Asian Games Young Stars: 11 साल में स्वर्ण से 18 साल में छह गोल्ड तक, वे बच्चे जिन्होंने दिग्गजों को हराकर दुनिया चौंका दी

Asian Games Young Stars: एशियाई खेलों में 11 साल के युकी कुरिहारा से लेकर 18 साल की रिकाको इकी तक, जानिए उन कम उम्र के खिलाड़ियों की कहानी जिन्होंने एशियाड में स्वर्ण जीतकर दिग्गजों को चौंकाया।

Yogesh Mishra
Published on: 3 Oct 2026 8:36 PM IST (Updated on: 3 Oct 2026 8:37 PM IST)
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Asian Games Young Stars: कल्पना कीजिए, जिस उम्र में कोई बच्चा प्राथमिक स्कूल में पढ़ रहा हो, होमवर्क और छुट्टियों के बारे में सोच रहा हो, उसी उम्र में वह अपने देश की जर्सी पहनकर एशियाई खेलों के फाइनल में पहुँचे, अपने से दो-तीन गुना उम्र के खिलाड़ियों को हराए और गले में स्वर्ण पदक डालकर पोडियम पर खड़ा हो जाए। यह किसी फिल्म की पटकथा नहीं है। आइची-नागोया 2026 में जापान के युकी कुरिहारा ने केवल 11 वर्ष की उम्र में एशियाई खेलों का स्वर्ण जीतकर इतिहास रच दिया। ओलंपिक काउंसिल ऑफ एशिया ने उन्हें एशियाई खेलों के सभी संस्करणों का सबसे कम उम्र का स्वर्ण पदक विजेता बताया है। ई-स्पोर्ट्स के पुयो पुयो फाइनल में इस 11 वर्षीय बच्चे ने दक्षिण कोरिया के कांग डोंगशिन को 10-2 से हराया। कांग ने पहला सेट जीता था, लेकिन उसके बाद कुरिहारा ने अगले पाँच सेट लगातार जीत लिए, एक सेट गंवाया और फिर पाँच लगातार सेट जीतकर मुकाबला समाप्त कर दिया। जिस उम्र में अधिकांश बच्चे अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता का अर्थ भी पूरी तरह नहीं समझते, उस उम्र में कुरिहारा एशिया का चैंपियन बन चुका था।

लेकिन एशियाई खेलों में कम उम्र के खिलाड़ियों की यह कहानी 2026 से शुरू नहीं हुई है। वास्तव में एशियाड कई दशकों से ऐसी किशोर प्रतिभाओं की प्रयोगशाला रहा है जो अचानक आती हैं, अपने से कहीं अनुभवी खिलाड़ियों को हरा देती हैं और कभी-कभी अगले दो-तीन वर्षों में ओलंपिक तथा विश्व चैंपियन बन जाती हैं। चीन की ये शिवेन 14 वर्ष की उम्र में दो एशियाड स्वर्ण जीतकर आईं और 16 वर्ष में ओलंपिक में विश्व रिकॉर्ड बना दिया, भारत के सौरभ चौधरी ने 16 वर्ष की उम्र में एशियाई खेल स्वर्ण जीतकर देश को चौंकाया, जापान की रिकाको इकी 18 वर्ष में छह स्वर्ण और दो रजत जीतकर पूरे एशियाड की सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी बनीं, चीन की कुआन होंगचान किशोरावस्था में ओलंपिक और एशियाड दोनों की चैंपियन बन गईं और भारत के शार्दुल विहान ने 15 वर्ष की उम्र में निशानेबाजी का एशियाई खेल रजत जीत लिया। इन कहानियों में केवल रिकॉर्ड नहीं हैं, इनके भीतर एक बड़ा सवाल भी छिपा है—इतनी कम उम्र में असाधारण सफलता मिलने के बाद इन खिलाड़ियों की जिंदगी और करियर का क्या हुआ?

युकी कुरिहारा: 11 साल की उम्र में एशियाड चैंपियन, उम्र के सारे पुराने पैमाने टूट गए

आइची-नागोया 2026 ने एशियाई खेलों में किशोर चैंपियन की परिभाषा ही बदल दी। अब तक 13-14 वर्ष के खिलाड़ियों को देखकर हैरानी होती थी, लेकिन जापान के युकी कुरिहारा ने आयु की सीमा सीधे 11 वर्ष तक पहुँचा दी। ओलंपिक काउंसिल ऑफ एशिया के अनुसार वह एशियाई खेलों के इतिहास के सबसे कम उम्र के स्वर्ण पदक विजेता हैं। पुयो पुयो एक तेज मानसिक प्रतिक्रिया, पैटर्न पहचान, रणनीति और लगातार बदलती स्थिति में तत्काल निर्णय लेने वाला ई-स्पोर्ट है। कुरिहारा ने फाइनल में दक्षिण कोरियाई प्रतिद्वंद्वी के खिलाफ शुरुआती सेट गंवाने के बाद जिस तरह मुकाबले को 10-2 में बदल दिया, वह उम्र से कहीं अधिक प्रतियोगी परिपक्वता दिखाता है।

यहाँ एक महत्वपूर्ण फर्क समझना चाहिए। कुरिहारा की उपलब्धि की तुलना सीधे 11 वर्षीय तैराक, धावक या भारोत्तोलक से नहीं की जा सकती, क्योंकि ई-स्पोर्ट्स में शारीरिक परिपक्वता की आवश्यकता पारंपरिक खेलों जैसी नहीं होती। लेकिन एशियाड का स्वर्ण पदक आधिकारिक स्वर्ण है और रिकॉर्ड भी आधिकारिक है। इसलिए अब जब भी एशियाई खेलों के सबसे कम उम्र के चैंपियन की चर्चा होगी, सबसे पहले इसी जापानी बच्चे का नाम आएगा। यह घटना भविष्य में एक नई बहस भी खड़ी कर सकती है—एशियाड में खिलाड़ियों की न्यूनतम उम्र कितनी होनी चाहिए और क्या अलग-अलग खेलों के लिए अलग आयु मानदंड आवश्यक हैं? 2026 में बाल प्रतिभाओं की असाधारण सफलता के बाद यह सवाल अंतरराष्ट्रीय चर्चा का विषय भी बना है।

कुई चेनशी: 13 साल की लड़की स्केटबोर्ड लेकर आई और एशिया जीत लिया

युकी से पहले कम उम्र के एशियाड चैंपियनों की सबसे दिलचस्प कहानियों में चीन की कुई चेनशी थीं। हांगझोऊ में 2023 में खेले गए 2022 एशियाई खेलों में कुई केवल 13 वर्ष की थीं। महिलाओं की स्ट्रीट स्केटबोर्डिंग में उन्होंने 242.62 अंक बनाकर स्वर्ण जीता। उनसे बड़ी और अधिक अनुभवी खिलाड़ी मुकाबले में थीं, लेकिन 13 वर्षीय कुई ने अपनी दूसरी रन में 79.14 अंक हासिल किए और आखिरकार अपनी ही देश की 18 वर्षीय जेंग वेनहुई को 6.01 अंकों से पीछे छोड़ दिया।

उनकी जीत का सबसे दिलचस्प पहलू उनकी रणनीति थी। कुई ने बाद में बताया कि उन्होंने पहली रन जानबूझकर अपेक्षाकृत सुरक्षित रखी ताकि स्कोरबोर्ड पर अंक आ जाएँ और फिर दूसरी रन में कठिन चालों के साथ आक्रमण किया। सोचिए, 13 साल की खिलाड़ी एशियाई खेलों के फाइनल में जोखिम प्रबंधन कर रही थी। उन्होंने स्वयं माना कि अपनी योजना का लगभग 90 प्रतिशत पूरा कर पाईं, हालांकि अंतिम कठिन चाल सफल नहीं हुई। फिर भी स्वर्ण उनका था। उसी प्रतियोगिता में चीन के 16 वर्षीय झांग जिए ने पुरुष स्ट्रीट स्केटबोर्डिंग का स्वर्ण जीता। एक ही दिन चीन के 13 और 16 वर्षीय खिलाड़ियों का एशियाड चैंपियन बनना इस बात का संकेत था कि स्केटबोर्डिंग जैसे नए खेल एशियाई खेलों में विजेताओं की उम्र का पुराना गणित बदल रहे हैं।

ये शिवेन: 14 साल में दो एशियाड स्वर्ण, 16 साल में ओलंपिक विश्व रिकॉर्ड

लेकिन यदि यह जानना हो कि एशियाड से निकली किशोर प्रतिभा दो वर्ष के भीतर दुनिया की सबसे बड़ी खिलाड़ी कैसे बन सकती है तो चीन की ये शिवेन की कहानी शायद सबसे उपयुक्त उदाहरण है। 2010 के ग्वांगझोऊ एशियाई खेलों में वह केवल 14 वर्ष की थीं। यह उनका पहला बड़ा अंतरराष्ट्रीय चैंपियनशिप मंच था और उन्होंने महिलाओं की 200 मीटर तथा 400 मीटर व्यक्तिगत मेडले, दोनों में स्वर्ण जीत लिया।

कहानी यहीं रुक जाती तो भी असाधारण थी, लेकिन इसके बाद जो हुआ उसने उन्हें विश्व तैराकी का सुपरस्टार बना दिया। अगले वर्ष उन्होंने विश्व चैंपियनशिप में 200 मीटर मेडले का विश्व खिताब जीता और 2012 लंदन ओलंपिक में केवल 16 वर्ष की उम्र में दो ओलंपिक स्वर्ण जीत लिए। 400 मीटर व्यक्तिगत मेडले में उन्होंने 4 मिनट 28.43 सेकंड का विश्व रिकॉर्ड बनाया, जबकि 200 मीटर मेडले में 2 मिनट 7.57 सेकंड का एशियाई रिकॉर्ड बनाते हुए ओलंपिक स्वर्ण जीता। विश्व तैराकी महासंघ के आधिकारिक आँकड़े आज भी उनके लंदन 2012 के 400 मीटर मेडले प्रदर्शन को उस समय का विश्व रिकॉर्ड दर्ज करते हैं।

चार वर्ष बाद 2014 इंचियोन एशियाड में उन्होंने दोनों मेडले खिताब बचाए और 4x100 मीटर फ्रीस्टाइल रिले में भी स्वर्ण जीता। यानी 14 साल की बच्ची के रूप में शुरू हुआ एशियाड सफर कुछ ही वर्षों में ओलंपिक और विश्व खिताबों तक पहुँच चुका था। लेकिन ये शिवेन की कहानी का दूसरा हिस्सा उतना सरल नहीं है।

जब किशोर सुपरस्टार अचानक पीछे चली गई

बहुत कम उम्र में विश्व रिकॉर्ड और ओलंपिक स्वर्ण जीतने का अर्थ यह नहीं कि खिलाड़ी अगले दस वर्ष वैसे ही चलता रहेगा। ये शिवेन इसका शानदार उदाहरण हैं। 2016 रियो ओलंपिक में वह 200 मीटर मेडले में आठवें स्थान पर रहीं और टोक्यो ओलंपिक के लिए चीन की टीम में ही जगह नहीं बना पाईं। स्वयं ये ने बाद में स्वीकार किया कि उनके जीवन में एक लंबा दौर ऐसा आया जब वह असमंजस में थीं और खेल छोड़ने तक के बारे में सोच रही थीं।

फिर उन्होंने वापसी की। 2023 हांगझोऊ एशियाड में, अपने पहले एशियाड के 13 वर्ष बाद, उन्होंने 200 मीटर ब्रेस्टस्ट्रोक का स्वर्ण जीता और 200 मीटर मेडले में रजत हासिल किया। 14 वर्ष की उम्र में एशियाड जीतने वाली खिलाड़ी 27 वर्ष की उम्र में फिर उसी मंच पर स्वर्ण जीत रही थी। उनकी पूरी एशियाई खेल यात्रा देखें तो विश्व तैराकी महासंघ के अनुसार उनके नाम एशियाड में छह स्वर्ण और एक रजत हैं।

यह कहानी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि किशोर प्रतिभाओं को लेकर अक्सर एक भ्रम पैदा होता है—आज 14 साल में चैंपियन है तो अगले दस वर्षों तक वही दुनिया पर राज करेगा। शरीर बदलता है, प्रशिक्षण का दबाव बढ़ता है, मानसिक अपेक्षाएँ बदलती हैं और दूसरे खिलाड़ी आगे आते हैं। ये शिवेन ने पहले असाधारण उछाल, फिर गिरावट और अंततः वापसी, तीनों देखीं।

रिकाको इकी: 18 साल, आठ पदक और एक एशियाड पर लगभग अकेली छा गई लड़की

जकार्ता-पालेमबांग 2018 में जापान की रिकाको इकी 18 वर्ष की थीं। तैराकी में उन्होंने ऐसा प्रदर्शन किया कि बाकी खेलों के बड़े-बड़े चैंपियन भी पीछे छूट गए। इकी ने छह स्वर्ण और दो रजत, यानी कुल आठ पदक जीते। उन्हें पूरे एशियाई खेलों का सर्वाधिक मूल्यवान खिलाड़ी चुना गया और वह यह सम्मान पाने वाली पहली महिला खिलाड़ी बनीं। ओलंपिक काउंसिल ऑफ एशिया के आधिकारिक रिकॉर्ड में उनके छह स्वर्ण एक संस्करण में सर्वाधिक स्वर्ण के रिकॉर्ड के रूप में दर्ज हुए, जिसकी बराबरी बाद में हांगझोऊ में चीन की झांग युफेई ने की।

18 वर्ष की उम्र में छह एशियाई खेल स्वर्ण का अर्थ समझना हो तो यह याद रखना चाहिए कि किसी खिलाड़ी को पहले कई स्पर्धाओं के क्वालिफिकेशन और सेमीफाइनल से गुजरना पड़ता है, फिर फाइनल खेलना होता है, इसके बीच रिले होती हैं और शरीर को लगातार कई दिनों तक शीर्ष क्षमता पर रखना पड़ता है। इकी केवल एक दौड़ की चैंपियन नहीं थीं, उन्होंने पूरे तैराकी कार्यक्रम में जापान की सबसे बड़ी ताकत बनकर प्रदर्शन किया।

लेकिन एशियाड के कुछ ही महीने बाद उनकी जिंदगी ने ऐसा मोड़ लिया जिसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी।

छह स्वर्ण के पाँच महीने बाद ल्यूकेमिया

फरवरी 2019 में इकी को ल्यूकेमिया का पता चला। कुछ महीने पहले जो 18 वर्षीय लड़की एशिया की सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी चुनी गई थी, वह अस्पताल में कैंसर का इलाज करा रही थी। उन्होंने लगभग दस महीने अस्पताल में उपचार कराया। ओलंपिक काउंसिल ऑफ एशिया के अनुसार दिसंबर 2019 में जब वह अस्पताल से बाहर आईं तब उन्होंने बताया कि उपचार के दौरान कीमोथेरेपी से मतली और थकान होती थी और कई बार नकारात्मक विचार भी आए, लेकिन वह वापसी का लक्ष्य लेकर चलती रहीं।

एक समय 406 दिन तक वह पूल में नहीं उतरी थीं। मार्च 2020 में उन्होंने इतने लंबे अंतराल के बाद फिर पानी में प्रवेश किया। बाद में उन्होंने जापान की टोक्यो ओलंपिक टीम में जगह बनाई। और कहानी यहीं भी खत्म नहीं हुई। हांगझोऊ एशियाड में 2023 में वह फिर पदक मंच पर पहुँचीं। महिलाओं की 50 मीटर बटरफ्लाई में चीन की झांग युफेई स्वर्ण जीतकर एक एशियाड में इकी के छह स्वर्ण के रिकॉर्ड की बराबरी कर रही थीं और इकी कांस्य जीत रही थीं। पदक समारोह के बाद दोनों एक-दूसरे से लिपटकर रो पड़ीं। झांग ने बीमारी के दौरान इकी का उत्साह बढ़ाया था। ओलंपिक काउंसिल ऑफ एशिया ने उस क्षण को खेल से कहीं आगे जाने वाला मानवीय दृश्य बताया।

इकी ने इसके बाद पेरिस 2024 के लिए भी जापानी टीम में जगह बनाई। इसलिए उनकी कहानी किशोर सुपरस्टार बनने से भी बड़ी है—18 वर्ष में छह एशियाड स्वर्ण, 19 वर्ष में कैंसर, लंबा इलाज और फिर उसी एशियाई खेल मंच पर पदक लेकर वापसी।

कुआन होंगचान: 14 वर्ष की उम्र में ओलंपिक में लगभग परफेक्ट डाइव, 16 में एशियाड स्वर्ण

चीन की कुआन होंगचान उन दुर्लभ खिलाड़ियों में हैं जिनके लिए एशियाई खेल तक पहुँचने से पहले ही दुनिया जान चुकी थी कि कोई असाधारण प्रतिभा आ गई है। टोक्यो ओलंपिक में केवल 14 वर्ष की उम्र में महिलाओं की 10 मीटर प्लेटफॉर्म डाइविंग में उन्होंने ऐसा प्रदर्शन किया जिसमें पाँच में से तीन डाइव पर गणना योग्य पूर्ण 10 मिले। कुल 466.20 अंक के साथ उन्होंने ओलंपिक स्वर्ण जीता। दो डाइव पर सभी सात निर्णायकों ने उन्हें 10 अंक दिए और एक अन्य डाइव पर छह निर्णायकों ने 10 तथा एक ने 9.5 दिया।

हांगझोऊ एशियाड में वह 16 वर्ष की थीं। सामने उनकी अपनी चीनी साथी और तीन बार की विश्व चैंपियन चेन युशी थीं। चार राउंड के बाद कुआन 5.45 अंक पीछे थीं। अब केवल एक डाइव बची थी। किशोर खिलाड़ी के सामने यही वह क्षण होता है जहाँ तकनीक से अधिक मानसिक नियंत्रण काम आता है। कुआन ने अंतिम डाइव लगभग पूर्णता के साथ पूरी की और 438.20 अंकों के साथ केवल 2.55 अंक से स्वर्ण जीत लिया। चेन को 435.65 अंक मिले। इससे पहले दोनों साथ मिलकर 10 मीटर सिंक्रोनाइज्ड डाइविंग का स्वर्ण भी जीत चुकी थीं।

यानी 16 वर्ष की उम्र तक कुआन के पास ओलंपिक स्वर्ण और एशियाई खेलों के दो स्वर्ण थे। यह उस चीनी खेल व्यवस्था की भी कहानी है जो डाइविंग जैसे खेलों में बहुत छोटी उम्र से खिलाड़ियों की पहचान कर उन्हें विश्व स्तर तक तैयार करती रही है।

भारत का 16 वर्षीय सौरभ चौधरी: खेतों के बीच अभ्यास से एशियाड स्वर्ण तक

भारतीय संदर्भ में किशोर एशियाड सितारों की चर्चा सौरभ चौधरी के बिना अधूरी है। जकार्ता 2018 में सौरभ केवल 16 वर्ष के थे और पुरुषों की 10 मीटर एयर पिस्टल में उन्होंने स्वर्ण जीता। उनके सामने जापान के अनुभवी ओलंपिक चैंपियन टोमोयुकी मात्सुदा जैसे निशानेबाज थे, लेकिन भारतीय किशोर ने दबाव नहीं माना। 240.7 अंक बनाकर उन्होंने उस समय एशियाई खेल रिकॉर्ड के साथ स्वर्ण हासिल किया।

सौरभ की पृष्ठभूमि इस जीत को और रोचक बनाती है। उत्तर प्रदेश के मेरठ क्षेत्र के किसान परिवार से आए इस किशोर ने बहुत कम उम्र में निशानेबाजी शुरू की थी। जकार्ता से पहले ही जूनियर स्तर पर वह अपनी क्षमता दिखा चुके थे, लेकिन एशियाड में सीनियर खिलाड़ियों के बीच स्वर्ण ने उन्हें रातोंरात भारतीय खेलों का बड़ा नाम बना दिया। आगे उन्होंने युवा ओलंपिक में भी स्वर्ण जीता, विश्व कप स्तर पर कई पदक और रिकॉर्ड बनाए तथा टोक्यो ओलंपिक तक पहुँचे। लेकिन ओलंपिक में व्यक्तिगत पदक नहीं मिल सका। किशोरावस्था में मिली जबरदस्त सफलता के बाद उनका करियर भी यह दिखाता है कि जूनियर या महाद्वीपीय स्तर की श्रेष्ठता को लगातार विश्व और ओलंपिक सफलता में बदलना कितना कठिन है।

शार्दुल विहान: 15 साल का बच्चा और डबल ट्रैप में एशियाड रजत

उसी जकार्ता एशियाड में भारत के शार्दुल विहान केवल 15 वर्ष के थे। डबल ट्रैप में उन्होंने क्वालिफिकेशन में शीर्ष स्थान हासिल किया और फाइनल में 73 निशाने लगाकर रजत पदक जीता। दक्षिण कोरिया के शिन ह्युनवू उनसे आगे रहे। उस समय भारतीय निशानेबाजी में किशोर खिलाड़ियों की पूरी नई पीढ़ी उभर रही थी—सौरभ चौधरी 16 वर्ष में स्वर्ण जीत रहे थे, शार्दुल 15 में रजत और युवा भारतीय निशानेबाज लगातार स्थापित अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों को चुनौती दे रहे थे।

शार्दुल की कहानी एक दूसरी सच्चाई भी बताती है। हर किशोर पदक विजेता बाद में ओलंपिक सुपरस्टार नहीं बनता। बहुत कम उम्र में अंतरराष्ट्रीय पदक मिलने के बाद प्रशिक्षण व्यवस्था, स्पर्धा का ओलंपिक कार्यक्रम में बने रहना, चोट, चयन, आर्थिक सहायता और खिलाड़ी के शारीरिक विकास जैसी अनेक चीजें भविष्य तय करती हैं। डबल ट्रैप को ओलंपिक कार्यक्रम से हटाए जाने का असर इस स्पर्धा के खिलाड़ियों पर भी पड़ा। इसलिए 15 साल में एशियाड पदक अपने आप अगले दस वर्षों की सफलता की गारंटी नहीं होता।

2026 में भारत की 17 वर्षीय कुमकुम मोहोड ने फिर वही कहानी दोहराई

और अब आइची-नागोया 2026 में भारत को एक नई किशोर सनसनी मिली है—कुमकुम मोहोड। केवल 17 वर्ष की उम्र में उन्होंने महिला व्यक्तिगत रिकर्व तीरंदाजी में स्वर्ण जीतकर वह उपलब्धि हासिल की जो भारतीय तीरंदाजी की पिछली कई पीढ़ियाँ नहीं कर सकी थीं। उन्होंने दक्षिण कोरियाई प्रभुत्व को चुनौती दी और व्यक्तिगत खिताब तक पहुँचीं। उनकी तेज शूटिंग शैली भी चर्चा में रही—रिपोर्टों के अनुसार वह कई बार तीर चढ़ाने के बाद केवल दो-तीन सेकंड में उसे छोड़ देती हैं। उन्होंने विश्व चैंपियन कांग चाए-यंग सहित मजबूत प्रतिद्वंद्वियों को पार किया।

उनकी उपलब्धि इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि दक्षिण कोरिया रिकर्व तीरंदाजी में दशकों से विश्व की सबसे बड़ी शक्ति रहा है। किसी 17 वर्षीय भारतीय खिलाड़ी का उसी मंच पर कोरियाई खिलाड़ियों को हराकर स्वर्ण जीतना केवल एक पदक नहीं, भारतीय रिकर्व तीरंदाजी में पीढ़ी परिवर्तन का संकेत हो सकता है। लेकिन ये शिवेन, रिकाको इकी, सौरभ चौधरी और दूसरे किशोर सितारों का इतिहास हमें सावधान भी करता है—कुमकुम की असली कहानी इस स्वर्ण पर खत्म नहीं हुई है, बल्कि यहीं से शुरू हुई है।

आखिर बच्चे इतनी कम उम्र में एशिया कैसे जीत रहे हैं?

यह प्रश्न स्वाभाविक है कि आज 11, 13, 14, 15 और 16 वर्ष के खिलाड़ी महाद्वीपीय चैंपियन कैसे बन रहे हैं। इसका एक उत्तर खेलों की प्रकृति में छिपा है। तैराकी, डाइविंग, जिम्नास्टिक, स्केटबोर्डिंग और कुछ निशानेबाजी स्पर्धाओं में युवा शरीर के अपने फायदे हो सकते हैं। स्केटबोर्डिंग और ई-स्पोर्ट्स जैसे नए खेलों ने आयु की परंपरागत सीमाएँ और नीचे कर दी हैं। ई-स्पोर्ट्स में 11 वर्षीय कुरिहारा का स्वर्ण इसका चरम उदाहरण है।

दूसरा कारण प्रतिभा पहचान की बदलती व्यवस्था है। चीन, जापान, दक्षिण कोरिया और अब भारत सहित अनेक एशियाई देश बहुत छोटी उम्र में प्रतिभाशाली खिलाड़ियों की पहचान कर उन्हें विशिष्ट प्रशिक्षण देने लगे हैं। खेल विज्ञान, पोषण, मनोवैज्ञानिक सहायता, वीडियो विश्लेषण और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं तक जल्दी पहुँच मिलने से किशोर खिलाड़ी उस अनुभव को 16-17 वर्ष की उम्र तक हासिल कर लेते हैं जिसके लिए पिछली पीढ़ियों को कई वर्ष अधिक लगते थे।

लेकिन इसके साथ एक गंभीर पक्ष भी है। बहुत कम उम्र में सफलता का अर्थ बहुत कम उम्र में राष्ट्रीय अपेक्षाओं का बोझ भी है। 14 वर्ष का खिलाड़ी जब एशियाड चैंपियन बन जाता है तो उससे 16 वर्ष में ओलंपिक स्वर्ण और 18 वर्ष में विश्व रिकॉर्ड की अपेक्षा शुरू हो जाती है। शरीर किशोरावस्था से वयस्क अवस्था में बदलता है, तकनीक में बदलाव आता है, मानसिक दबाव बढ़ता है और सामान्य किशोर जीवन लगभग समाप्त हो सकता है। इसलिए हर कहानी ये शिवेन जैसी ओलंपिक सफलता या रिकाको इकी जैसी असाधारण वापसी तक नहीं पहुँचती।

किशोर चैंपियनों की कहानियाँ हमें एक जरूरी बात बताती हैं

एशियाई खेलों के इन किशोर सितारों को एक साथ रखें तो उनकी कहानियाँ बिल्कुल अलग-अलग दिशाओं में जाती दिखाई देती हैं। ये शिवेन 14 वर्ष में दो एशियाड स्वर्ण जीतती हैं, 16 में दो ओलंपिक स्वर्ण और विश्व रिकॉर्ड बनाती हैं, फिर वर्षों तक संघर्ष करती हैं और 27 वर्ष में दोबारा एशियाड स्वर्ण जीतती हैं। रिकाको इकी 18 वर्ष में छह स्वर्ण और दो रजत लेकर पूरे एशियाड की सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी बनती हैं, कुछ महीनों बाद कैंसर से जूझती हैं और फिर अंतरराष्ट्रीय तैराकी में वापस आती हैं। कुआन होंगचान 14 वर्ष में ओलंपिक डाइविंग में लगभग पूर्णता का प्रदर्शन करती हैं और 16 में एशियाड चैंपियन बनती हैं। सौरभ चौधरी 16 वर्ष में एशियाड जीतकर भारतीय निशानेबाजी के सबसे बड़े युवा नामों में आते हैं, लेकिन ओलंपिक पदक की कठिन मंजिल अभी उनसे दूर रहती है। कुई चेनशी 13 वर्ष में स्केटबोर्डिंग चैंपियन बनती हैं और अब युकी कुरिहारा 11 वर्ष में स्वर्ण जीतकर आयु का लगभग अकल्पनीय रिकॉर्ड बना चुके हैं।

इसलिए एशियाड में किसी बच्चे का स्वर्ण जीतना केवल यह नहीं बताता कि वह कितना प्रतिभाशाली है। असली प्रश्न उसके बाद शुरू होता है—क्या वह प्रतिभा दस वर्ष बाद भी बची रहेगी, क्या उसका शरीर लगातार शीर्ष खेल का दबाव झेल पाएगा, क्या मानसिक अपेक्षाएँ उसे तोड़ेंगी या मजबूत बनाएँगी और क्या उसके देश की व्यवस्था किशोर चैंपियन को सफल वयस्क खिलाड़ी में बदल पाएगी?

11 वर्षीय युकी कुरिहारा से लेकर 18 वर्षीय रिकाको इकी तक इन कहानियों का सबसे आकर्षक पहलू यही है। एशियाड कभी-कभी हमें भविष्य के महान खिलाड़ी वर्षों पहले दिखा देता है, लेकिन यह भविष्य की गारंटी नहीं देता। कोई किशोर एशियाड से निकलकर ओलंपिक विश्व रिकॉर्डधारी बनता है, कोई बीमारी को हराकर दोबारा उसी मंच पर पहुँचता है, कोई अंतरराष्ट्रीय खेल की बदलती परिस्थितियों में पीछे छूट जाता है और कोई अभी इतना छोटा है कि उसकी असली कहानी लिखी ही जानी बाकी है। 2026 में 11 साल के बच्चे को एशिया का चैंपियन बनते देखने के बाद शायद अब एशियाई खेलों में यह पूछना भी बंद करना पड़ेगा कि कोई खिलाड़ी चैंपियन बनने के लिए कितना बड़ा होना चाहिए।

Yogesh Mishra
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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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