Cricket Ball Swing Science: क्रिकेट की गेंद हवा में स्विंग कैसे करती है?

Cricket Ball Swing Science: क्रिकेट की गेंद चमड़े की ही क्यों बनाई जाती है? जानिए रबर, प्लास्टिक और कृत्रिम चमड़े की गेंदें अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में विकल्प क्यों नहीं बन पाईं।

Yogesh Mishra
Published on: 17 Oct 2026 7:24 PM IST
Cricket Ball Swing Science Explained in Hindi | Newstrack Hindi News
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Cricket Ball Swing Science Explained in Hindi | Newstrack Hindi News

Cricket Ball Swing Science: क्रिकेट में बल्ला लकड़ी का होता है, मैदान पर घास होती है और गेंद का बाहरी आवरण चमड़े का। समय के साथ बल्ले की बनावट बदली, खिलाड़ियों के सुरक्षा उपकरण बेहतर हुए और मैदानों की तकनीक भी विकसित हुई। लेकिन अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में इस्तेमाल होने वाली पारंपरिक गेंद आज भी चमड़े से ढकी होती है।

आखिर ऐसा क्यों है? क्या चमड़े में कोई खास गुण है, जो रबर, प्लास्टिक या दूसरे कृत्रिम पदार्थों में नहीं मिलता? क्या कभी चमड़े की जगह किसी दूसरे पदार्थ की गेंद बनाने की कोशिश नहीं हुई? और अगर ऐसी गेंदें बनाई गई हैं, तो वे अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में चमड़े की गेंद की जगह क्यों नहीं ले पाईं?

इसका जवाब केवल परंपरा में नहीं, बल्कि गेंद की बनावट, वजन, कठोरता, उछाल, हवा में उसकी गति और पिच पर उसके व्यवहार में छिपा है।

क्रिकेट की गेंद सिर्फ एक गोल वस्तु नहीं है। उसके भीतर का केंद्र, उसके चारों ओर लिपटी सामग्री, बाहरी आवरण और उभरी हुई सिलाई - ये सभी मिलकर तय करते हैं कि गेंद बल्ले से टकराने पर कैसा व्यवहार करेगी, हवा में स्विंग करेगी या नहीं और पिच पर टप्पा खाने के बाद किस दिशा में जा सकती है।

सबसे पहले एक बात समझ लें। क्रिकेट में चमड़े के अलावा किसी दूसरे पदार्थ की गेंद का इस्तेमाल कभी नहीं हुआ, यह धारणा गलत है। रबर, प्लास्टिक, फोम और कृत्रिम चमड़े जैसी सामग्री से बनी गेंदें लंबे समय से अभ्यास और मनोरंजन के लिए इस्तेमाल होती रही हैं। असली सवाल यह है कि इनमें से कोई गेंद अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में इस्तेमाल होने वाली पारंपरिक गेंद का पूरा विकल्प क्यों नहीं बन सकी।

क्रिकेट की गेंद के अंदर क्या होता है?

अक्सर लोग समझते हैं कि क्रिकेट की गेंद में चमड़ा उसकी बाहरी परत होती है। गेंद के भीतर कई दूसरी सामग्रियाँ होती हैं, जो उसे जरूरी वजन, मजबूती और उछाल देती हैं। पारंपरिक क्रिकेट गेंद के केंद्र में आमतौर पर कॉर्क आधारित सामग्री होती है। उसके चारों ओर धागे या ऊन की परतें कसकर लपेटी जाती हैं। कुछ गेंदों में कॉर्क और रबर के मिश्रण का भी इस्तेमाल हो सकता है। इसके बाद बाहर चमड़े के टुकड़े लगाकर उन्हें सिल दिया जाता है।

यानी गेंद के भीतर रबर जैसी दूसरी सामग्री पहले से इस्तेमाल होती रही है। खास बात उसके बाहरी आवरण और पूरी बनावट की है।

वर्ष 2008 में Sports Technology पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन में अलग-अलग निर्माताओं की क्रिकेट गेंदों को खोलकर उनकी आंतरिक संरचना और कठोरता की तुलना की गई थी। शोध में पाया गया कि गेंदों के केंद्र और निर्माण के तरीकों में अंतर हो सकता है। इससे यह भी पता चला कि बाहर से एक जैसी दिखने वाली गेंदों के भौतिक गुण हमेशा समान नहीं होते। इसका मतलब है कि गेंद का व्यवहार केवल इस बात पर निर्भर नहीं करता कि उसका बाहरी आवरण किस पदार्थ का बना है। उसके भीतर इस्तेमाल की गई सामग्री भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

बाहरी आवरण के लिए चमड़ा ही क्यों चुना गया?

चमड़े का सबसे बड़ा फायदा यह है कि उसमें मजबूती और लचीलेपन का अच्छा संतुलन मिलता है। क्रिकेट की गेंद को बार-बार बल्ले, पिच और मैदान से टकराना पड़ता है। उसे इन टक्करों के बावजूद अपना आकार बनाए रखना चाहिए। साथ ही, उसका बाहरी आवरण इतना लचीला भी होना चाहिए कि वह अंदर की संरचना के साथ मिलकर काम कर सके।

अच्छी तरह तैयार किए गए चमड़े को इस तरह काटा और आकार दिया जा सकता है कि उसके टुकड़ों को सिलकर मजबूत, गोल आवरण बनाया जा सके। लेकिन चमड़े का महत्व केवल मजबूती तक सीमित नहीं है। गेंद की सतह और उसकी सिलाई भी खेल में अहम भूमिका निभाती हैं।

गेंद के बीच में बनी उभरी हुई सिलाई को सीम कहा जाता है। गेंदबाज इसे पकड़कर गेंद फेंकते हैं और इसकी दिशा का इस्तेमाल करके गेंद के व्यवहार को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं।

इसके अलावा, खेल के दौरान गेंद की सतह धीरे-धीरे घिसती है। नई गेंद की चमक और पुरानी गेंद की खुरदरी सतह में अंतर होता है। इस बदलाव का असर हवा में गेंद की गति पर भी पड़ सकता है।

क्रिकेट की गेंद में सिलाई इतनी महत्वपूर्ण क्यों होती है?

क्रिकेट की गेंद पर बनी उभरी हुई सिलाई केवल चमड़े के टुकड़ों को जोड़ने के लिए नहीं होती। यह गेंदबाज के लिए भी महत्वपूर्ण है। तेज गेंदबाज गेंद की सीम (सिलाई) को एक खास कोण पर रखकर फेंकने की कोशिश करते हैं। इससे गेंद के आसपास हवा का प्रवाह प्रभावित हो सकता है और गेंद हवा में अपनी दिशा बदल सकती है। इसे स्विंग कहते हैं।

अगर गेंद पिच पर सीम के सहारे टप्पा खाती है, तो उसकी दिशा में अचानक बदलाव भी आ सकता है। इसी वजह से सीम की स्थिति और उसका उभार गेंदबाजी में अहम होते हैं। गेंद की सतह की चिकनाई और खुरदरापन भी हवा के प्रवाह को प्रभावित कर सकते हैं। गेंदबाज अक्सर गेंद के एक हिस्से को चमकदार बनाए रखने की कोशिश करते हैं, जबकि दूसरा हिस्सा खेल के दौरान धीरे-धीरे घिसता जाता है।

वर्ष 2020 में Applied Sciences पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन में क्रिकेट गेंद के आसपास हवा के प्रवाह और स्विंग से जुड़ी परिस्थितियों का विश्लेषण किया गया था। इस तरह के शोध बताते हैं कि गेंद का व्यवहार उसकी सतह, सीम, गति और हवा के साथ उसकी परस्पर क्रिया पर निर्भर करता है।

चमड़े की गेंद हवा में स्विंग कैसे करती है?

जब गेंद हवा में तेजी से आगे बढ़ती है, तो उसके आसपास हवा का प्रवाह बनता है। इस प्रवाह पर गेंद की गति, सीम का कोण, सतह की स्थिति और गेंद के घूमने का असर पड़ता है। अगर गेंदबाज सीम को सही दिशा में रखकर गेंद फेंकता है, तो गेंद के दोनों ओर हवा का प्रवाह अलग-अलग हो सकता है। इससे गेंद पर एक तरफ लगने वाला बल दूसरी तरफ से अलग हो जाता है और गेंद हवा में अपनी दिशा बदल सकती है।

इसी को स्विंग कहा जाता है। लेकिन स्विंग केवल चमड़े की वजह से नहीं होती। अगर किसी दूसरे पदार्थ से बनी गेंद की सतह, सीम और दूसरी भौतिक विशेषताएँ उपयुक्त हों, तो वह भी हवा में मुड़ सकती है।

असली चुनौती यह है कि गेंद अलग-अलग गति, मौसम और इस्तेमाल की परिस्थितियों में कैसा व्यवहार करती है।

पारंपरिक चमड़े की गेंद का व्यवहार खिलाड़ियों को लंबे समय से मालूम है। गेंदबाजों की तकनीक और बल्लेबाजों की तैयारी भी उसी के अनुसार विकसित हुई है। किसी नई सामग्री की गेंद लाने पर उसके व्यवहार में अंतर आ सकता है, जिससे खेल की तकनीक भी प्रभावित होगी।

नई और पुरानी गेंद में इतना अंतर क्यों होता है?

नई गेंद की सतह आम तौर पर चमकदार होती है और उसकी सीम स्पष्ट रहती है। लेकिन मैच आगे बढ़ने के साथ गेंद बार-बार पिच और मैदान से टकराती है। उसकी सतह घिसने लगती है, चमक कम हो सकती है और सीम भी धीरे-धीरे बदलती है।

इन बदलावों का असर गेंद की गति और हवा में उसके व्यवहार पर पड़ सकता है। तेज गेंदबाज पुरानी गेंद से रिवर्स स्विंग कराने की कोशिश करते हैं। इसमें गेंद हवा में उस दिशा के विपरीत स्विंग कर सकती है, जिसकी सामान्य स्विंग से अपेक्षा की जाती है। हालाँकि, रिवर्स स्विंग को केवल गेंद के एक हिस्से को चमकदार और दूसरे को खुरदरा रखने से नहीं समझा जा सकता। गेंद की गति, सीम का कोण, सतह की स्थिति और हवा के प्रवाह जैसे कई कारक मिलकर इसका असर तय करते हैं। इसलिए हर पुरानी गेंद रिवर्स स्विंग नहीं करती।

अगर चमड़े की जगह किसी कृत्रिम पदार्थ की गेंद लाई जाए, तो यह देखना होगा कि इस्तेमाल के दौरान उसकी सतह किस तरह बदलती है। क्या वह धीरे-धीरे घिसती है? क्या उसकी सीम लंबे समय तक बनी रहती है? क्या गेंद पुरानी होने पर भी उसी तरह स्विंग करती है? क्या उसकी पकड़ और उछाल में जरूरत से ज्यादा बदलाव आता है? किसी नई सामग्री को अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में अपनाने से पहले ऐसे सवालों के जवाब जरूरी होंगे।

क्या रबर की गेंद से अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट नहीं खेला जा सकता?

रबर की गेंद से क्रिकेट खेलना बिल्कुल संभव है। कई जगहों पर ऐसी गेंदों का इस्तेमाल अभ्यास और मनोरंजन के लिए किया जाता है। लेकिन सामान्य रबर गेंद का वजन, कठोरता, उछाल और पकड़ पारंपरिक क्रिकेट गेंद से अलग हो सकते हैं।

रबर की एक खासियत यह है कि वह दबाव पड़ने पर विकृत होकर फिर अपने पुराने आकार में लौट सकता है। लेकिन हर तरह का रबर एक जैसा व्यवहार नहीं करता। कुछ रबर गेंदें ज्यादा उछलती हैं, जबकि कुछ अपेक्षाकृत नरम होती हैं। यह उनके निर्माण और इस्तेमाल की गई सामग्री पर निर्भर करता है। अगर रबर की गेंद को अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के लिए तैयार करना हो, तो केवल उसका वजन पारंपरिक गेंद के बराबर रखना पर्याप्त नहीं होगा। यह भी देखना पड़ेगा कि गेंद बल्ले से टकराने पर कितनी ऊर्जा लौटाती है, पिच पर कितनी उछलती है, उसकी सीम गेंदबाजी को किस तरह प्रभावित करती है और इस्तेमाल के दौरान उसके गुण कितने बदलते हैं।

प्लास्टिक और दूसरी कृत्रिम गेंदें क्यों नहीं अपनाई गईं?

प्लास्टिक, फोम और दूसरी कृत्रिम सामग्रियों से बनी गेंदें अभ्यास के लिए पहले से उपलब्ध हैं। बच्चों को क्रिकेट सिखाने, सीमित जगह में खेलने और शुरुआती अभ्यास के लिए इनका इस्तेमाल उपयोगी हो सकता है।

लेकिन प्लास्टिक या सिंथेटिक सामग्री का मतलब किसी एक खास पदार्थ से नहीं है। इस श्रेणी में अलग-अलग वजन, कठोरता और लचीलेपन वाली अनेक सामग्रियाँ आती हैं। कुछ गेंदें हल्की होती हैं। कुछ में कृत्रिम सीम बनाई जाती है, जबकि कुछ को पारंपरिक क्रिकेट गेंद जैसी पकड़ देने की कोशिश की जाती है। लेकिन अभ्यास के लिए उपयोगी गेंद का पाँच दिन के टेस्ट मैच में चमड़े की गेंद जैसा प्रदर्शन करना अलग बात है। एक बड़ी चुनौती गेंद की सतह में होने वाला बदलाव है। अगर कृत्रिम आवरण चमड़े से अलग तरीके से घिसता है, तो पुरानी होने पर गेंद का व्यवहार भी अलग हो सकता है।

क्या भारत में चमड़े के विकल्प वाली गेंद बनाई गई है?

चमड़े के विकल्प के रूप में कृत्रिम चमड़े जैसी सामग्री से गेंद बनाने के प्रयास हुए हैं।

मेरठ की क्रिकेट उपकरण निर्माता कंपनी एसजी ने 'सुपर 50' नामक गेंद बनाई थी। इस गेंद में पारंपरिक चमड़े के बजाय लेदरेट यानी कृत्रिम चमड़े जैसी सामग्री का इस्तेमाल किया गया था। इसे खास तौर पर क्रिकेट अकादमियों और अभ्यास के बाजार को ध्यान में रखकर विकसित किया गया था। इसका उद्देश्य प्रशिक्षण के लिए ऐसी गेंद उपलब्ध कराना था, जो उपयोग के लिहाज से व्यावहारिक हो और खर्च को नियंत्रित करने में मदद करे।

यह उदाहरण बताता है कि चमड़े के विकल्प तलाशने के प्रयास पहले से हो रहे हैं।

क्या क्रिकेट के नियमों में गेंद का चमड़े का होना अनिवार्य है?

अक्सर माना जाता है कि क्रिकेट के नियम स्पष्ट रूप से गेंद को चमड़े का बनाने का आदेश देते हैं। मेरिलबोन क्रिकेट क्लब (MCC) के क्रिकेट नियमों में कानून संख्या चार गेंद से संबंधित है। इसमें पुरुष क्रिकेट की नई गेंद का वजन 155.9 से 163 ग्राम और परिधि 22.4 से 22.9 सेंटीमीटर निर्धारित की गई है। नियमों में गेंद के इस्तेमाल, अंपायरों के नियंत्रण और नई गेंद उपलब्ध कराने से जुड़े प्रावधान भी हैं। लेकिन कानून संख्या चार के सामान्य पाठ में यह स्पष्ट सार्वभौमिक शर्त नहीं है कि हर परिस्थिति में गेंद का बाहरी आवरण केवल प्राकृतिक चमड़े का ही होना चाहिए।

इसका यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि कोई भी प्लास्टिक या रबर की गेंद अंतरराष्ट्रीय मैच में इस्तेमाल की जा सकती है। किसी प्रतियोगिता में गेंद का चयन संबंधित खेल परिस्थितियों, स्वीकृति की शर्तों और आयोजन के नियमों के अनुसार होता है।

क्या चमड़े की गेंद ज्यादा खतरनाक होती है?

क्रिकेट की पारंपरिक गेंद कठोर और अपेक्षाकृत भारी होती है। तेज गति से फेंके जाने पर इससे गंभीर चोट लग सकती है। इसी वजह से प्रतिस्पर्धी क्रिकेट में हेलमेट, पैड, दस्ताने और दूसरे सुरक्षा उपकरण महत्वपूर्ण हैं।

लेकिन चोट का जोखिम केवल इस बात से तय नहीं होता कि गेंद का बाहरी आवरण चमड़े का है या नहीं।

गेंद का वजन, कठोरता, गति और शरीर के किस हिस्से पर टक्कर लगती है, ये सभी बातें चोट की गंभीरता को प्रभावित करती हैं। शुरुआती खिलाड़ियों के लिए नरम प्रशिक्षण गेंद उपयोगी हो सकती है। लेकिन सभी कृत्रिम गेंदें सुरक्षित हों, यह जरूरी नहीं है। अगर किसी कृत्रिम गेंद को कठोर और भारी बनाया गया है, तो उससे भी गंभीर चोट लग सकती है। इसलिए बच्चों और शुरुआती खिलाड़ियों के लिए गेंद चुनते समय उसकी सामग्री के साथ-साथ वजन, कठोरता और इस्तेमाल का उद्देश्य भी देखना चाहिए।

लाल, सफेद और गुलाबी गेंद में क्या अंतर होता है?

क्रिकेट में लाल, सफेद और गुलाबी गेंदों का इस्तेमाल अलग-अलग परिस्थितियों में किया जाता है। लाल गेंद पारंपरिक रूप से टेस्ट क्रिकेट में इस्तेमाल होती है। सफेद गेंद सीमित ओवरों के क्रिकेट में व्यापक रूप से इस्तेमाल की जाती है, जबकि गुलाबी गेंद का उपयोग दिन-रात्रि टेस्ट मैचों में होता है। इन रंगों का एक प्रमुख उद्देश्य अलग-अलग रोशनी और पृष्ठभूमि में गेंद को आसानी से दिखाई देने योग्य बनाना है।

लेकिन इन गेंदों में अंतर केवल रंग का नहीं होता। उन्हें तैयार करने में इस्तेमाल की जाने वाली रंगाई, सतह की फिनिश और पॉलिश में भी अंतर हो सकता है। इससे उनकी चमक और घिसने का व्यवहार प्रभावित हो सकता है। हालाँकि, किसी गेंद का अधिक स्विंग करना केवल उसके लाल, सफेद या गुलाबी होने पर निर्भर नहीं करता। गेंद की बनावट, सीम, सतह, गति, मौसम और इस्तेमाल की अवधि भी महत्वपूर्ण हैं।

ड्यूक्स, कूकाबुरा और एसजी की गेंदों में क्या अंतर होता है?

अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में ड्यूक्स, कूकाबुरा और एसजी जैसे निर्माताओं की गेंदें इस्तेमाल की जाती हैं। इन गेंदों में चमड़े की तैयारी, सिलाई, सीम की बनावट, भीतरी संरचना और सतह की फिनिश में अंतर हो सकता है। इसी कारण अलग-अलग गेंदों के व्यवहार को लेकर खिलाड़ियों के अनुभव भी अलग होते हैं। लेकिन किसी एक ब्रांड को हर परिस्थिति में सबसे ज्यादा स्विंग कराने वाला या सबसे ज्यादा टिकाऊ घोषित करना उचित नहीं होगा। गेंद का वास्तविक व्यवहार कई बातों पर निर्भर करता है। इनमें उसका निर्माण, मौसम, पिच, गेंदबाज की गति और गेंद की उम्र शामिल हैं।

वर्ष 2008 में प्रकाशित गेंद निर्माण संबंधी अध्ययन में भी अलग-अलग मॉडलों की कठोरता और आंतरिक संरचना में अंतर पाया गया था। इससे एक बात स्पष्ट होती है: चमड़े की सभी गेंदें भी पूरी तरह एक जैसी नहीं होतीं। इसलिए केवल बाहरी सामग्री देखकर उनके प्रदर्शन का पूरा अनुमान नहीं लगाया जा सकता।

क्या भविष्य में चमड़े की जगह कोई दूसरा पदार्थ ले सकता है?

तकनीकी रूप से इसकी संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। आधुनिक सामग्री विज्ञान की मदद से ऐसे कृत्रिम पदार्थ विकसित किए जा सकते हैं, जिनकी कठोरता, लचीलापन, घर्षण और सतह की बनावट को जरूरत के अनुसार तैयार किया जा सके। लेकिन किसी नई सामग्री से बनी गेंद को अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में अपनाने से पहले कई तरह के परीक्षण करने होंगे।

यह देखना होगा कि गेंद हवा में किस तरह चलती है और कितना स्विंग करती है; पिच पर टप्पा खाने के बाद कैसा उछाल देती है; बल्ले से टकराने पर कैसा व्यवहार करती है; उसकी सीम कितनी प्रभावी रहती है; लंबे समय तक इस्तेमाल के बाद उसका आकार और सतह कैसी रहती है; अलग-अलग गेंदों के प्रदर्शन में कितनी एकरूपता रहती है।

आखिरी बात भी बहुत महत्वपूर्ण है। अगर एक ही मॉडल की दो गेंदें अलग-अलग व्यवहार करें, तो खेल की निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है। इसके अलावा, पर्यावरण पर पड़ने वाले असर को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। प्राकृतिक चमड़े के उत्पादन में पशुपालन, पानी और चमड़ा प्रसंस्करण में इस्तेमाल होने वाले रसायनों से जुड़े पर्यावरणीय प्रभाव हो सकते हैं। दूसरी ओर, कुछ कृत्रिम सामग्रियाँ पेट्रोलियम से बनती हैं और उनके निर्माण तथा निपटान की अपनी समस्याएँ होती हैं। इसलिए किसी सामग्री को केवल प्राकृतिक या कृत्रिम होने के आधार पर पर्यावरण के लिए बेहतर नहीं कहा जा सकता। इसके लिए उसके उत्पादन से लेकर इस्तेमाल और निपटान तक के पूरे जीवनचक्र की तुलना करनी होगी।

आखिरकार, क्रिकेट की गेंद चमड़े की इसलिए नहीं है कि कोई दूसरा पदार्थ गोल गेंद नहीं बना सकता। वह इसलिए चमड़े की बनी रही, क्योंकि गेंदबाजी, बल्लेबाजी और गेंद के पुरानी होने से जुड़ी खेल की तकनीकें लंबे समय से इसी तरह की गेंद के व्यवहार के अनुरूप विकसित हुई हैं।

भविष्य में गेंद की सामग्री बदल सकती है, लेकिन अगर उसके व्यवहार में बड़ा बदलाव आया, तो क्रिकेट खेलने और समझने का तरीका भी कुछ हद तक बदल सकता है।

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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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