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Asian Games की वे कहानियां जिन्हें भुलाया नहीं जा सकता: पीटी उषा के चार स्वर्ण से सरिता के आँसू तक, डोपिंग के तूफान से 107 पदकों वाले भारत तक
Asian Games 2026: एशियाई खेलों का इतिहास सिर्फ पदकों और रिकॉर्डों की कहानी नहीं है। जानिए PT उषा के चार स्वर्ण, सरिता देवी के आंसू, रिकाको इकी के छह गोल्ड और नीरज चोपड़ा जैसे यादगार किस्से।
Asian Games History
Asian Games 2026: एशियाई खेलों का इतिहास केवल इस हिसाब से पढ़ना कि चीन ने कितने स्वर्ण जीते, जापान किस स्थान पर रहा या भारत की पदक संख्या कितनी थी, इस महाद्वीप के सबसे बड़े खेल आयोजन के साथ न्याय नहीं होगा। एशियाड के भीतर ऐसी सैकड़ों कहानियाँ छिपी हैं जिनमें कहीं एक खिलाड़ी ने अकेले लगभग पूरी एथलेटिक्स प्रतियोगिता पर अपना नाम लिख दिया, कहीं एक मुक्केबाज ने रोते हुए अपना पदक प्रतिद्वंद्वी के गले में डाल दिया, कहीं इतने खिलाड़ी डोपिंग में पकड़े गए कि एक पूरे देश की खेल व्यवस्था पर सवाल उठ गए, कहीं उत्तर और दक्षिण कोरिया के खिलाड़ी राजनीतिक दुश्मनी भुलाकर एक झंडे के नीचे स्टेडियम में दाखिल हुए और कहीं नीरज चोपड़ा का भाला इतनी दूर जाकर गिरा कि अधिकारी उसका निशान ही नहीं खोज पाए। कभी किसी 18-19 साल के खिलाड़ी ने एशिया को चौंकाया तो कभी वर्षों से राज कर रहे महान खिलाड़ी ने लगातार तीसरा या चौथा खिताब जीतकर लगभग असंभव रिकॉर्ड बना दिया। पिछले चार दशकों के कुछ एशियाई खेलों को पलटकर देखें तो खेल, राजनीति, विवाद, मानवीय भावनाएँ और रिकॉर्ड एक साथ चलते दिखाई देते हैं।
दिल्ली 1982: जब रंगीन टेलीविजन घरों में आया और एशियाई खेलों की सत्ता जापान से चीन के हाथ चली गई
1982 के दिल्ली एशियाई खेल भारतीय खेल इतिहास के साथ-साथ आधुनिक भारत के सामाजिक और तकनीकी इतिहास का भी बड़ा पड़ाव थे। 19 नवंबर से 4 दिसंबर तक हुए इन खेलों में 33 देशों के 3,411 खिलाड़ियों ने हिस्सा लिया। घुड़सवारी, गोल्फ, हैंडबॉल, रोइंग और महिला हॉकी पहली बार एशियाई खेलों में शामिल हुए। लेकिन इन खेलों की सबसे बड़ी ऐतिहासिक घटना पदक तालिका में हुई। शुरुआती एशियाई खेलों में जापान निर्विवाद महाशक्ति था, लेकिन दिल्ली में चीन ने जापान को हटाकर पदक तालिका में पहला स्थान प्राप्त किया। उसके बाद चीन का जो वर्चस्व शुरू हुआ, वह एशियाड की सबसे स्थायी कहानियों में बदल गया। दिल्ली 1982 वह बिंदु है जहाँ एशियाई खेलों की शक्ति-संरचना बदलती हुई दिखाई देती है। इसी संस्करण से एशियाई खेल नवगठित ओलंपिक काउंसिल ऑफ एशिया के अधीन आयोजित होने लगे।
भारत में इन खेलों की याद केवल स्टेडियम तक सीमित नहीं रही। एशियाड ने दिल्ली का चेहरा बदलने, खेल ढाँचे के विस्तार और रंगीन टेलीविजन प्रसारण के प्रसार में बड़ी भूमिका निभाई। अप्पू नाम का हाथी शुभंकर भारतीय जनमानस में इतना लोकप्रिय हुआ कि खेल समाप्त होने के दशकों बाद भी दिल्ली एशियाड की स्मृति उससे जुड़ी रही। लेकिन चमकदार आयोजन के पीछे विवाद भी कम नहीं थे। आयोजन पर होने वाला विशाल खर्च, निर्माण ठेके, होटल परियोजनाएँ, आयोजन समितियों का राजनीतिकरण और खरीद में कथित अनियमितताएँ उस समय राष्ट्रीय बहस का विषय बनीं। खेल शुरू होने से महीनों पहले ही सवाल पूछा जा रहा था कि विकासशील भारत को इतने महंगे खेल आयोजन की आवश्यकता क्यों है। उस समय की रिपोर्टिंग बताती है कि परियोजना चार अलग-अलग सरकारों के दौर से गुजरी और लागत तथा प्रशासनिक फैसलों को लेकर लगातार विवाद रहा।
सियोल 1986: एक भारतीय महिला ने पूरे एशिया को अपने पीछे दौड़ा दिया
अगर किसी एक भारतीय खिलाड़ी के नाम पर पूरा एशियाड याद किया जा सकता है तो 1986 का सियोल एशियाड पीटी उषा का था। सियोल में 27 देशों के 4,839 खिलाड़ी उतरे थे और प्रतियोगिताओं में 83 एशियाई रिकॉर्ड तथा तीन विश्व रिकॉर्ड टूटे, दो विश्व रिकॉर्ड की बराबरी भी हुई। लेकिन भारत में आज भी सियोल का अर्थ है—पीटी उषा।
उषा ने 200 मीटर, 400 मीटर, 400 मीटर बाधा दौड़ और 4x400 मीटर रिले में स्वर्ण जीता तथा 100 मीटर में रजत हासिल किया। यानी एक खिलाड़ी, पाँच स्पर्धाएँ, चार स्वर्ण और एक रजत। एशियाड जैसे आयोजन में, जहाँ चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसी खेल शक्तियाँ मौजूद थीं, एक भारतीय महिला धावक का ऐसा प्रभुत्व असाधारण था। वह केवल पदक नहीं जीत रही थीं, उस दौर में भारतीय महिला खिलाड़ी की सामाजिक छवि भी बदल रही थीं। दो वर्ष पहले लॉस एंजिलिस ओलंपिक 1984 में उषा 400 मीटर बाधा दौड़ का कांस्य मात्र 0.01 सेकंड से चूक गई थीं। सियोल उनके लिए उस निराशा के बाद लगभग विस्फोटक वापसी थी। ओलंपिक काउंसिल ऑफ एशिया भी उन्हें उस संस्करण की सबसे बड़ी एथलेटिक्स स्टार के रूप में दर्ज करता है।
सियोल में एक और असाधारण रिकॉर्ड जापान के हैमर थ्रो खिलाड़ी शिगेनोबु मुरोफुशी ने बनाया। उन्होंने लगातार पाँचवीं बार एशियाई खेल स्वर्ण जीता। उनका स्वर्ण सिलसिला 1970 से 1986 तक चला। आधुनिक खेलों में जहाँ खिलाड़ी का सर्वोच्च स्तर कुछ वर्षों तक ही टिकता है, वहाँ 16 वर्ष तक एशिया का चैंपियन बने रहना अपने आप में अद्भुत था। इसी एशियाड में दक्षिण कोरिया ने जापान को पदक तालिका में पीछे छोड़कर दूसरा स्थान हासिल किया और संकेत दे दिया कि एशियाई खेलों में अब चीन, दक्षिण कोरिया और जापान की नई त्रिकोणीय शक्ति व्यवस्था बन रही है।
हिरोशिमा 1994: शांति के शहर में खेल हुए, लेकिन डोपिंग ने उत्सव को झकझोर दिया
1994 का हिरोशिमा एशियाड अपने आयोजन स्थल के कारण प्रतीकात्मक था। परमाणु बम की विभीषिका झेल चुके हिरोशिमा में एशिया के खिलाड़ी खेल के माध्यम से शांति और मेल-मिलाप का संदेश लेकर पहुँचे थे। लेकिन खेल समाप्त होते-होते कहानी बिल्कुल दूसरी दिशा में चली गई। चीनी खिलाड़ियों के डोपिंग नमूनों को लेकर ऐसा विवाद उठा जिसने विश्व खेल जगत को हिला दिया।
खेलों के बाद आई रिपोर्टों में 11 चीनी खिलाड़ियों के प्रतिबंधित पदार्थ के परीक्षण में पॉजिटिव पाए जाने की बात सामने आई। इनमें तैराक भी शामिल थे। यह इसलिए और सनसनीखेज था क्योंकि चीन ने तैराकी, विशेषकर महिला वर्ग में असाधारण प्रभुत्व दिखाया था। उस समय उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार परीक्षण में पुरुष हार्मोन टेस्टोस्टेरोन जैसे प्रदर्शन बढ़ाने वाले पदार्थ से जुड़े निष्कर्ष सामने आए। एक ही देश के इतनी बड़ी संख्या में खिलाड़ियों के डोपिंग मामलों ने व्यक्तिगत गलती से आगे बढ़कर इस सवाल को जन्म दिया कि कहीं प्रदर्शन बढ़ाने वाली दवाओं का व्यवस्थित प्रयोग तो नहीं हो रहा। चीन की ओर से व्यापक संस्थागत डोपिंग के आरोपों का विरोध किया गया, लेकिन हिरोशिमा 1994 एशियाई खेल इतिहास के सबसे बड़े डोपिंग विवादों में स्थायी रूप से दर्ज हो गया।
यही वह दौर था जब अंतरराष्ट्रीय खेलों में यह समझ मजबूत होने लगी कि रिकॉर्ड को केवल स्टॉपवॉच, दूरी या वजन से नहीं देखा जा सकता, उसके पीछे निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा की विश्वसनीयता भी उतनी ही जरूरी है। हिरोशिमा का मामला इसीलिए महत्वपूर्ण है—इसने एशियाई खेलों को डोपिंग नियंत्रण की चुनौती के सामने बहुत कठोर तरीके से खड़ा कर दिया।
बैंकॉक 1998: आर्थिक संकट के बीच खेल और मेजबान थाईलैंड का रिकॉर्ड प्रदर्शन
1998 में एशिया गंभीर आर्थिक संकट के असर से जूझ रहा था और उसी माहौल में बैंकॉक ने चौथी बार एशियाई खेलों की मेजबानी की। 41 देशों के लगभग 6,554 खिलाड़ी 36 खेलों की 377 स्पर्धाओं में उतरे। मेजबान थाईलैंड ने 24 स्वर्ण जीतकर अपना नया रिकॉर्ड बनाया और जापान के धावक कोजी इतो को खेलों का सर्वाधिक मूल्यवान खिलाड़ी चुना गया।
लेकिन बैंकॉक की कहानी में खेल से बाहर की राजनीति भी मौजूद थी। सऊदी अरब ने थाईलैंड के साथ चल रहे तथाकथित ‘ब्लू डायमंड’ राजनयिक विवाद की पृष्ठभूमि में भाग नहीं लिया। यह याद दिलाता है कि एशियाई खेल शायद ही कभी महाद्वीप की राजनीति से पूरी तरह अलग रह पाए हैं। देशों के आपसी संबंध, मान्यता के प्रश्न, युद्ध, कूटनीतिक विवाद और बहिष्कार समय-समय पर खेल मैदान तक पहुँचते रहे हैं।
बुसान 2002: जब उत्तर और दक्षिण कोरिया साथ-साथ स्टेडियम में आए
एशियाई खेलों के सबसे भावुक राजनीतिक दृश्यों में से एक 29 सितंबर 2002 को बुसान के उद्घाटन समारोह में दिखाई दिया। उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया तकनीकी रूप से अलग देश, दशकों पुराना संघर्ष, भारी सैन्य तनाव और बीच में दुनिया की सबसे कड़ी सीमाओं में से एक—लेकिन उद्घाटन समारोह में दोनों देशों के खिलाड़ी एक साथ स्टेडियम में आए। उनके आगे किसी एक देश का राष्ट्रीय झंडा नहीं था, बल्कि सफेद पृष्ठभूमि पर नीले रंग में पूरे कोरियाई प्रायद्वीप वाला एकीकरण ध्वज था।
इस प्रतीक को और शक्तिशाली बनाने के लिए दक्षिण कोरिया के माउंट हल्ला और उत्तर कोरिया के माउंट बैकडू में अलग-अलग जलाई गई मशालों को सीमा क्षेत्र इमजिनगाक में मिलाया गया था। उद्घाटन में दोनों ओर के खिलाड़ियों ने साथ प्रवेश किया और दोनों देशों के प्रतिनिधियों ने मिलकर मशाल प्रज्ज्वलित की। उत्तर कोरिया ने अपने इतिहास का उस समय तक का सबसे बड़ा खेल और समर्थन दल दक्षिण कोरिया भेजा। उपलब्ध विवरण के अनुसार पूरे उत्तर कोरियाई दल में खिलाड़ियों, अधिकारियों, समर्थकों और अन्य सदस्यों सहित 673 लोग शामिल थे।
उस समय एक और विचित्र दृश्य था। दक्षिण कोरिया में जिस उत्तर कोरियाई झंडे को सामान्य परिस्थितियों में सार्वजनिक रूप से देखना तक अत्यंत संवेदनशील राजनीतिक मामला था, वही झंडा खेल आयोजन के कारण दिखाई दे रहा था। उत्तर कोरियाई समर्थकों का बड़ा दल भी बुसान पहुँचा और लगभग 300 सदस्यीय चीयर दल स्वयं खेलों का आकर्षण बन गया। खेल कभी-कभी राजनीति को समाप्त नहीं करते, लेकिन कुछ घंटों के लिए यह जरूर दिखा देते हैं कि राजनीति से परे कोई दूसरी तस्वीर भी संभव है। बुसान 2002 उसी तस्वीर के कारण याद किया जाता है।
ग्वांगझोऊ 2010: इतना बड़ा एशियाड पहले कभी नहीं हुआ था
2010 में चीन के ग्वांगझोऊ पहुँचे एशियाई खेल आकार के लिहाज से विशाल हो चुके थे। 45 देशों और क्षेत्रों के 9,704 खिलाड़ियों ने 42 खेलों की 476 स्पर्धाओं में हिस्सा लिया। लगभग 60 हजार स्वयंसेवक और दस हजार से अधिक मीडिया प्रतिनिधि आयोजन से जुड़े थे। उस समय ओलंपिक काउंसिल ऑफ एशिया के नेतृत्व ने इसे अब तक के श्रेष्ठ एशियाई खेलों में गिना।
इन खेलों का सबसे बड़ा चेहरा चीन के लियू शियांग थे। 2004 के ओलंपिक चैंपियन और कभी दुनिया के सबसे तेज 110 मीटर बाधा धावक रहे लियू चोटों और भारी अपेक्षाओं से गुजर चुके थे। ग्वांगझोऊ में पूरा स्टेडियम उन्हें देखने आया और उन्होंने 13.09 सेकंड का नया एशियाई रिकॉर्ड बनाकर लगातार तीसरा एशियाई खेल स्वर्ण जीत लिया। किसी मेजबान सुपरस्टार पर घरेलू दर्शकों की अपेक्षा का कितना दबाव होता है, इसका यह शानदार उदाहरण था।
ग्वांगझोऊ ने एक दूसरी बात भी स्थापित कर दी—एशियाड अब केवल एथलेटिक्स, तैराकी और कुछ पारंपरिक खेलों वाला आयोजन नहीं था। खेलों और स्पर्धाओं की संख्या इतनी बढ़ चुकी थी कि आकार के मामले में यह दुनिया के सबसे विशाल बहु-खेल आयोजनों में शामिल हो गया।
इंचियोन 2014: सरिता देवी के आँसू और पोडियम पर पड़ा कांस्य पदक
भारतीय खेल इतिहास के सबसे दर्दनाक और विवादास्पद दृश्यों में से एक 2014 के इंचियोन एशियाड में आया। भारतीय मुक्केबाज एल. सरिता देवी महिला लाइटवेट सेमीफाइनल में दक्षिण कोरिया की पार्क जी-ना से भिड़ीं। भारतीय पक्ष को विश्वास था कि सरिता ने मुकाबला जीता है, लेकिन तीनों निर्णायकों ने दक्षिण कोरियाई मुक्केबाज के पक्ष में निर्णय दिया। निर्णय घोषित होते ही विवाद खड़ा हो गया। कई पर्यवेक्षकों और भारतीय खेमे ने फैसले पर गंभीर सवाल उठाए।
इसके बाद जो हुआ उसने मुकाबले के परिणाम से भी बड़ी खबर बना दी। पदक समारोह में सरिता रो रही थीं। उन्हें कांस्य पदक दिया गया, लेकिन उन्होंने उसे अपने गले में रखने के बजाय पार्क जी-ना के गले में डाल दिया। पार्क ने पदक लौटाने की कोशिश की। अंततः कांस्य पदक पोडियम पर ही रह गया और सरिता चली गईं। वह तस्वीर—पोडियम पर अकेला पड़ा कांस्य पदक—भारतीय खेल इतिहास की सबसे प्रसिद्ध विरोध तस्वीरों में शामिल हो गई।
विवाद यहीं समाप्त नहीं हुआ। अंतरराष्ट्रीय मुक्केबाजी संस्था ने सरिता के व्यवहार को खेल मर्यादा के विरुद्ध माना और उनके खिलाफ अनुशासनात्मक प्रक्रिया शुरू हुई। उन्हें अस्थायी रूप से निलंबित भी किया गया। भारत सरकार ने बाद में इस मामले को लेकर बैठक और हस्तक्षेप किया। सरिता ने बिना शर्त माफी मांगी और ओलंपिक काउंसिल ऑफ एशिया ने उन्हें कड़ी चेतावनी देकर मामला आगे नहीं बढ़ाया, लेकिन अंतरराष्ट्रीय मुक्केबाजी संस्था की अपनी अनुशासनात्मक कार्रवाई अलग रही।
इस घटना का एक और मार्मिक पहलू था। आधिकारिक विरोध दर्ज कराने के लिए 500 डॉलर की राशि चाहिए थी और उस समय सरिता के समर्थन में आवश्यक रकम जुटाने तक को लेकर अफरा-तफरी हुई। उनके कोच और एक भारतीय पत्रकार को मदद करनी पड़ी। घटना ने केवल निर्णायकों की निष्पक्षता नहीं, बल्कि बड़े अंतरराष्ट्रीय आयोजन में खिलाड़ी के पीछे खड़ी अपनी व्यवस्था की भूमिका पर भी सवाल खड़े किए।
इंचियोन का दूसरा विवाद: जापानी तैराक और चोरी हुआ कैमरा
इंचियोन 2014 का एक बिल्कुल अलग और असामान्य विवाद जापानी तैराक नाओया तोमिता से जुड़ा। उन पर एक दक्षिण कोरियाई पत्रकार का कैमरा चुराने का आरोप लगा और घटना निगरानी कैमरे में दर्ज होने की बात सामने आई। जापानी तैराकी महासंघ ने उन्हें टीम से निकाल दिया। किसी अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी का प्रतियोगिता स्थल पर चोरी के आरोप में इस तरह फँसना अपने आप में इतना असामान्य था कि सरिता विवाद के साथ यह भी इंचियोन की सबसे चर्चित घटनाओं में शामिल हो गया।
जकार्ता-पालेमबांग 2018: 18 वर्ष की तैराक ने छह स्वर्ण जीतकर पूरा एशियाड अपना बना लिया
2018 के एशियाड का सबसे चमकदार व्यक्तिगत प्रदर्शन जापान की युवा तैराक रिकाको इकी का था। वह केवल 18 वर्ष की थीं और उन्होंने छह स्वर्ण तथा दो रजत, यानी कुल आठ पदक जीत लिए। छह स्वर्ण के कारण उन्हें ओलंपिक काउंसिल ऑफ एशिया ने खेलों का सर्वाधिक मूल्यवान खिलाड़ी चुना। किसी युवा महिला तैराक का एक ही एशियाड में छह स्वर्ण जीतना अपने आप में असाधारण था।
इस कहानी को बाद की घटना और भावुक बनाती है। कुछ ही महीनों बाद फरवरी 2019 में इकी को ल्यूकेमिया होने का पता चला। जिस लड़की ने कुछ महीने पहले एशिया के स्विमिंग पूल पर राज किया था, वह अचानक जीवन की सबसे कठिन लड़ाई में पहुँच गई। उन्होंने उपचार कराया और बाद में प्रतिस्पर्धी तैराकी में वापसी की। इसलिए जकार्ता के छह स्वर्ण आज केवल रिकॉर्ड नहीं लगते, वे एक असाधारण खेल जीवन का शिखर और उसके बाद शुरू हुई मानवीय संघर्ष की कहानी भी हैं।
भारत के लिए जकार्ता भी महत्वपूर्ण मोड़ था। भारत ने 69 पदक जीते, जिनमें 15 स्वर्ण थे। यह उस समय भारत का सर्वश्रेष्ठ कुल पदक प्रदर्शन था। लेकिन पाँच वर्ष बाद हांगझोऊ में यही 69 का आँकड़ा बहुत पीछे छूटने वाला था।
जकार्ता में तीरंदाजी का विवाद: स्कोर बदला और सोना चाँदी बन गया
2018 में भारतीय पुरुष कंपाउंड तीरंदाजी टीम दक्षिण कोरिया के खिलाफ फाइनल में थी। मुकाबले के दौरान स्कोर को लेकर ऐसा संशोधन हुआ जिसने भारतीय खेमे को निराश कर दिया। जिस स्थिति में भारत को बढ़त दिखाई दे रही थी, स्कोर की समीक्षा के बाद मुकाबले की तस्वीर बदल गई और दक्षिण कोरिया स्वर्ण विजेता बना, भारत को रजत मिला। इस घटना ने तीरंदाजी में स्कोरिंग और निर्णय प्रक्रिया को लेकर भारतीय खेल प्रेमियों में लंबी बहस पैदा की।
हांगझोऊ 2022, जो वास्तव में 2023 में हुआ: महामारी ने खेलों का कैलेंडर ही बदल दिया
19वें एशियाई खेलों का आधिकारिक नाम हांगझोऊ 2022 है, लेकिन वे सितंबर-अक्टूबर 2023 में खेले गए। कोविड-19 महामारी और चीन की परिस्थितियों के कारण आयोजन एक वर्ष टालना पड़ा। इसीलिए इतिहास में एक विचित्र स्थिति बनी—2022 एशियाई खेलों के पदक वास्तव में 2023 में जीते गए। खेल इतिहास में नाम और वास्तविक आयोजन वर्ष अलग होने का यह दुर्लभ उदाहरण है।
भारत के लिए हांगझोऊ एक ऐसी सीमा पार करने वाला एशियाड बना जिसकी कल्पना कुछ वर्ष पहले कठिन थी। भारत ने 107 पदक—28 स्वर्ण, 38 रजत और 41 कांस्य जीते। इससे पहले भारत का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन जकार्ता 2018 के 70 के आसपास का था। हांगझोऊ में एथलेटिक्स ने 29, निशानेबाजी ने 22 और तीरंदाजी ने नौ पदक दिए। पहली बार भारत ने एशियाई खेलों में 100 पदकों की सीमा पार की।
लेकिन हांगझोऊ केवल 107 के कारण यादगार नहीं था। कई ऐसे क्षण हुए जो किसी फिल्मी पटकथा जैसे लगते हैं।
ज्योति याराजी: कांस्य से रजत तक पहुँचा एक विरोध
महिलाओं की 100 मीटर बाधा दौड़ में भारतीय ज्योति याराजी और चीन की वू यानी से जुड़ा फॉल्स स्टार्ट विवाद पैदा हुआ। शुरुआत में दोनों को लेकर असमंजस रहा, दौड़ जारी हुई और बाद में निर्णय प्रक्रिया ने परिणाम को प्रभावित किया। अंततः वू यानी को अयोग्य घोषित किए जाने के बाद ज्योति का कांस्य पदक रजत में बदल गया। यह उस एशियाड का उदाहरण था जिसमें खिलाड़ी को दौड़ खत्म होने के बाद भी नहीं पता था कि अंतिम पदक कौन सा होगा।
नीरज चोपड़ा का वह भाला जिसे अधिकारी ढूँढ़ नहीं पाए
हांगझोऊ के सबसे विचित्र दृश्यों में नीरज चोपड़ा का पुरुष भाला फेंक फाइनल था। नीरज ने अपना पहला थ्रो किया। भाला स्पष्ट रूप से काफी दूर गिरा, लेकिन तकनीकी अधिकारियों के सामने समस्या आ गई—उस थ्रो को मापा ही नहीं जा सका। तकनीकी गड़बड़ी और दूसरे खिलाड़ी की गतिविधि के बीच भाले के उतरने का सही निशान गायब हो गया। मैदान पर अधिकारी घास में निशान खोजते रहे। आखिर नीरज को दोबारा पहला प्रयास करने के लिए कहा गया। विश्व चैंपियन खिलाड़ी के साथ किसी महाद्वीपीय खेल के फाइनल में ऐसी घटना होना बेहद असामान्य था।
नीरज विचलित हो सकते थे, लेकिन नहीं हुए। मुकाबले में भारत के ही किशोर जेना ने उन्हें जबरदस्त चुनौती दी। जेना ने व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हुए कुछ समय के लिए बढ़त भी बनाई। आखिर नीरज ने 88.88 मीटर फेंककर स्वर्ण जीता और किशोर जेना रजत पदक लेकर लौटे। इस तरह जिस फाइनल की शुरुआत नापे न जा सके भाले से हुई थी, उसका अंत भारत के स्वर्ण-रजत के साथ हुआ।
पारुल चौधरी: आखिरी कुछ मीटर में बदला पदक का रंग
हांगझोऊ में भारत की पारुल चौधरी की 5000 मीटर जीत खेलों की सबसे रोमांचक भारतीय दौड़ों में थी। आखिरी लैप तक जापान की रिरिका हिरोनाका आगे थीं। अंतिम मोड़ तक भी ऐसा लग रहा था कि स्वर्ण जापान के पास जाएगा। लेकिन पारुल ने अंतिम सीधे हिस्से में अपनी बची हुई ऊर्जा लगा दी, हिरोनाका को पीछे छोड़ा और अंतिम क्षणों में स्वर्ण जीत लिया। लंबी दूरी की दौड़ में रणनीति और आखिरी समय तक धैर्य का इससे अच्छा उदाहरण कम मिलता है। पारुल ने उसी एशियाड में 3000 मीटर स्टीपलचेज़ का रजत भी जीता। भारत के 29 एथलेटिक्स पदकों में उनकी भूमिका विशेष रही।
सात्विक-चिराग: बैडमिंटन में वह स्वर्ण जो भारत ने पहले कभी नहीं जीता था
सात्विकसाईराज रंकीरेड्डी और चिराग शेट्टी ने पुरुष युगल बैडमिंटन में स्वर्ण जीतकर भारतीय बैडमिंटन के लिए नया इतिहास बनाया। एशियाई खेलों में बैडमिंटन हमेशा चीन, इंडोनेशिया, जापान, दक्षिण कोरिया और मलेशिया जैसी शक्तियों का क्षेत्र रहा था। इसलिए भारतीय पुरुष जोड़ी का शीर्ष पर पहुँचना केवल एक पदक नहीं था, वह इस बात का संकेत था कि भारत विश्व बैडमिंटन की युगल शक्ति भी बन चुका है।
कबड्डी फाइनल: लगभग एक घंटे रुका खेल और नियमों की व्याख्या पर युद्ध
हांगझोऊ का भारत-ईरान पुरुष कबड्डी फाइनल शायद खेलों का सबसे अव्यवस्थित निर्णायक मुकाबला था। अंतिम मिनटों में भारत के पवन सहरावत की रेड पर अंक किसे मिलना चाहिए, इसे लेकर भारी विवाद हुआ। एक नियम की अलग-अलग व्याख्या, अधिकारियों की चर्चा, दोनों टीमों का विरोध और बार-बार बदलते फैसलों के कारण मुकाबला लगभग एक घंटे तक रुका रहा। खिलाड़ी मैट पर थे, दर्शक प्रतीक्षा कर रहे थे और किसी को स्पष्ट नहीं था कि स्कोर क्या माना जाएगा। अंततः निर्णय भारत के पक्ष में गया और भारत ने स्वर्ण जीता। लेकिन इस फाइनल ने कबड्डी के अंतरराष्ट्रीय नियमों और निर्णय व्यवस्था की स्पष्टता पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए।
पहली बार ई-स्पोर्ट्स में असली पदक
हांगझोऊ ने एशियाई खेलों की परिभाषा को भी बदल दिया। ई-स्पोर्ट्स पहली बार आधिकारिक पदक खेल के रूप में शामिल हुआ। यानी कंप्यूटर और मोबाइल आधारित प्रतिस्पर्धी खेल अब प्रदर्शन प्रतियोगिता नहीं रहे, उनके स्वर्ण, रजत और कांस्य ठीक उसी पदक तालिका में जुड़ने लगे जिसमें एथलेटिक्स, तैराकी, मुक्केबाजी और हॉकी के पदक जुड़ते हैं। यह बदलाव केवल एक नए खेल का प्रवेश नहीं था, बल्कि इस प्रश्न का उत्तर भी था कि 21वीं सदी में आखिर ‘खेल’ किसे माना जाए।
क्रिकेट की वापसी और भारत का पहला एशियाई खेल क्रिकेट स्वर्ण
क्रिकेट 2010 और 2014 के बाद हांगझोऊ में वापस आया और पहली बार भारत ने अपनी पुरुष और महिला दोनों टीमें भेजीं। दोनों ने स्वर्ण जीता। यह अपने आप में दिलचस्प था कि जिस देश में क्रिकेट लगभग राष्ट्रीय जुनून है, उसने एशियाई खेल क्रिकेट में इतने वर्षों बाद प्रवेश किया और पहली भागीदारी में ही दोनों खिताब जीत लिए।
एशियाड की सबसे बड़ी कहानी: जापान से चीन और अब पूरे एशिया तक फैलती शक्ति
इन सारे संस्करणों को एक साथ रखकर देखें तो एशियाई खेलों का एक दूसरा इतिहास सामने आता है। शुरुआती दशकों में जापान महाशक्ति था। 1982 दिल्ली में चीन ने जापान को हटाकर शीर्ष स्थान लिया और उसके बाद चीन का प्रभुत्व एशियाड की स्थायी विशेषता बन गया। 1986 सियोल ने दक्षिण कोरिया के उभार को स्थापित किया। उसके बाद चीन, जापान और दक्षिण कोरिया एशियाई खेलों के केंद्रीय स्तंभ बने रहे।
लेकिन इसी अवधि में भारत की कहानी भी धीरे-धीरे बदली। इंचियोन 2014 में भारत 57 पदकों पर था। जकार्ता 2018 में संख्या बढ़कर 69 हुई और हांगझोऊ में सीधे 107 तक पहुँच गई। सरकारी आँकड़े भी इस उछाल की पुष्टि करते हैं—2014 में 57, 2018 में 69 और हांगझोऊ में 107 पदक।
इससे भी दिलचस्प बात यह है कि भारत की सफलता अब केवल हॉकी, कबड्डी, कुश्ती या कुछ चुनिंदा एथलेटिक्स स्पर्धाओं तक सीमित नहीं रही। निशानेबाजी, तीरंदाजी, बैडमिंटन, घुड़सवारी, क्रिकेट, रोइंग और एथलेटिक्स की कई अलग-अलग स्पर्धाओं से पदक आने लगे। हांगझोऊ के 107 पदक इस विस्तृत आधार का परिणाम थे।
इसलिए एशियाई खेल केवल पदक तालिका नहीं हैं
बीते चार दशक के एशियाड को यदि कुछ तस्वीरों में समेटना हो तो वे अद्भुत होंगी। दिल्ली में अप्पू और रंगीन टेलीविजन, सियोल के ट्रैक पर चार स्वर्ण लेकर दौड़ती पीटी उषा, हिरोशिमा में खेल और शांति के उत्सव पर पड़ा डोपिंग का साया, बुसान में एक ही झंडे के पीछे चलते उत्तर और दक्षिण कोरिया के खिलाड़ी, ग्वांगझोऊ में लगातार तीसरा स्वर्ण जीतते लियू शियांग, इंचियोन के पोडियम पर रोती सरिता देवी और वहीं छूटा कांस्य पदक, जकार्ता के पूल में छह स्वर्ण जीतती 18 साल की रिकाको इकी और हांगझोऊ के मैदान में नीरज चोपड़ा के भाले का निशान खोजते अधिकारी—ये सभी एशियाई खेलों के इतिहास का हिस्सा हैं।
रिकॉर्ड हमें बताते हैं कि कौन सबसे तेज था, कौन सबसे ऊँचा कूदा और किसने सबसे अधिक वजन उठाया, लेकिन विवाद और मानवीय कहानियाँ बताती हैं कि उस रिकॉर्ड तक पहुँचने के पीछे क्या चल रहा था। इसीलिए पीटी उषा के चार स्वर्ण आज भी याद हैं, सरिता देवी का कांस्य भी स्वर्ण पदक जितना चर्चित है और बुसान में उत्तर-दक्षिण कोरिया का साथ चलना किसी पदक तालिका में दर्ज न होने के बावजूद एशियाई खेलों की सबसे बड़ी घटनाओं में शामिल है।
और शायद एशियाड की यही सबसे दिलचस्प विशेषता है। हर चार वर्ष में पदक नए खिलाड़ियों के गले में चले जाते हैं, रिकॉर्ड टूट जाते हैं और तालिकाएँ बदल जाती हैं, लेकिन कुछ दृश्य कभी पुराने नहीं होते। 1986 की पीटी उषा, 1994 का डोपिंग तूफान, 2002 का संयुक्त कोरियाई मार्च, 2014 की सरिता देवी, 2018 की रिकाको इकी और 2023 का नीरज-किशोर मुकाबला उसी जीवित इतिहास के अध्याय हैं। आज आइची-नागोया 2026 में बन रहे नए रिकॉर्ड भी कुछ वर्षों बाद इसी सूची में शामिल होंगे—तब कोई अगली पीढ़ी उन्हें देखकर पूछेगी कि क्या सचमुच एक एशियाड में इतने विश्व रिकॉर्ड टूटे थे और क्या 17-19 साल के खिलाड़ी पूरे एशिया पर इस तरह छा गए थे।


