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Commonwealth Games 2026: ढाबे में बर्तन धोने वाला लड़का बना कॉमनवेल्थ स्टार, मीराबाई ने भूखे रहकर जीता गोल्ड
Commonwealth Games 2026: कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत के दो वेटलिफ्टर्स की संघर्ष गाथा चर्चा में है। जानिए कैसे गरीबी, भूख और कठिन हालात को हराकर ऋषिकांत सिंह और मीराबाई चानू ने देश का नाम रोशन किया।
Commonwealth Games 2026
Commonwealth Games 2026: कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारतीय वेटलिफ्टर खिलाड़ियों ने एक बार फिर दुनिया को अपनी ताकत और बुलंद हौसलों से परिचित करवाया है। मणिपुर के ऋषिकांत सिंह चानंबम ने गरीबी और मजदूरी से निकलकर रजत पदक जीतकर इतिहास रचा, जबकि मीराबाई चानू ने दो दिन तक भूखे रहकर वजन नियंत्रित किया और फिर लगातार तीसरी बार स्वर्ण पदक जीत कर देश का नाम रोशन किया। ये सफलता सिर्फ मेडल जीतने के लक्ष्य तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संघर्ष, अनुशासन और कभी हार न मानने वाले जज्बे की मिसाल भी बन चुकी है। यही वजह है कि आज उनकी कहानी लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा बन कर लोकप्रियता हासिल कर रही है।
ढाबे में बर्तन धोने वाले लड़के के गले पर सजा कॉमनवेल्थ का सिल्वर
ग्लासगो में रजत पदक जीतने के बाद जब ऋषिकांत सिंह डिनर के लिए पहुंचे तो होटल की रसोई में काम कर रहे कर्मचारियों को देखकर उन्हें अपना अतीत याद आ गया। एक समय ऐसा भी था जब वह मणिपुर के इंफाल के पास सड़क किनारे बने एक ढाबे में बर्तन धोते थे, पानी भरते थे और शाम को निर्माण स्थलों पर मजदूरी करते थे। पूरे दिन की मेहनत के बदले उन्हें सिर्फ 150 रुपये मिलते थे। जिससे परिवार का गुजारा चलता था। आज वही युवा भारत के लिए कॉमनवेल्थ गेम्स का पदक जीतकर करोड़ों लोगों के लिए प्रेरणा बन चुका है।
गरीबी के बीच खेल ने दिखाई नई राह
ऋषिकांत का जीवन तब बदला जब गांव के एक मेले में एक खेल शिक्षक की नजर उन पर पड़ी। महज 12 साल की उम्र में उन्हें खुमान लम्पक स्थित SAI अकादमी में ट्रायल का मौका मिला। वहां उनका चयन बॉक्सिंग और वेटलिफ्टिंग दोनों के लिए हुआ, लेकिन कोच एस. ब्रोजेंद्र सिंह ने उनकी ताकत और क्षमता को देखते हुए वेटलिफ्टिंग चुनने की सलाह दी। यह फैसला आगे चलकर उनके पूरे करियर की दिशा तय करने वाला साबित हुआ।
स्पोर्ट्स हॉस्टल में पहली बार मिली भरपेट रोटी
स्पोर्ट्स अकादमी पहुंचने के बाद ऋषिकांत की जिंदगी में सबसे बड़ा बदलाव यह आया कि उन्हें नियमित भोजन मिलने लगा। आर्थिक तंगी के कारण पहले उन्हें पुराने जूते और बेल्ट बार-बार सिलवाकर इस्तेमाल करने पड़ते थे। इसके बावजूद उन्होंने कभी अभ्यास नहीं छोड़ा। उनके लिए खेल सिर्फ मेडल जीतने का जरिया नहीं था, बल्कि गरीबी से बाहर निकलने का रास्ता भी था।
जब आर्थिक तंगी के कारण छोड़ना पड़ा खेल
18 साल की उम्र में परिवार की खराब आर्थिक स्थिति ने उन्हें वेटलिफ्टिंग से दूर कर दिया। लगभग एक साल तक उन्होंने अभ्यास छोड़ दिया क्योंकि उन्हें लगा कि बिना आर्थिक सहारे खेल में आगे बढ़ना संभव नहीं है। परिवार की जिम्मेदारियों के बीच उन्हें अपना सपना टूटता हुआ नजर आने लगा था।
एक फोन कॉल ने बदल दी पूरी जिंदगी
इसी दौरान मणिपुर वेटलिफ्टिंग एसोसिएशन के तत्कालीन सचिव सुनील इलांगबम का फोन आया। उन्होंने ऋषिकांत को तक्येल स्थित 'वेटलिफ्टिंग सेंटर ऑफ एक्सीलेंस' में ट्रायल देने की सलाह दी। चयन होने के बाद उनका आत्मविश्वास लौट आया। 2019 में वह राष्ट्रीय चैंपियन बने। फिर सामोआ में कॉमनवेल्थ चैंपियनशिप का स्वर्ण पदक जीता और उसी साल भारतीय नौसेना में नौकरी भी मिल गई। आर्थिक सुरक्षा मिलने के बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और अब कॉमनवेल्थ गेम्स में रजत पदक जीतकर मणिपुर के पहले पुरुष वेटलिफ्टर बने जिन्होंने इस प्रतियोगिता में पदक हासिल किया।
सफलता के बाद भी नहीं भूले संघर्ष के दिन
ऋषिकांत सिंह का कहना है कि यह पदक उनके माता-पिता और भाई-बहनों का है, जिन्होंने कठिन समय में भी उनका साथ नहीं छोड़ा। उन्होंने यह भी कहा कि वह सबसे पहले ढाबे पर साथ काम करने वाले अपने पुराने दोस्त को फोन करेंगे। उन्हें उम्मीद है कि जिस ढाबे में उन्होंने कभी बर्तन धोए थे, वहां आज उनके पदक की चर्चा जरूर होगी। उनका सपना अब आर्थिक रूप से कमजोर युवाओं की मदद करना भी है। ताकि कोई भी प्रतिभा सिर्फ पैसों की कमी के कारण पीछे न रह जाए।
मीराबाई चानू ने फिर दिखाया चैंपियन बनने का जज्बा
कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत के लिए पहला स्वर्ण पदक जीतने वाली मीराबाई चानू ने एक बार फिर साबित कर दिया कि मेहनत और अनुशासन का कोई विकल्प नहीं होता। महिलाओं के 48 किलोग्राम वर्ग में उन्होंने स्नैच में 85 किलोग्राम और क्लीन एंड जर्क में 105 किलोग्राम भार उठाकर कुल 190 किलोग्राम वजन के साथ स्वर्ण पदक अपने नाम किया। उनका प्रदर्शन इतना शानदार रहा कि दूसरे स्थान पर रहने वाली खिलाड़ी उनसे 22 किलोग्राम पीछे रह गई।
दो दिन भूखी रहकर भी नहीं टूटा हौसला
वजन वर्ग बनाए रखने के लिए मीराबाई चानू ने लगातार दो दिन तक कुछ नहीं खाया। प्रतियोगिता में उनका पहला स्नैच प्रयास असफल रहा, लेकिन उन्होंने घबराने के बजाय शानदार वापसी की। क्लीन एंड जर्क में भी पहला प्रयास सफल नहीं हुआ, लेकिन दूसरे प्रयास में 105 किलोग्राम वजन उठाकर उन्होंने स्वर्ण पदक लगभग सुनिश्चित कर लिया। इसके बाद एशियाई खेलों की तैयारी को ध्यान में रखते हुए उन्होंने तीसरा प्रयास नहीं किया।
तिरंगे वाली हेयर क्लिप बनी देशभक्ति की पहचान
मीराबाई चानू ने प्रतियोगिता से एक रात पहले भारतीय तिरंगे के रंगों वाले रिबन से खुद तितली के आकार की हेयर क्लिप बनाई थी। उनका कहना था कि वह भारत के लिए कुछ खास करना चाहती थीं। पदक समारोह के दौरान जब तिरंगा सबसे ऊपर लहराया और राष्ट्रगान बजा तो उनकी आंखों से खुशी के आंसू निकल पड़े। उनके लिए यह सिर्फ एक स्वर्ण पदक नहीं, बल्कि देश के सम्मान का गौरान्वित क्षण बन गया था।
उपलब्धियों से भरा है मीराबाई का शानदार करियर
टोक्यो ओलंपिक की रजत पदक विजेता और विश्व चैंपियन रह चुकी मीराबाई चानू के नाम अब कॉमनवेल्थ गेम्स में तीन स्वर्ण और एक रजत पदक दर्ज हो चुके हैं। 2021 एशियाई भारोत्तोलन चैंपियनशिप में बनाया गया उनका क्लीन एंड जर्क का विश्व रिकॉर्ड भी लंबे समय तक कायम रहा। पद्मश्री और मेजर ध्यानचंद खेल रत्न जैसे सम्मान उनके शानदार में शामिल हैं।
भारतीय वेटलिफ्टिंग ने बढ़ाया देश का गौरव
कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारतीय वेटलिफ्टर्स के शानदार प्रदर्शन से भारत की पदक संख्या चार हो गई है। देश के खाते में एक स्वर्ण, दो रजत और एक कांस्य पदक हैं, जिसके साथ भारत पदक तालिका में आठवें स्थान पर पहुंच गया है। इन सफलताओं ने साफ कर दिया है कि भारतीय वेटलिफ्टिंग लगातार नई ऊंचाइयों की ओर बढ़ रही है।


