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FIFA World Cup 2010: फीफा वर्ल्ड कप 2010, अफ्रीका का पहला विश्वकप और स्पेन का स्वर्ण युग
FIFA World Cup 2010: 2010 फीफा वर्ल्ड कप पहली बार अफ्रीका की धरती दक्षिण अफ्रीका में आयोजित हुआ। एंड्रेस इनिएस्ता के अतिरिक्त समय में किए गए निर्णायक गोल से स्पेन ने नीदरलैंड्स को हराकर अपना पहला विश्व कप जीता।
FIFA World Cup 2010: 2006 का जर्मनी विश्वकप खत्म हुआ तो लगा फुटबॉल एक पूरे युग को विदा कर रहा है। ज़िदान जा चुके थे। रोनाल्डो, रोनाल्डिन्हो, फिगो, बेकहम जैसे नाम करियर के आख़िरी पड़ाव पर थे। पर खेल कभी खाली जगह नहीं छोड़ता। जब एक पीढ़ी विदा होती है तब दूसरी उसी वक्त आकार ले रही होती है। 2006 से 2010 के बीच क्लब फुटबॉल में दो युवा खिलाड़ी तेज़ी से उभरे। एक बार्सिलोना के लिए खेल रहा था जबकि दूसरा मैनचेस्टर यूनाइटेड और फिर रियल मैड्रिड के लिए। शैली अलग थी। व्यक्तित्व अलग था पर हुनर दोनों में असाधारण था। नाम थे - लियोनेल मेसी और क्रिस्टियानो रोनाल्डो। दक्षिण अफ्रीका पहुंचते वक्त वे दुनिया के सबसे बड़े सितारे बन चुके थे पर विश्वकप अभी भी उनके लिए एक अधूरी कहानी था।
जब विश्वकप पहली बार अफ्रीका पहुंचा
2010 का विश्वकप अपने आप में इतिहास था। पहली बार यह अफ्रीका की धरती पर खेला जा रहा था। सिर्फ खेल आयोजन नहीं था बल्कि एक पूरे महाद्वीप की स्वीकृति थी। दशकों तक अफ्रीका ने दुनिया को बेहतरीन खिलाड़ी दिए थे पर सबसे बड़ा मंच कभी उसकी ज़मीन पर नहीं आया था। दक्षिण अफ्रीका को मेज़बानी मिलना पूरे महाद्वीप के लिए गर्व की बात बन गई। टूर्नामेंट का आधिकारिक गीत "वाका वाका", जिसे शकीरा ने गाया, दुनिया भर में छा गया।
इस आयोजन का गहरा राजनीतिक मतलब भी था। दक्षिण अफ्रीका ने दशकों तक रंगभेद की पीड़ा सही थी और नेल्सन मंडेला के नेतृत्व में लोकतंत्र आने के बाद देश अपनी नई पहचान बना रहा था। फाइनल के दौरान 91 साल के मंडेला ख़राब सेहत के बावजूद व्हीलचेयर पर मैदान पर आए और पूरी दुनिया खड़े होकर उनका स्वागत करती रही। यह उनकी आख़िरी सार्वजनिक मौजूदगियों में एक थी।
उद्घाटन समारोह में हज़ारों "वुवुजेला" की तीखी आवाज़ ने बता दिया कि यह विश्वकप पहले जैसा नहीं होगा। एडिडास की "जाबुलानी" गेंद को लेकर भी काफी विवाद हुआ। हवा में अनपेक्षित ढंग से दिशा बदलने के कारण गोलकीपर और स्ट्राइकर दोनों ने इसकी आलोचना की।
स्पेन: सितारों की टीम नहीं, एक सोच
टूर्नामेंट में दावेदारों की लंबी फेहरिस्त थी। ब्राज़ील के पास काका, अर्जेंटीना के पास मेसी और कोच माराडोना, पुर्तगाल के पास रोनाल्डो, जर्मनी के पास नई पीढ़ी। पर सबसे संतुलित टीम मानी जा रही थी स्पेन। उरुग्वे ने भी कमाल किया। स्टार स्ट्राइकर डिएगो फोर्लान ने लंबी दूरी के जादुई गोलों से सबको चौंकाया और टूर्नामेंट का "गोल्डन बॉल" जीता।
स्पेन के पास सिर्फ अच्छे खिलाड़ी नहीं थे बल्कि एक दर्शन था। गेंद पर नियंत्रण रखो, विरोधी को दौड़ने दो, छोटे पास खेलो, खाली जगह खोजो, और मौका मिलते ही वार करो। इसे दुनिया ने "टिकी-टाका" नाम दिया। चावी, इनिएस्ता, ज़ाबी अलोंसो, डेविड विया, पुयोल, कैसियास, यह टीम सितारों का जमावड़ा नहीं थी बल्कि एक सुव्यवस्थित मशीन थी।
फिर भी शुरुआत झटके से हुई। स्विट्ज़रलैंड ने उन्हें 1-0 से हरा दिया। दुनिया चौंक गई। लगा फिर वही पुरानी कहानी दोहराई जाएगी। शानदार टीम बनाना और विश्वकप में नाकाम होना। पर यह स्पेन अलग था, घबराया नहीं, धीरे-धीरे लय में लौटा और फिर लगातार जीतता गया।
अर्जेंटीना और पुर्तगाल: हुनर था, पर टीम पूरी नहीं थी
अर्जेंटीना का सफर दिलचस्प रहा। कोच माराडोना का जुनून और मेसी का हुनर टीम को आकर्षक बनाता था पर मेसी गोल नहीं कर पा रहे थे। मौके बनाते, खेल चलाते, पर वह निर्णायक असर नहीं छोड़ पा रहे थे जिसकी उम्मीद थी।
क्वार्टर फाइनल में जर्मनी का सामना हुआ और जर्मनी ने फुटबॉल का एक सबसे ज़ोरदार प्रदर्शन दिया तथा 4-0 से अर्जेंटीना को रौंद दिया। मेसी निराश थे, माराडोना स्तब्ध। अर्जेंटीना का सफर खत्म हो गया।
पुर्तगाल भी उम्मीद के मुताबिक नहीं चल सका। रोनाल्डो हुनरमंद थे पर टीम इतनी मज़बूत नहीं थी कि विश्वकप जीत सके। एक बार फिर साबित हुआ कि अकेले खिलाड़ी की महानता टीम की महानता के बराबर नहीं होती।
सुआरेज़ का हाथ और घाना का टूटा सपना
इसी दौर में घाना और उरुग्वे का मैच फुटबॉल इतिहास का सबसे नाटकीय मुकाबला बना। आख़िरी सेकंड में उरुग्वे के लुइस सुआरेज़ ने गोल लाइन पर गेंद हाथ से रोक दी, लाल कार्ड मिला, पर घाना पेनाल्टी चूक गया। अफ्रीका का पहली बार सेमीफाइनल तक पहुंचने का सपना वहीं टूट गया।
जर्मनी की नई पीढ़ी, और गोल-लाइन तकनीक की शुरुआत
नॉकआउट दौर में जर्मनी का खेल कमाल का था, इंग्लैंड को हराया, फिर अर्जेंटीना को कुचला। मेसुत ओज़िल, थॉमस मुलर, श्वाइनस्टाइगर, फिलिप लाम, यह युवा टीम भविष्य की झलक दिखा रही थी। इंग्लैंड के खिलाफ मैच में फ्रैंक लैम्पार्ड का साफ गोल रेफरी ने नहीं माना, इस बड़ी चूक के बाद ही फीफा को आगे "गोल-लाइन तकनीक" लानी पड़ी।
पर सेमीफाइनल में स्पेन ने जर्मनी को रोक दिया, पुयोल के हेडर ने स्पेन को पहली बार फाइनल में पहुंचा दिया। दूसरे सेमीफाइनल में नीदरलैंड्स ने उरुग्वे को हराया। फाइनल तय हुआ, स्पेन बनाम नीदरलैंड्स, दो ऐसी टीमें जिन्होंने पहले कभी विश्वकप नहीं जीता था।
फाइनल: तनाव, पीले कार्ड, और इनिएस्ता का जादू
11 जुलाई 2010, जोहान्सबर्ग का सॉकर सिटी स्टेडियम। पूरा अफ्रीका सांस रोके देख रहा था। नीदरलैंड्स ने शारीरिक खेल अपनाया, स्पेन ने गेंद अपने पास रखी। रेफरी हॉवर्ड वेब को रिकॉर्ड 14 पीले कार्ड और एक लाल कार्ड दिखाना पड़ा। निगेल डी जोंग की जाबी अलोंसो की छाती पर मारी गई किक आज भी फाइनल इतिहास का सबसे हिंसक फाउल मानी जाती है। गोलकीपर इकर कैसियास ने अर्जेन रोबेन का एक तय गोल अपने पैर से बचाया।
गोल नहीं हुआ, नियमित समय खत्म, अतिरिक्त समय शुरू हुआ, पेनाल्टी शूटआउट की संभावना बढ़ती जा रही थी। फिर 116वें मिनट में वह पल आया, फाब्रेगास से गेंद मिली, इनिएस्ता आगे बढ़े, शॉट लगाया, गोल। पूरा स्टेडियम गूंज उठा, स्पेन 1-0 आगे। गोल के बाद इनिएस्ता ने जर्सी उठाकर अपने दिवंगत दोस्त दानी जार्के को याद किया, अंदर की शर्ट पर लिखा था, "दानी जार्के हमेशा हमारे साथ हैं।"
स्पेन का स्वर्ण युग शिखर पर
कुछ मिनट बाद आख़िरी सीटी बजी, स्पेन पहली बार चैंपियन बना। यह सिर्फ एक मैच की जीत नहीं थी, एक सोच की जीत थी, सालों की योजना और सामूहिक समझ का नतीजा। स्पेन ने 2008 में यूरो जीता था, अब 2010 का विश्वकप, और आगे 2012 का यूरो भी जीतने वाला था, ऐसी निरंतरता बहुत कम राष्ट्रीय टीमों ने हासिल की है।
आगे जो होने वाला था
2010 का विश्वकप कई वजहों से खास है, अफ्रीका का पहला विश्वकप, स्पेन के स्वर्ण युग का शिखर, और मेसी-रोनाल्डो के विश्वकप सफर का शुरुआती अध्याय। यह उस नई दुनिया का संकेत भी था जिसमें क्लब के सुपरस्टारों को राष्ट्रीय टीम के मंच पर खुद को फिर साबित करना था।
पर अगला विश्वकप और भी नाटकीय होने वाला था। विश्वकप ब्राज़ील लौटेगा, फुटबॉल के सबसे भावुक देश में। नेमार उभरेंगे, जर्मनी अपनी सबसे महान टीमों में एक लेकर आएगा, और दुनिया एक ऐसा सेमीफाइनल देखेगी जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी, ऐसा स्कोर जिसे फुटबॉल इतिहास कभी नहीं भूल पाएगा।


