Ferenc Puskas Biography: हंगरी का वह महान फुटबॉलर जिसने गोल करने के रिकॉर्ड बना दिए

Ferenc Puskas Biography in Hindi: विश्व फुटबॉल के इतिहास में यदि उन खिलाड़ियों की सूची बनाई जाए जिन्होंने खेल की दिशा बदल दी, तो उसमें कुछ नाम अनिवार्य रूप से शामिल होंगे।

Yogesh Mishra
Published on: 3 July 2026 4:55 PM IST
Fifa World Cup 2026 Ferenc Puskas Biography
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Fifa World Cup 2026 Ferenc Puskas Biography

Ferenc Puskas Biography in Hindi: विश्व फुटबॉल के इतिहास में यदि उन खिलाड़ियों की सूची बनाई जाए जिन्होंने खेल की दिशा बदल दी, तो उसमें कुछ नाम अनिवार्य रूप से शामिल होंगे। पेले, माराडोना, क्रुइफ़, बेकेनबाउर और उनके साथ एक नाम और खड़ा दिखाई देगा - फेरेंक पुस्कास। आधुनिक पीढ़ी के बहुत से दर्शक उन्हें केवल फीफा के उस प्रतिष्ठित पुरस्कार के नाम से जानते हैं जो वर्ष के सबसे सुंदर गोल के लिए दिया जाता है, लेकिन वास्तविकता यह है कि पुस्कास केवल महान गोलस्कोरर नहीं थे। वे उस युग के सबसे प्रभावशाली खिलाड़ियों में से एक थे, जब फुटबॉल आज की तरह वैश्विक उद्योग नहीं, बल्कि राष्ट्रीय गौरव और सामूहिक पहचान का माध्यम था।

फुटबॉल इतिहास में कुछ खिलाड़ियों की महानता उनके द्वारा जीती गई ट्रॉफियों से मापी जाती है, लेकिन कुछ खिलाड़ियों की महानता उनके द्वारा छोड़े गए प्रभाव से। पुस्कास दूसरी श्रेणी में आते हैं। उन्होंने ऐसे समय में खेला जब यूरोप द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद नए राजनीतिक और सामाजिक समीकरणों से गुजर रहा था। उनके खेल ने एक छोटे देश हंगरी को विश्व फुटबॉल की महाशक्ति बना दिया। उनकी टीम को “मैजिकल मैज्यार्स” कहा गया और लंबे समय तक दुनिया उन्हें लगभग अजेय मानती रही।

साधारण परिवार से निकला असाधारण प्रतिभा का धनी बालक

फेरेंक पुरचेल्ड बिर्ओ का जन्म 1 अप्रैल 1927 को हंगरी की राजधानी बुडापेस्ट के निकट किश्पेस्ट क्षेत्र में हुआ। बाद में परिवार ने अपना उपनाम बदलकर पुस्कास कर लिया। उनके पिता स्वयं फुटबॉल खिलाड़ी और कोच थे। इस कारण फुटबॉल उनके जीवन का स्वाभाविक हिस्सा था। बचपन से ही गेंद उनके हाथों और पैरों में रहती थी। वे घंटों अभ्यास करते, स्थानीय मैदानों में खेलते और अपने पिता से खेल की बारीकियां सीखते। हंगेरियाई भाषा में 'पुस्कास' शब्द का अर्थ होता है - "बंदूकधारी"। बचपन में उनके पास असली फुटबॉल खरीदने के पैसे नहीं होते थे, इसलिए वे फटे-पुराने कपड़ों और मोज़ों को बटोरकर बनाई गई 'कतरनों की गेंद' से घंटों गलियों में गोल दागने का अभ्यास किया करते थे।

उनकी प्रारंभिक शिक्षा सामान्य स्कूलों में हुई, लेकिन शीघ्र ही स्पष्ट हो गया कि उनका भविष्य फुटबॉल में है। उस समय यूरोप के अधिकांश देशों में खेल और शिक्षा के बीच संतुलन बनाना कठिन था। पुस्कास ने भी कम आयु में ही खेल को प्राथमिकता देना शुरू कर दिया। किशोरावस्था में वे स्थानीय क्लब प्रणाली का हिस्सा बन चुके थे। पुस्कास ने अपनी उम्र छिपाकर मात्र १२ वर्ष की आयु में किश्पेस्ट क्लब की जूनियर टीम के साथ एक फर्जी नाम 'मिकलोस कोवाच' के तहत अपना पहला आधिकारिक अनुबंध साइन किया था, क्योंकि उस दौर में १२ वर्ष से कम के बच्चों का पंजीकरण प्रतिबंधित था।

किश्पेस्ट से 'गैलोपिंग मेजर' बनने तक का सफर

उनकी पेशेवर यात्रा बुडापेस्ट होन्वेड से शुरू हुई। यह वही क्लब था जिसने आगे चलकर हंगरी की राष्ट्रीय टीम की रीढ़ तैयार की। पुस्कास की प्रतिभा इतनी स्पष्ट थी कि कम आयु में ही उन्हें वरिष्ठ स्तर पर अवसर मिलने लगे। वे बाएं पैर से खेलने वाले खिलाड़ी थे और उनका नियंत्रण, दृष्टि तथा शॉट लगाने की क्षमता असाधारण थी। बहुत जल्दी यह समझ में आ गया कि यह खिलाड़ी साधारण नहीं है। हंगरी की सेना द्वारा होनवेड क्लब का अधिग्रहण किए जाने के बाद सभी खिलाड़ियों को सैन्य रैंक दी गई थी, जिसमें पुस्कास को 'मेजर' का सर्वोच्च पद मिला था। इसी कारण पूरे विश्व फुटबॉल में उन्हें 'द गैलोपिंग मेजर' के अमर नाम से पुकारा जाने लगा।

पुस्कास की सबसे बड़ी विशेषता केवल गोल करना नहीं थी। वे गोल बनाने की कला भी जानते थे। आधुनिक फुटबॉल की भाषा में कहें तो वे स्ट्राइकर, प्लेमेकर और कप्तान, तीनों भूमिकाओं को निभा सकते थे। उनके पास असाधारण खेल-बुद्धि थी। वे यह समझते थे कि विरोधी रक्षा की कमजोरी कहां है और उसे किस प्रकार भेदा जा सकता है।

'मैजिकल मैज्यार्स' और दुनिया पर हंगरी का स्वर्णिम राज

1950 का दशक उनके करियर का स्वर्णिम काल था। यही वह समय था जब हंगरी की राष्ट्रीय टीम विश्व फुटबॉल की सबसे भयावह शक्ति बन गई। इस टीम में पुस्कास के अलावा कई असाधारण खिलाड़ी थे, लेकिन उसकी आत्मा पुस्कास ही थे। टीम की खेल शैली अपने समय से बहुत आगे थी। गेंद पर नियंत्रण, तीव्र पासिंग, स्थान परिवर्तन और सामूहिक आक्रमण, ये सभी तत्व बाद में आधुनिक फुटबॉल के महत्वपूर्ण आधार बने। पुस्कास के जादुई नेतृत्व में हंगरी की राष्ट्रीय टीम ने मई 1950 से जून 1954 के बीच लगातार रिकॉर्ड 31 अंतरराष्ट्रीय मैचों तक अजेय रहने का एक ऐसा कीर्तिमान स्थापित किया था, जो उस सदी के खेल इतिहास में एक अभूतपूर्व रिकॉर्ड था।

वेम्बली की ऐतिहासिक जीत, जिसने इंग्लैंड का भ्रम तोड़ दिया

1952 के हेलसिंकी ओलंपिक में हंगरी ने स्वर्ण पदक जीता। यह केवल एक टूर्नामेंट विजय नहीं थी। यह दुनिया को दिया गया संदेश था कि हंगरी विश्व फुटबॉल का नया केंद्र बन चुका है। इसके बाद 1953 में वह ऐतिहासिक मैच आया जिसने पूरे यूरोप को हिला दिया। हंगरी ने लंदन के वेम्बली स्टेडियम में इंग्लैंड को 6-3 से पराजित किया। यह पहली बार था जब इंग्लैंड अपनी धरती पर किसी गैर-ब्रिटिश टीम से हारा था। २५ नवंबर १९५३ के उस वेम्बली के मुकाबले को 'शताब्दी का मैच' कहा जाता है। उस मैच में पुस्कास ने जब इंग्लैंड के कप्तान बिली राइट को अपने प्रसिद्ध 'ड्रैग-बैक' (गेंद को पैर के तलवे से पीछे खींचना) मूव से छकाया तो बिली राइट हवा में ऐसे फिसले जैसे कोई 'गलत दिशा में जा रही दमकल गाड़ी' हो। इसके बाद बुडापेस्ट में हुए रिटर्न मैच में हंगरी ने इंग्लैंड को ७-१ से रौंद दिया था।

उस मैच में पुस्कास का प्रदर्शन आज भी फुटबॉल इतिहास का हिस्सा माना जाता है। उनका एक गोल विशेष रूप से प्रसिद्ध है, जिसमें उन्होंने रक्षक को अद्भुत कौशल से छकाकर गेंद को जाल में पहुंचाया। कई विशेषज्ञों का मानना है कि वह गोल फुटबॉल तकनीक के विकास में एक मील का पत्थर था। इंग्लैंड, जो स्वयं को खेल का जन्मदाता मानता था, अचानक समझ गया कि दुनिया का फुटबॉल उससे आगे निकल चुका है।

1954 विश्वकप : सबसे दर्दनाक हार जिसने पुस्कास को अमर बना दिया

1954 का विश्वकप पुस्कास के जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि भी बन सकता था और सबसे बड़ी पीड़ा भी। स्विट्जरलैंड में आयोजित उस टूर्नामेंट में हंगरी को प्रबल दावेदार माना जा रहा था। टीम ने पूरे टूर्नामेंट में अद्भुत प्रदर्शन किया। समूह चरण में पश्चिम जर्मनी को 8-3 से हराया गया। ऐसा लग रहा था कि विश्वकप अब केवल औपचारिकता भर है।

लेकिन खेल हमेशा पूर्वानुमानों का सम्मान नहीं करता। फाइनल में एक बार फिर पश्चिम जर्मनी सामने था। हंगरी शुरुआती बढ़त ले चुका था। दुनिया को परिणाम तय लग रहा था। लेकिन जर्मनी ने वापसी की। हंगरी हार गया। और पुस्कास विश्वकप ट्रॉफी से वंचित रह गए। यह मैच आज “मिरेकल ऑफ बर्न” के नाम से जाना जाता है। फुटबॉल इतिहास में बहुत कम हार ऐसी हुई हैं जिन्होंने विजेता और पराजित दोनों को अमर बना दिया हो। 1954 का फाइनल उन्हीं में से एक है। पुस्कास ने शानदार खेला, लेकिन विश्वकप उनके हाथों से फिसल गया। यह उनके जीवन का सबसे बड़ा अधूरा सपना बन गया। १९५४ के उस फाइनल मुकाबले में पुस्कास एंकल की गंभीर चोट के बावजूद दर्द निवारक पट्टियाँ बांधकर मैदान पर उतरे थे। मैच के ठीक ८६वें मिनट में पुस्कास ने बराबरी का गोल दाग दिया था, लेकिन लाइंसमैन ने उसे एक बेहद विवादास्पद फैसले के तहत 'ऑफसाइड' करार दे दिया। इसके बावजूद पुस्कास को उस विश्वकप का सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी चुनकर 'गोल्डन बॉल' से नवाजा गया था।

निर्वासन, संघर्ष और ऐतिहासिक पुनर्जन्म

इसके बाद राजनीतिक परिस्थितियों ने उनके जीवन को नया मोड़ दिया। 1956 में हंगरी में सोवियत प्रभाव के विरुद्ध विद्रोह हुआ। देश में अस्थिरता बढ़ी और पुस्कास विदेश में रह गए। लंबे समय तक वे प्रतिस्पर्धी फुटबॉल से दूर रहे। उनका वजन बढ़ गया। आलोचकों ने कहना शुरू कर दिया कि उनका करियर समाप्त हो चुका है।

लेकिन महान खिलाड़ी कठिन परिस्थितियों में ही अपनी वास्तविक शक्ति दिखाते हैं। जब अधिकांश लोग उन्हें भुलाने लगे थे, तब पुस्कास ने अपने जीवन का दूसरा महान अध्याय लिखा। वे स्पेन पहुंचे। और वहां उनका संबंध रियल मैड्रिड से हुआ। उस समय रियल मैड्रिड पहले से ही यूरोप की सबसे बड़ी टीमों में शामिल था। क्लब में अल्फ्रेडो स्टीफानो जैसे महान खिलाड़ी मौजूद थे। कई लोगों को संदेह था कि उम्रदराज और अधिक वजन वाले पुस्कास यहां सफल हो पाएंगे या नहीं। लेकिन उन्होंने सभी आलोचनाओं को गलत साबित कर दिया। वर्ष 1958 में जब ३१ वर्षीय पुस्कास रियल मैड्रिड में शामिल हुए, तो उनका वजन सामान्य से करीब १८ पाउंड अधिक था। इसके बावजूद उन्होंने रियल मैड्रिड के लिए १८० मैचों में अविश्वसनीय १५६ गोल दागे, ४ बार स्पेनिश 'पिचिची' (शीर्ष स्कोरर) ट्रॉफी जीती और क्लब को लगातार ३ यूरोपीय कप जिताए।

रियल मैड्रिड का स्वर्णिम अध्याय और गोलों की नई परिभाषा

रियल मैड्रिड में उन्होंने गोलों की ऐसी बरसात की कि पूरी दुनिया फिर से चकित रह गई। उन्होंने स्पेनिश लीग में असाधारण रिकॉर्ड बनाए। यूरोपीय कप में उनका प्रदर्शन शानदार रहा। 1960 के यूरोपीय कप फाइनल में उन्होंने चार गोल किए। आज भी वह प्रदर्शन क्लब फुटबॉल के इतिहास में सबसे महान व्यक्तिगत प्रदर्शनों में गिना जाता है। आइंट्राख्त फ्रैंकफर्ट के खिलाफ ग्लास्गो में हुए १९६० के उस ऐतिहासिक यूरोपीय कप फाइनल (रियल मैड्रिड की ७-३ से जीत) में पुस्कास ने अकेले ४ गोल दागे थे। यूरोपीय कप/चैंपियंस लीग के फाइनल इतिहास में आज तक किसी भी खिलाड़ी द्वारा एक मैच में चार गोल करने का यह सर्वकालिक रिकॉर्ड अटूट है।

खेल की सोच बदलने वाले खिलाड़ी

उनकी खेल शैली समय के साथ विकसित हुई। युवावस्था में वे गति और कौशल पर निर्भर थे। बाद के वर्षों में उन्होंने अनुभव, स्थिति-निर्धारण और निर्णय क्षमता को अपना हथियार बना लिया। यही कारण था कि वे बढ़ती आयु में भी प्रभावी बने रहे।

आर्थिक दृष्टि से उनका युग आधुनिक फुटबॉल से बहुत अलग था। आज के खिलाड़ियों की तरह अरबों डॉलर के अनुबंध नहीं थे। फिर भी वे यूरोप के सबसे प्रसिद्ध खिलाड़ियों में शामिल थे। उनकी लोकप्रियता हंगरी से लेकर स्पेन और पूरे महाद्वीप में फैली हुई थी। बाद के वर्षों में उनका नाम फुटबॉल की वैश्विक विरासत का हिस्सा बन गया। अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल महासंघ के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, फेरेंक पुस्कास ने अपने पूरे करियर के कुल 754 आधिकारिक मैचों में रिकॉर्ड 746 गोल दागे हैं। वे २०वीं सदी के इतिहास में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ८४ मैचों में ८४ गोल करने वाले दुनिया के सबसे घातक स्ट्राइकर माने जाते हैं।

संघर्ष, अनुशासन और निजी जीवन

उनका निजी जीवन अपेक्षाकृत स्थिर रहा। उन्होंने कठिन राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों का सामना किया, लेकिन परिवार उनके जीवन का महत्वपूर्ण आधार बना रहा। निर्वासन जैसी स्थिति, देश से दूरी और करियर की अनिश्चितताओं के बावजूद उन्होंने स्वयं को संभाले रखा।

खान-पान और फिटनेस के संदर्भ में उनकी कहानी रोचक है। करियर के मध्य चरण में बढ़े हुए वजन के कारण उनकी आलोचना हुई। लेकिन उन्होंने अनुशासन और प्रशिक्षण के बल पर वापसी की। यह वापसी इस बात का प्रमाण थी कि मानसिक दृढ़ता कई बार शारीरिक सीमाओं पर भी विजय प्राप्त कर लेती है।

संन्यास के बाद उन्होंने कोचिंग और फुटबॉल विकास में योगदान दिया। विभिन्न देशों में कार्य किया और अपने अनुभव को नई पीढ़ी तक पहुंचाया। जीवन के अंतिम वर्षों में उन्हें स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों का सामना करना पड़ा, लेकिन फुटबॉल जगत का सम्मान कभी कम नहीं हुआ। कोच के रूप में भी पुस्कास ने अपनी रणनीतिक बुद्धिमत्ता साबित की थी। उन्होंने वर्ष १९७१ में ग्रीस के क्लब पैनाथिनाइकोस को अपनी जादुई कोचिंग के दम पर यूरोपीय कप के ऐतिहासिक फाइनल तक पहुँचाया था, जो ग्रीक फुटबॉल इतिहास की आज तक की सबसे बड़ी क्लब उपलब्धि है।

'पुस्कास अवार्ड' : एक खिलाड़ी जो स्वयं पुरस्कार बन गया

2006 में उनके निधन के बाद फीफा ने वर्ष के सर्वश्रेष्ठ गोल के लिए दिए जाने वाले पुरस्कार को उनके नाम से जोड़ दिया। यह सम्मान केवल एक खिलाड़ी के लिए नहीं था; यह उस कलाकार के लिए था जिसने गोल करने को एक सुंदर कला में बदल दिया। वर्ष २००९ में फीफा ने आधिकारिक तौर पर 'फीफा पुस्कास अवार्ड' की स्थापना की थी। इसके अलावा, हंगरी की सरकार ने उनके सम्मान में बुडापेस्ट के राष्ट्रीय स्टेडियम का नाम बदलकर आधिकारिक तौर पर 'फेरेंक पुस्कास स्टेडियम' कर दिया है।

यदि प्लातिनी रणनीतिक जादूगर थे, यदि क्रुइफ़ फुटबॉल के दार्शनिक और यदि बेकेनबाउर उसके सम्राट थे, तो फेरेंक पुस्कास गोल करने की कला के महान वैज्ञानिक थे। उन्होंने यह सिद्ध किया कि प्रतिभा, नेतृत्व और दृढ़ता मिलकर एक खिलाड़ी को युगों से परे पहुंचा सकती है।

फुटबॉल इतिहास में अनेक महान गोलस्कोरर हुए हैं, लेकिन बहुत कम ऐसे हुए हैं जिनके नाम पर पूरी दुनिया का सबसे प्रतिष्ठित गोल पुरस्कार रखा गया हो। यह सम्मान बताता है कि पुस्कास केवल एक महान खिलाड़ी नहीं थे; वे गोल की अवधारणा का पर्याय बन चुके थे।

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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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