से एक-दूसरे से संवाद कर सकते हैं। घर का नेटवर्क प्रिंटर, स्थानीय सर्वर, कैमरा या स्मार्ट टीवी काम कर सकता है, इंटरनेट केवल बाहर की दुनिया तक पहुँचने वाला अतिरिक्त मार्ग है।

इसी तरह मोबाइल नेटवर्क में भी रेडियो संपर्क और इंटरनेट दो अलग चरण हैं। आपका फोन टावर से जुड़ा हो सकता है, लेकिन ऑपरेटर के मूल नेटवर्क या इंटरनेट कनेक्शन में समस्या हो तो संकेत की पट्टियाँ दिखाई देने के बावजूद डेटा नहीं चलेगा। संकेत की पट्टियाँ केवल रेडियो लिंक की ताकत बताती हैं; वे यह गारंटी नहीं देतीं कि पूरा इंटरनेट मार्ग ठीक है।

वाई-फाई की स्पीड किन चीजों पर निर्भर करती है

वाई-फाई की गति केवल आपके इंटरनेट प्लान पर निर्भर नहीं करती। मान लें आपने 1 गीगाबिट प्रति सेकंड का फाइबर कनेक्शन लिया है, लेकिन आपका पुराना राउटर केवल 100 या 300 मेगाबिट स्तर पर व्यावहारिक प्रदर्शन देता है—तब इंटरनेट तेज होने के बावजूद फोन को पूरी गति नहीं मिलेगी। इसके विपरीत आपका वाई-फाई लिंक 1 गीगाबिट का हो सकता है, लेकिन इंटरनेट प्लान केवल 100 मेगाबिट का है तो बाहर से आने वाला डेटा 100 के आसपास ही सीमित रहेगा।

इसलिए 'वाई-फाई स्पीड' वास्तव में दो चीजों का न्यूनतम परिणाम होती है। आपके उपकरण और राउटर के बीच वायरलेस लिंक कितना तेज है, और राउटर से इंटरनेट तक का कनेक्शन कितना तेज है। इसके अलावा पड़ोसी नेटवर्क, दीवारें, दूरी, चैनल की भीड़, राउटर की स्थिति, एंटीना, फोन का हार्डवेयर और एक साथ जुड़े उपकरणों की संख्या भी फर्क डालते हैं।

राउटर कहाँ रखें और माइक्रोवेव का असर

राउटर को अलमारी के भीतर रखना खराब क्यों हो सकता है? क्योंकि हर अतिरिक्त पदार्थ रेडियो तरंग का कुछ भाग अवशोषित या परावर्तित कर सकता है। इसलिए राउटर को घर के अपेक्षाकृत केंद्रीय, खुले और थोड़े ऊँचे स्थान पर रखना अक्सर बेहतर परिणाम देता है। उसे धातु की अलमारी, माइक्रोवेव के पास या मोटी कंक्रीट की कई दीवारों के पीछे रखना संकेत को कमजोर कर सकता है।

माइक्रोवेव ओवन 2.4 गीगाहर्ट्ज वाई-फाई को कभी-कभी इसलिए प्रभावित कर सकता है क्योंकि वह लगभग 2.45 गीगाहर्ट्ज के आसपास ऊर्जा इस्तेमाल करता है, जो इस बैंड के बहुत पास है। अच्छा माइक्रोवेव ऊर्जा भीतर ही रोकता है, लेकिन सीमित रिसाव या आसपास का विद्युत शोर कमजोर 2.4 गीगाहर्ट्ज लिंक को प्रभावित कर सकता है। 5 गीगाहर्ट्ज नेटवर्क पर यह समस्या उसी तरह नहीं होती।

वाई-फाई नाम कहाँ से आया

वाई-फाई का नाम कहाँ से आया? यहाँ एक लोकप्रिय भ्रम है कि Wi-Fi का पूरा नाम 'Wireless Fidelity' है। वास्तव में यह आधिकारिक तकनीकी विस्तार नहीं है। "Wi-Fi" एक ब्रांड नाम है जिसे Wi-Fi Alliance ने वायरलेस नेटवर्किंग मानकों को उपभोक्ता-अनुकूल नाम देने के लिए अपनाया। इसकी तकनीकी जड़ IEEE 802.11 मानकों में है।

मोबाइल इंटरनेट में 4G, 5G जैसे नाम पीढ़ियों को बताते हैं, जबकि वाई-फाई में पुराने 802.11 नाम आम उपभोक्ता के लिए कठिन थे। बाद में Wi-Fi Alliance ने Wi-Fi 4, Wi-Fi 5, Wi-Fi 6, Wi-Fi 6E और Wi-Fi 7 जैसे सरल नाम अपनाए। Wi-Fi 6E में 'E' का अर्थ 6 गीगाहर्ट्ज बैंड के विस्तार से जुड़ा है, जबकि Wi-Fi 7 और आगे अधिक चौड़े चैनल, बेहतर बहु-लिंक संचालन और अधिक क्षमता जैसी सुविधाएँ लाते हैं।

गति और सुरक्षा: कौन बेहतर है?

क्या वाई-फाई मोबाइल इंटरनेट से हमेशा तेज होता है? नहीं। घर में तेज फाइबर से जुड़ा नया वाई-फाई बहुत तेज हो सकता है, लेकिन पुराने धीमे ब्रॉडबैंड से जुड़ा वाई-फाई आधुनिक 5G से धीमा हो सकता है। तुलना रेडियो तकनीक और उसके पीछे के इंटरनेट दोनों पर निर्भर करती है।

क्या मोबाइल इंटरनेट हमेशा ज्यादा सुरक्षित है? यह भी इतना सरल नहीं। आधुनिक मोबाइल नेटवर्क और सुरक्षित घरेलू वाई-फाई दोनों मजबूत कूटलेखन व्यवस्था इस्तेमाल कर सकते हैं। समस्या अक्सर खुले सार्वजनिक वाई-फाई में होती है, जहाँ उपयोगकर्ता अज्ञात नेटवर्क से जुड़ता है। HTTPS जैसी आधुनिक वेब कूटलेखन व्यवस्था सार्वजनिक नेटवर्क पर भी वेब डेटा की बड़ी सुरक्षा करती है, फिर भी नकली हॉटस्पॉट, कमजोर पासवर्ड या पुराने सुरक्षा मानक जोखिम बढ़ा सकते हैं। घर के वाई-फाई में वर्तमान WPA2 या बेहतर WPA3 सुरक्षा, मजबूत पासवर्ड और अद्यतन राउटर रखना महत्वपूर्ण है; पुरानी WEP जैसी सुरक्षा अब सुरक्षित नहीं मानी जाती। मोबाइल नेटवर्क में फोन और नेटवर्क के बीच प्रमाणीकरण तथा कूटलेखन होता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि पूरा इंटरनेट ट्रैफिक ऑपरेटर से भी हर जगह छिपा हुआ है। इस्तेमाल किए जाने वाले ऐप और वेबसाइट का HTTPS तथा अन्य एंड-टू-एंड सुरक्षा अलग भूमिका निभाते हैं।

वाई-फाई कितनी दूर तक जा सकता है

वाई-फाई कितनी दूर तक जा सकता है, इसका कोई एक निश्चित उत्तर नहीं है। घर के अंदर सामान्य राउटर कुछ कमरों तक अच्छा काम कर सकता है; खुले मैदान में वही संकेत कहीं अधिक दूर पहुँच सकता है क्योंकि बीच में दीवारें नहीं हैं। विशेष दिशा-निर्देशित एंटीना और उच्च गुणवत्ता वाले उपकरणों से वाई-फाई आधारित रेडियो लिंक कई किलोमीटर तक भी बनाए जा सकते हैं। इसलिए 'वाई-फाई केवल 20 मीटर चलता है' कोई भौतिक सीमा नहीं, वह सामान्य घरेलू उपयोग का मोटा अनुभव है।

घर में मेष वाई-फाई व्यवस्था इसलिए बनाई जाती है कि एक अकेले राउटर की सीमा पर्याप्त न हो तो कई नोड मिलकर घर के अलग हिस्सों में कवरेज दें। साधारण रिपीटर वही संकेत पकड़कर आगे भेजता है और कभी गति में उल्लेखनीय कमी कर सकता है, जबकि मेष प्रणाली कई नोडों को एक समन्वित नेटवर्क की तरह संभालती है और बेहतर मार्ग चुन सकती है। यदि नोडों के बीच तारयुक्त ईथरनेट बैकहॉल हो तो प्रदर्शन और स्थिर हो सकता है।

मोबाइल हॉटस्पॉट कैसे काम करता है

जब आप फोन में 'हॉटस्पॉट' चालू करते हैं, तो फोन एक छोटा वाई-फाई राउटर बन जाता है। आपका लैपटॉप वाई-फाई से फोन से जुड़ता है; फोन आगे 4G या 5G मोबाइल नेटवर्क से इंटरनेट लेता है। यानी एक ही कनेक्शन में दोनों तकनीकें एक साथ काम कर रही होती हैं—लैपटॉप से फोन तक वाई-फाई, और फोन से मोबाइल टावर तक सेलुलर नेटवर्क।

वाई-फाई इस बात की तकनीक है कि आसपास के उपकरण रेडियो के जरिए स्थानीय नेटवर्क से कैसे जुड़ें। मोबाइल इंटरनेट इस बात की विशाल दूरसंचार व्यवस्था है कि चलते-फिरते ग्राहक ऑपरेटर के बेस स्टेशनों, मूल नेटवर्क और इंटरनेट से कैसे जुड़ा रहे। दोनों अंततः उसी वैश्विक इंटरनेट तक पहुँच सकते हैं।

दीवार के पार जाने की क्षमता में भी मोबाइल और वाई-फाई का फर्क आवृत्ति से जुड़ा है। यदि मोबाइल नेटवर्क कम आवृत्ति वाले 700 या 800 मेगाहर्ट्ज जैसे बैंड इस्तेमाल करता है तो उसका संकेत कई भवनों में 5 गीगाहर्ट्ज वाई-फाई की तुलना में बेहतर प्रवेश कर सकता है। यही कारण है कि कुछ जगह घर के भीतर मोबाइल कॉल चलता रहता है जबकि पड़ोसी कमरे का 5 गीगाहर्ट्ज वाई-फाई कमजोर पड़ जाता है। लेकिन शहर के किसी ऊँचे भवन के भीतर यदि कंक्रीट और धातु बहुत अधिक हो तो कम आवृत्ति वाला मोबाइल संकेत भी कमजोर हो सकता है; तब भवन के भीतर विशेष छोटे सेल या वितरित एंटीना प्रणाली लगाई जा सकती है।

सिग्नल की ताकत बनाम नेटवर्क की क्षमता

एक भ्रम है कि 'जितनी ज्यादा पट्टियाँ, उतना तेज इंटरनेट।' जरूरी नहीं। आपके फोन को वाई-फाई राउटर का संकेत बहुत मजबूत मिल सकता है, लेकिन उस समय इंटरनेट सेवा प्रदाता की लाइन धीमी हो सकती है। मोबाइल में भी टावर का संकेत मजबूत हो सकता है, लेकिन उसी सेल में हजारों लोग डेटा चला रहे हों तो गति कम हो सकती है। इसलिए संकेत की ताकत और नेटवर्क की क्षमता अलग बातें हैं।

वाई-फाई में भी यदि सौ लोग एक ही छोटे राउटर पर जुड़े हैं तो रेडियो माध्यम साझा करना पड़ता है तथा हर उपकरण को समय और चैनल का हिस्सा मिलता है। यही कारण है कि होटल, सम्मेलन या रेलवे स्टेशन में "फुल वाई-फाई" दिखाई देने के बावजूद इंटरनेट धीमा हो सकता है। मोबाइल नेटवर्क इसी समस्या को बहुत बड़े स्तर पर संभालता है। एक बेस स्टेशन क्षेत्र को सेक्टरों में बाँट सकता है, कई आवृत्तियों का उपयोग कर सकता है और हजारों उपयोगकर्ताओं के बीच रेडियो संसाधन गतिशील रूप से बाँट सकता है। 5G ने इस क्षमता को और बढ़ाया है।

क्या वाई-फाई तरंगें स्वास्थ्य के लिए खतरनाक हैं?

वाई-फाई गैर-आयनीकरण रेडियो आवृत्ति का उपयोग करता है। इसका मतलब यह है कि इसमें एक्स-रे या गामा किरणों जैसी ऊर्जा नहीं होती जो सीधे रासायनिक बंध तोड़कर डीएनए को आयनीकृत करे। सामान्य नियामकीय सीमा के भीतर वाई-फाई रेडियो आवृत्ति को लेकर उपलब्ध मुख्यधारा सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थाओं ने सामान्य घरेलू उपयोग से स्थापित स्वास्थ्य हानि का प्रमाण नहीं माना है, फिर भी रेडियो उपकरणों के लिए निर्धारित उत्सर्जन मानक लागू होते हैं। यानी वाई-फाई का दीवार के पार जाना इस बात का प्रमाण नहीं कि वह "शरीर के भीतर खतरनाक शक्ति से घुस रहा है"—रेडियो तरंगों का पदार्थ से कुछ हद तक गुजरना उनकी भौतिक प्रकृति का सामान्य परिणाम है।

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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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