Gerd Muller Biography: ‘डेर बॉम्बर’ जिसने गोल करने के रिकॉर्ड से दुनिया को चौंका दिया

Gerd Muller Biography in Hindi: जानिए जर्मनी के महान स्ट्राइकर ‘डेर बॉम्बर’ गेर्ड मुलर की कहानी, उनके Bayern Munich करियर, 1974 World Cup, Ballon d'Or और ऐतिहासिक गोल रिकॉर्ड के बारे में।

Yogesh Mishra
Published on: 3 July 2026 6:43 PM IST
Gerd Muller Biography: ‘डेर बॉम्बर’ जिसने गोल करने के रिकॉर्ड से दुनिया को चौंका दिया
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Gerd Muller Biography in Hindi: फुटबॉल के महान खिलाड़ियों की बात हो तो अक्सर वही नाम याद आते हैं जिन्होंने ड्रिब्लिंग से दिल जीते या मैदान के एक छोर से दूसरे तक गेंद लेकर भागे। पर फुटबॉल का इतिहास सिर्फ कलाकारों का नहीं है, उन खिलाड़ियों का भी है जिनका एक ही हुनर था, गोल करना। गेर्ड मुलर इसी श्रेणी के सबसे बड़े नाम हैं।

पेले फुटबॉल के सम्राट थे। क्रुइफ़ खेल के दार्शनिक। बेकेनबाउर उसके सेनापति। तो, गेर्ड मुलर गोल करने की मशीन थे। जर्मनी में उन्हें 'डेर बॉम्बर' यानी बमवर्षक कहा जाता था। यह नाम उनके खेल का सटीक चित्र था। वे मैदान पर आते और विरोधी डिफेंस पर गोलों की बारिश कर देते। बहुत कम खिलाड़ी ऐसे होते हैं जिनके बारे में यह यकीन हो कि पेनाल्टी बॉक्स में एक पल का मौका भी मिल जाए तो गेंद जाल में जाएगी ही। मुलर उन्हीं दुर्लभ नामों में थे।

जब बुनकर की नौकरी करते हुए शाम को फुटबॉल खेलते थे

गेर्हार्ड 'गेर्ड' मुलर का जन्म 3 नवंबर 1945 को जर्मनी के नॉर्डलिंगेन में हुआ। यह वही दौर था जब दूसरा विश्वयुद्ध बस खत्म हुआ था और जर्मनी अपने सबसे कठिन समय से गुज़र रहा था। परिवार बहुत गरीब था। 16 साल की उम्र में पिता गुज़र गए और मुलर को परिवार चलाने के लिए कपड़ा कारखाने में बुनकर का काम करना पड़ा। वे दिन में मेहनत करते और शाम को स्थानीय क्लब टीएसवी नॉर्डलिंगेन के लिए फुटबॉल खेलते।

एक नाटा और मोटा लड़का

किशोरावस्था में देखकर कोई अंदाज़ा नहीं लगा सकता था कि यह लड़का आगे दुनिया का सबसे घातक स्ट्राइकर बनेगा। शरीर पारंपरिक फुटबॉल हीरो जैसा नहीं था। वे ज़्यादा लंबे नहीं थे और बदन भारी था। 1964 में जब वे बायर्न म्यूनिख पहुंचे तो कोच ज़्लैटको काइकोवस्की ने उनके शरीर का मज़ाक उड़ाते हुए कहा था, -"मैं इस वेटलिफ्टर या नाटे मोटे लड़के का अपनी टीम में क्या करूं?" वे उन्हें प्यार से 'शॉर्ट फैट मुलर' भी कहते थे।

पर फुटबॉल बार-बार यह साबित करता है कि हुनर शरीर के आकार से नहीं नापा जाता। मुलर के पास जो था वह बहुत दुर्लभ था। उन्हें पता होता था गेंद कहां गिरेगी, कब गोलकीपर गलती करेगा, और सबसे ज़रूरी बात, मौके को गोल में बदलना उनका स्वभाव था।

बायर्न में गोलों की बाढ़

1964 में वे बायर्न म्यूनिख से जुड़े। उस वक्त बायर्न आज जैसा दिग्गज क्लब नहीं था, बस उभर रहा था। पर मुलर, बेकेनबाउर और सीप मायर जैसे खिलाड़ियों ने मिलकर उसे यूरोप की सबसे ताक़तवर टीम बना दिया। बायर्न के लिए 15 सीज़न में मुलर ने 607 मैच खेले और अविश्वसनीय 566 गोल किए। वे आज भी बुंडेसलीगा के इतिहास में 365 गोलों के साथ सर्वकालिक टॉप स्कोरर हैं। ये ऐसा रिकॉर्ड है जिसे तोड़ना नामुमकिन माना जाता है।

उनकी शैली देखने में कभी-कभी सादी लगती थी। वे गारिंशा जैसे जादूगर नहीं थे और क्रुइफ़ जैसे दार्शनिक भी नहीं। पर जब मैच खत्म होता तब स्कोरशीट पर उनका नाम हमेशा दिखता था। वे सुंदरता की भाषा नहीं बोलते थे बल्कि असर की भाषा बोलते थे।

जब गोलमुख ही उनकी दुनिया थी

मुलर के बारे में मशहूर बात कही जाती है कि अगर गेंद पेनाल्टी बॉक्स में भटक रही हो तो दुनिया का सबसे खतरनाक इंसान गेर्ड मुलर होता था। उनकी प्रतिक्रिया गज़ब की थी और वे असंतुलित स्थिति में भी गोल कर सकते थे। कई बार लगता था कि वे खुद नहीं जानते कैसे गेंद जाल में पहुंची पर नतीजा हमेशा उनके पक्ष में होता।

उनका शरीर ही उनकी सबसे बड़ी ताक़त था। उनका गुरुत्वाकर्षण केंद्र बहुत नीचे था और जांघें असाधारण रूप से मज़बूत थीं। इस बनावट की वजह से वे पेनाल्टी बॉक्स की तंग जगह में बिजली की रफ़्तार से 360 डिग्री घूमकर शॉट मार सकते थे।

1970: मेक्सिको में दस गोल का तूफान

1960-70 का दशक जर्मन फुटबॉल का सुनहरा दौर था और उस दौर के बीचोंबीच मुलर थे। राष्ट्रीय टीम के लिए भी उनका खेल क्लब जैसा ही असरदार था। 1970 के विश्वकप में उन्होंने दस गोल किए और पूरी दुनिया का ध्यान खींच लिया। मेक्सिको की ऊंचाई पर खेले गए उस टूर्नामेंट में वे लगातार दो मैचों में, बुल्गारिया और पेरू के खिलाफ, दो हैट्रिक लगाकर तहलका मचा गए। दस गोलों के साथ उन्हें गोल्डन बूट मिला।

1972 में पश्चिम जर्मनी ने यूरोपीय चैम्पियनशिप जीती और मुलर ने इसमें निर्णायक भूमिका निभाई। यह साबित करते हुए कि वे सिर्फ क्लब के नहीं, अंतरराष्ट्रीय मंच के भी सुपरस्टार थे।

1974: वह गोल जिसने उन्हें अमर कर दिया

पर उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि अभी आनी थी। 1974 का विश्वकप, मेज़बान पश्चिम जर्मनी, कप्तान बेकेनबाउर, और आक्रमण की धुरी मुलर। फाइनल में नीदरलैंड्स की महान टीम सामने थी। दुनिया का बड़ा हिस्सा क्रुइफ़ की टीम को ज़्यादा आकर्षक मानता था। पर फुटबॉल सिर्फ आकर्षण का खेल नहीं है, निर्णायक पलों में गोल करने वाले ही इतिहास लिखते हैं।

7 जुलाई 1974, म्यूनिख का ओलंपियास्टेडियम, 43वां मिनट। मुलर ने एक मुड़ता हुआ शॉट मारकर विजयी गोल किया, उनका 68वां अंतरराष्ट्रीय गोल। जर्मनी 2-1 से चैंपियन बना। मुलर ने सिर्फ 28 साल की उम्र में अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल से संन्यास का एलान कर दिया।

क्लब में भी अटूट रिकॉर्ड

क्लब स्तर पर उनकी कामयाबी भी असाधारण थी। बायर्न म्यूनिख ने लगातार तीन साल, 1974, 1975, 1976, यूरोपीय कप जीता, और मुलर का गोलों का सिलसिला यूरोपीय मंच पर भी जारी रहा। 1971-72 सीज़न में उन्होंने एक ही बुंडेसलीगा सीज़न में 40 गोल का रिकॉर्ड बनाया, जो करीब 50 साल तक अटूट रहा, आख़िर रॉबर्ट लेवांडोव्स्की ने इसे तोड़ा।

उनका गोल अनुपात आज भी अविश्वसनीय लगता है। जर्मनी के लिए उन्होंने सिर्फ 62 मैचों में 68 गोल किए, यानी प्रति मैच 1.1 गोल का औसत, इतिहास में सबसे बेजोड़।

1970 का बैलन डी'ओर

1970 में उन्हें बैलन डी'ओर मिला, जर्मनी के पहले खिलाड़ी जिन्होंने यह सम्मान जीता। उनका दौर आज जैसा करोड़ों डॉलर वाला नहीं था फिर भी वे जर्मनी के सबसे चाहे जाने वाले खिलाड़ियों में थे। मेहनती, विनम्र, और नतीजे देने वाले इंसान के तौर पर पहचाने जाते थे।

जब बायर्न परिवार बन गया

संन्यास के बाद ज़िंदगी आसान नहीं रही, शराब की लत ने उन्हें जकड़ लिया। पर बायर्न म्यूनिख ने उनका साथ नहीं छोड़ा। उनके पुराने साथी उली होनेस और फ्रांज़ बेकेनबाउर ने उन्हें क्लब की रिज़र्व और यूथ टीम का मुख्य कोच बना दिया, जिससे उनकी ज़िंदगी फिर पटरी पर लौटी। यही वजह है कि मुलर और बायर्न का रिश्ता सिर्फ खिलाड़ी और क्लब का नहीं बल्कि परिवार जैसा माना जाता है।

विरासत: गोल करना ही जिनकी कला थी

2021 में उनके निधन के साथ फुटबॉल ने एक ऐसा खिलाड़ी खोया जिसने गोल करने की कला को नई ऊंचाई दी। दुनिया भर से श्रद्धांजलियां आईं, क्योंकि वे सिर्फ महान स्ट्राइकर नहीं थे, गोल की अवधारणा का जीता-जागता रूप थे।

बॉबी चार्लटन गरिमा के प्रतीक थे, डी स्टेफानो पूर्णता के, पुस्कास गोल की कला के वैज्ञानिक, तो गेर्ड मुलर मौके को भुनाने की सबसे ऊंची मिसाल थे। उन्होंने साबित किया कि फुटबॉल में कभी-कभी सबसे मुश्किल काम सबसे आसान दिखता है, गोल करना। और उन्होंने इस आसान दिखने वाले काम को इतिहास की सबसे बड़ी महारत में बदल दिया। आज भी जब किसी युवा स्ट्राइकर को पेनाल्टी बॉक्स में सोचने का तरीका सिखाया जाता है, कहीं न कहीं उसकी जड़ गेर्ड मुलर की विरासत में होती है।

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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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